जलवायु परिवर्तन की चपेट में चेन्नई

प्रमोद भार्गव

86 लाख की आबादी वाला शहर चेन्नई लगभग जलमग्न है। चेन्नई के अलावा नेल्लौर,चित्तूर,प्रकाशम्,कांचीपुरम,तिरूवल्लूर,विल्लूपुरम् और पुड्डुचेरी में भी प्रकृति का यही रौद्र रूप दखने में आ रहा है। इसके पहले हम जम्मू-कष्मीर,उत्तराखण्ड,लद्दाख और 2005 में मुंबई को भी इसी बेहाली की जटिल स्थिति से रूबरू होते देख चुके हैं। तय है,एक के बाद एक प्राकृतिक आपदाओं का सामना जिस तरह से देश को करना पड़ रहा है,वह जलवायु परिवर्तन के स्पष्ट संकेत हैं। इस बारिश ने सौ साल का रिकाॅर्ड तोड़ा है। औसत से तीन गुना अधिक बारिश हुई,वह भी चंद दो-तीन दिनों में। तमाम आधुनिक संशाधनों के बावजूद प्रकृति के आगे हम कितने लाचार हैं,यह बाढ़ में डूबे चेन्नई की जल सतह पर देखने को मिल रहा है। जो ‘हिंदू‘ अखबार अपनी 137 साल की उम्र में कभी बंद नहीं हुआ,उसका प्रकाशन 2 दिसंबर को नहीं हो पाया। सभी शिक्षण संस्थान तो बंद हैं ही,एक हजार से ज्यादा दफ्तर और कारखाने भी बंद हैं। नगर की 50 लाख से भी अधिक आबादी बाढ़ की चपेट में है। सेना के तीनों अंगों की मदद के बावजूद लोगों को घरेलू सामान के जुगाड़ से नावें बनाकर,जिंदगी को जोखिम में डालकर किनारे तलाशने को मजबूर होना पड़ रहा है। लोकसभा में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने 269 लोगों की मृत्यु का बयान दिया है। यह प्रलयंकारी संकट कुदरती तो है,लेकिन इसके तांडव का सबब मानव उत्सर्जित अनियंत्रित औद्योगिक विकास और विस्तार लेता अनियोजित शहरीकरण भी है। जिसके चलते आदमी प्राकृतिक आपदाओं के संकट से घिरता जा रहा है।

तमिलनाडू में इन दिनों तेज बारिश होती रहती है। इसका कारण उत्तर-पूर्वी मानसून रहता है। हिमालय के छोर से प्रवाहित ठंडी हवाएं बंगाल की खाड़ी से जल का शोषण कर नमी पाती हैं और दिसंबर से मार्च के बीच प्रायद्वीपीय भारत में बारसात की वजह बनती हैं। इस मर्तबा हैरानी में डालने वाली बात यह रही कि एक महीने के भीतर ही इस इलाके में उतनी बारिश हो चुकी है,जो चार महिनों में होती है। 30 नवबंर और एक दिसंबर के दरमियान ही करीब 1088 मिलीमीटर बारिश हुई,जिससे चेन्नई की सभी 35 झीलें और ताल-तलैया उफान पर आ गए। नतीजतन इस आफत की बारिश ने देश के चौथे बड़े शहर को पानी-पानी कर दिया।

