लेखक परिचय

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

Posted On by &filed under टॉप स्टोरी.


पिछले कुछ दिनो से एक विवाद उठा हुआ है, कि भारत हिन्दू राष्ट्र है या नहीं।संघ और भाजपा से जुड़े कई लोग इसके पक्ष मे तर्क दे रहे हैं, हिन्दू शब्द के उद्गम और अर्थ की जानकारी दे रहे हैं, उसका इतिहास बता रहे हैं और हिन्दुस्तान के भूगोल पर शोध कर रहे हैं, कि यह भूभाग जम्बूद्वीप कहलाता था और माउंटऐवरैस्ट का नाम गौरीशंकर पर्वत था।अपनी बात की पुष्टि करने के लियें उच्चतम न्यायालय के एक निर्णय को भी उद्धरित किया जा रहा है।

दूसरे पक्ष का कहना है कि भारत एक धर्मनिर्पेक्ष राष्ट्र है, उसे हिन्दू राष्ट्र कहना सांप्रदायिक ही नहीं असंवैधानिक भी है।इसके उत्तर मे पहले पक्ष का कहना है कि हिन्दू धर्म मे सभी धर्म समाहित हो सकतेहैं क्योंकि वह धर्म नहीं इस भूभाग की जीवन शैली है।मेरे विचार से हिन्दू ही नहीं, सभी धर्म जीवन शैली ही हैं, जिनमे पहनावा, खानपान , तीज त्योहार और अपने इष्ट से प्रार्थना करने के तरीक़े भी अलग अलग है जबकि भगवान तो सबका एक ही है…. नास्तिक लोगों के लियें मै भगवान नहीं प्रकृति कह देती हूँ, जो सबके लिये एक ही है।जो लोग आज हिन्दू धर्म मे सभी धर्मो के समाहित होने की बात कर रहे हैं उनसे मुझे यही कहना है कि हिन्दुओं ने भले ही मुसलमानो या इसाइयों से दोस्ती कर ली हो पर ऊंची जाति के हिन्दूओं ने खान पान की दूरी बनाये रखी।

धर्म वह है जो अधर्म न करवाये, पर आजकल हम जिसे धर्म कह रहे हैं वह खुल कर अधर्म करवा रहा है।अपने को धार्मिक मानने वाले खूब अधर्मऔर हिंसा करवा रहे हैं, वह भी अपने धर्म की रक्षा के लियें।

विषय से भटक न जाऊं इसलियें धर्म के आध्यात्मिक पक्ष पर अधिक न लिखकर लिखकर सीधे व्यावहारिक पक्ष की बात करूँगी।मेरे विचार से ये दोनो ही पक्ष, धर्म के नाम पर राजनीति कर रहे हैं।हिन्दु, सिंधु या इन्दु का इतिहास जो भी रहा हो यह महत्वपूर्ण नहीं है। हमारे संविधान ने हिन्दू , इस्लाम, सिख, इसाई, बौद्ध पारसी और  अब जैन धर्म को भी स्वतन्त्र धर्म का दर्जा दिया  है, जबकि सिख, ईसाई, बौद्ध और जैन धर्म हिन्दू धर्म से ही प्रस्फुटित हुए हैं । संभव है भविष्य मे कुछ और धार्मिक समूहों जैसे आर्य समाज और राधास्वामी सतसंग को भी स्वतन्त्र धर्म का दर्जा मिल जाये और वो अल्पसंख्यकों मे आजायें।

भारत मे इस्लाम मध्य एशिया से और ईसाई धर्म योरोप से आया। कहा जाता रहा है कि हिन्दू धर्म मे सबको समाने की प्रथा चली आरही है, पर हिन्दुओं ने ही हिन्दुओंकी  निचली जातियों के साथ दुर्व्यवहार करके उन्हे हाशिये पर रखा जिस वजह से उन्होने मौक़ा मिलते ही इस्लाम या ईसाई धर्म को स्वीकार लिया। कुछ धर्म परिवर्तन दबाव या लालच के कारण हुए।धर्म जाति की तरह पैदाइश से मिलता है, धर्म परिवर्तन हो सकता है, पर जाति नहीं बदली जा सकती।

राष्ट्रीयता और धर्म दो अलग बाते हैं। हमारी राष्ट्रीयता भारतीय या इण्डियन है, यदि हम सभी भारतीयों को हिन्दू कहने लगेगे, फिरतो हिन्दू धर्म की जगह ‘सनातन’ लिखेंगे जबकि अब सभी हिन्दू सनातनी नहीं रहगये है। एक व्यक्ति राष्ट्रीयता की जगह ‘हिन्दू’ लिखेगा और धर्म की जगह ‘इस्लाम’ तो व्यर्थ मे स्थिति भ्रामक होगी। यदि हमने हिन्दू और भारतीय को समानार्थक बना दिया तो कुछ भ्रम ज़रूर पैदा होंगे, जैसे नेपाल का हिन्दू अपनी राष्ट्रीयता ‘नेपाली’ लिखेगा और धर्म ‘हिन्दू’ तो उसे भारतीय मान लेने की ग़लती हो सकती है।

एक तर्क दिया जा रहा है कि जब जर्मनी का रहने वाला जर्मन है, चीन का चीनी, जापान का जापानी तो हिन्दुस्तान का हिन्दू क्यों नहीं? सबसे पहली बात कि हिन्दुस्तान के अलावा किसी दूसरे देश का नाम धर्म से नहीं जुड़ा है, इसलियें हम अपने देश को हिन्दुस्तान न कहकर सिर्फ भारत या इण्डिया कहेंगे तो स्वाभाविक तौर पर हमारी राष्ट्रीयता भारतीय या इण्यिन ही होगी।

आदर्श स्थिति तो यह होगी कि प्रत्येक भारतीय सार्वजनिक जीवन मे सिर्फ भारतीय हो । किसी का धर्म क्या है, यह बताना ज़रूरी न हो।सबके लियें एक क़ानूनऔर एक सी सुविधाये हों।यदि आरक्षण देना है तो उसका आधार केवल आर्थिक होना चाहिये।व्यक्तिगत जीवन मे सब अपने धर्मको मानने के लियें स्वतन्त्र हों,पर अन्य धर्मो का सम्मान करें। राजनीति से धर्म को दूर रखा जाये

59 Responses to “भारत हिन्दू राष्ट्र नहीं हो सकता”

  1. इंसान

    “भारत हिन्दू राष्ट्र नहीं हो सकता” को लेकर विषय पर अनुपयुक्त व अनावश्यक फैलाव को देखते हुए इंसानियत के नाते मेरा सभी पाठकों से अनुरोध है कि निम्नलिखित लिंक http://hindubooks.org/sudheer_birodkar/hindu_history/secularroots.html पर प्रस्तुत निबंध को एक बार अवश्य पढ़िए क्योंकि मेरा विश्वास है कि देश में हर प्रकार की विभिन्नता के बीच सार्वजनिक भलाई हेतु इस विश्लेषणात्मक निबंध में दिए विचारों में भारत के लिए एक हिन्दू राष्ट्र होने की विशेष सामग्री उपलब्ध है।

    Reply
    • आर. सिंह

      आर. सिंह

      http://hindubooks.org/sudheer_birodkar/hindu_history/secularroots.html
      मुझे तो आश्चर्य इस बात पर हुआ कि ईशा मसीह और हजरत मुहम्मद को अवतारों में क्यों नहीं गिना गया?क्या ऐसा इसलिए हुआ ,क्योंकि ये दोनों भारत में अवतरित नहीं हुए थे?जब आप वराह,कछुए,मछली को भगवान का अवतार मान सकते हैं,तो दो इंसानों को उनका अवतार मानने में क्या दिक्कत थी या है?ऐसा नहीं लगता कि यह आलेख या इससे सम्बंधित वक्तव्य तर्क की कसौटी पर खरे नहीं उतरते,जबकि कहा जाता है कि सनातन धर्म तर्क पर आधािरत .है.
      अब आती है हिंदुत्व की बात क्या इस बारे में इस लेख का लेखक दिग्भ्रमित नहीं लगता?मुझसे कहा जा सकता है कि जिस लेखक पर आप अस्पष्ट और दिग्भ्रमित होने का आक्षेप लगा रहे हैं उसका कद्द देखा और अपनी औकात देखी,तब शायद मुझे सोचना पड़े,पर तब की तब देखी जायेगी.
      अगर अवतारों की बात की जाए तो केवल महात्मा बुद्ध तक आकर यह श्रृंखला क्यों समाप्त हो जाती है?तुर्रा यह की बुद्ध न तो ईश्वर को मानते थे और न किसी तरह के सनातनी पाखंडफोन से उनका कोई सम्बन्ध था.यह दूसरी बात है की सनातनी महंथ गिरी ने अब बोधगया का बौद्ध मंदिर पर भी कब्ज़ा कर लिया है.अगर ईशा मसीह या हजरत मुहम्मद को अवतार मानने में एतराज हो तो कम से कम गुरु नानक ,दयानंद सरस्वती और बाद में शिर्डी के साईं की गिनती तो अवतारोंमें की ही जा सकती थी. सनातनी अनेकेश्वर वाद को भी जायज ठहराते हैं,जबकि एकोअहम सनातन धर्म का सार है.अगर यह सही है ,तो फिर मुस्लिम ,ईसाई और आर्य समाज वाले भी तो वही एक परमात्मा का राग अलापते हैं,फिर झगड़ा किस बात का?रही बात हिन्दू को सनातन का पर्यायवाची मानने का, तो विद्वान लेखक भी उसी हिन्दू के परिभाषा में उलझ गया है. विद्वान लेखक के अनुसार भी ऐतिहासिक रूप से हिन्दू सिंधु का अपभ्रंश है,अतः इसको सनातन धर्म का पर्यायवाची नहीं समझ जाना चाहिए.आदि शंकराचार्य ने भी सनातन धर्म के पुनरुद्धार की बात कही थी न की हिन्दू धर्म की.उनके समय में तो शायद हिन्दू शब्द आया ही नहीं था.
      इस लिंक का प्रथम पृष्ठ पढ़ने वके बाद यह एक तरह से अंतरिम समीक्षा है.पूर्ण समीक्षा तभी की जा सकती है,जब उस पूरी पुस्तक का अध्ययन किया जाए ,जोइस लिंक पर उपलब्ध है.

