मग रहे कितने सुगम जगती में !

रचयिता: गोपाल बघेल ‘मधु’

मग रहे कितने सुगम जगती में,

पंचभूतों की प्रत्येक व्याप्ति में;

सुषुप्ति जागृति विरक्ति में,

मुक्ति अभिव्यक्ति और भुक्ति में !

काया हर क्या न क्या है कर चहती,

माया में कहाँ कहाँ है भ्रमती;

करती मृगया तो कभी मृग होती,

कभी सब छोड़ कहीं चल देती !

सोचते ही है सृजन हो जाता,

मात्र चुनना ही एक पथ होता;

उसमें गहराइयाँ उभर आतीं,

खाइयाँ काइयाँ प्रकट होतीं !

धरणि तल कितनीं रहीं धाराएँ,

अजस्र राहें औ वेदनाएँ;

कितने आनन्द स्रोत गहमाएँ,

कितने आलोक लोक दरशाएँ !

त्रिलोक तरजे रहे द्रष्टि में,

तटस्थित कितने रहे त्रिकुटी में;

‘मधु’ माधव से मिल समाधि में,

रह गए उनके मार्ग दर्शन में !

 

 

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