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    राष्‍ट्रवादी चिंतक रामशंकर अग्निहोत्री नहीं रहे

    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक, वरिष्ठ पत्रकार एवं मानव अध्ययन शोधपीठ, कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर (छत्तीसगढ़) के अध्यक्ष श्री रामशंकर अग्निहोत्री का आज सुबह रायपुर में निधन हो गया। वे कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे और एस्कार्ट रायपुर में भर्ती थे। रायपुर में आज उनका अंतिम संस्कार होगा।

    राष्‍ट्रवादी पत्रकारिता के इतिहास के मील के पत्थर अग्निहोत्रीजी ने पत्रकारिता के मूल्यों के साथ कभी समझौता नहीं किया। आजादी के तुरंत बाद पत्रकारिता में जब विदेशी विचारधारा से अनुप्राणित पत्रकारों का दबदबा था वैसे चुनौतीपूर्ण दौर में उन्‍होंने अपने राष्‍ट्रवादी तेवर से कई मुद्दों पर बेबाक टिप्‍पणी की। आपातकाल और रामजन्‍मभूमि आंदोलन से जुडी खबरों को वैश्विक क्षितिज पर प्रसारित करने में उन्‍होंने उल्‍लेखनीय भूमिका निभाई।

    सन् २००८ के लिए माणिकचन्द्र वाजपेयी राष्ट्रीय पत्रकारिता पुरस्कार से सम्‍मानित श्री रामशंकर अग्निहोत्री का जन्म 14 अप्रैल, 1926 को मध्य प्रदेश के सिवनी मालवा, जिला होशंगाबाद में हुआ था। सागर विश्वविद्यालय से 1950 में बी.ए. करने के बाद उन्होंने 1952 में नागपुर विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा प्राप्त किया।

    श्री अग्निहोत्री 1944 में मंडला जिले में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक बने। वे 1949 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, महाकौशल के संगठन मंत्री नियुक्त हुए। श्री अग्निहोत्री 1951 में विन्ध्य प्रदेश भारतीय जनसंघ के संगठन मंत्री बने। वे 1951-52 में दैनिक युगधर्म, नागपुर के सह संपादक रहे। वे 1953-54 में सांध्य दैनिक आकाशवाणी (दिल्ली) के संपादक बने। इस बीच वे कश्मीर सत्याग्रह से जुड़े रहे।

    श्री अग्निहोत्री 1954-55 में पांचजन्य (मध्य भारत संस्करण) के संपादक रहे। वे 1956 से 1964 तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के महाकौशल प्रांत प्रचारक रहे। वे 1964 से 1968 तक मासिक राष्ट्रधर्म, लखनऊ के संपादक रहे। वे 1969 में युगवार्ता, फीचर्स सर्विस, नई दिल्ली के संपादक थे। वर्ष 1970 से 1975 तक वे हिन्दुस्तान समाचार न्यूज एजेंसी के ब्यूरो प्रमुख रहे। इसके बाद 1971 से वे युद्ध संवाददाता (पश्चिमी क्षेत्र) रहे।

    श्री अग्निहोत्री 1975 से 1977 तक एकीकृत समाचार न्यूज एजेंसी नई दिल्ली (आपातकाल) के उप समाचार संपादक रहे। वर्ष 1978 से 1980 तक उन्होंने हिन्दुस्थान समाचार ( महाराष्ट्र-गुजरात ) मुंबई के क्षेत्रीय व्यवस्थापक के रूप में सेवा की। वे 1981 से 1983 तक विशेष संवाददाता (नेपाल) काठमांडू रहे। इसके बाद वे हिन्दुस्थान समाचार, नई दिल्ली के प्रधान संपादक रहे। श्री अग्निहोत्री 1986 से 1989 तक पांचजन्य साप्ताहिक, दिल्ली के प्रबंध संपादक और भारत प्रकाशन, नई दिल्ली के महाप्रबंधक रहे। वे 1989 से 1990 तक श्री राम कार सेवा समिति, सूचना केन्द्र, नई दिल्ली के निदेशक तथा 1992 में श्री रामजन्म भूमि मीडिया सेंटर, रामकोट, अयोध्या के निर्देशक थे। उन्होंने 1991 से 1998 तक मीडिया फोर फीचर्स लखनऊ का प्रकाशन और संपादन किया। वे 1999 से 2002 तक भारतीय जनता पार्टी के केन्द्रीय मीडिया प्रकोष्ठ, नई दिल्ली में रहे। उन्होंने 2002 से 2004 तक मीडिया वाच का संपादन और प्रकाशन किया।

    श्री अग्निहोत्री 2004 में हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषी संवाद समिति के अध्यक्ष रहे।

    साहित्य सृजन के क्षेत्र में भी श्री अग्निहोत्री सुपरिचित हस्ताक्षर थे । उनका काव्य संग्रह सत्यम एकमेव प्रकाशित है। उन्‍होंने तंजानिया, कोरिया, युगांडा, इथोपिया, नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान और यूनाइटेड किंगडम का विदेश प्रवास किया। श्री अग्निहोत्री को उनके श्रेष्ठ कार्य के लिए अनेक पुरस्कार से सम्‍मानित किया गया था। इनमें इन्द्रप्रस्थ साहित्य भारती द्वारा डा. नगेन्द्र पुरस्कार, राष्ट्रीय पत्रकारिता कल्याण न्यास द्वारा स्व. बापूराव लेले स्मृत्ति पत्रकारिता पुरस्कार तथा माधवराव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान भोपाल द्वारा लाला बलदेव सिंह सम्मान उल्‍लेखनीय हैं।

