लेखक परिचय

निर्मल रानी

निर्मल रानी

अंबाला की रहनेवाली निर्मल रानी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट हैं, पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं...

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निर्मल रानी
हमारे देश के संविधान निर्माताओं द्वारा कुछ ऐसी व्यवस्था की गई है कि यहां विधायक,सांसद, मंत्री,मुख्यमंत्री,प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति जैसे किसी भी पद के लिए किसी निर्धारित डिग्री या डिप्लोमा का होना कोई ज़रूरी नहीं है। इन पदों पर पहुंचने वाला व्यक्ति जनप्रतिनिधि है अर्थात् जनता ने उसे निर्वाचित कर देश की विधायिका का अंग बनाकर भेजा है यही उसकी सबसे बड़ी योग्यता है। ज़ाहिर है इस श्रेणी के लोग हमारी नज़रों में विशिष्ट व्यक्ति अथवा वीआईपी की हैसियत रखते हैं। इसके अलावा भी हमारे देश में अनेक प्रकार के बोर्ड अथवा निगम या परिषदों के चेयरमैन अथवा मेयर आदि नियुक्त किए जाते हैं या इनका औपचारिक निर्वाचन किया जाता है। यहां भी शिक्षा का कोई खास महत्व नहीं है। लिहाज़ा इस श्रेणी के लोग भी समाज में वीआईपी का रुतबा रखते हैं।
हमारे देश में विशिष्ट व्यक्ति अथवा वीआईपी बनने की चाह रखने वाला एक वर्ग ऐसा भी है जो सांसद,विधायक,मंत्री अथवा चेयरमैन नहीं भी बन पाता फिर भी उसकी यह मनोकामना होती है कि वह समाज में स्वयं को एक रुतबेदार शख्स के रूप में पेश कर सके। और अपनी कार पर वीआईपी का स्टिकर चिपका सके। और यदि उस कार पर चोरी-छुपे लाल बत्ती लगाने का अवसर भी मिल जाए फिर तो सोने में सुहागा है। ऐसे लोग स्वयंभू राष्ट्रीय अथवा अंतर्राष्ट्रीय फजऱ्ी संगठन बना डालते हैं और स्वयं भी ऐसे फजऱ्ी संगठनों के राष्ट्रीय अध्यक्ष अथवा राष्ट्रीय चेयरमैन बन बैठते हैं। इसके बाद ऐसे ‘विशेष प्राणी’ अपने अध्यक्ष या चेयरमैन के नाम की कोई आकर्षक सी प्लेट बनवाकर अपने वाहन में लगाते हैं। इसके साथ-साथ वे वाहन के शीशे पर वीआईपी का स्टिकर भी चिपका देते हैं। भले ही वीआईपी शब्द अंग्रेज़ी में मोटे अक्षरों में तथा उसके नीचे बारीक अक्षरों में पार्किंग क्यों न लिखा हो। ऐसे लोगों की यही चाह होती है कि जब वे सडक़ों पर अपनी कथित वीआईपी स्टिकर लगी हुई गाड़ी पर चलें तो राहगीर उनकी गाड़ी की ओर निहारें, रास्ते में किसी पुलिस नाके पर उनकी कोई रोक-टोक न करें और कोई तलाशी न ले। भले ही इस वीआईपी स्टिकर की आड़ में कोई काला धंधा ही क्यों न हो रहा हो।
यहां एक बात और भी गौर करने योग्य है कि प्रधानमंत्री से लेकर राज्य के मंत्रियों तक यानी वास्तविक विशिष्ट व्यक्तियों में कुछ ही लोग ऐसे होते होंगे जिनकी कारों पर वीआईपी के स्टिकर लगे होते हों। क्योंकि वे वास्तविक विशिष्ट व्यक्ति की श्रेणी के लोग होते हैं और उनकी उपस्थिति या आवागमन स्वयं उनके विशिष्ट व्यक्ति होने की शिनाख्त करती है। परंतु जो लोग विशिष्ट व्यक्ति न होते हुए भी विशिष्ट व्यक्तियों की श्रेणी में आना चाहते हैं परंतु उनके पास कोई ऐसा सरकारी अधिकृत पद नहीं होता वे फजऱ्ी संगठनों के पदाधिकारी होने अथवा अपने वाहन पर वीआईपी का स्टिकर लगाकर स्वयं को वीआईपी प्रदर्शित करने का ढोंग रचते हैं। बाज़ार में चुंबक से चिपकने वाली रेड लाईट उपलब्ध हंै जो कोई भी व्यक्ति खरीदकर अपने वाहन के शीशे के उपरी हिस्से में लाल बत्ती लगाने वाली जगह पर चिपका सकता है। फजऱ्ी लोग आमतौर पर इसीलाल बत्ती का इस्तेमाल करते हैं। आम राहगीरों का ध्यान अपनी ओर खींचने का एक और निराला तरीका हमारे देश में कुछ मनचले लोगों द्वारा इस्तेमाल किया जाता है। मिसाल के तौर पर किसी विधायक के पुत्र के पास कोई रुतबा नहीं है तो वह अपनी कार के पीछे ‘विधायक पुत्र’ ही लिखवा बैठता है। एक बार सोशल मीडिया में तो एक ऐसा चित्र देखने को मिला जिसमें कार के पीछे के शीशे पर हिंदी में मोटे अक्षरों में लिखा गया था-‘विधायक पौत्र’ यानी विधायक जी की तीसरी पीढ़ी तक अपना परिचय विशिष्ट व्यक्ति के पौते के रूप में देने को उतावली रहती है।
हालांकि अब देश की अदालतें व प्रशासन ने भी इस तरह की वीआईपी बनने व इसका प्रदर्शन करने की आज़ादी पर लगाम कसने की कवायद शुरु कर दी है। इसकी श्रेणियां निर्धारित की जा चुकी हैं और यह भी निर्धारित किया जा चुका है कि किस क्षेत्र का विशिष्ट व्यक्ति किन सीमाओं के भीतर ही अपने वाहन में लाल बत्ती का प्रयोग कर सकता है। जो लोग कानून का पालन करते हैं तथा लाल,पीली व नीली बत्तियों के अंतर को समझते हुए सीमाओं के भीतर रहकर इसका प्रयोग करते हैं वे तो सरकारी व अदालती कायदे-कानूनों के पालनकर्ता समझे जाते हैं। परंतु इन ताज़ातरीन दिशा निर्देशों के बावजूद अब भी उसी श्रेणी के लोग जो कल भी इससे संबंधित सरकारी नियमों की धज्जियां उड़ाते फिरते थे ऐसे स्वयंभू विशिष्ट प्राणी आज भी कानूनों का खुला उल्लंघन करते दिखाई दे रहे हैं।
हमारे देश में आज़ादी का इस हद तक दुरुपयोग हो रहा है कि कोई ऐसा व्यक्ति जो स्वंय ही दहशत फैलाने में महारत रखता हो वह व्यक्ति यदि चाहे तो ‘आतंकवाद विरोधी’ नाम का कोई संगठन बना बैठता है। और स्वयं भी न सिर्फ उसका राष्ट्रीय अध्यक्ष बन जाता है बल्कि राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद वह प्रदेश अध्यक्ष व राष्ट्रीय महामंत्री जैसे पदों की ‘टॉिफयां’ भी अपने ही हमख्याल लोगों में बांटने लग जाता है। उधर दूसरी ओर बेरोज़गारी के इस दौर में तथा वीआईपी बनने की चाह में अच्छे-भले लोग भी पद लेने की लालच में ऐसे स्वयंभू राष्ट्रीय अध्यक्षों के झांसे में आ जाते हैं। इसी तरह हमारे देश में अनेक लोग ऐसे भी मिलेंगे जो अपने भ्रष्टाचारों पर पर्दा डालने के लिए ‘भ्रष्टाचार विरोधी’ अथवा ‘भ्रष्टाचार निरोधक’ कोई संगठन बनाए बैठे हें और समाज में स्वयं को विशिष्ट व्यक्ति की हैसियत से पेश करते हैं। ऐसे स्वयंभू विशिष्ट प्राणियों की भूख यहीं समाप्त नहीं होती बल्कि ऐसे अनेक लोग समय-समय पर अपने घरों या कार्यालयों में किसी न किसी विशिष्ट अथवा स्वयंभू विशिष्ट व्यक्ति को किसी न किसी बहाने आमंत्रित करते रहते हैं और इस अवसर पर पास-पड़ोस के लोगों को बुलाकर उन्हें अपनी पहुंच व अपने कथित ऊंचे संबंधों से अवगत कराने की कोशिश करते हैं। ऐसा यह इसलिए करते हैं ताकि कम से कम अपने पास-पड़ोस में उनका रुतबा कायम रहे और आम लोग उसकी कथित ऊंची पहुंच से परिचित हो सकें।
दरअसल इस प्रकार के थोथे व खोखले हथकंडे उसी मानसिकता के लोगों द्वारा अपनाए जाते हैं जिन्हें इस बात का यकीन रहता है कि समाज में कोई उनका मान-सम्मान नहीं करता और आम लोग उसे कोई अहमियत नहीं देते। दूसरी ओर इसी समाज में कुछ ऐसे लोग भी है जो चाहे लाल बत्ती की कार पर घूमें या न घूमें, वह विधायक,सांसद या मंत्री भी हों या न हों परंतु समाज में उनकी मान-प्रतिष्ठा कायम रहती है। ऐसे लोग अपने नेक कर्मों,अपनी समाजसेवा या अपने क्षेत्र विशेष में की जा रही अपनी अभूतपूर्व कारगुज़ारियों के चलते समाज में लोकप्रिय होते हैैं। ऐसे लोगों को गाड़ी में लाल बत्ती लगाने,किसी स्वयंभू संगठन का प्रमुख बनने या अपने घर में बार-बार पत्रकार सम्मेलन बुलाकर निरर्थक बातें कर अखबार में अपना फोटो छपवाने का शौक नहीं होता। जनता उन्हें खुद-बखुद सलाम करती है तथा उनका सम्मान करती है। जबकि वीआईप्ी बनने की चाह रखने वाले फजऱ्ी लोग मात्र दिखावा कर अथवा छल या पाखंड के द्वारा समाज में अपने को स्थापित करने व जनता में जबरन अपना परिचय कराने के आदी हो जाते हैं। ऐसे लोगों से समाज को सचेत रहना चाहिए।
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