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    Homeपर्यावरणएक दूसरे से जूझते मानव व वन्य प्राणी

    एक दूसरे से जूझते मानव व वन्य प्राणी

    बीना बिष्ट

    हल्द्वानीनैनीताल

    अक्सर हम सभी प्राकृतिक आपदा के बारे में सुनते है तो सबसे पहले हमारे जहन में आम जनजीवन की बात ही आती है जबकि इन आपदाओं से केवल आम जनजीवन ही नहीं जीव जन्तु भी प्रभावित होते है. हालांकि इसके लिए स्वयं मनुष्य जिम्मेदार है. अक्सर हम अपने लाभों के लिए जंगलों को उजाड़ देते हैं, पर वास्तविकता यही है कि यदि जंगलों का अस्तित्व समाप्त होगा तो इसका प्रभाव पर्यावरण पर पडेगा व जानवरों को भी इसका नुकसान उठाना पडेगा. बहुमूल्य खाल व स्वादिष्ट भोजन के लिए जंगली जानवरों का शिकार आज भी छुप-छुप कर किया जाता है. साथ ही मनुष्य द्वारा जंगली जानवरों के आवासों को प्रतिदिन नष्ट किया जा रहा है. इस कारण भी इनका अस्तित्व में संकट उत्पन्न हो गया है. 

    अक्सर जंगली जानवरों का मानव बस्तियों की ओर आने का कारण घटते वन क्षेत्रों को बताया जाता है पर राज्य में 65 प्रतिशत भू-भाग पर वन है. देखा जाए तो तस्करों द्वारा अवैध शिकार के साथ जंगलों में लगने वाली आग, विकास के नाम पर हो रहे अवैध कार्य, जंगलों में घटते आहार व जल स्रोत के लुप्त होने के कारण जंगली जानवर मानव बस्तियों की ओर रुख करने लगे है. ऐसे में एक ओर जहां आम आदमी की जान आदमखोर जानवरों से कैसे सुरक्षित की जाए वहीं वन्य विभाग के सामने भी जंगली जानवरों पर आये दिन होने वाले प्राकृतिक आपदाओं, दुर्घटनाओं व अवैध शिकार से कैसे सुरक्षित की जाए, यह किसी चुनौती से कम नहीं है.

    पदमपुरी धारी मुख्य मार्ग पर दिन दहाड़े बाघ की आवाजाही से ग्रामीणों में दहशत का माहौल व्याप्त है. यातायात के साधनों के अभाव के चलते अधिकतर ग्रामीण स्कूली बच्चे अपना सफर पैदल ही करते हैं. वहीं हल्द्वानी शहर के टांडा जंगल में बाघिन को उसके बच्चों के साथ गश्त लगाते देखा गया है. यह जंगल गांव के नजदीक है. आये दिन गुलदार और बाघ मानव बस्तियों में पहुच कर महिलाओं, बच्चों व मवेशियों को अपना शिकार बना रहे हैं. रामनगर गर्जिया निवासी 55 वर्षीय महिला शांति देवी को बाघ ने उस समय अपना शिकार बनाया जब वह जंगल में चारा जुटाने के लिए गई थी. जंगल ही नही, वरन् आंगन से बच्चों को उठा लेने की बहुत घटनाएं पहाड़ी क्षेत्रों में होती रहती हैं. 

    वन विभाग द्वारा अक्सर ग्रामीणों को जंगल में जाने पर रोक लगा दी जाती है पर सोचने का विषय यह भी है कि पर्वतीय क्षेत्रों की निर्भरता जंगलों पर सबसे अधिक है. चाहे वह चारा-घास, लकड़ी, आजीविका संवर्धन से सम्बन्धित गतिविधि ही क्यों न हो. हमें नहीं भूलना चाहिए यदि जंगल नहीं जाएंगे तो मवेशियों के लिए चारे का संकट उत्पन्न हो जायेगा. जंगल पर रोक लगाना कोई उपाय नहीं वरन् दूसरे आयामों को सोचना होगा. पहाड़ों पर चारे के अभाव के चलते मवेशियों को बेचने की प्रर्था भी चलने लगी है. यह एक सोचनीय विषय है. इन मवेशियों पर पहाड़ी क्षेत्रों की आय भी टिकी है. दुग्ध उत्पादन प्रत्येक ग्राम के लिए आजीविका का प्रमुख साधन है. यदि जानवर नहीं होंगे तो उनकी आर्थिक स्थिति प्रभावित होगी.

    राज्य के ग्रामीण इलाकों को जानवरों की दुहरी मार झेलनी पड़ रही है. न तो आम आदमी का जीवन ही सुरक्षित है और न ही उनकी खेती. एक और जंगली जानवर गुलदार, बाघ जीवन समाप्त कर रहे हैं, वहीं बन्दर, जंगली सुअर व लंगूर खेती को बर्बाद करने में लगे हैं. इन दोनों समस्याओं से निपटने में व्यक्ति असहाय हो गया है क्योंकि गुलदार को मार नहीं सकते हैं. मारने पर सात साल की कैद का प्रावधान है. अतः इससे सहमे हुए ग्रामीण शाम को सूरज ढलते ही घरों के अन्दर दुबकने को मजबूर हो गये हैं. उनकी एकमात्र उम्मीद वन विभाग से लगी है जो इस समस्या के समाधान से छुटकारा दिलाने में समर्थ नहीं है. वन विभाग की रिर्पोट के अनुसार वर्ष 2018 से 2022 तक बाध के हमले में 22 व्यक्तियों ने अपनी गवायी साथ ही 30 व्यक्ति बुरी तरह से जख्मी हुए है. वहीं वर्ष 2000 से अब तक विभिन्न जंगली जानवरों के हमले में 317 व्यक्तियों ने अपनी जान गवाई वहीं 363 घायल हुए हैं. इन आंकड़ो में प्रति वर्ष वृद्धि ही देखने को मिल रही है.

    राज्य में लोमड़ी की प्रजाति जो 15-20 वर्ष पूर्व बड़ी आसानी से देखी जाती थी वह आज विलुप्ति के कगार पर आ गयी है. इनके कम होने के कारण सुअरों का आतंक बहुत अधिक हो गया है. प्रकृति का संतुलन बिगड़ने से जीवों के जीवन पर भी प्रभाव पड़ने लगा है. पर्वतीय क्षेत्रों में गुलदार व मैदानी क्षेत्रों में ट्रांजिट रसेन्यू सेन्टर की स्थापना, अवैध शिकार व वन्य जीव अपराधियों को पकड़ने हेतु डाग स्क्वायड व्यवस्था के साथ रैपिड एक्शन फोर्स व हाईव पैट्राल की स्थापना की है साथ ही अन्य पर भी कार्य जारी है पर हम सबको जागरूक होने की आवश्यकता है. वास्तव में, प्रकृति का विनाश न करें, खुद जिये और जीवों को भी जीने दें, की प्रवृत्ति को अपनाना ज़रूरी है. यही वह मंत्र है जिससे मनुष्य और वन्य जीव न केवल अपना अस्तित्व बचा सकते हैं बल्कि पर्यावरण संतुलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. (चरखा फीचर)

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