    चित्र परिचय: (सबसे बाएं) शॉल और ताम्रपत्र से सम्‍मानित श्री रामशंकर अग्निहोत्री

    4 COMMENTS

    1. श्रधेय रामशंकर अग्निहोत्री के स्वर्गारोहण पर आपका लेख पढ़ा .स्वर्गीय अग्निहोत्री जी त्याग व तपस्या की प्रतिमूर्ती थे . वे साहित्य के साधक थे ,सचमुच उनके निधन से साहित्य तथा पत्रकारिता जगत को अपूरणीय छति हुई है .अशोक बजाज रायपुर

    2. ॥श्रद्धांजलि॥
      ॥अग्निहोत्री जी की स्मृति में॥

      कैसे, कुछ साथी, आकर, चले जाते हैं?
      जैसे पल पल, गूंज-बिना-शोर, बह जाते हैं।

      आस्मान, देखते ही, समझ आता है।
      किसी दिन पर, कोई नाम, न लिखा होता है।

      समय को, नापते जहां, तरुओंकी छाया से,
      छाया न हो, तो, आसमानके तारोंसे,

      ढ़का जो, आस्मान, घनी घटा-मेघोंसे,
      ढक देते, समयको, घडीकी, डिबिया में,

      समय के पार जहां काल भी न होता है।
      कबीर, मीरा, तुकाराम का देस होता है।

      अग्नि आप ही, प्रज्वलित रखते थे,
      होत्र* थे, और होतृ** दोनो आप थे।

      शब्दों में, कैसे मैं, पकड पाता?
      हिमाले को नापने तो, हिमाला लगता।

      कुछ फूल शीर्ष चढकर निर्मल हो जाते हैं।
      कैसे कुछ साथी आकर चले जाते हैं?

      होत्र*= यज्ञमें अर्पण करनेकी वस्तु,
      होतृ**= यज्ञ (संपन्न) कर्ता

    3. राष्ट्रवादी और आदर्श पूर्ण पत्रकारिता के पुरोधा के गमन पर किसे पीड़ा नहीं होगी. पर उनके प्रति सच्ची श्रधांजलि यही होगी की उनके पीछे रहगये पत्रकार व साहित्य जगत के लोग उनकी तेजस्वी मशाल को मंद न होने दें. साहित्य व मीडिया जगत पर इतना बड़ा संकट शायद कभी नहीं था,वर्तमान परिस्थितियां तो अतीत में कभी भी रही होने की जानकारी नहीं मिलती. ऐसे में लेखनी के सिपाहियों का काम अत्यंत कठिन और चुनौतीपूर्ण है. स्वर्गीय अग्निहोत्री जी का पथ आलोक इस हेतु हमारे सामने है. ईश्वर उन्हें पुनः भारत की पवित्र भूमि पर मानव देह में भेजें तथा वे अपने प्रयासों को अपने चरम क्षुओं से साकार होता देख सकें .
      मर्म स्पर्शी लेख हेतु गिरीश जी को नमन.

    4. अरे…? ये क्या हुआ? एक भयानक दुखद खबर मिली…अभी चार-पांच दिन पहले ही वयोवृद्ध लेखा-पत्रकार अग्निहोत्री जी से मेरी मुलाकात एकात्म परिसर में हुई थी. पत्रकार रसिक परमार के साथ. बहुत देर तक हम सब बतियाते रहे. उस वक्त तो वे स्वस्थ और प्रसन्नचित्त थे. उन्हें मैंने अपनी पत्रिका ”सद्भावना दर्पण” दी थी. उन्होंने मुझे बताया की भविष्य में एक कार्यक्रम करने की योजना है. गाँधी, लोहिया और दीनदयाल उपाध्याय पर विचार सेमिनार करेंगे. मैं उन्हें एक -दो नाम भी सुझाये थे. उन्होंने मुझे दीनदयाल उपाध्याय जी पर केन्द्रित एक पुस्तक भी भेंट की थी. वे जब से रायपुर मे आये, किसी न किसी कार्यक्रम में उनके दर्शन होते रहे. पंद्रह दिन पहले ”दासबोध” के हिंदी अनुवाद के सौ वर्ष पूर्ण होने पर एक कार्यक्रम हुआ था. वहा भी भेट हुई थी. दासबोध पर मेरे विचारों को सुन कर उन्होंने आशीर्वाद दिया था. मैं उनके सहज-सरल व्यक्तित्व से प्रभावित था. वे भारतीय पत्रकारिता के नैतिक पुरुष थे. जब-जब उन्हें देखा तो लगा, अच्छे लोगों को इनके जैसा ही होना चाहिए. आज वे हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनकी याद बनी रहेगी. उन्होंने लंबा-स्वस्थ जीवन जीया. और नयी पीढ़ी को समुचित दिशा देते रहे. उनका काम हमेशा याद किया जायेगा. उन्हें मेरी अश्रुपूरित श्रद्धांजलि

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