लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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राकेश कुमार आर्य

इन प्रमाणों से सिद्घ होता है कि ये सभी लोग पूर्व से अर्थात भारत से ही आये थे। ईंटों पर आज भी लोग अपनी भट्टा कंपनी का नाम लिखते हैं, उससे पता चलता है कि ईंटों पर इस प्रकार नाम लिखने की परम्परा भारत में सदियों पुरानी है। साथ ही यह भी कि पक्की ईंट बनाकर मकान बनाने की परम्परा भी भारतीय है। वैसे भारत में पहाड़ आदि भी पर्याप्त हैं, परंतु भारत ने पहाड़ों के पत्थरों का प्रयोग घर बनाने में कम से कम किया। इसका कारण यही था कि हमारे पूर्वज भली प्रकार जानते थे कि एक तो भारत गर्म देश है उसमें पत्थर के बने मकान गर्म हो जाएंगे। दूसरे-प्राकृतिक संसाधनों को जितना कम से कम छेड़ा जाए उतना ही अच्छा है।

जिस समय की ये ईंटें मेसोपोटामिया में मिली हैं-उस समय तक तो यूरोपियन लोग बड़े-बड़े बिल बनाकर पशुओं की भांति जंगलों में रहते थे। पं. रघुनंदन शर्मा जी कहते हैं-”इस प्रकार से हमने यहां तक एशिया माइनर के तमाम प्राचीन देशों को देखा तो मालूम हुआ कि वहां प्राचीन काल में ही आर्य जाति आकर बस गयी थी और उसी ने अपनी सभ्यता का वहां प्रचार किया है। यही थोड़ा सा पश्चिमी एशिया में आदिकालीन आर्यों के गमन का इतिहास है।”
हम इतिहास से शिक्षा लें
इतिहास लिखा ही इसलिए जाता है कि लोग अपने अतीत से शिक्षा लें। हम देख रहे हैं कि भारत के आर्य लोगों ने जब तक अनार्यों को गले लगाकर चलने और उनमें सुधारकर उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाने का श्लाघनीय कार्य किया तब तक सब कुछ ठीक-ठाक और सामान्य रूप से चलता रहा। भारत की सर्वत्र जय-जयकार होती रही। पर जब जाति बहिष्कृत करने और देश निकाला देने का हमारे देश में प्रचलन बढ़ा तो वह न्याय न्याय होकर भी न्याय न रहा। वास्तव में जाति बहिष्कृत करना या देश निकाला देने का दण्ड विषम परिस्थितियों में ही दिया जाता है और वह भी एक अवधि विशेष के लिए दिया जाता है। समय व्यतीत हो जाने पर या ऐसे दण्ड से दण्डित लोगों के द्वारा प्रायश्चित कर लेने पर यह दण्ड वापस ले लिया जाता था और फिर लोगों को सम्मानपूर्वक साथ लेकर चला जाता रहा। परंतु यहां हम देख रहे हैं कि जाति बहिष्कृत करने और देश निकाला देने की प्रक्रिया सम्भवत: लम्बी हो गयी। जिससे जाति बहिष्कृत लोग दूर देशों में ही बस गये। आजकल हमारे घरों में भी यह देखा जाता है कि अपने जिस परिजन से आप बोलना छोड़ देंगे या फिर जिसे आप बहिष्कृत कर देंगे-वह एक अवधि के व्यतीत हो जाने पर आपके प्रति उदासीन होते-होते आपका विरोधी हो जाएगा। इस प्रकार अपेक्षा से अधिक और बिना विचार किये दिया गया दण्ड भी आपके शत्रु बढ़ाता है-देर-सवेर ये शत्रु आपके शत्रु से मिलकर उसके मित्र बन जाते हैं और फिर आपको ही दण्ड देने की स्थिति में आ जाते हैं। विश्व इतिहास में ऐसा हुआ भी है।
भारत से ही गये लोग भारत के प्रति उदासीन होते-होते कालांतर में इस्लाम में विलीन होकर भारत को ही दंडित करने के लिए चल दिये, जिससे हमारी दण्ड प्रक्रिया का गुडग़ोबर हो गया। अच्छा होता कि जाति बहिष्कृत करने और देश निकाला देने के समय दण्ड का अनुपात उचित रखा जाता। हम यह भूल गये कि दण्ड को ईश्वर पूर्णत: तोलकर देता है, फिर भी व्यक्ति उसके विरोधी हो जाते हैं कि शायद उसने यह इतना सारा दण्ड मुझे ही दिया है और ऐसा करके उसने मेरे साथ भारी अन्याय किया है।
चीन, तिब्बत बर्मा व पूर्वी एशिया