      Reply
  2. आर. सिंह

    आर. सिंह

    इंसान जी ,आपकी इस टिप्पणी पर ,जिसमे आपने मुझे चलती फ़िरती लाश कह डाला है,मेरी नजर ज़रा देर से पड़ी .आप जैसे वकवास करने वाले से तर्क करना या उसके सामने अपने विचार प्रस्तुत करना स्वयं की तौहीनी है. मैं अब आपसे यही अनुरोध करूंगा कि प्रवक्ता के छह वर्ष पूरे होने पर जो विचार गोष्ठी १६ अक्टूबर को होने जा रहा है,उसमे पधारिये और तब रूबरू होने पर पता चलेगा कि कौन चलती फिरती लाश है.आप जैसे बदमिजाज और सठियाये लोगों से तर्क करना भी बेकार है,क्योंकि आप व्यक्ति पूजा में इतने लीन हैं कि उसके आगे कुछ दिखाएँ नहीं पड़ रह है,अतः आपसे विचार विमर्श करना भी अपने समय की बर्बादी है.अब तो केवल इंतज़ार है आपके दर्शन का.अगर आप दिल्ली के आस पास रहते हों या दिल्ली का का कोई प्रोग्राम हो तो मैं आपसे मिलना चाहूंगा,क्योंकि आप जैसे पहुंचे हुए व्यक्ति से मिल कर शायद इस उम्र में सुधर जाऊं. रही तब उन सब अनाप सनाप विशेषणों कि ,जिससे आपने मुझे सम्बोधित किया है,उसका मैं कतई बुरा नहीं मानता.,क्योंकि ये सब सम्बोधन मुझे उस व्यक्ति का संस्कार जानने में सहायता करते हैं.

    Reply
    • इंसान

      जी नहीं, कोई मिलने की चाह नहीं। मैं आपसे दूर ही भला। जहां तक चलती फिरती लाश की बात है यह अन्यमनस्कता में हुआ। अन्यथा मत लीजिए।

      Reply
      • आर. सिंह

        आर. सिंह

        आमने सामने आने में आपको क्यों एतराज है?क्या कोई ख़ास कारण है? अगर ऐसा ही तो भी भी मुझे कोई अंतर नहीं पड़ता.यह भी आपने अच्छी कही कि इसे आप इसे अन्यथा न लें. मैंने तो पहले ही लिख दिया है कि मैं इस सम्बोधनों को अन्यथा नहीं लेता,क्योंकि इससे मेरा अनुभव बढ़ता है और मुझे उस व्यक्ति विशेष के संस्कार जानने में मदद मिलती है.

        Reply
  3. बीनू भटनागर

    जिन लोगों हिन्दुओं को एकजुट होने की बात कही वो अगर भारतीयों को या हिन्दुस्तानियों को, या इन्डियन्स को एक जुट होने की बात करते तो इस देश का भविष्य बहुत उज्ज्वल होता। यदि हिन्दू कहेंगे कि हिन्दू एक जुट हों और मुसलमान कहेंगे मुसलमान एक जुट हों तो हमे कई मुज्जफ्फर नगर देखने पड़ सकते हैं।

    Reply
    • इंसान

      छोटी बाजी, लो तुम्हारी मुराद पूरी होते नज़र आती है! यह जान कर कि “भारत हिन्दू राष्ट्र नहीं हो सकता” अल क़ायदा नेता अयमन अल ज़वाहिरी ने क़ायदात अल जिहाद के नाम से भारतीय उपमहाद्वीप में अपने संगठन की शाखा बनाने की घोषणा की है। सदैव की तरह घोर अराजकता मचाए कांग्रेस राज में सरकार द्वारा ऐसी संभावना का कोई समाधान अथवा उपाय न देख भारतीयों में एक दूसरे के प्रति आशंका व अविश्वास होना स्वाभाविक ही नहीं एक सामाजिक सत्य हो जाता लेकिन संयुक्त हिन्दू राष्ट्र में शांति से रहते संगठित भारतीय अपने बीच इस कायदात अल जिहाद जैसे कर्कट रोग का बीज ही नहीं पड़ने देंगे। भले ही हिन्दू राष्ट्रीयता के प्रति आपके दृष्ट्रिकोण के कारण आपकी आत्मा आपको कोसती रहेगी, मुज्जफ्फरनगर क्या भारत में जहां चाहें वहां बैठ मन बहलाने के लिए आप शान्ति से कविता करती रहेंगी।

      Reply
    • शिवेंद्र मोहन सिंह

      बहन बड़े बोल मत बोलिए, हिन्दुओं को एक जुट होने की जरूरत क्यों पड़ रही है उसके कारण में जाइए। मतान्ध हो कर कुछ भी अनर्गल मत बोलिए। मुजफ्फर नगर की बात बोल रही हैं तो उसके कारण में जाइये फिर नाम लीजिये।

      Reply
  4. इक़बाल हिंदुस्तानी

    Iqbal hindustani

    सचिन जी आपने मेरी इस आशंका को ठीक साबित कर दिया कि आप जैसे लोग बिना किसी तर्क के मेरे ऊपर कीचड़ जरूर उछालेंगे। इसे जहर उगलना भी कह सकते हैं।
    आपने अपनी बात की शुरुआत ही मेरे नाम पर सवाल उठाकर की है जिस से आपकी मानसिकता का पता लगता है। मैं हिंदुस्तानी हूँ और इसमें मुझे गर्व है इसलिए मैं आप जैसे लोगो की तरह संकीर्ण जातिवादी पहचान नाम में नहीं लगता हूँ। मेरे बारे में जानना हो तो प्रवक्ता पर ही मौजूद मेरे 200 से अधिक लेख पहले पढलो तब कोई तमगा देना। वैसे मुझे आप जैसे एकतरफा सोच के व्यक्ति से कोई सर्टिफिकेट चाहिए भी नहीं अच्छा कहलाने का।
    जहां तक हिन्दू राष्ट्र की बात है ये मेरे नहीं देश के बहुत बड़े वर्ग के विचार हैं की भारत एक सेकुलर देश है और ये भी सच है कि अगर यहाँ की बहु संख्यक आबादी यानी हिन्दू न चाहे तो ये सेकुलर नहीं रह सकता। मेरा यही अनुमान और आशंका है है कि अगर देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने की कोशिश की जायेगी तो इस विचार की विरोधी शक्तियाँ ऐसा करने का भरपूर विरोध करेंगी। क्या इस से खूनखराबा यानि हिंसा का डॉ डर नहीं है? ये धमकी नहीं मेरे भाई एक देशभक्त हिंदुस्तानी की आशंका है।
    अगर कोई ऐसा तरीका हो जिस से कानूनी और शांतिपूर्वक ढंग से देश को हिन्दू राष्ट्र बनाया जा सकता हो और उसमें किसी को कोई ऐतराज़ विरोध या हिंसा न हो सबके बराबर अधिकार हो तो आपको ऐसा चमत्कार करने से किसने रोका है? अब तो केंद्र की सत्ता NDA के पास है और उसमें भी बीजेपी के पास बहुमत है। फिर देर किस बात की है बनाओ हिन्दू राष्ट्र………।

    Reply
    • RTyagi

      aap hamesha ek tarfa soch ek tarfa soch ka raag alapte hain aapki soch. ek tarfa nahin hai kya.. ?? Hindu virodhi soch?/

      Reply
      • आर. सिंह

        आर. सिंह

        मैं इस तरह की टिप्पणी पर केवल खुल कर हँस सकता हूँ.पर आप जैसे लोगों को तो शायद वह हँसी भी बुरी लगे.

        Reply
      • इक़बाल हिंदुस्तानी

        Iqbal hindustani

        आप चूंकि खुद कट्टर हिंदूवादी हैं इसलिए आपकी सोच निष्पक्ष हो ही नहीं सकती। इसलिए आपके कुछ भी कहने का मेरे लिए पहले की तरह कोई महत्व नहीं है।

        Reply
  5. Sachin Tyagi

    इकबाल साब , क्या आपने अपने नाम के साथ हिन्दुस्तानी , फैशन में या फ़िल्मी स्टाइल में या बस कहने -सुनने और दूसरों को दिखाने के लिए ही लगा रखा है .असल में , आपको इस शब्द से जरा सा भी लगाव नहीं ……… मतलब , खून खराबे और अशांति की बातें आप कह रहे है और सांप्रदायिक और फासिस्ट , हम हो गए ……… तालिबान , खून खराबा , अशांति , साम्प्रदायिकता , फासिज्म ,अंध राष्ट्रभक्त , ज़हर , हार , जीत – ये सब आपके शब्द हैं , हमारे नहीं ……….. क्या किसी सार्वजनिक मंच पर हिन्दू या मुसलमान शब्द लिखना या सच को सच और झूठ को झूठ कहना भी गुनाह है …..? क्या सच्ची और सही बातें भी आपको ज़हर लगती हैं ……. कडवी भी नहीं ……!! ……. खून खराबे और अशांति का डर दिखाकर आप हमे संगठित होने से रोकने की कोशिश तो नही कर रहे …….! क्या हिन्दुओं के संगठित होने से ही इस देश में , खून खराबा या अशांति हो सकती है ……!! क्या राष्ट्रभक्त और देशभक्त होना , अँधा होना है और आँखों पर पट्टी बांधकर दोस्त को दुश्मन और दुश्मन को दोस्त समझना , ज्यादा अक्ल की बात है ……!! ……आपने पहले से ही इस बात का फैसला कर लिया कि हम किसी भी तर्क से अपनी बात सही साबित नही कर सकते . और यही हमारी हार और आप लोगो की जीत है ……. कमाल है ……!

