लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

 

केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में शपथ-पत्र प्रस्तुत कर बताया है कि देशभर में 1765 सांसद और विधायकों के विरुद्ध 3045 आपराधिक मुकदमे लांबित हैं। दागी माननीयों की संख्या उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक, इसके बाद तमिलनाडू दूसरे और बिहार तीसरे नबंर पर हैं। ये आंकड़े केंद्र सरकार ने शीर्ष न्यायालय के निर्देश पर जुटाए हैं। दरअसल सुप्रीम कोर्ट में भाजपा नेता और वकील अश्वनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर ये आंकड़े अदालत ने एकत्रित कराए हैं। याचिका में सजायाफ्ता जनप्रतिनिधियों के चुनाव लड़ने पर आजीवन रोक लगाने की मांग भी की गई है। मौजूदा कानून में सजा के बाद जेल से छूटने के छह वर्ष तक चुनाव नहीं लड़ने की अयोग्यता का प्रावधान है। इसके बाद कोई भी सजायाफ्ता व्यक्ति या नेता चुनाव लड़ सकता है।

इन आंकड़ों के सामने आने से यह तो साफ हो गया है कि राजनीति में दागी नेताओं के प्रभुत्व पर कोई अंकुश नहीं लगा है। 1765 जो सांसद एवं विधायक दागी हैं, उन पर 3045 मामले दर्ज हैं। साफ है, कई प्रतितिधियों पर एक से अधिक मामले दर्ज हैं। यह संख्या तब है, जब बाॅम्बे उच्च न्यायालय के आंकड़े अभी नहीं आए हैं। दरअसल केंद्र सरकार ने आंकड़े एकत्र करने के लिए सभी राज्य सरकारों, केंद्र शासित प्रदेशों, राज्य विधानसभाओं तथा राज्यसभा एवं लोकसभा सचिवलायों के साथ उच्च न्यायालयों से दागी प्रतिनिधियों की सूचना मांगी थी। इनमें से 23 उच्च न्यायालय, 7 विधानसभाओं और ग्हारह राज्य व केंद्र शासित प्रदेशों ने ही दागियों का ब्यौरा भेजा है। इससे यह पता चलता है कि हमारी राज्य सरकारें एवं विधानसभाएं सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अवहेलना करने से भी नहीं हिचकिचाती हैं।

यह स्थिति तब है, जब सर्वोच्च न्यायलय 10 जुलाई 2013 को एक फैसले के जरिए जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8;4द्ध को अंसवैधानिक करार दे चुकी है। इस आदेश के मुताबिक अदालत द्वारा दोषी ठहराते ही जनप्रतिनिधि की सदस्यता समाप्त हो जाएगी। अदालत ने यह भी साफ किया था कि संविधान के अनुच्छेद 173 और 326 के अनुसार दोषी करार दिए लोगों के नाम मतदाता सूची में शामिल ही नहीं किए जा सकते हैं। इसके उलट जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8;4द्ध के अनुसार सजायाफ्ता जनप्रतिनिधियों को निर्वाचन में भागीदारी के सभी अधिकार हासिल हैं। अदालत ने महज इसी धारा को विलोपित कर दिया था। इसी आधार पर लालू प्रसाद यादव जैसे प्रभावी नेता सजा मिलने के बाद चुनाव लड़ने से वंचित है।

 

दरअसल हमारे राजनीतिक परिवेश में आज भी सभी राजनीतिक दलों में टिकट देने के मानदंड हर हाल में जिताऊ उम्मीदवार है। इसलिए राजनीतिक दल धन और बाहुवली उम्मीदवारों की खोज में रहते हैं। फिर चाहे वह हत्यारा, बलात्कारी, अपहकर्ता या डकैत ही क्यों न हो। यह योग्यता रखने वाले दलबदलुओं को भी दूसरे दल आसानी से झेल लेते हैं। यही वजह रही कि दागियों की संख्या सदनों में बढ़ती जा रही हैं। एसोसिएशन फाॅर डेमोक्रेटिक रिफाॅर्म ने इन्हीं प्रतिनिधियों द्वारा चुनाव लड़ते वक्त जो शपथ पत्र पेश किए थे, उनके आधार पर जुटाए आंकड़ो से पता चला था कि लोकतंत्र के पवित्र सदनों में 4835 सांसद व विधायकों में से 1448 के खिलाफ आपराधिक मामले चल रहें हैं। इनमें 369 प्रतिनिधि ऐसे हैं, जिन पर महिलाओं को प्रताड़ित व यौन उत्पीड़न के मामले विचाराधीन हैं। पूर्व बसपा सांसद धनंजय सिंह और उनकी दंत चिकित्सक पत्नी जागृति सिंह को नौकारानी की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। दूसरी तरफ जूनागढ़ से भाजपा सांसद दीनू बोधा सोलंकी को आरटीआई कार्यकरता अमित जेठवा के हत्याकांड में हिरासत में लिया गया था। जाहिर है, ऐसा कानून फौरन वजूद में लाने की जरूरत है, जो राजनीतिक दागियों के आरोपित होने के साथ ही, उन्हें मिली विशेष कानूनी सुरक्षा से वंचित कर दे।

