लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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डा. राधेश्याम द्विवेदी
महामारी जैसी 20,000 से ज्यादा मौतें :- उत्तर प्रदेश विहार तथा नेपाल के तराई इलाके में जल भराव तथा गन्दगी आदि की अधिकता के कारण बरसात के मौसम में दिमागी बुखार यानी इंसेफेलाइटिस का प्रकोप बढ़ जाता है. इसमें जापानी इंसेफेलाइटिस और एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम नामक दो बीमारियां होती हैं. दोनों को ही सामान्य भाषा में इसे जापानी इनसेफेलाइटिस (जेई) या दिमागी बुखार भी कहा जाता है. पिछले चार दशक में इस बीमारी से बीस हजार से अधिक मौतें हो चुकी हैं. हर साल पांच-छह सौ बच्चे गोरखपुर के सरकारी रिकॉर्ड में मरते हैं जबकि हकीकत कुछ और ही है. वहीं इस बीमारी से लकवाग्रस्त हुए लोगों का कोई रिकॉर्ड ही नहीं रखा जाता. इंसेफेलाइटिस के सबसे अधिक शिकार तीन से पन्द्रह साल के बच्चे होते हैं. यह बीमारी जुलाई से दिसम्बर के बीच फैलती है. सितम्बर-अक्टूबर में बीमारी का कहर सबसे ज्यादा होता है.
आंकड़े बताते हैं कि जितने लोग इंसेफेलाइटिस से ग्रसित होते हैं, उनमें से केवल 10 प्रतिशत में ही दिमागी बुखार के लक्षण जैसे झटके आना, बेहोशी और कोमा जैसी स्थिति दिखाई देती है. इनमें से 50 से 60 प्रतिशत मरीजों की मौत हो जाती है. बचे हुए मरीजों में से लगभग आधे लकवाग्रस्त हो जाते हैं और उनके आंख और कान ठीक से काम नहीं करते हैं. जिंदगीभर दौरे आते रहते हैं. मानसिक अपंगता हो जाती है. विहार, नेपाल के तराई तथा उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल के गोरखपुर, महाराजगंज, सिद्धार्थनगर, बस्ती, कुशीनगर, देवरिया, मऊ समेत करीब दर्जन भर जिलों में हर साल सैकड़ों बच्चों को निगल जाती है. कभी कभी इसकी चपेट में आकर बहुत सारे बच्चे विकलांगता के मुख में समा जाते हैं.
कारण:- इंसेफेलाइटिस फैलने के स्पष्ट कारणों का अभी तक पता नहीं चल पाया है, लेकिन अब तक मुख्य कारणों में साफ-सफाई का अभाव माना जा रहा है. गंदगी की वजह से यह बीमारी एक-दूसरे में फैलती है. यह वायरस और बैक्टीरिया के माध्यम से फैलती है लेकिन जो बीमारी यहां पाई जाती है वह वायरस से फैलती है. जो सूअर और हिरोनस नामक पानी की चिड़िया के शरीर पर पाये जाते हैं. अगर इन्हें काटने के बाद मच्छर किसी मनुष्य को काट लें तो उसे इंसेफेलाइटिस होने की पूरी आशंका होती है. दूषित पानी से भी इस बीमारी के वायरस लारवा के रूप में फलते-फूलते हैं.यह बीमारी एक मादा मच्छर क्यूलेक्स ट्राइटिनीओरिंकस के काटने से होती है.इसमें दिमाग के बाहरी आवरण यानी इन्सेफेलान में सूजन हो जाती है. रोगी में तेज बुखार, झटके, कुछ भी निगलने में कठिनाई जैसे लक्षण नजर आने लगते हैं और यदि समुचित इलाज न हो सके तो तीन से सात दिन में मौत हो जाया करती है.
सरकार स्वास्थ्य संगठनों का उदासीन रवैया : – गोरखपुर का बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज हर साल, गोरखपुर के नजदीक ही नहीं बल्कि बिहार और नेपाल से आने वाले मरीजों से बुरी तरह भर जाता है. अक्सर 208 बिस्तरों वाले इनसेफेलाइटिस वॉर्ड में एक बेड पर तीन से चार बच्चों को लिटाना पड़ता है. साल 2005 तक इस बारे में सरकारों या स्वास्थ्य संगठनों का रवैया खासी लापरवाही भरा था, लेकिन उस साल मौतों का आंकड़ा एक हजार से भी ज्यादा हो जाने और राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय मीडिया में खबर आने के बाद सरकारों को सक्रियता दिखानी पड़ी. साल 2006 तक तो इस रोग से हुई मौतों का जिम्मेदार अकेले मच्छरों को ही माना जाता था, लेकिन बाद में हुए परीक्षणों से पता चला कि सभी मामले दिमागी बुखार के नहीं थे.कई मामलों में वहां जलजनित एंटेरो वायरस की मौजूदगी पाई गई है. वैज्ञानिकों ने इसे एईएस यानि एक्यूट इनसेफेलाइटिस सिंड्रोम का नाम दिया है. बीते कुछ सालों में दिमागी बुखार के मामलों में तो कमी आई है, लेकिन एईएस के मामले तेजी से बढ़े हैं और इसके लक्षण भी दिमागी बुखार जैसे ही होते हैं.