    Reply
  6. आर. सिंह

    आर. सिंह

    सचिन जी,आपके ८ सितम्बर वाले टिप्पणी के बारे में केवल इतना ही कहूँगा कि मैंने यह कभी नहीं समझा कि सब मेरे जैसे हैं.ऐसे दो व्यक्ति एक तरह के नहीं होते,लेकिन समानता विचारों में हो सकती है.भारत वासियों ,खासकर सामान्य सनातनियों में जाति प्रथा और उच्च,नीच के भाव ने इतनी संकीर्णता भर दी है कि वे उससे आगे देख ही नहीं पाते.मुझे आप व्यक्तिगत रूप से नहीं जानते ,अगर जान जाएंगे तो शायद आपको फिर से सोचना पडेगा कि आप मेरे बारे में जो कह रहे हैं,क्या वह उचित है? ऐसे तो कुछ लोगों ने मुझे चौपाल पर बैठने की सलाह दे डाली है,उनकी बुद्धि पर मैं केवल तरस खा सकता हूँ.रह गयी बात १०० दिनों में कुछ करने की,तो मैं उस व्यक्ति को सपने के सौदागर के सिवा और क्या समझूँ,जो सब्ज बाग़ दिखा कर और अनहोनी को होनी करने का वायदा करके आम आदमी को मूर्ख बना गया.खैर यह तो अब भक्तों को भी मालूम हो गया कि वैसा संभव नहीं था,पर भक्ति भाव में पूजा तो करनी ही है.
    बात फिर वहीँ आ जातीं है कि भारत को हिन्दू राष्ट्र यानि सनातन पंथियों का राष्ट्र बनाने पर क्या जातीय आधार और उच्च नीच ,धर्मी अधर्मी का भाव ख़त्म हो जाएगा?
    मैं बार बार कहता हूँ और यह दुहराते रहूंगा कि यह असली मुद्दों से भटकाने के लिए एक सोची समझी चाल है.

    Reply
  7. इक़बाल हिंदुस्तानी

    Iqbal hindustani

    तालिबानियों की तरह हिंदूवादी भी इस देश में खूनखराबा किये बिना बाज़ नहीं आयेंगे हालात ऐसा इशारा कर रहे हैं।
    ये देश हिन्दू राष्ट्र तो बने या न बनें लेकिन इस प्रयास में देश में अशांति जरूर हो सकती है।
    बीनू जी इन लोगो से बहस करना बेकार है क्य्प्नकि इनके सर पर साम्प्रदायिकता और फासिज्म का भूत सवार है। ये अंध राष्ट्र भक्त इस कमेंट के बाद मेरे खिलाफ भी जी भरकर ज़हर उगलेंगे लेकिन अपनी बात किसी भी तर्क से ठीक साबित नहीं कर सकते यही इनकी हार और हम जैसे लीगों की असली जीत है।

    Reply
    • इंसान

      आओ भाई, तुम भी अपनी नासमझी की मिसाल देते जाओ नहीं तो राष्ट्रद्रोही कहाँ जाएंगे? यदि सभी भारतीयों को मिलजुल राष्ट्रीयता निभाते जीवन में अपने अपने लक्ष्य को प्राप्त करना है तो आपके हर प्रकार के तालिबानी हव्वे को खूनखराबा करने से रोकना होगा। फिरंगी ने भारतीय उप महाद्वीप के मूल निवासियों को उनकी धार्मिक व सामाजिक विभिन्नता में वांट उन पर राज किया लेकिन तुम्हें मालुम होना चाहिए कि तथाकथित स्वतंत्रता के पश्चात देश के नेताओं ने साम्प्रदायिक दंगों पर क्योंकर काबू नहीं पाया था? जब कभी भारत विधिवत हिन्दू राष्ट्र बन पाएगा, पिछले सरसठ वर्षों से अब तक सांप्रदायिक दंगों में मारे गए निर्दोष भारतीयों की आत्माएं फिर से भारत मे शरीर धारण करने को व्याकुल रहेंगी। ऐसी स्थिति में स्वयं तुम जैसे लोगों की आत्मा तुम्हें कोसने से नहीं चूकेगी।

      Reply
  8. Sachin Tyagi

    बीनू जी , आपकी बातें बहुत अजीब हैं . आपकी बातोँ को सही भी नही कहा जा सकता और गलत भी नही . आपके विचार और आपका नजरिया भयंकर रूप से भ्रामक है . आप बातोँ को तोड़ – मरोड़कर या घुमा – फिराकर पेश करती हैं – अपनी बातोँ को साबित करने के लिए ……..बीनू जी , अगर पाकिस्तान या बांग्लादेश इस्लामिक या मुस्लिम – राष्ट्र हो सकते हैं तो भारत हिन्दू -राष्ट्र क्यू नही हो सकता . अगर पाकिस्तान या बांग्लादेश के हिन्दू खुद को पाकिस्तानी हिन्दू या बांग्लादेशी हिन्दू लिख सकते हैं तो भारत के मुसलमान खुद को हिन्दुस्तानी मुसलमान क्यू नही लिख सकते ……….. भारत धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र भी हिन्दुओ की सदाशयता की ही बदौलत है . हिन्दुओ की संख्या कम होते ही इस देश को भी इस्लामिक राष्ट्र बनाने की कोशिशें होने लगेंगी और अब भी हो रही है ………… मुग़ल शासन में भारत हिन्दू राष्ट्र था या इस्लामिक राष्ट्र ….? ब्रिटिश शासन में ये देश हिन्दुराष्ट्र था या मुस्लिमराष्ट्र …….? ……हज़ार साल तक हिन्दुओ ने मुसलमानों की वजह से मुसीबत झेली और फिर २०० सालों तक अंग्रेजो की वजह से ……… आपके अनुसार हिन्दू सिर्फ कमजोर , मजबूर और बंटे हुए हैं …. इससे ज्यादा कुछ नही ….. और कोई उनको संगठित करने या सशक्त बनाने की कोशिश कर रहा है तो भी आपको एतराज़ है ….. जब अँगरेज़ व्यापार करने आये थे तब मुग़ल शासक ने ही उनको ऐसा करने दिया और तब किसी को भी ये अंदाजा नही था कि एक व्यापारिक कंपनी एक दिन पूरे देश पर कब्ज़ा कर लेगी ………… आपकी ये बात सही है कि १२०० साल तक अगर हिन्दू लगातार गुलाम रहे तो इसकी वजह उनकी अपनी कमजोरियां ही हैं लेकिन अगर संघ जैसा संगठन इस कमजोरी को दूर करने की कोशिस कर रहा है तो भी आप उसको रोक रहे है ……… भारत को हिन्दुराष्ट्र कहने का मकसद बस हिन्दुओं को संगठित करना ही हैऔर कुछ नहीं , और आप जैसे लोग इस काम को सिर्फ मुश्किल बना रहे हैं ………… आप सरिता व गृहलक्ष्मी में लिखती रही है जिनमे हिन्दू धर्म की कमियों पर लिखना होता है लेकिन आपने उन सब विचारों को अन्यथा ले लिया है …………!!!

    Reply
    • आर. सिंह

      आर.सिंह

      सचिन त्यागी जी,ऐसे तो आपकी यह टिप्पणी लेखिका से सीधा वार्तालाप है,जिसमे शायद अन्य पर्यवेक्षकों को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए ,पर चूंकि आपके इन विचारों से मेरी भी असहमति है,अतः इस पर मैं कुछ कहना चाहता हूँ.उम्मीद है,आप इसे अन्यथा नहीं लेंगे.पहले तो आपलोगों की यह बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी है कि हिन्दू शब्द सनतान का पर्यायवाची है.दूसरी गलतफहमी यह है कि संविधान में वर्णित धर्मनिरपेक्षिता सनातन पंथियों के कारण है. अमेरिका में ,कनाडा में या इंग्लैंड में भी कोई एक दूसरे के धर्म में रूकावट नहीं डालता.वहां तो सनातन धर्मियों की बहुलता नहीं है.फिर भी यह वहां की जीवन शैली बन गया है.रही बात हिन्दू शब्द को परिभाषित करने की,तो सनातन पंथियों ने इस शब्द को बहुत संकीर्ण कर दिया है.सनातन पंथियों से (इसमे मैं भी शामिल हूँ) मेरा केवल यह अनुरोध है कि भारत के मुख्य ज्वलंत मुद्दों से न भटकें या अन्य लोगों को भटकाएँ.पहले देश से अशिक्षा ,बीमारी,भ्रष्टाचार और भूखमरी ख़त्म करने में हाथ बताएं.मेरे ख्याल से ये सब बकवास उनलोगों के चोंचले हैं ,जिनका पेट भरा है.
      बहुतों ने सनातन पंथ के उदारता को भी बढ़ा चढ़ा कर आंकने का प्रयत्न किया है.उनसे मेरा केवल यह अनुरोध है कि वे अपने दामन में झांके और समाज के दबे हुए या दबाये हुए इकाई के बारे में अपने रूख की समीक्षा करे,तब उनको पता चलेगा कि सनातन पंथ में कितनी उदारता है.