अपराधियों को टिकट देने की विवशता के शिकार सभी राजनीतिक दल हैं। 2013 के राजस्थान के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने राहुल गांधी के राजनीतिक शुचिता संबधी दिशा-निर्देशों को ठेंगा दिखाते हुए उन सभी बड़े राजनीतिक अपराधियों के परिजनों को टिकट दे दिए थे, जो महिलाओं की हत्याओं और बलात्कार जैसे संगीन अपराधों के कारण सलाखों के पीछे थे। राजस्थान की कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे व बहुचर्चित भंवरी देवी हत्याकंड के आरोपी महिपाल सिंह मदेरणा की पत्नी लीला मदेरणा को तक टिकट दे दिया गया था। इस कांड के दूसरे आरोपी व कांग्रेस विधायक मलखान सिंह बिशनोई की 80 वर्षीया मां अमरी देवी को टिकट दिया गया था। यही नहीं, हाल ही में बलात्कार के आरोप में कठघरे में आए, राज्य सरकार में मंत्री रहे बाबूलाल नागर के भाई हजारीलाल नगर को भी टिकट दिया गया था।

आरोपियों के परिजनों को ही टिकट दिए जाने की विवशता से ऐसा भी लगता है कि हमारे राजनीतिक दल, कार्यकताओं की उदीयमान पीढ़ी को आगे बढ़ाने का काम नहीं कर रहे हैं। राजनीतिक संस्कृति कालांतार में इस दोष से मुक्त नहीं हुई तो थोपे गए प्रतिनिधि कार्यकताओं को राजनीतिक संस्कार व सरोकारों से नहीं जोड़ पाएंगे। गोया, दलीय विचारधारा भी सरस्वती नदी की तरह लुप्त हो जाएगी ? दागियों, वंशवादियों और अयोग्य नेताओं को नकारे जाने की इच्छाशक्ति जताए बिना कोई राजनीतिक सुधार होने वाले नहीं हैं। अर्थात दलों का दायित्व बनता है कि वे ऐसे लोगों को टिकट न दें, जिनके खिलाफ अदालतों में ऐसे मामले विचाराधीन हैं, जिनमें पांच वर्ष या उससे अधिक की सजा हो सकती है। हालांकि कुछ राज्य सरकारों ने ऐसे सांसदों और विधायकों के मामलों के शीघ्र निपटाने के लिए विशेष अदालतों का गठन भी किया है, किंतु इनमें भी तेजी दिखाई नहीं दे रही है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि सक्षम नेता येन-केन-प्रकारेण मामले की सुनवाई में बाधाएं डालते रहते हैं। यदि इन विशेष अदालतों में मुकदमों का निपटारा प्राथमिकता से होने लग जाए तो इससे भी राजनीति में आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों को सदनों में प्रवेश मिलने पर अंकुश लगेगा।

लोक पर राजनेता की मंशा असर डालती है। दरअसल, हमारे राजनेता और तथाकथित बुद्धिजीवी बड़ी सहजता से कह देते हैं कि दागी, धनी और बाहुवालियों को यदि दल उम्मीदवार बनाते हैं तो किसे जिताना है, यह तय स्थानीय मतदाता को करना चाहिए। बदलाव उसी के हाथ में है। वह योग्य प्रत्याशी का साथ दे और शिक्षित व स्वच्छ छवि के प्रतिनिधि का चयन करे। लेकिन ऐसी स्थिति में अक्सर मजबूत विकल्प का अभाव होता है। ऐसे में मतदाता के समक्ष, दो प्रमुख दलों के बीच से ही उम्मीदवार चयन की मजबूरी पेश आती है। जनता अथवा मतदाता से राजनीतिक सुधार की उम्मीद करना इसलिए भी बेमानी है, क्योंकि राजनीति और उसके पूर्वग्रह पहले से ही मतदताओं को धर्म और जाति के आधार पर बांट चुके हैं। बसपा और सपा का तो बुनियादी आधार ही जाति है। यह अलग बात है कि जब एक ही जाति के बूते सत्ता पाना संभव नहीं हुआ तो मायावती ने सोशल इंजिनियरिंग के बहाने सर्व समाज हितकारी समीकरण आगे बढ़ाया। हालांकि नरेंद्र मोदी के जबरदस्त प्रभाव के चलते ये सब तथाकथित सामाजिक समीकरण फिलहाल हशिए पर चले गए हैं। वैसे भी देश में इतनी अज्ञानता, अशिक्षा, असमानता और गरीबी है कि लोगों को दो जून की रोटी के लाले पड़ रहे हैं। राजनीतिक सुधार की दिशा में न्यायालय हस्तक्षेप करके विधायिका को कानून बनाने के लिए उत्प्रेरित तो कर सकती है, लेकिन वह इस दिशा में कोई नया कानून अस्तित्व में नहीं ला सकती ? क्योंकि कानून बनाने का दायित्व संविधान ने विधायिका के पास ही सुरक्षित रखा हुआ है। लिहाजा राजनीति को साफ-सुथरा बनाए रखने का पहला दायित्व राजनीतिक दलों का ही बनता है।

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