आफत की यह बारिश इस बात की चेतावनी है कि हमारे नीति-नियंता देश और समाज के जागरूक प्रतिनिधि के रूप में दूरदृष्टि से काम नहीं ले रहे हैं। पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के मसलों के परिप्रेक्ष्य में चिंतित नहीं हैं। 2008 में जलवायु परिवर्तन के अंतरसकारी समूह ने रिपोर्ट दी थी कि घरती पर बढ़ रहे तापमान के चलते भारत ही नहीं दुनिया में वर्षाचक्र में बदलाव आने वाले हैं। इसका सबसे ज्यादा असर महानगरों पर पड़ेगा। इस लिहाज से शहरों में जल-प्रबंधन व निकासी के असरकारी उपायों की जरूरत है। इस रिपोर्ट के मिलने के तत्काल बाद केंद्र की तत्कालीन संप्रग सरकार ने राज्य स्तर पर पर्यावरण सरंक्षण परियोजनाएं तैयार करने की हिदायत दी थी। लेकिन देश के किसी भी राज्य ने इस अहम् सलाह पर गौर नहीं किया। इसी का नतीजा है कि हम जल त्रासदियां भुगतने को विवश हो रहे हैं। यही नहीं शहरीकरण पर अंकुश लगाने की बजाय,ऐसे उपायों को बढ़ावा दे रहे हैं,जिससे उत्तरोत्तर शहरों की आबादी बढ़ती रहे। यदि यह सिलसिला इन त्रासदियों को भुगतने के बावजूद जारी रहता है तो ध्यान रहे,2031 तक भारत की शहरी आबादी 20 करोड़ से बढ़कर 60 करोड़ हो जाएगी। जो देश की कुल आबादी की 40 प्रतिशत होगी।

वैसे,धरती के गर्म और ठंडी होते रहने का क्रम उसकी प्रकृति का हिस्सा है। इसका प्रभाव पूरे जैवमंडल पर पड़ता है,जिससे जैविक विविधता का आस्तित्व बना रहता है। लेकिन कुछ वर्षों से पृथ्वी के तापमान में वृद्धि की रफ्तार बहुत तेज हुई है। इससे वायुमंडल का संतुलन बिगड़ रहा है। यह स्थिति प्रकृति में अतिरिक्त मानवीय दखल से पैदा हो रही है। इसलिए इस पर नियंत्रण संभव है। पेरिस में जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में जो सम्मेलन चल रहा है,वह भी धरती के तापमान को नियंत्रित करने के लक्ष्य को प्राप्त के लिए है। हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी चेन्नई की इस जल त्रासदी को ग्लोबल वार्मिंग मान रहे हैं। इस नाते उन्होंने विष्व जलवायु सम्मेलन का ध्यान भी इस ओर खींचा है। सयुक्त राश्ट्र की जलवायु परिवर्तन समिति के वैज्ञानिकों ने तो यहां तक कहा है कि ‘तापमान में वृद्धि न केवल मौसम का मिजाज बदल रही है,बल्कि कीटनाशक दवाओं से निष्पभावी रहने वाले बीशाणुओं-जीवाणुओं,गंभीर बीमारियों,सामाजिक संघर्शों और व्यक्तियों में मानसिक तनाव बढ़ाने का काम भी कर रही है।‘

दरअसल,पर्यावरण के असंतुलन के कारण गर्मी,बारिश और ठंठ का संतुलन भी बिगड़ता है। इसका सीधा असर मानव स्वास्थ्य और कृषि की पैदावर व फसल की पोष्टिकता पर पड़ता है। यदि मौसम में आ रहे बदलाव से बीते तीन-चार साल के भीतर घटी प्राकृतिक आपदाओं और संक्रामक रोगों की पड़ताल की जाए तो वे हैरानी में डालने वाले हैं। तापमान में उतार-चढ़ाव से ‘हिट स्ट्रेस हाइपरथर्मिया जैसी समस्याएं दिल व सांस संबंधी रोगों से मृत्युदर में इजाफा हो सकता है। पश्चिमी यूरोप में 2003 में दर्ज रिकाॅर्ड उच्च तापमान से 70 हजार से अधिक मौतों का संबंध था। बढ़ते तापमान के कारण प्रदुषण में वृद्धि दमा का कारण है। दुनिया में करीब 30 करोड़ लोग इसी वजह से दमा के शिकार हैं। पूरे भारत में 5 करोड़ और अकेली दिल्ली में 9 लाख लोग दमा के मरीज हैं। बाढ़ प्रभावित तमिलनाडू में भी दमा के मरीजों की संख्या बढ़ना तय है। बाढ़ के दूषित जल से डायरिया व आंख के संक्रमण का खतरा बढ़ता है। भारत में डायरिया से हर साल करीब 18 लाख लोगों की मौत हो रही है। इसी दूषित जल से डेंगू और मलेरिया के मच्छर कहर ढाते हैं। तय है,बाढ़ थमने के बाद,बाढ़ प्रभावित शहरों को बहुआयामी संकटों का सामना करना होगा।