      Reply
      • Sachin Tyagi

        आर .सिंह जी , माफ़ कीजिये लेकिन आपकी सबसे पहली बात ही निरर्थक है . मैंने सनातन , संविधान , अमेरिका , कनाडा या इंग्लैंड के बारे में एक शब्द भी नही लिखा ………. और आप क्यू बार -2 अनावश्यक रूप से हिन्दू शब्द को परिभाषित करने की कोशिश करते रहते हैं . आम लोगों की नज़रों में ( और मेरी भी ) आर्य , वैदिक , सनातन और हिन्दू शब्द या धर्म या इंसान एक ही हैं ……… कहीं आप सनातन धर्म के अपभ्रंश होने या मतान्तरण या कन्वर्जन के कारण मुसलमानों को भी तो हिन्दू नही कहने लगे हैं ……! और रही बात संविधान की तो मूल संविधान में तो धर्मनिरपेक्ष या सेक्युलर शब्द था ही नही ….. इस शब्द को बाद में ( में , इंदिरा गाँधी के कहने से , एमरजेंसी के दौरान ) संविधान में जोड़ा गया , वो भी बिना स्पष्ट किए ……. पाकिस्तान , बांग्लादेश या कोई भी इस्लामिक देश किस संविधान या कानून से चलता है …….. इस्लामिक कानून या शरीयत से ही न ……. और देशों की छोडिये , हमारे देश में भी ऐसा है . और अमेरिका , कनाडा व यूरोपीय देशों में ऐसा होने के लिए मुसलमान मांग करते है …… उन देशो में मुस्लिमो की अलग बस्तियां होती हैं जिनमे अकेले जाने से भी अँगरेज़ डरते हैं ………… और उन देशो की धर्मनिरपेक्षता की वजह भी वहा का बहुसंख्यक क्रिस्चियन समाज ही है . क्या कोई मुस्लिम देश भी सेक्युलर है …….? नही !

        Reply
        • आर. सिंह

          आर.सिंह

          हिन्दू शब्द को परिभाषित करने की आवश्यकता इसलिए पडी,क्योंकि जहां तक मेरा ज्ञान है हिन्दू शब्द सनातन धर्म के किसी आदि ग्रन्थ में नहीं है.यह विदेशियों द्वारा प्रदत नाम है.मुझे सब मुस्लिम देशों के बारे में तो नहीं पता है,कि वहां धर्म निरपेक्षता है या नहीं,पर इंडोनेसिया में तो है.हो सकता है,वहां भी नहीं हो,पर यह तो आप भी मानते हैं कि क्रिश्चियन बहुल देशों में ऐसा है,तो जब कोई कहता है कि भारत में धर्मनिरपेक्षता हिन्दुओं(सनातनियों) के कारण है,तो उसका प्रतिकार आवश्यक हो जाता है.सनातनियों के समाज का जो आमतौर से रूख है वह सहिष्णु तो नहीं ही कहा जा सकता. दलितों और समाज के दबे हुए लोगों पर जो अत्याचार देखने को मिलता है,वह सारे सहिष्णुता और उदारवाद की पोल खोल देता है. आपलोग अपने सब तर्कों का आधार एक विशेष वर्ग या पंथ को क्यों बना देते हैं?अगर ख़ास वर्ग या समुदाय यह करता है,तो हम तो उससे अच्छे हैं.यह बिना कांटे छांटें एक लकीर के सामने उससे बड़ी लकीर खिंच कर पहले को छोटा सिद्ध करने वाली प्रवृति को आपलोग कब तक ढोयेंगे? आपलोग तुलनातमक,वह भी एक ख़ास सम्प्रदाय के कुछ ख़ास लोगों के मद्देनजर, यह तर्क कब तक देते रहेंगे?आपलोग अपने धर्म या पंथ के बारे में स्वतन्त्र रूप से क्यों नहीं विचार करते. भारत की मूल समस्याओं की ऒर से ध्यान बाटनें के अतिरिक्त इस तरह के बहस के कोई अन्य कारण नहीं है. नमो सरकार ने १०० दिनों के लिए बहुत से वादे चुनाव प्रचार के दौरान किये थे.उनवादों का क्या हुआ?वहां भी आप जैसे लोगों के पास एक तर्क है कि कांग्रेस सरकार ने क्या किया था?

          Reply
          • Sachin Tyagi

            आपकी , और ज्यादातर लोगों की यही दिक्कत हो जाती है कि वे बाकी सब को अपने जैसा ही समझने लगते हैं .”जग कैसा कि मुझसा !! ” लेकिन ऐसा नही होता ……. ज्यादातर या आम लोगो ने , आपकी तरह सनातन धर्म के आदि ग्रन्थ नही देखें हैं ……… और ये तो मैं आपकी बातों के भ्रम या झांसे में आकर लिख गया कि क्रिस्चियन देश सेक्युलर हैं वर्ना मुझको पक्का नही पता कि ऐसा है या नही … लेकिन पोइंट आप फिर भी मिस कर गये …. मेरा कहना ये था कि कोइ भी देश ( इस्लामिक देश नही ) एक हद तक , बस तभी सेक्युलर हो सकता है जब उसका बहुसंख्यक वर्ग ( चाहे हिन्दू / सनातन / क्रिस्चियन , मुसलमान नही ) ऐसा चाहे …… मुस्लिम बहुल कोई देश सेक्युलर हो ही नही सकता ……. भारत में मुसलमान कम संख्या में हैं … और फिर भी वे सेक्युलर नही, कम्युनल ही हैं …… ये बात सही है कि बहुत से हिन्दू भी , बिना वजह , दुसरे हिन्दुओ को खत्म करने पर तुले रहते हैं और ऐसे हिन्दुओ में और वैसे मुसलमानों में भी कोई अंतर नही . लेकिन कुल मिलाकर ये या वो देश बहुसंख्यको की वजह से ही सेक्युलर है .और कोई मुस्लिम देश या क्षेत्र ऐसा नही हो सकता …… ऊ.प्र. सरकार के एक मुस्लिम मंत्री के इस बयान पर ध्यान दें कि इस्लाम में देशभक्त या सेक्युलर होना गुनाह है ………… और हमारा मकसद किसी दूसरे वर्ग या पंथ या समुदाय को अपनी तुलना में रखकर उसे नीचा दिखाना नही है . हमे ऐसा करने में कोई मज़ा नही आता . हमारा मकसद है सत्य की तलाश करना ……. और उस दूसरे सम्प्रदाय के कुछ लोगो में कुछ भी खास या विशेष नही , सिवा चालाकी या कमीनेपन के ……. हाँ , बहुत से हिन्दू भी ऐसे ही होते हैं ….. और इन सब में एक ही कीचड़ भरी हुई है ………. लेकिन इस देश की मूल समस्याओं से ध्यान बटाने से हमे कुछ फायदा या हासिल नही होगा ……. और मोदी सरकार के १०० दिनों का फैसला करते हुए आप भूल गए कि इस सरकार के आते ही देशभर में सूखा पड़ गया . इतने बड़े देश व एक नयी सरकार के लिए १०० दिन , बहुत कम समय है ….. थोडा तो इंतज़ार करिए !!

      • इंसान

        प्रभु, मैंने आपसे बहुत पहले चौपाल पर बैठ बुढ़ापा काटने का सुझाव दिया था परन्तु हठधर्मी में जैसे आप अंतरिक्ष से स्थिति का निरिक्षण करते दूसरों को उपदेश देने से नहीं चूकते हैं। यदि आप पिछले कई शतकों से हिन्दुस्तान में हिन्दुस्तानी; भारत में भारतीय; एवं इंडिया में इंडियन बन कर क्षेत्र के मूल निवासियों को लुटते मरते देखने के अभ्यस्त हो गए हैं तो मैं इस में आपकी स्वार्थपरायणता को ही देखता हूँ। अमेरिका कनाडा और इंग्लैंड की बात करते आप भारत में केवल उन्हीं लोगों को सभ्यता का पाठ पढ़ा रहे हैं जो अधिकतर भारतीय जनसमूह के बल पर आर्थिक समृद्धि प्राप्त कर चुके हैं। आपके पूर्व और वर्तमान आकाओं ने उनके द्वारा देश में हो रही लूटमार में आपकी भागीदारी के कारण आपको सदैव समाज में अत्यधिक अभाव ग्रस्त जनसमूह से अलग रखा है और अवश्य ही यह स्थिति आज आपके “ज्वलंत मुद्दों” का कारण बन कर रह गई है। विडंबना तो यह है कि आप इन “ज्वलंत मुद्दों” की दुहाई देते फिर से राष्ट्र विरोधी शक्तियों को समर्थन दे रहे हैं। यदि आज सरसठ वर्षों बाद देश में गरीबी, गन्दगी, और लाचारी जोर पकड़ रही है तो आप स्वयं बताएं कौन शक्ति इस दयनीय स्थिति को दूर कर सकती है? खेद तो यह है कि आपके सरंक्षकों ने “संगठन” शब्द आपके भेजे में घुसने तक नहीं दिया। आप हिन्दू राष्ट्र में संगठित राष्ट्रवाद को क्योंकर पहचाने गे?