पहेली बना वायरस:- साल 2006 में पहली बार टीकाकरण कार्यक्रम शुरू हुआ और 2009 में पुणे स्थित नेशनल वायरोलॉजी लैब की एक इकाई गोरखपुर में स्थापित हुई, ताकि रोग की वजहों की सही पहचान की जा सके. टेस्ट किट उपलब्ध होने के चलते दिमागी बुखार की पहचान अब मुश्किल नहीं रही, लेकिन इन एंटेरो वायरस की प्रकृति और प्रभाव की पहचान करने की टेस्ट किट अभी विकसित नहीं हो सकी है. अमरीका के अटलांटा स्थित नए बैक्टीरिया और वायरस की खोज करने वाले संगठन सीडीसी (सेंट्रल डिजीज कंट्रोल) के वैज्ञानिक भी इन वायरसों का पता लगाने के लिए 2007, 2009 और 2012 में मेडिकल कॉलेज का दौरा कर चुके हैं.
कुछ खतरा कम हुआ:- मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य प्रोफेसर केपी कुशवाहा दो दशक से ज्यादा समय से बतौर बाल रोग विशेषज्ञ इस महामारी पर नजर रखते रहे हैं.वह इस बात पर संतोष जताते हैं कि बीते दिनों साफ सफाई, शौचालय और शुद्ध पेयजल को लेकर जागरूकता और सरकारी सक्रियता बढ़ने से खतरा कम हुआ है. गांवों में अब भी मरीजों को सही वक्त पर चिकित्सा सुविधा नहीं मिल पाती, जिससे मौतों का आंकड़ा बढ़ जाता है.
उन्मूलन व बचाव :- इस बीमारी के उन्मूलन और इससे बचाव के लिए काफी दिनों से सक्रिय गोरखपुर के डॉक्टर आरएन सिंह कहते हैं, अकेले गोरखपुर जिले में पांच सौ-छह सौ बच्चों की मौत होती हैयदि प्रभावित 10-12 जिलों को मिला दिया जाए तो कम से कम पांच हजार बच्चे हर साल इस बीमारी से मरते हैं.यह मुद्दा किसी भी राजनीतिक पार्टी के लिए कोई चुनावी मुद्दा नहीं है. डॉ आरएन सिंह ने लोगों के साथ मिलकर इंसेफेलाइटिस को खत्म करने के लिए जनता का घोषणा पत्र तैयार किया है. वह प्रचार करने वाले हर नेता को अपना बनाया हुआ घोषणा पत्र बांट रहे हैं. इंसेफेलाइटिस पूर्वांचल में धान के खेतों में होने वाले एक मच्छर से होता है. ज्यादातक मामले अप्रैल से लेकर जुलाई तक सामने आते हैं. अगर समय से बच्चों को इंजेक्शन लगवा दें तो न जाने कितने ही बच्चों की जिंदगी बच सकती है. जानकारों के मुताबिक इस बीमारी में मृत्यु दर करीब तीस प्रतिशत है. बुखार के रूप में शुरू होने वाली इस बीमारी के वायरस का मुख्य कारण मच्छरों को माना जाता है और डॉक्टरों के मुताबिक अब तक इसका कारगर इलाज संभव नहीं हो पाया है, सिर्फ बचाव और रोकथाम ही एकमात्र रास्ता है.इसके लिए एक राष्ट्रीय कार्यक्रम की जरूरत है जो बनाया भी गया था लेकिन आजतक वो लागू नहीं हो पाया.गांव में जागरूकता के तमाम संदेश भी पढ़ने को मिलते हैं. साफ-सफाई के लिए ये संदेश सरकारी विभागों की ओर से जारी किए जाते हैं. लोगों से खुद सफाई रखने की अपील की जाती है और सरकारी स्तर पर दवाइयां छिड़काई जाती हैं. लेकिन साफ सफाई की स्थिति पूरे इलाके में काफी दयनीय है. घर को साफ-सुथरा रखें मच्छरों से बचाव के लिए कीटनाशक का प्रयोग करें. रात में सोते समय मच्छरदानी का प्रयोग करें. इंसेफेलाइटिस रोग पैदा करने वाले मच्छर शाम को ही काटते हैं, इसलिए शाम को बाहर निकलते समय शरीर को ढककर ही निकलने को कहें. बच्चों को इंसेफेलाइटिस का टीका जरूर लगवाएं. इस टीके के तीन डोज होते हैं. यह शून्य से 15 साल तक के बच्चों को लगाया जाता है.