चीन कभी आर्यावत्र्त का ही एक भाग था। चीन का यह स्वरूप भारत के साथ करोड़ों वर्ष तक रहा है। भारत की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था ने चीन को दीर्घकाल तक अनुशासित रखा है। भारत के लोगों के रहन -सहन, राज्यव्यवस्था और जीवन-चर्या ने चीन, तिब्बत व बर्मा को भी समान रूप से प्रभावित किया है। लोग भारत से जाते रहे और वेद की पावन-पताका के नीचे वेद की ज्योति के आलोक में इन देशों का उद्घार व कल्याण करते रहे।
चीन के राजाओं की लंबी श्रंखला में अनेकों हिंदू संस्कृति के नाम हमें देखने को मिलते हैं। कालांतर में चीन में बौद्घ धर्म का प्रवेश हुआ। यह धर्म भारत की धरती पर जन्मा था और इसने यहां से जाकर चीन को धर्म की दृष्टि प्रदान की। भारत के धर्म से पूर्व से ही शासित चीन ने भारत से आयातित इस नये धर्म का हृदय से स्वागत किया और बड़ी शीघ्रता से सारा देश ही बौद्घ धर्म के रंग में रंग गया। यद्यपि कालांतर में शंकराचार्य जी जैसी महान विभूति ने भारत में एक आंदोलन चलाकर वैदिक धर्म के विरूद्घ विद्रोह की क्रांति मचा रहे बौद्घ धर्म को भारत में पैर फैलाने से रोक दिया। यह उनकी बड़ी सफलता थी, क्योंकि समय ने यह सिद्घ कर दिया है कि चीन, तिब्बत और बर्मा भी विपरीत संप्रदाय के रंग में रंगकर भारत से मनोवैज्ञानिक रूप से दूर होते गये और एक अलग देश बनाने में सफल हो गये।
चीन ने भारत से धर्म की दृष्टि लेकर भी भारत को अपना प्रतिद्वंद्वी माना और वह भारत से ईष्र्या करने लगा। इसका अभिप्राय है कि एक देश-एक धर्म और एक भाषा के होने से ही राष्ट्रीय एकता स्थापित रह सकती है। भारत ने संपूर्ण विश्व का नेतृत्व इसी आधार पर किया था-कि उसने संपूर्ण विश्व को एक देश (वसुधैव कुटुम्बकम्) एक धर्म (कृण्वन्तो विश्वमाय्र्यम्) और एक भाषा (संस्कृत) का महान विचार दिया था। भारत जब किन्हीं भी परिस्थितियों में शेष विश्व के देशों से दूर होता गया तो सारे संसार में ही टूटन-फूटन का दौर चल निकला।
साईमस का कहना है कि बर्मी लोग अपनी संहिता को प्राय: ‘धर्म स्थ’ या शास्त्र कहते हैं। जो कि मनु की बहुत सारी व्यवस्थाओं में से एक है। मिन बिलसन का कहना है कि बर्मा व तिब्बत की सभ्यता भारत की देन है। वैसे तिब्बत में आदि सृष्टि होने से भारत का इतिहास तिब्बत से ही आरंभ होता है। तिब्बत के बिना भारत की संस्कृति अधूरी है और इतिहास व धर्म भी पूर्ण नहीं होते हैं। तिब्बत हमारा मूल है और तिब्बत के लिए हम सर्वाधिक अनुकूल हैं। क्योंकि तिब्बती संस्कृति को जितना हम समझ सकते हैं और तिब्बत जितना हमें समझ सकता है-उतना हम दोनों ही किसी तीसरे को नहीं समझ सकते।
कम्बोडिया देश काम्बोजों का देश है। 1882 में यहां एक हिंदू मंदिर की खुदाई एक फ्रांसीसी के द्वारा की गयी थी, जिससे यह पता चला कि यह क्षेत्र निश्चय ही भारत के संपर्क में रहा है। मि. हैवेल का कथन है-”ईसा की चौथी शताब्दी के लगभग तक्षशिक्षा के आसपास रहने वाले साहसी लोगों का एक दल (तक्षशिला को उस समय कम्बोज कह जाता था) भारत के पश्चिमी तट से चला और उन्होंने कुछ शताब्दी बाद एशिया के दक्षिणी पूर्वी कोने की ओर जावा नामक उपनिवेश बसाया और वहां अपना राज्य स्थापित किया उसका नाम उन्होंने अपने मूल देश के नाम पर रखा था।”
जावा वास्तव में जौ की आकृति का द्वीप है। भारत के लोगों ने इसकी आकृति के आधार पर इसे यवद्वीप कहा था। संस्कृत में यव जौ के लिए ही कहा जाता है। इस यव का ‘जव’ हो गया (जैसा कि अक्सर हिन्दी में ‘य’ का ‘ज’ हो भी जाता है) इस ‘जव’ को अंग्रेजों ने जावा के नाम से उच्चारित किया। जैसे आजकल राम को रामा और कृष्ण को कृष्णा कहने की मूर्खता भारत के अंग्रेज कर रहे हैं। इस संस्कृति नामकरण से ही यह पूर्णत: स्पष्ट है कि यवदीप को बसाने वाले आर्य लोग भारतीय ही थे।
क्रमश:

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