        सचिन त्यागी जी की टिप्पणी पर आपकी प्रतिक्रिया के आरंभ में कही उनसे आपकी असहमति के कारण आपका उपदेश अदूरदर्शी ही नहीं अनावस्यक भी दिखाई देता है। अन्यथा डॉ मधुसूधन जी द्वारा दी गई टिप्पणी पर लेखिका की प्रतिक्रिया में उन्हें “10-12 लोगों को रिसर्च करवाइये, डालर कमाइये” कहते उन्हें स्थिति से दूर रहने के सुझाव पर भी अपने विचार अवश्य व्यक्त करते।

        Reply
        • आर. सिंह

          आर.सिंह

          इंसान जी,आपके आधारहीन और तर्क हीन वार्तालाप का समुचित उत्तर बहुत कठिन है.आपने किसी चौपाल पर समय काटने की सलाह भी मुझे दे डाली है. क्या आप बता सकते हैं कि दिल्ली ,नोएडा क्षेत्र में कौन ऐसा चौपाल है,जहां मैं समय काट सकता हूँ? २००७ में इंडिया टुडे में एक लेख आया था,जिसमे वरिष्ठ नागरिकों के दयनीय हालातों का विषद वर्णन था.उसमे मैं संपादक के नाम पत्र में लिखा था कि वे लोग इस हालात केलिए स्वयं जिम्मेवार हैं. उस समय भी मेरी गिनती वरिष्ठ नागरिकों में ही होती थी,अतः वह पत्र प्रकाशित भी हो गया था. मेरा तो आप जैसे महानुभावों के लिए एक ही सलाह है.आपलोग अपनी खोलों से बाहर आइये और देखिये कि इस देश की मूल समस्या क्या है? उसका समाधान ढूंढने में मदद कीजिये.कौन हिन्दू है कौन नहीं है,यह तो आप क्या आपके पहुंचे हुए भी नहीं बता सकते,तो करते रहिये,यह तर्क और कुतर्क .समय बीताने के लिए यह भी एक अच्छा साधन है.रही बात बीनू जी की,तो मैं समझता हूँ कि स्वयं सक्षम है,इन सबका उत्तर देने के लिए.

          Reply
          • इंसान

            मेरे वार्तालाप को आधारहीन और तर्कहीन कहते आप उसका समुचित उत्तर देने में असमर्थ हैं क्योंकि आप ने ऐसी स्थिति की ओर कभी ध्यान तक नहीं दिया। गला किस का कटा क्योंकर कटा तलवार क्या जाने! यदि आप मेरी टिप्पणी को बार बार पढ़ क्षण भर के लिए अपने से हट कभी दूसरों का सोचें तो आप वरिष्ठ नागरिक नहीं अपने को भारतीय उप महासागर के उन मूल निवासियों के संग खड़ा देखेंगे जिन्होंने स्वार्थपरायणता में डूब फिरंगी और तत्पश्चात तथाकथित स्वतंत्रता के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को चिरकाल तक सत्ता में बने रहने में अपना पूर्ण समर्थन दिया है। क्योंकि आपने अनजाने में भारतीय समाज के प्रति बहुत अनर्थ किया है मैं आपको बार बार इस लिखने विखने से दूर बैठ बुढ़ापा काटने का सुझाव देता रहा हूँ। भारत के शुभचिंतकों को चलती फिरती लाश की नहीं उन श्रमजीवी भारतीय नागरिकों की आवश्यकता है जो देश की प्रगति में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के साथ जुड़ने को लालयित हैं। देश के और देश में उजागर राष्ट्रीय नेताओं के प्रति आपकी नकारात्मक मानसिकता अब असहनीय होती जा रही है।

          • Sachin Tyagi

            यही नेक सलाह हम भी आपको दे सकते हैं कि आप अपने खोल से बाहर आएं , और असलियत को पहचानने की और उसका हल ढूंढने की कोशिश करें ………. मतलब आप टिप्पणी करें तो ” उत्तर ” या प्रतिकार ….. और हम करें तो तर्क , वितर्क या कुतर्क …….है ना ! ……….और समय बिताने के लिए हम अन्ताक्षरी भी खेल सकते हैं …………….!!

  9. बीनू भटनागर

    जिन लोगों का मानना है कि हिन्दुओं सब धर्मो को समाहित करने की क्षमता है उनको उत्तर देना ज़रूरी लग रहा है-
    देश को हिन्दूराष्ट्र बनाने वालों का तर्क है, कि हिन्दू शब्द सब धर्मो को अपने मे समाहित कर सकता है, पर सच तो ये है कि मध्य एशिया से मुसलमान या तो लूटपाट करने आये थे या शासन करने। यहाँ के लोग अपनी सुरक्षा नही कर पाये, उन्होने मन्दिर तोडे, लूटपाट की, राज किया, तो भी हिन्दू कुछ नहीं कर पाये।हिन्दुओ की कमज़ोरी का लाभ उठाकर वो यहीं बस गये। हिन्दू समाज जातियों मे बँटा हुआ था।ऊँची जाति के लोग नीची जाति के हिन्दुओ से अमानवीय व्यवहार करते थे, उन्हे समाज ने हाशिये पर रखा हुआ था, इसलियें कुछ ने दबाव मे , कुछ ने लालच मे और कुछ ने स्वेच्छा से इस्लाम को अपना लिया।स्वतन्त्रता मिलने के बाद, हमारे संविधान ने उन्हे भारत का नागरिक माना और समानाधिकार दिये, जो सही भी था, उनके पूर्वजों की ग़लतियों की सज़ा कई सदियों के बाद उन के वंशजो को नहीं दी जा सकती थी।
    योरोप से ईसाई धर्म के मानने वाले भी व्यापार करने आये थे । कमज़ोर हिन्दू राजाओं के कारण वो यहाँ दो सदियों तक राज करके चले गये, उनको भी हिन्दुओं ने महमान बना के नहीं बुलाया, गले नहीं लगाया था। ईसाई धर्म को भी तिरस्कृत समाज ने स्वीकार किया। अंग्रेज़ चले गये पर ईसाई धर्म भारत मे रह गया। कहने का तात्पर्य केवल यह है, कि हिन्दुओं ने केवल मजबूरी मे उन्हे देश मे रहने दिया, ये कहना कि हिन्दू धर्म मे सबको समेटने की क्षमता है , ग़लत है।

    Reply
  10. sahil

    binu ji aap ka lekh pada kafi acha laga. ye mere bharat vasio ko na jane kya ho gya h koi samjhta hi nhi ki sabse bada dharm manavta h. jaha tak mene suna ya pada h kisi bhi dharm m ladai ladne k liye nhi kaha. hame apne desh ki trakki ki bate karni chaiye uske bare m behas krni chaiye ki ham apne desh ko kese bulandio pr le ja sakte na ki dharm k naam pr apas m ladna chaiye.

    Reply
  11. आर. सिंह

    आर. सिंह

    बीनू जी पहले तो आपकी भावपूर्ण और दिल को छू लेने वाली कविता के लिए मुबारक वाद.रही बात हिन्दू राष्ट्र बनाने और कहने की तो मैं तो यह कहूँगा कि पहले हिन्दू को तो परिभाषित कर लें तब न बात आएगी हिन्दू राष्ट्र बनाने या न बनाने की.. क्या कोई मुझे बता सकता है कि हिन्दू सनातन का पर्यायवाची कब से बन गया?जो लोग ये बहस कर रहे हैं उनमे कितनो को धर्म का असली मतलब समझ में आता है?धर्म को किसी ख़ास पंथ से नहीं बंधा जा सकता .सनातन धर्म जिस रूप में आज विद्यमान है,वह एक पंथ है,धर्म नहीं.अगर ऐसा नहीं होता ,तो आज शंकराचार्य और साईं भक्तों की लड़ाई नहीं होती.उसी तरह इस्लाम एक पंथ है,अगर ऐसा नहीं होता तो शिया सुन्नी ही आपस में नहीं लड़ते.राष्ट्रीयता को सनातन धर्म के साथ बांधना कूपमंडूकता दर्शाता है.अगर हमारा देश हिन्दुस्तान है,तो हम हिन्दुस्तानी हैं.अगर यह भारत है तो हम भारतीय हैं.अगर यह इंडिया है तो हम इंडियन हैं.