चेन्नई की वर्तमान मुसीबत का वजह कम समय में ज्यादा बारिश होना तो है ही,जल निकासी के इंतजानम नाकाफी होना भी है। दरअसल औद्योगिक और प्रौद्योगिक विकास के चलते शहरों के नक्षे निरंतर बढ़े हो रहे हैं। गांव और ताल-तलैया निगलते जा रहे हैं। इस कारण जहां जल संग्रहण का क्षेत्र कम हो रहा है,वहीं अनियोजित शहरीकरण से बरसाती पानी के रास्ते बंद हो रहे हैं। समुद्र तटीय महानगर होने के कारण चेन्नई का बड़ा क्षेत्र समुद्र तल के बराबर या उससे नीचे है। लिहाजा करीब दो तिहाई शहर की 481 बस्तियां पानी में डूब गईं। हवाई अड्डा,रेलवे स्टेशन,बस अड्ढे और सड़कें व फ्लाई ओवर तक डूब गए। मंदिर,मस्जिज्द,चर्च और गुरुद्वारे भी जलमग्न हैं। एक हजार से ज्यादा दफ्तर और कारखानों में पानी भर गया है। जाहिर है,आदमी तो आदमी उद्योग जगत की भी नींद हराम है। जल के इतने बढ़े क्षेत्र में भराव का कारण चेन्नई का विकास उद्वहन परियोजनाओं ;हाइड्रोलाॅजीकल प्लानद्ध के अनुसार नहीं होना भी है। नरेंद्र मोदी जैसा कि दावा कर रहे हैं कि शहरीकरण ही नहीं,स्मार्ट शहर वर्तमान की जरूरत हैं,तो यह भी जरूरी है कि शहरों की अधोसरंचना संभावित आपदाओं के अनुसार विकसित की जाए ?

चेन्नई आईटी और आॅटो कंपनियां का बड़ा नाभि केंद्र है। अधिकतर कंपनियों के कार्यालयों में पानी लबालब है। फोर्ड,डेमलर,निसान,टीवीएस,हुंडई रेनो निसान और अषोक लैलेंड के कारखाने यही हैं। फोर्ड संयंत्र फिलहाल बंद कर दिया गया है। इसकी सालाना उत्पादन क्षमता 3.4 लाख इंजन और 2 लाख वाहन है। किंतु पानी भर जाने से उत्पादन क्षमता प्रभावित होगी और कंपनी समय पर अपने उत्पाद उपभोक्ता तक नहीं पहुंचा पाएगी। चेन्नई में सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में काम करने वाली टीसीएस,इंफोसिस,टेक मंहिंद्रा और एचसीएल टेक जैसी कंपनियां भी हैं। इनका भी कारोबार ठप है। इस कारण ऐसी आशंका जताई जा रही है कि इनके शेयरों में भारी गिरावट दर्ज होने वाली है। इंडिया सीमेंट कंपनी भी ऐसे ही हालातों से दो-चार हो रही है। इन कंपनियों में 15 हजार करोड़ के नुकसान का अनुमान लगाया जा रहा है। नगरीय सरंचना को 8.5 हजार करोड़ की हानि पहुंचने का अंदाजा है। फौरन राहत के लिए मुख्यमंत्री जयललिता ने केंद्र सरकार से 2000 करोड़ की मांग की थी,इसके बदले में 940 करोड़ की आर्थिक सहायता तत्काल केंद्र ने दे दी है। बहरहाल जलवायु में आ रहे बदलाव के चलते यह तो तय है कि प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति बढ़ रही है। इस लिहाज से जरूरी है कि शहरों के पानी का ऐसा प्रबंध किया जाए कि उसका जल भराव नदियों और बांधों में हो,जिससे आफत की बरसात के पानी का उपयोग जल की कमी से जूझ रहे क्षेत्रों में किया जा सके। साथ ही शहरों की बढ़ती आबादी को नियंत्रित करने के लिए ग्रामीण विकास पर ध्यान देने की जरूरत भी है।

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