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    इस कठिन समय में उनके बिना

    राष्ट्रवादी पत्रकारिता के प्रमुख हस्ताक्षर थे रामशंकर अग्निहोत्री

    -संजय द्विवेदी

    वे राममंदिर के आंदोलन के व्यापक असर के दिन थे। 1990 के वे दिन आज भी सिरहन से भर देते हैं। तभी मैंने पहली बार वरिष्ठ पत्रकार रामशंकर अग्निहोत्री को विश्व संवाद केंद्र, लखनऊ के पार्क रोड स्थित दफ्तर में देखा था। आयु पर उनका उत्साह भारी था। उनके जीवन के लक्ष्य तय थे। विचारधारा उनकी प्रेरणा थी और कर्म के प्रति समर्पण उनका संबल। वे जानते थे वे किस लिए बने हैं और वे यह भी जानते थे कि वे क्या कर सकते हैं। तब से लेकर रायपुर, भोपाल और दिल्ली की हर मुलाकात में उन्होंने यह साबित किया कि वे न तो थके हैं न ही हारे हैं।

    बुधवार सुबह जब रायपुर से डा. शाहिद अली का फोन आया कि अग्निहोत्री जी नहीं रहे तो सहसा इस सूचना पर भरोसा नहीं हुआ। क्योंकि उनकी गति और त्वरा कहीं से कम नहीं हुयी थी, इस विपरीत समय में भी और अपनी बढ़ती आयु के चलते भी। काम करने के अंदाज और तेजी से कहीं भी जा पहुंचने में वे हम नौजवानो से होड़ लेते थे। हम सोचते थे यह आदमी ऐसा क्यूं है। लेकिन पिछले साल जब मध्यप्रदेश की सरकार ने उन्हें अपने प्रतिष्ठित माणिकचंद्र वाजपेयी सम्मान से अलंकृत किया और उस मौके पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान,संस्कृति मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा की मौजूदगी में पूर्व सरसंघचालक के.सी.सुदर्शन ने जो कुछ उनके बारे में कहा उसने कई लोगों के भ्रम दूर कर दिए। श्री सुदर्शन ने स्वीकार किया कि वे श्री अग्निहोत्री के ही बनाए स्वयंसेवक हैं और उनके एक वाक्य – “संघ तुमसे सब करवा लेगा” ने मुझे प्रचारक निकलने की प्रेरणा दी। यह एक ऐसा स्वीकार था जो रामशंकर अग्निहोत्री की विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता को जताने के लिए पर्याप्त था। यह बात यह भी साबित करती है कि अगर वे चाहते तो कोई भी उंचाई पा सकते थे किंतु उन्होंने जो दायित्व उन्हें मिला उसे लिया और प्रामणिकता से उसे पूरा किया। आज की राजनीति में पदों की दौड़ में लगे लोग उनसे प्रेरणा ले सकते हैं।