    Reply
    • बीनू भटनागर

      धन्यवाद सिंह साहब, यही बात तो मै कहना चाह रही थी, शायद मै अपनी बात समझा नहीं पाई।भारतवासियों को भारतीय , इण्डियन या हिन्दुस्तानी कहा जा सका है पर हिन्दू कभी नहीं, हिन्दूराष्ट्र कभी नहीं।

      Reply
  12. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन

    दो बाते किसी भी लेखक/लेखिका को मान कर चलना होता है।
    (१) उसे पूरी स्वतंत्रता है, अपना आलेख बनाने की।
    (क) आलेख में आप तर्क देकर ही पाठक को समझा सकते/सकती हैं।(१ख) तर्क ही आधार होगा, जिस पर आप अपना आलेख प्रतिष्ठित करें।
    (२) केवल भावना पर आलेख बन तो सकता है; पर स्वीकृति के लिए, सच्चाई, तर्क, और प्रमाण इत्यादि आवश्यक होते हैं।
    (३) उदाहरणार्थ: मुझे मेरी माँ की पूजा करने की स्वतंत्रता है।(भावना) — (४)पर यदि मैं चाहूं, कि, आप सभी मेरी माँ की पूजा करें, तो मुझे प्रमाण,तर्क, और अनुमान इत्यादि का आश्रय करना पडता है। न्याय्य शास्त्र भी यही कहेगा।
    ***इन दोनों (भावना और प्रमाण) का अंतर समझने का अनुरोध।***
    आप को पढने/न पढने, की भी स्वतंत्रता है।पर बिना पढे अपना मत दूसरों पर थोपने की स्वतंत्रता नहीं है।
    जब प्रवक्ता पर इतने सारे मत प्रकट होते हैं, तो, उनका प्रकट होना ही एक सफलता है। ऐसा ही होता रहे। “स्वस्थ बहस” ही प्रवक्ता की अलग पहचान है। उसको ना त्यागे, ना लेखक/लेखिका मौन रहे।
    “सर्वेषां अविरोधेन”

    Reply
    • बीनू भटनागर

      मैने आप पर कुछ नहीं थोपा है, अमरीका मे सालों बिताकर वहाँ के लोग भारत के बारे मे क्या सोचते हैं यह मैने अमरीका मे आकर देखा था। आप उनके बारे मे सोचे। भारत के नागरिक शायद अब आप नहीं होंगे ,कर दाता भी आप वहीं के होंगे, इसलियें भारतीयों को उनके हाल पर छोड़ कर 10-12 लोगों को रिसर्च करवाइये, डालर कमाइये, कहां की बात लेकर बैठ गये आप।

      Reply
      • डॉ. मधुसूदन

        डॉ. मधुसूदन

        कुछ निम्न अर्थ के शब्दों का, गीत स्मरण हो रहा है।
        ===>
        “वो अफसाना,—-जिसे अंजाम तक,
        लाना न हो मुमकिन।—उसे एक खूबसूरत मोड,
        देकर छोडना अच्छा।”

        मैं स्तर से नीचे उतर कर उत्तर नहीं देता। पर आप ही के निम्न शब्द है।
        “मै इस लेख मे अपने विचार पाठकों को ठीक से समझा नहीं पाई” —तो आप ने ही मान लिया है।
        —आप की अगली टिप्पणी पर मैं (बहुत कर के,) उत्तर देना नहीं चाहूंगा।
        ॐ शान्तिः शान्तिः शातिः

        Reply
  13. Satyarthee

    वाह बीनूजी वाह ।मुख्य धर्मोँ के आधार ग्रन्थ न आपने पढ़े हैं न आप पढ़ना चाहती हैं. तो “कोई भी धर्म दूसरों से बैर नहीं सिखाता” यह मंत्र क्या स्वयं भगवान ने जन्म के समय या किसी अन्य समय आपके कान में फूँका था। या आप अपने आप को किसी पैगम्बर या दिव्यदृष्टि विभूषित विभूति समझती हैं कि जो आप कहें उस पर बिना उचित समीक्षा के सब को विश्वास कर लेना चाहिए . क्षमा कीजिये आप को चेले मिल जाएंगे लेकिन सेवक उस श्रेणी में खड़ा नहीं होना चाहता

    Reply
    • बीनू भटनागर

      धर्मग्रंथ तो आपने भी नहीं पढ़े होंगें ,पढ़े तो कौन समझे होंगे, मै ढ़ोंग नहीं करती,
      commen sense भी कोई चीज़ होती है।

      Reply
      • Satyarthee

        Aapke uttar ne mujhe atyant anichchha poorvak apne baare men kuchh likhane ke liye vivash kar diya hai. Dharm granthon ka main vidwan naheen hoon par aapko bata doon ki maine sab se pahle kuran shareef ka Maktaba Al Hasnat Rampur UP dwara prakashit Hindi -Urdu translation padha tha. Uske baad Abdullah Yusuf Ali ka bahu charchit English translation padha. Marmduke Pickthall la translation bhee padha. Uske atirikt aur anek granth Islam ke baare men padhe.Pata nahin Aapne kabhi prof Shesh Rao More ka naam suna hai ya nahin. kshama keejiye aapka bahumoolya samay nasht kiya.

        Reply
  14. Satyarthee

    वाह बीनूजी वाह ।मुख्य धर्मोँ के आधार ग्रन्थ न आपने पढ़े हैं न आप पढ़ना चाहती हैं. तो “कोई भी धर्म दूसरों से बैर नहीं सिखाता” यह मंत्र क्या स्वयं भगवान ने जन्म के समय या किसी अन्य समय आपके कान में फूँका था। या आप अपने आप को किसी पैगम्बर या दिव्यदृष्टि विभूषित विभूति समझती हैं कि जो आप कहें उस पर बिना उचित समीक्षा के सब को विश्वास कर लेना चाहिए . क्षमा कीजिये आप को चेले मिल जाएंगे लेकिन सेवक उस श्रेणी में खड़ा नहीं होना चाहता

    Reply
  15. बीनू भटनागर

    मै इस लेख मे अपने विचार पाठकों को ठीक से समझा नहीं पाई या प्रवक्ता के पाठक हिन्दू, हिन्दुत्व, सनातन और वैष्णव जैसे शब्दों की पुनरावृति कर कर के, पुराने ग्रंथों की दुहाई दे दे कर, मुझे अज्ञानी बताकर, ख़ुद को सनातन धर्म और हिन्दू राष्ट्र का पक्षधर बनकर, एक हिन्दू तालिबान का उदय करना चाहते हैं तो मै प्रवक्ता पर इस विषय मे कुछ नहीं लिखूंगी।

    Reply
  16. Pawsn Kumar

    Beenu ji m completely disagree with yr thought and u can’t impose your outlook on the others people. Though u r pretending being secular , but it can be seen completely clear that u can’t utter the complete truth .

    Reply
  17. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन

    देवी जी—आप विदुषी है; इस लिए आप का मत मह्त्व रखता है। पर ऐसा मत सच पर आधारित होना चाहिए।
    हिंदू समाज की कुरीतियों को समाप्त करने में कोई आपका विरोध नहीं है।संघ सबसे पहले सामाजिक सुधार का काम सक्रिय रूपसे कर रहा है। उस काम में, आपका स्वागत ही करेगा।
    पर निम्न बिंदुओं को आप के ध्यान में लाना चाहता हूँ। अनधिकार चेष्टाओं का उत्तर देकर समय नष्ट नहीं करूंगा।
    (१) हिंदू जीवनमूल्य अन्य पंथों, संप्रदायों, मजहबों या रिलिजनों का द्वेष नहीं सिखाते| इसलिए, उन्हीं जीवनमूल्यों को हमने अपने आचरण में दर्शाया भी है|
    (२) इसी कारण तो हिंदुस्थान में पारसी अपने मजहब के साथ सैंकडों वर्षों से सम्मान से जी रहे हैं| सोचने की बात है कि पारसी, अपनी मातृभूमि, पर्शिया (इराण) में, क्यौं नहीं रहे?
    (३)वैसे यहुदी भी अपनी मातृभूमि से कटने के बाद यूरोप के कई देशों में बिखर गये| **वहॉं पर उनको घृणित अत्याचारों का सामना करना पडा** | कुछ थोडे भारत में आये वे आदर सहित बस पाए। क्या यह इतिहास आप जानती नहीं।
    *** ये हमारे जीवनमूल्य हैं, हमारी संस्कृति है|***
    *** और राष्ट्रीयता का आधारस्तंभ संस्कृति ही होती है|**
    जो बटवृक्ष अनेक विविधताओं को आश्रय दे रहा है, उसी वट वृक्ष पर प्रहार कर कहाँ जाएंगे, यहुदि और पारसी?

    Reply
    • बीनू भटनागर

      कोई भी धर्म दूसरों से बैर नहीं सिखाता। ये बीज तो राजनीति ने बोये हैं पहले कौंग्रेस और सपा मुस्लिम तुष्टीकरण कर रही थी, भले ही मुसलमानो का उससे कोई लाभ न हुआ हो। मुस्लिम तुष्टीकरण के कारण भारत मे हिन्दू उग्रवाद पनपना अच्छा लक्षण नहीं है। आये दिन बजरंगदल राम सेन और ऐसे कई छोटे मोटे दल विश्व हिन्दू परिषद, संघ और बीजेपी के सरंक्षण मे मारपीट और गुण्डागर्दी कर रहे हैं।
      इसलेख से मुझे मुसलमानो का समर्थक समझने की ग़लती हुई है। मैने उनका भी बहुत विरोध किया है कांग्रेस के शासन काल मे।
      मुझे हिन्दू धर्म ग्रन्थो,बाइबल या कुरान मे को दिलचस्पी नहीं है ,न पढ़े हैं न पडूंगी।
      मेरे देश के लोग शांति से रहे, सुख समृद्ध हो, विकास हो ।

      Reply
      • sachin tyagi

        दूसरों से बैर सिखाने के लिए धर्म या राजनीति की जरूरत नही होती .कोई भी इंसान जैसी भी बातें सुनता है ,उसके मन में वैसी ही बातें आने लगती हैं .एक दूसरे से बैर करना लोग अपने आप सीख जाते हैं … आपने लिखा कि पहले कांग्रेस और सपा ने मुसलमानों का तुष्टीकरण किया … और फिर मुसलमानों ने कांग्रेस और सपा का तुष्टीकरण किया और ऐसा होने से दोनों पक्षों का लाभ हुआ ………ये कहना गलत है कि मुस्लिम तुष्टीकरण से मुसलमानों को कोई लाभ नही हुआ …….और इसी मुस्लिम तुष्टीकरण और मुसलमानों के हिन्दुओं को ख़तम करने के कारण भारत में हिन्दू उग्रवाद पनपा ….. और इसीलिए बजरंग दल और श्री राम सेना आएदिन गुंडागर्दी नहीं करते , इंसाफ की लड़ाई लड़ते हैं …. और मुसलमानों की समर्थक तो आप हैं ही , लेकिन आप साथ में एंटी हिन्दू या हिन्दू विरोधी भी हैं ….. और आपको धर्म ग्रंथों , इतिहास , संघ या राष्ट्रवादी विचारों में भी कोई दिलचस्पी नही तो फिर आप अपने सीमित नज़रिए से बाहर भी कैसे आ पाएं ……..!!