जागरुकता जरुरी : – गोरखपुर के सामाजिक कार्यकर्ता महेंद्र श्रीवास्तव पिछले कई साल से इस बीमारी को लेकर जागरूकता अभियान चला रहे हैं. वह बताते हैं कि आज भी लोगों में जागरूकता की कमी है. बुखार होने पर तीन-चार दिन स्थानीय स्तर पर ही लोग बिता देते हैं जबकि यदि शुरुआत में ही मेडिकल कॉलेज ले जाएं तो शायद समुचित इलाज हो जाए. गर्मी की शुरुआत होते ही इनंसेफेलाइटिस का कहर इलाके में शुरू हो जाता है. गरीब वर्ग इससे अधिकतर पीड़ित होते हैं क्योंकि इनके पास संसाधन के साथ जागरुकता की कमी है। इस वर्ग को समाज की मुख्य धारा से जोड़ना जागरूक वर्ग का दायित्व है। यह बीमारी हम सबके लिए एक चुनौती है और इसका स्थायी समाधान करना है। उन्होंने बताया कि सभी ब्लाकों पर इंसेफेलाइटिस ट्रीटमेन्ट सेंटर की स्थापना की गई है जहा प्राथमिक उपचार की सुविधाएं उपलब्ध हैं। जैसे ही इस बीमारी के लक्षण दिखाई दें तत्काल नजदीक के प्राथमिक स्वास्थ केंद्र पर ले जाएं ताकि केस बिगड़ने न पाए। जिस तरह जनपद स्तरीय जागरुकता कार्यशाला का आयोजन किया गया है। ऐसे ही आयोजन ब्लाक एवं ग्राम स्तर पर भी किए जाएं ताकि शत प्रतिशत जनों में जागरूकता का प्रसार हो।
पेयजल स्वच्छता एवं स्वास्थ्य पर जोर :- समुदाय एवं किसी व्यक्ति के लिए पेयजल स्वच्छता एवं स्वास्थ्य के बीच सीधा संबंध है। इंसेफेलाइटिस एक जानलेवा एवं खतरनाक बीमारी है जो भविष्य में मरीज में विकलांगता की संभावना भी बढ़ाती है। इसके लक्षणों को पहचानना और इसके बचाव के लिए जन जागरुकता आवश्यक है। यह मुख्यत अगस्त से अक्टूबर में होता है क्योंकि इस समय बारिश के कारण जलजमाव होता है जिससे मच्छरों की संख्या बढ़ती है। इससे बच्चे ज्यादा प्रभावित होते हैं। इस बीमारी से टीकाकरण से बचा जा सकता है। एइएस एक जलजनित बीमारी है और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं में अधिकांश कारण अशुद्ध पेयजल है। पानी को प्राथमिक स्वास्थ्य के मुख्य अंगों से जोड़ा गया है। छोटे हैंडपंपों का पानी स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है। इंडिया मार्क हैंडपंप के जल का पेयजल के रूप में प्रयोग सर्वाधिक सुरक्षित एवं सस्ता माना जाता है।
योगी जी से बहुत उम्मीदें :- गोरखपुर से सांसद रहे और अब राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस मुद्दे को कई बार संसद में भी उठा चुके हैं.उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद अब यहां के लोगों की उम्मीद और भी बढ़ गई है.योगी जी के आगमन से उत्तर प्रदेश में नये युग का संचार हो चुका है. अनेक सुप्त विभाग अब सक्रिय हो गये हैं. व्यक्तियों को भी लगने लगा है कि इस गम्भीर बीमारी का निदान शोध तथा सुविधा विस्तार के बहु आयामी प्रयास शुरु हो सकते हैं. योगी जी का अपने गृह जनपद का प्रथम दौड़ा खाली नहीं जाना चाहिए और उस क्षेत्र के लिए एक मील का पत्थर साबित हो सकती है।

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