    14 अप्रैल, 1926 को मप्र के सिवनी मालवा में जन्में श्री अग्निहोत्री की जिंदगी एक ऐसे पत्रकार का सफर है जिसने कभी मूल्यों से समझौता नहीं किया। वे अपनी युवा अवस्था में जिस विचार से जुड़े उसके लिए पूरी जिंदगी होम कर दी। विचारधारा और लक्ष्यनिष्ठ जीवन के वे ऐसे उदाहरण थे जिस पर पीढ़ियां गर्व कर सकती हैं। पांचजन्य, राष्ट्रधर्म, तरूण भारत, हिंदुस्तान समाचार, आकाशवाणी, युगवार्ता वे जहां भी रहे राष्ट्रवाद की अलख जगाते रहे। उनका खुद का कुछ नहीं था। देश और उसकी बेहतरी के विचार उनकी प्रेरणा थे। राजनीति के शिखर पुरूषों की निकटता के बावजूद वे कभी विचलित होते नहीं दिखे। युवाओं से संवाद की उनकी शैली अद्बुत थी। वे जानते थे कि यही लोग देश का भविष्य रचेंगें। रायपुर में हाल के दिनों में उनसे अनेक स्थानों पर, तो कभी डा. राजेंद्र दुबे के आवास पर जब भी मुलाकात हुयी उनमें वही उत्साह और अपने लिए प्यार पाया। वे सदैव मेरे लिखे हुए पर अपनी सार्थक टिप्पणी करते। अपने विचार परिवार के प्रति उनका मोह बहुत प्रकट था। संपर्कों के मामले में उनका कोई सानी न था। पहली मुलाकात में ही आपका परिचय और फोन नंबर सब कुछ उनके पास होता था और वे वक्त पर आपको तलाश भी लेते। मैंने पाया कि उनमें बढ़ी आयु के बावजूद चीजों को जानने की ललक कम नहीं हुयी थी वे मुझे कभी विश्राम में दिखे ही नहीं। यह ऐसा व्यक्तित्व था जिसकी सक्रियता ही उसकी पहचान थी। हर आयोजन में वे आते और खामोशी से शामिल हो जाते। उन्हें इस बात की कभी परवाह नहीं थी उन्हें नोटिस भी किया जा रहा है या नहीं। मान-अपमान की परवाह उन्होंने कभी नहीं की, इस तरह के मिथ्या दंभ से दूर वे अपने बहुत कम आयु के हम जैसे नौजवानों के बीच भी खुद को सहज पाते तो सत्ता और शासन के शिखरों पर बैठे लोगों के बीच भी। जो व्यक्ति पांचजन्य का प्रबंध संपादक, राष्ट्रधर्म का संपादक, लगभग एक दशक नेपाल में एक हिंदी समाचार एजेंसी का संवाददाता रहा हो, हिंदुस्तान समाचार का प्रधानसंपादक और अध्यक्ष जैसे पदों पर रहा हो, जिसे भारतीय जनता पार्टी ही नहीं देश की राजनीति के प्रथम पंक्ति के सभी राजनेता प्रायः नाम से पुकारते हों, जिसने दर्जन भर देशों की यात्राएं की हों, साहित्य और पत्रकारिता की दुनिया में जिसकी एक बड़ी जगह हो। माधवराव सप्रे संग्रहालय,भोपाल से लेकर इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती जैसे संस्थाएं जिसे सम्मानित कर चुकी हों ऐसे व्यक्ति का इस कठिन समय में चला जाना वास्तव में एक बड़ा शून्य रच रहा है। वास्तव में वे एक ऐसे समय में हमसे विदा हुए हैं जब पत्रकारिता पर पेड न्यूज और राजनीति पर जनविरोधी आचरणों के आरोप हैं। देश अनेक मोर्चों पर कठिन लड़ाइयां लड़ रहा है चाहे वह महंगाई, आतंकवाद और नक्सलवाद की शक्ल में ही क्यों न हों। आज हम यह भी कह सकते हैं कि रामशंकर अग्निहोत्री अपने हिस्से का काम कर चुके हैं, पर क्या हमारी पीढ़ी में उनका उत्तराधिकार, उनकी शर्तों पर लेने का साहस है? शायद नहीं, क्योंकि ये जगह सिर्फ उनकी है और इस विपरीत समय में सारे युद्ध हमें ही लड़ने हैं उनके बिना ही।

    संजय द्विवेदी
    संजय द्विवेदीhttps://www.sanjaydwivedi.com
    लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं। संपर्कः अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल (मप्र) मोबाइलः 098935-98888

    8 COMMENTS

    1. आपके विचार गहन मंथन
      और मनन के योग्य तो हैं ही,
      उनसे सीख और समझ के नए सेतु
      भी बन सकते हैं बशर्ते कि अमल की
      ज़रुरत समझी जाये अब….
      ================================
      डॉ.चन्द्रकुमार जैन

    2. संजय जी,
      लेखनी के निर्विकार साधक पर
      आपकी अभिव्यक्ति सटीक लगी.
      ==========================
      डॉ.चन्द्रकुमार जैन
      राजनांदगांव छत्तीसगढ़
      मो.09301054300

    3. मेरा सौभाग्य रहा कि विगत तीन चार महीनों में उनसे संपर्क में रहा। प्राय: युवाओं के उत्साह की चर्चा की जाती है,
      कहा जाता है कि राजनीति खेल हर जगह युवा उत्साह का दौर है…लेकिन श्री रमाशंकर अग्निहोत्री
      जी से मिलने के बाद इस मान्यता को चुनौती मिली। उनका अंतिम समय तक समाजिक कार्यों के प्रति
      जो उत्साह था, अभिभूत करने वाला रहा..उनकी प्रेरणा जीवंत रहेंगी….विशेषत; पत्रकारिता जगत के लिए आप प्रेरणापुरष हैं…
      अरविंद मिश्र

    4. अग्निहोत्री जी पत्रकारिता की उस महान परम्परा के अनुगामी थे, जो मूल्यों को जीती है. उनके चले जाने के बाद अब पत्रकारिता में ऐसे नैतिक, सरल, सज्जन, ऊर्जावान-प्राणवान, ज्ञानवान, स्नेहवान लोग हम कहाँ से लायेंगे. मुझे भी उनका मिलता रहा. अब उनकी निर्मल यादें हमारा पाते रहेंगी. उन्हें श्रद्धांजलि.

    5. कल जब मुझे भाजपा कार्यालय से सुबह फोन आया की रामशंकरजी नहीं रहे तो सहसा ही मुझे ऐसा लगा की मानो किसी निकट व्यक्ति को मैंने खो दिया , पिछले कुछ दिनों या महीनो से मैं उनके सतत संपर्क में था और उनके साथ समय गुजारने का सौभाग्य प्राप्त हुआ ,पर सच कहू तो कभी मुझे इस बात का पता ही नहीं चला की वे ८५ वर्ष के थे मुझे हमेशा से ऐसा अनुमान होता था की वे ७० वर्ष के आस पास के होंगे क्योंकि उनका जोश ही कुछ अलग था कई बार मैं जल्दी नहीं उठ पाता था पर वे उस वक्त मुझे सुबह फ़ोन कर देते थे और जब भी मैं उनसे मिलने भाजपा कार्यालय जाता था कभी उन्हें आराम करते नहीं देखा ….उन्होंने मुझे अपने वेबसाइट के लिए कई बार विभिन्न अखबारों के कतरन दिया करते थे और कहते थे की इसका फाइल बना न बेटा और अपने पास रखना …शायद उनके उन कतरने मेरे लिए अब किसी अलंकर से कम साबित नहीं होंगे और मैं उन्हें उतना ही सम्हाल के रखूँगा ..मैं जब उन्हें एस्कोर्ट के बिस्तर पे देखा तो कैसा अनुभव हुआ उसे वाक्यों में कहना बहुत ही कठिन होगा …पर कल रात मैं सो नही पाया और उनका बेटा कहना सच में बहुत याद आता है

    6. ॥श्रद्धांजलि॥
      ॥अग्निहोत्री जी की स्मृति में॥

      कैसे, कुछ साथी, आकर, चले जाते हैं?
      जैसे, पल पल, गूंज- बिना-शोर, बह जाते हैं।

      आस्मान, देखते ही, समझ आता है।
      किसी दिन पर, कोई नाम, न लिखा होता है।

      समय को, नापते जहां, तरुओंकी छाया से,
      छाया न हो, तो, आसमानके तारोंसे,

      ढ़का जो, आस्मान, घनी घटा-मेघोंसे,
      ढक देते, समयको, घडीकी, डिबिया में,

      समय के पार जहां काल भी न होता है।
      कबीर, मीरा, तुकाराम का देस होता है।

      अग्नि आप ही, प्रज्वलित रखते थे,
      होत्र* थे, और होतृ** दोनो आप थे।

      शब्दों में, कैसे मैं, पकड पाता?
      हिमाले को नापने तो, हिमाला लगता।

      कुछ फूल शीर्ष चढकर निर्मल हो जाते हैं।
      कैसे कुछ साथी आकर चले जाते हैं?

      होत्र*= यज्ञमें अर्पण करनेकी वस्तु,
      होतृ**= यज्ञ (संपन्न) कर्ता

    7. श्रधेय रामशंकर अग्निहोत्री के स्वर्गारोहण पर आपका लेख पढ़ा .स्वर्गीय अग्निहोत्री जी त्याग व तपस्या की प्रतिमूर्ती थे . वे साहित्य के साधक थे ,सचमुच उनके निधन से साहित्य तथा पत्रकारिता जगत को अपूरणीय छति हुई है .अशोक बजाज रायपुर

    8. द्विवेदी जी ने यह लेख किखकर स्वर्गीय श्री राम शंकर अग्निहोत्री जी की स्मृतियों को जीवंत कर दिया. इस सुन्दर आलेख हेतु साधुवाद.

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