        Reply
  18. इंसान

    मुझे खेद है कि तथाकथित स्वतंत्रता के सरसठ वर्षों बाद भी सामान्य भारतीय किसी विषय पर भी एकमत नहीं हो पा रहे हैं| वास्तविकता यह है कि पूर्व शासन में अयोग्यता व मध्यमता के कारण उत्पन्न सामाजिक उपलब्धियों की असमानता के होते हुए भारतीय जनसमूह का एक बड़ा भाग असहाय, अनपढ़, गरीब जीवन का बोझ ढ़ोते दूसरे बहुत छोटे से “संपन्न” भाग द्वारा अधिकारहीन बने हुए है| भारतीय जनसमूह का यह बहुत छोटा सा “संपन्न” भाग चिरकाल से राष्ट्र-द्रोही शक्तियों का अखाड़ा बना हुआ है और ऐसी स्थिति में स्वयं अपने सामाजिक कर्तव्य से अनभिज्ञ अथवा राष्ट्र-द्रोही शक्तियों द्वारा फैलाई अराजकता में लाभान्वित यह भाग अनजाने में देश और देश की संस्कृति को नष्ट करने में जुटा हुआ है| मानो न मानो, संक्षिप्त में विभिन्न धर्मों, भाषाओं, संस्कृति व सोच के होते भारत की वर्तमान दयनीय स्थिति का एकमात्र समाधान केवल हिन्दू राष्ट्रवाद है अन्यथा विधि व्यवस्था के घोर अभाव व असफलता के कारण पिछले सरसठ वर्षों में सांप्रदायिक दंगों में निर्दोष भारतीयों की मृत्यु के लिए मैं लेखिका और वैसी ही मानसिकता युक्त अन्य सभी लोगों को दोषी समझता हूँ|

    Reply
    • बीनू भटनागर

      अगर भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाया गया तो बहुत खून ख़राबा होगा।मै न मुस्लिम समर्थक हूँ नहिन्दू कट्टरवादी। धर्म केबारे मे मे मेरे विचार ये हैं-
      1
      धर्म क्या है?
      केवल संसकृति!
      या फिर एक नज़रिया!,
      या फिर जीने की कला!
      जो है जन्म से मिला।
      धर्म जो बांट दे,
      धर्म जो असहिष्णु हो,
      तो क्या होगा किसी का भला!
      व्रत उपवास ना करूं,
      मंदिरों मे ना फिरूं,
      या पूजा पाठ ना करूं,
      तो क्या मै हिंदू नहीं?
      रोज़ा नमाज़ ना करूं
      तो क्या मै मुस्लिम नहीं?
      मै अधर्म ना करूं,
      तो क्या मै धार्मिक नहीं?
      धर्म तो है जोड़ता,
      नहीं है वो तोड़ता,
      यही है धर्म निर्पेक्षता!
      माथे पे हो चंदन टीका,
      या हो जालीदार टोपी,
      ईश तो सबका वही है,
      नहीं तो है सिर्फ धोखा!

      2
      हर जड़ चेतन का उद्गम प्रकृति,
      हमने उसको भगवान कहा,
      तुमने उसको इस्लाम कहा
      या केश बांध ग्रंथ साब कहा,
      या फिर प्रभु यशु महान कहा।

      पशु पक्षी हों या भँवरे तितली,
      वट विराट वृक्ष हो चांहे हो तृण,
      या हों सुमन सौरभ और कलियाँ,
      हाथी विशाल हो या सिंह प्रबल
      या हों जल मे मछली की क्रीड़ायें,

      ऊँचे पहाड़ हों या घाटी,नदियाँ
      गहरे समुद्र मे टापू छोटे छोटे,
      जल-थल हो या फिर अंतरिक्ष,
      या फिर सौर मंडल अनेक,
      ग्रह और उनके उपग्रह अनेक

      हम प्रकृति को जो भी नाम दे,
      राम रहीम अल्लाह कहें,
      मानव हैं मानव बने रहें।

      हर जड़ चेतन का उद्गम प्रकृति,
      हमने उसको भगवान कहा,
      तुमने उसको इस्लाम कहा
      या केश बांध ग्रंथ साब कहा,
      या फिर प्रभु यशु महान कहा।

      पशु पक्षी हों या भँवरे तितली,
      वट विराट वृक्ष हो चांहे हो तृण,
      या हों सुमन सौरभ और कलियाँ,
      हाथी विशाल हो या सिंह प्रबल
      या हों जल मे मछली की क्रीड़ायें,

      ऊँचे पहाड़ हों या घाटी,नदियाँ
      गहरे समुद्र मे टापू छोटे छोटे,
      जल-थल हो या फिर अंतरिक्ष,
      या फिर सौर मंडल अनेक,
      ग्रह और उनके उपग्रह अनेक

      हम प्रकृति को जो भी नाम दे,
      राम रहीम अल्लाह कहें,
      मानव हैं मानव बने रहें।

      Reply
    • आर. सिंह

      आर. सिंह

      इंसान जी,आपने बहुत कुछ कहना चाहा है,पर आप इस लिए उलझ गए हैं,क्योंकि आप स्वयं नहीं समझ पा रहे हैं कि भारत की दुर्दशा का असली कारण क्या है?असली कारण है,मुद्दों से भटक जाने की हमारी प्रकृति.हमारा देश उन कारणों से इस हीन अवस्था को नहीं प्राप्त है,जिसका जिक्र आपने किया है.कारण कुछ और हैं,पर चूंकि यह भ्रष्ट व्यवस्था आप लोगों को कोई हानि नहीं पहुंचा सकी है,अतः या तो आपलोगों की निगाह उन कारणों की और गया नहीं है या आपलोगों ने जानबूझ कर उनकी अवहेलना की है.पहले तो हिन्दू शब्द सनातन पंथ का प्रयायवाची नहीं है.फिर जिस संस्कृति की वकालत करते आपलोग थक नहीं रहे हैं,उस संस्कृति ने मानवों को क्या दिया है?भारतीयों में जितनी संक्रीणता और एक दूसरे से दुराभाव की भावना है,वैसा शायद ही कहीं देखने को मिले.आज भी दलितों का आपके समाज में क्या स्थान है?संस्कृति का कौन गौरव शाली अध्याय उनकी इस दुर्दशा का कारण है?मुद्दों से आपलोग मत भटकिये.देश के सामने असली मुद्दा है भूखसे निजात भटष्टाचार से निजात,अशिक्षा से निजात और बीमारी से निजात इन सबके बाद हीं ये सब चोचले सामने आते हैं.,रही बात अपने गौरवशाली अतीत , देशभक्ति और चरित्र की बात ,तो इस बारे में मेरे दो आलेख प्रवक्ता के पन्नो पर मौजूद है.क्या उनमे दर्शाये तथ्य हमारी आँखें खोलने के लिए प्रयाप्त नहीं हैं?..
      मेरे समझ से ये सब बहस एक सोचे समझे षड्यंत्र का हिस्सा हैं.हमारी नयी सरकार ने सत्ता में आने से पहले बहुत से वादे किये थे,उसी में एक वादा यह था कि सौ दिनों में विदेशों से काला धन वापस लाएंगे. मैं समझता हूँ कि सौ दिन पूरे होने में शायद एक सप्ताह बाकी है.ऐसा तो नहीं लग रहा है कि इस एक सप्ताह में कोई काला धन वापस आएगा.इसी तरह महंगाई और भ्रष्टाचार पर काबू पाने की बात थी.वहां भी यथास्थिति कायम है.
      बीनू जी ने एक कड़वा सत्य बयान करने का जो साहस दर्शाया है,वह भी तारीफ़ के काबिल है.सचमुच में जो भारत की नागरिकता त्याग चूके हैं और वर्षों से विदेश में रह रहे हैं,वे यहां की जमीनी हकीकत नहीं समझ सकते.

      Reply
      • Satyarthee

        एक कड़वा सत्य यह भी है कि यहाँ भारत में भी ऐसे नागरिकों की कमी नहीं है जो ज्ञान अथवा पूर्वाग्रहों से ग्रसित होने के कारण विदेशों में उपजी और विकसित हुई विचारधाराओं को जिन में से कुछ तो जन्म के देशों द्वारा तिरस्कृत और त्याज्य भी हो चुकी हैं तथा कुछ अब अंतर्राष्ट्रीय निंदा का पात्र होती जा रही हैं बलपूर्वक ओढ़े हुए हैं और भारत के विघटन प्रायोजित कार्यक्रम में पूरा सहयोग कर रहे हैं। ब्रेकिंग इंडिया नमक पुस्तक पढ़ कर देखें

        Reply
        • आर. सिंह

          आर. सिंह

          आपका कथन ठीक हो सकता है,पर यह तर्क तो तो केवल उस पुरानी परम्परा को आगे बढ़ाने का प्रयत्न मात्र है कि अगर किसी लक़ीर को बिना कांटे छांटें छोटा करना है ,तो उसके आगे एक बड़ी लकीर खींच दीजिये , पर आप इसमें भी पूरी तरह सफल नहीं हुए हैं.क्या आप बता सकते हैं,कि जो लोग भारत की नागरिकता त्याग कर अन्य देशों की नागरिकता ग्रहण कर चुके हैं,उनको भारत के अंदरुनी मामले में बोलने का क्या अधिकार है? ऐसे कोई तर्क संगत बात कहे तो उसको मुनासिब समझा जा सकता है,पर जब कोई इतर भारतीय किसी भारतीय पर लांछन लगाने का प्रयत्न करे ,तो उस भारतीय को यह क्यों गवारा होगा?

          Reply
    • sachin tyagi

      इन्सान जी , आपके विचार बहुत अच्छे और सही हैं लेकिन आपकी भाषा व शैली बहुत जटिल है . अगर आप अपने विचारों को सरल ढंग से कहें तो मेरे जैसे सीधे व सरल इंसानों पर बड़ी कृपा होगी .

      Reply
  19. Satyarthee

    पता नहीं बीनू जी ने कुरान शरीफ और बाइबिल का कुछ गंभीर अध्धययन किया है या नहीं। यदि वे कर चुकी हैं और यह लेख उन के इस्लाम तथा ईसाई धर्मग्रंथों के ज्ञान पर आधारित है तो मुझे कुछ कहना नहीं है. और यदि उन्हों ने ऐसा नहीं किया है तो मेरा विनम्र अनुरोध है पहले इन धर्म ग्रंथों का थोड़ा गंभीर ज्ञान प्राप्त कर लें। ऐसा ही कुछ हिन्दू धर्म ग्रंथों के बारे में भी करने का कष्ट करें.

    Reply
    • बीनू भटनागर

      सच मे मैने किसी धर्म ग्रंथ का अध्ययन नहीं किया, करूंगी भी नही। मैने धर्म के नाम पर आडम्बर , मारपीट , हत्या, अंधविश्वास और दंगो का अध्ययन किया है इसलियें जिसे आप धर्म कह रहे हैं उससे दूर रहना चाहती हूँ।

      Reply
  20. बीनू भटनागर

    डा. मधुसूदन और शिवेश प्रसाद जी,
    आपको मेरी कौन सी बात ने कष्ट पंहुचाया, मै नहीं समझ पा रही हूँ। मैने कौंग्रेस और सपा के मुस्लिम तुष्टीकरण का भी उतना ही विरोध किया है, जितना हिन्दू कट्टरवादी ताक़तों का कर रही हूँ। मेरी रुची हिन्दू धर्म के इतिहास या हिन्दू शब्द के उद्गम मे नहीं है, जो गुणी जन कर रह है सब सच है।मैने सिर्फ वर्तमान मे क्या व्यावहारिक है, उस पर चर्चा की है।विदेश मे रहकर किताबी बातें करना और ज़मीनी स्थिति को समझकर ऐसी स्थिति बनाना जहाँ सभी संप्रदाय शाँति से रह सके दोनो अलग बाते हैं।
    जहाँ तक स्वतन्त्रता देने का सवाल है, ये स्वतन्त्रता हमे देश के संविधान ने दी है, न कि हिन्दुत्व ने। हिन्दुओं मे अपनाने की जगह छुआछूत का ज़हर फैलाया इसलियें कुछ लोग उससे दूर ही हुए।
    हिन्दू ताक़ते आज सांई भक्तों से लड़ रह हैं, मार पीट कर रही हैं, जबकि शिरडी के सारे कर्मकाँण्ड हिन्दू रीति से(सनातन वैष्णव या कुछ और) ही होते हैं। बाबा के पास तो हिन्दू मुसलमान दोनो आते थे । हिन्दू कट्टरवाद मुस्लिम तुष्टीकरण की देन है, पर देश के लियें हानिकारक है। अब हिन्दुंओं का ही एक वर्ग सांई पूजा का वरोध कर रहा है, विरोध ही नहीं मारपीट गुण्डागर्दी करवा रहा है, इस वर्ग को शंकराचार्य का संरक्षण भी मिला है, बल्कि कहा जा सकता है कि शुरुआत ही वहीं से हुई है।आस्था निजी अनुभूति है, किसी rule book से नहीं चलती ,ये मामूली बात कट्टरवादी ताक़ते नहीं समझती।

    Reply
    • SCMUDGAL

      ALPSANKHYAKON KO ITNI BHI VARIYATA MAT DO KI LOG KHUD KO CHHOTA DHARM BANAANE KEE AUR AGRSAR HONE LAGE AUR BHAVISHYA MEIN DESH KEE EKTA KO HI KHATRA HO JAAYE ! ALPSANKYAKON KO APNE BARABARI KE ADHIKAR PAANE KA ADHIKAR JAROORI HOTA HAI NAA KI VISHESH ADHIKAR YA DARJA PAANE KA ??

      Reply
      • इंसान

        “अल्पसंख्यकों को इतनी भी वरियता मत दो कि लोग खुद को छोटा धर्म बनाने की ओर अग्रसर होने लगें और भविष्य में देश की एकता को ही खतरा हो जाए! अल्पसंख्यकों को अपने बराबरी के अधिकार पाने का अधिकार जरूरी होता है न कि विशेष अधिकार या दर्जा पाने का??”

        अच्छे विचार हैं| हिंदी देवनागरी में लिखें, शुद्ध हिंदी बोलें व ओरों को भी ऐसा करने के लिए कहें| धन्यवाद|

        Reply
  21. डॉ. मधुसूदन

    डॉ.मधुसूदन

    (क) आप जिस वैचारिक स्वातंत्र्य से यह आलेख लिख सकती है, और उसे प्रकाशित भी करवा सकती है; यह वैचारिक स्वातंत्र्य ही हिन्दुत्व का पारिचय है।
    (ख) आज के भारत के संविधान के मूल में भी प्रायः हिंदुत्व की विचारधारा का ही प्रभाव है।”सत्यमेव जयते” उपनिषदों से ही आता है। ऐसी समन्वयवादिता ही हिंदुत्व की पहचान है।
    (ग) जिन जिन जनों को भारत की उन्नति से आनंद और अवनति से दुःख होता है, वे सारे राष्ट्रीय है या भारतीय है।
    **यह हिंदु विचारकों की देन ही है।*** अतः प्रमाणित हो गया, कि यह हिंदु राष्ट्र ही है।
    (घ) क्या आप भारत को(१) पुण्यभूमि, (२)कर्मभूमि,(३) धर्मभूमि,(४) मातृभूमि, (५) पितृभूमि —या कुछ ऐसी ही, अन्य धारणाओं में, मानती है?
    यदि हाँ, तो संघ आपको हिन्दु ही समझता है।
    पर आप जो भी समझना हो, समझिए। यह स्वतंत्रता भी आप को हिंदुत्व ही देता है।
    (च) इंद्रेश जी के आंदोलन के विषय में जानने का अनुरोध करता हूँ।
    (छ)राम और कृष्ण को आप चाहे तो भगवान ना माने, पर राष्ट्र पुरूष मान सकती हैं। जनता उन्हें भारत में जन्मे हुए मानती है।
    (ज) आप को नास्तिक होने का अधिकार भी हिंदुत्व ही देता है।उसके लिए, “हेल” में, या “जहन्नम” में नहीं भेजता।

    (झ)जिस विचार के अंतर्गत आपको यह लेखन स्वातंत्र्य दिया गया है; वह “वादे वादे जायते तत्त्व बोधाः” का विचार भी हिंदुत्व का ही परिचायक है।
    (ट) किसी मौलिक बिंदुपर संवाद (विवाद नहीं) कीजिए। कुछ विलम्ब होगा; पर उत्तर अवश्य दूंगा।

    Reply
  22. Shivesh Pratap

    Binu ji aap ka bauddhik aadhar satahi hai. Mujhe lagta hai ki lekhni ka durupayog karne se accha hai ki ise band hi rakha jaaye. Secular hone ka manasik faisan aap par parilakshit hota hai.

    Vaicharikta ka nitant abhav hi jahil puja paddhatiyon ki tulna HINDU ke samaveshi darshan se karne ki tulna kar sakta hai.
    Bahut Dukh hua is lekh ko padhkar.

    Reply
    • इंसान

      “बीनू जी आप का बौधिक आधार सतही है| मुझे लगता है कि लेखनी का दुरुपयोग करने से अच्छा है कि इसे बंद ही रखा जाए| सेक्युलर होने का मानसिक फैशन आप पर परिलक्षित होता है|

      वैचारिकता का नितांत अभाव ही जाहिल पूजा पद्धतियों की तुलना हिन्दू के समावेशी दर्शन से करने की तुलना कर सकता है| बहुत दुःख हुआ इस लेख को पढ़कर|”

      शिवेश प्रताप जी, आपके विचार बहुत अच्छे हैं| हिंदी देवनागरी में लिखें, शुद्ध हिंदी बोलें व ओरों को भी ऐसा करने के लिए कहें| धन्यवाद|

      Reply
    • आर. सिंह

      आर. सिंह

      देवनागरी लिपि में हिंदी लिखने के लिए आप निम्नलिखित लिंक इस्तेमाल कीजिये.आप रोमन लिपि जो भी लिखेंगे,कर्सर को आगे बढ़ाते ही वह स्वयं देवनागरी लिपि में लिखता जाएगा.
      http://hindi.changathi.com/

      Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *