जीप के बोनट पर फारुक अहमद धर और बचाव में उतरे उमर अब्दुल्ला –

उमर अब्दुल्ला और उनकी मानवाधिकार ब्रिगेड यह तो चिल्ला रही है कि मेजर गोगोई को , फारुख अहमद धर को जीप के बोनट पर नहीं बिठाना चाहिए था लेकिन यह नहीं बताती कि उस हालत में उसे इसके स्थान पर क्या करना चाहिए था ? स्थल सेनाध्यक्ष जनरल रावत ने बिल्कुल सही प्रश्न उठाया है कि यदि सीमा पर शत्रुओं के मन में और देश के भीतर देश के खिलाफ बन्दूक़ उठा लेने वालों के मन में सेना का भय नहीं रहेगा तो देश का भविष्य ख़तरे में पड़ जाएगा ।

डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

पिछले महीने अप्रेल मास में देश के कुछ राज्यों में विधान सभा और लोकसभा की कुछ रिक्त हुई सीटों के लिए उपचुनाव हुए थे । जम्मू कश्मीर की लोकसभा सीट पर भी 9 अप्रेल 2017 को मतदान हुआ था । दरअसल यह सीट 2014 के लोक सभा चुनावों में पीपुल्ज डैमोक्रेटिक पार्टी के तारिक अहमद कारा ने नैशनल कान्फ्रेंस के फारुख अब्दुल्ला को हराकर जीती थी । फारुख अब्दुल्ला शेख़ अब्दुल्ला के फरजन्द हैं , जो कभी जम्मू कश्मीर राज्य के मुख्यमंत्री रहे थे । शेख़ अब्दुल्ला के स्वर्ग सिधार जाने के बाद फारुख ही राज्य के मुख्यमंत्री बने थे । फारुख अब्दुल्ला के बाद उनके बेटे उमर अब्दुल्ला राज्य के मुख्यमंत्री बने । क़िस्सा कोताह यह कि पूरे जम्मू कश्मीर पर तो नहीं , लेकिन कश्मीर घाटी की श्रीनगर सीट पर शेख़ परिवार का तीन पीढ़ियों से क़ब्ज़ा चला आ रहा था । लेकिन 2014 में पहली बार पीडीपी ने परास्त कर जिया । शेख़ परिवार के लिए यह हार सचमुच बहुत अपमानजनक थी ।
इस अपमान का बदला लेने के लिए उमर अब्दुल्ला और फारुख अब्दुल्ला ने अपनी रणनीति बदली । उन्हें किसी भी तरह श्रीनगर की यह लोकसभा सीट जीतनी थी । उसके लिए नैशनल कान्फ्रेंस एक बार फिर 1952 की रणनीति में पहुँच गई । उस वक़्त उसने राज्य की संविधान सभा की सभी ७५ सीटें विरोधी दलों के काग़ज़ रद्द करके या उन्हें चुनाव में खड़े ही न होने देकर जीत लीं और नए लोकतांत्रिक रिकार्ड क़ायम किए थे । २०१७ में यह सब तो संभव नहीं था लेकिन इसकी पुनरावृत्ति दूसरे रूप में की गई । आतंकवादियों ने इन चुनावों का बहिष्कार करने की घोषणा पहले ही कर रखी थी । क्या यह संभव नहीं हो सकता कि यह बहिष्कार इस तरीक़े से हो जिससे नैशनल कान्फ्रेंस को तो लाभ हो लेकिन विरोधी पिट जाए । अब्दुल्ला परिवार अच्छी तरह जानता है कि यह तभी संभव है यदि आतंकवादियों की भाषा में ही बात करनी शुरु कर दी जाए । दुनिया भर की अनेक भाषाएँ सीखने से बहुत लाभ होता है , यह सभी जानते हैं लेकिन आतंकवादियों की इस रहस्यमयी भाषा सीखने और समझने से कितना और किस प्रकार लाभ होता है , इसे अब्दुल्ला परिवार से ज़्यादा और कौन जान सकता है ? नैशनल कान्फ्रेंस के मुखिया इस प्रकार की हालत में अपना और अपनी पार्टी का स्टैंड स्पष्ट करने में जुट गए । फारुख और उमर , दोनों बाप बेटा श्रीनगर के कूचों में चुनाव प्रचार के दौरान मतदान से चार दिन पहले तक घोषणा कर रहे थे कि पत्थर फेंकने वाले कश्मीर के लिए अपने प्राण न्योछावर कर रहे हैं । ये अपने वतन कश्मीर के लिए पत्थर चला रहे हैं । फारुख अब्दुल्ला ने पत्थरबाज़ों का हौसला बढ़ाते हुए प्रधानमंत्री को ललकारा और कहा कि आपको कश्मीर में पर्यटकों की चिन्ता होगी लेकिन हमारे इन नौजवानों को इस की फ़िक्र नहीं है । ये भूखे रह कर मर सकते हैं लेकिन अपने वतन कश्मीर के लिए पत्थर मारना बन्द नहीं करेंगे । इन्होंने ख़ुदा से वायदा किया है कि ये अपने देश कश्मीर को आज़ाद करवाने के लिए अपने प्राण तक न्योछावर कर देंगे । कश्मीर के नौजवान अब मौत से बेपरवाह हो गए हैं । उन्होंने हाथों में बन्दूकें थाम ली हैं , विधायक सांसद बनने के लिए नहीं , बल्कि कश्मीर की आज़ादी के लिए । फारुक अब्दुल्ला ने अपनी पार्टी के कारकुनों और नेताओं को आदेश दिया कि इन नौजवान के हक़ में निकल पड़ो । फारुक अब्दुल्ला यहीं नहीं रुके । उन्होंने भारत को चुनौती दी,”कश्मीर हिन्दुस्तान की खानदानी जायदाद नहीं है जो वह इस पर अपना दावा ठोकता रहता है । पाकिस्तान के क़ब्ज़े में चले गए जम्मू कश्मीर के हिस्से पर भारत के दावे को भी उन्होंने चुनौती दी और कहा , हिम्मत है तो पाकिस्तान से वह इलाक़ा छुड़वा कर दिखाओ ? फारुख अब्दुल्ला इस बार हर तरीक़ा आज़मा लेना चाहते थे । वे गिलान वाले सैयद अहमद शाह की गोद में बैठ कर हुर्रियत की शान में क़सीदे पढ़ने लगे । अपनी पार्टी के कारकुनों को हुर्रियत के साथ मिल कर चलने का आदेश देने लगे । चुनाव से कुछ दिन पहले जब अब्दुल्ला परिवार इस प्रकार का प्रलाप कर रहा था तो कुछ लोगों ने कहा था कि क्या वे बहक गए हैं ? लेकिन अब्दुल्ला ख़ानदान को जानने वाले समझ गए थे कि वे बहके नहीं हैं बल्कि बहका रहे हैं । भविष्य की रणनीति तैयार की जा रही है । आतंकवादी चुनाव का बहिष्कार कर चुके हैं । घाटी में मतदान के बहिष्कार की अनेक व्याख्याएँ की जाती हैं । एक व्याख्या के अनुसार आतंकवादियों का मतदान बहिष्कार का अपना विशिष्ट संदेश और संकेत रहता है । अब्दुल्ला परिवार घाटी का पुराना राजनैतिक परिवार है । वह इन संकेतों को झट पकड़ लेता है । चुनाव नज़दीक़ आने के कारण फारुक और उमर को खुल कर आतंकवादियों के समर्थन में आना पडा । अब्दुल्ला परिवार ने जगह जगह सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंकने वालों को आज़ादी के योद्धा कहना शुरु कर दिया था । उन्होंने नैशनल कान्फ्रेंस के कारकुनों को भी निर्देश दे दिया था कि वे हुर्रियत कान्फ्रेंस के साथ कन्धे से कन्धा मिला कर चलें । पत्थर फेंकने वालों की पलटन उनकी नज़र में हीरो हो गई थी । फारुक अब्दुल्ला ने अपने कार्यकर्ताओं से पहले ही कह दिया था ,अबकी बार पत्थरबाज़ों की सफ़ों में घुस जाओ । रणनीति के अनुसार सब ठीकठाक ही चल रहा था ।
लेकिन गहरी जाँच का विषय यह होना चाहिए कि फारुख और उमर आतंकवादियों का समर्थन करने के लिए कश्मीरी नौजवानों में अपना यह अभियान कब से चला रहे हैं ? क्योंकि पुलिस की रपट है कि पिछले कुछ अरसे से अस्सी के लगभग कश्मीरी युवक आतंकवादियों के साथ मिल गए हैं । फारुक अब्दुल्ला ख़ुद कह रहे हैं कि पत्थर फेंकने वाले और बन्दूक़ चलाने वाले इन कश्मीरी नौजवानों ने न संसद बनना है और न ही विधायक , तो फिर क्या वे इस बात का ख़ुलासा करेंगे कि इनका प्रयोग वे ख़ुद संसद बनने के लिए क्यों कर रहे हैं ? नैशनल कान्फ्रेंस की इन आतंकवादी नौजवानों से क्या कैमिस्ट्री है ?
इस पृष्ठभूमि में ९ अप्रेल की घटना को बेहतर और सही तरीक़े से समझा जा सकता है । उस दिन मतदान केन्द्रों की सुरक्षा के लिए अर्ध सैनिक बल के कुछ जवान तैनात थे । एक मतदान केन्द्र में मामला ज़्यादा उग्र हो गया और स्थानीय अधिकारियों के हाथ से निकलने लगा । उद्र भीड़ ने मतदान केन्द्र को घेर लिया था । पत्थर फेंकने वालों की ब्रिगेड पहले ही तैनात थी । लगभग बारह सौ लोगों की यह आक्रामक भीड़ पेट्रोल बम्बो से मतदान केन्द्र को जलाने की कोशिश में उग्र हो रही थी । चारों ओर से पत्थर फेंके जा रहे थे । इतना ही नहीं घरों की छत्तों से भी पत्थर बरसाए जा रहे थे । मतदान केन्द्र के कर्मचारियों और सुरक्षा कर्मियों की जान ख़तरे में पड़ गई तो उनको वहाँ से सही सलामत निकालने का सवाल पैदा हुआ । इसके लिए सेना की सहायता माँगी गई । मेजर गोगोई के नेतृत्व में सैनिकों का एक जत्था मतदान केन्द्र पर पहुँचा । स्थिति अत्यन्त गंभीर थी । लेकिन असम के रहने वाले मेजर गोगोई न तो जम्मू कश्मीर और नैशनल कान्फ्रेंस की इस दशकों पुरानी राजनीति के विशेषज्ञ थे और न ही उन्हें यह जानने की जरुरत थी । वे तो सीमा पर शत्रु का सफ़ाया किस प्रकार किया जाना चाहिए , इस काम में महारत हासिल किए हुए थे । लेकिन इस मतदान केन्द्र पर वे अपनी इस महारत का भी उपयोग नहीं कर सकते थे । क्योंकि उनके सामने शत्रु देश के लोग नहीं थे बल्कि अपने देशवासी ही खड़े थे । ख़ून की एक बूँद भी बहाए हिना और एक भी गोली चलाए बिना सभी को सही सलामत वहाँ से निकालना था । लेकिन कैसे ? गोगोई के सामानों आपद धर्म को चुनने का रास्ता था । यह सामान्य काल का धर्म नहीं होता । इस आपातकाल में सामान्य काल के नियम लागू नहीं होते । इसका मुक़ाबला करने के लिए असामान्य रास्ता और तरीक़ा अपनाना पड़ता है । आपाद धर्म निभाने की जरुरत सभी लोगों को नहीं होती । उसकी जरुरत उसी को होती है जो आपदा में फँसा होता है । आप्त काल में ही धर्म निभाना सबसे ज़्यादा मुश्किल होता है । लेकिन आपद काल उपस्थित हो गया है ? इसका निर्णय कौन करेगा ? यक़ीनन मौक़े पर खड़ा व्यक्ति ही इसका निर्णय करेगा । उसे स्वविवेक से ही काम लेना होगा । मेजर गोगोई के सामने स्थिति से निपटने का एक रास्ता तो बहुत सीधा था । वे गोली चलाते और बंधक बनाए हुए मतदान अधिकारियों को वहाँ से छुड़ा लेते । वैसे भी सिविल प्रशासन सेना को तभी बुलाता है जब स्थिति नियंत्रित करने के उसके बाक़ी सब उपाए फ़ेल हो चुके होते हैं । मेजर गोगोई को इसी प्रकार की परिस्थिति को संभालने के लिए बुलाया गया था । गोलीबारी में हो सकता भीड़ के वेश में छिपे आतंकवादी भी गोली चलाते । लेकिन इससे वहाँ बक़ौल मेजर गोगोई दस बारह लाशें जरुर गिर जातीं । उससे ज़्यादा लोग भी मारे जा सकते थे । गोली से मारना बहुत आसान विकल्प है लेकिन गोगोई की चिन्ता तो वहाँ होने वाले नर संहार को किसी भी तरह टालने की थी । भीड़ उग्र होती जा रही थी । क्षण भर में कुछ भी हो सकता था । गोगोई को कोई ऐसा तरीक़ा तलाशना था जिससे बिना किसे को मारे मामला क़ाबू में आ जाए ? उस समय वह तरीक़ा तलाश करने के लिए वहाँ किसी लम्बी मीटिंग या सैमीनार आयोजित करने का विकल्प उपलब्ध नहीं था ताकि एमनेस्टी इंटरनैशनल और देश भर में मानवाधिकारों का अध्ययन कर रहे गंभीर विद्वानों , समाचार पत्रों के स्तम्भ लेखकों , नैशनल कान्फ्रेंस के प्रतिनिधियों को बुला कर कार्यवाही के लिए ठोस विकल्प तलाशे जा सकते । जो कुछ करना था मेजर गोगोई को ही करना था और वह भी तुरन्त करना था । फारुक अब्दुल्ला ने कुछ दिन पहले अपने कार्यकर्ताओं को हुर्रियत कान्फ्रेंस के साथ मिल कर आज़ादी के लिए संघर्ष करने के लिए कह ही दिया था । इसलिए पत्थरबाज़ों की उस भीड़ में कितने नैशनल कान्फ्रेंस के कार्यकर्ता थे , इसका अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल था । नैशनल कान्फ्रेंस की नई रणनीति ने उसके कार्यकर्ताओं को एक साथ दोहरी भूमिका में लाकर खड़ा कर दिया था । उन्हें वोट भी डालना था और पत्थर भी फेंकना था । वे एक साथ ही पत्थरबाज़ और मतदाता की भूमिका में आ गए थे । गोगोई के मन में क्षण भर में एक विचार कौंधा । उसने तुरन्त पत्थरबाज़ों को उकसा रहे एक लड़के को ( जो फारुख अहमद धर था) पकड़ कर जीप के बोनट पर बाँध देने का आदेश दिया । फारुख अहमद धर पत्थर फेंकने वालों को उकसा रहा था और सेना के जीप के पास पहुँच गया था । फारुख अहमद धर ने भागने की कोशिश की । वह अपने मोटर साईकिल तक पहुँच भी गया था । लेकिन सेना के जवानों ने किसी तरह उसको पकड़ लिया और जीप के बोनट पर बिठा दिया । पत्थर चलाने वालों ने पत्थर चलाने बन्द कर दिए । भीड़ में से किसी आतंकवादी द्वारा गोली चलाए जाने का ख़तरा भी टल गया था । क्योंकि इस गोलीबारी में जीप पर बँधे फारुख अहमद धर की मौत भी हो सकती थी । लेकिन वह तो पत्थर फेंक पलटन का अपना आदमी था । इस लिए अब न गोली चलेगी न पत्थर चलेगा । मेजर ने मतदान केन्द्र से बिना एक भी गोली चलाए सभी को सुरक्षित बाहर निकाल लिया । हुर्रियत कान्फ्रेंस, अलगाव वादियों और आतंकवादियों की रणनीति असफल हो गई । नैशनल कान्फ्रेंस की फ़ेल हुई या नहीं यह तो फारुख और उमर अब्दुल्ला ही बेहतर जानते होंगे ।
लेकिन आख़िर वे भी मेजर गोगोई को इतनी आसानी से कैसे सफल होने दे सकते थे । तुरन्त अलगाववादियों का सोशल मीडिया को हथियार के तौर पर प्रयोग करने वाला ब्रिगेड सक्रिय हो गया । आधुनिक तकनीक की विशेषता है कि इस काम के लिए पत्थरफेंकने वाली पलटन की तरह आगे आने नहीं पडता । बोनट पर बँधे फारुख अहमद धर की तस्वीर , वायरल कर दी गई । पहली पलटन पत्थरबाज़ों की मैदान में उतरी थी । दूसरी पलटन सोशल मीडिया वालों की उतरी थी । उसने अपना काम कर दिखाया था । अब तुरन्त तीसरी पलटन मानवाधिकारवादियों की मैदान में उतरी । यह बुद्धिजीवियों की पलटन है । छत्तीसगढ़ के जंगलों में माओवादियों से लेकर जम्मू कश्मीर में काम कर रहे आतंकवादियों तक सभी के मानवाधिकारों की रक्षा करने से लेकर उनके कुकर्त्यों की सफ़ाई देने और उसके औचित्य को सही ठहराने की भारी भरकम ज़िम्मेदारी इसी पलटन के ज़िम्मे है । पत्थरबाज़ों की पलटन को अपना काम करते हुए कुछ सीमा तक ख़तरा भी उठाना पड़ता है । वे सुरक्षा बलों की गोली का शिकार हो सकते हैं लेकिन मानवाधिकार ब्रिगेड को ऐसा कोई ख़तरा नहीं होता । क्योंकि वे अपना काम सुरक्षित स्थान और सुविधासम्पन्न वातावरण में ही करते हैं । इस काम के लिए उन्हें स्मृति चिन्ह और पुष्प गुच्छ भेंट किए जाते हैं । इस ब्रिगेड के महारथी अपने इलाक़े में बहुत ही ऊँची नस्ल के पहुँचे हुए बुद्धिजीवी कहलाते हैं । इस ब्रिगेड ने अपनी रणनीति से मेजर गोगोई को घेर लिया । उस पर पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज कर दी । मानवाधिकारवादियों के समूह गोगोई के लिए सज़ा की माँग करने लगे । उसने नरसंहार को होने से बचा लिया , यह बात गौण हो गई । बोनट पर बँधे अहमद धर को कितनी मानसिक वेदना हुई , इसका लेखा जोखा किया जाने लगा । बोनट पर कुछ देर बैठे रहने से उसके किस किस मानवाधिकार को चोट पहुँची है , कौन सा अधिकार कितना डैमेज हो चुका है , इसका एक्स रे शुरु हो गया । शायद फारुख अहमद धर को भी इस बात का पता नहीं होगा कि उसके किस किस अधिकार को कितनी चोट पहुँच चुकी है । इन सब बातों के लिए मेजर गोगोई को ज़िम्मेदार ठहरा दिया गया । उसके एवज़ में गोगोई को दंडित करने की माँगें उठाई जाने लगी । पत्थरबाज़ ब्रिगेड की असफलता को मानवाधिकार ब्रिगेड सफलता में बदलना चाहती थी । उधर नैशनल कान्फ्रेंस ने अपनी भूमिका सँभाली । वैसे तो कान्फ्रेंस शेख़ अब्दुल्ला के वक़्त से ही यह दोहरी भूमिका जी रहा है । फारुक अब्दुल्ला ने केवल उसका नया संस्करण प्रस्तुत किया है । इस नई रणनीति का लाभ भी है । नैशनल कान्फ्रेंस का कार्यकर्ता अपनी पार्टी को वोट डालने वाले लोगों को तो मतदान केन्द्र तक आने की अनुमति देगा लेकिन जब दूसरे दलों के लोग वोट डालने के लिए आएँगे तो वही कार्यकर्ता पत्थरफेंकों की पलटन बन कर उनको रोकेगा और आज़ादी चिल्लाएगा । एक पंथ दो काज । जितना कम मतदान होगा नैशनल कान्फ्रेंस को उतना ही लाभ होगा । सफल मैनेजमेंट की यही ख़ूबी होती है । सभी अंग प्रत्यंग अपना अपना काम इस प्रकार संभालते हैं कि एक दूसरे की सहायता प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रुप से होती रहे । कोई ब्रिगेड पर्दे के आगे आकर अपना मोर्चा संभालती है और कोई ब्रिगेड पर्दे के पीछे से अपना मोर्चा संभालती है । लेकिन तालमेल बना रहता है । यह तालमेल का परिणाम था कि अलगाव वादी और नैशनल कान्फ्रेंस के लोग अपने अपने इलाक़ों में सड़कों पर चिल्ला चिल्ला कर गोगोई के लिए फाँसी की माँग करने लगे ।

लेकिन इस पूरी रणनीति में एक पलीता लग गया । इसकी शंका शायद किसी को नहीं थी । न पत्थर ब्रिगेड को , न सोशल मीडिया ब्रिगेड को और न ही मानवाधिकार ब्रिगेड को । नैशनल कान्फ्रेंस को तो बिल्कुल ही नहीं क्योंकि श्रीनगर की इस लोकसभा की सीट के लिए कांग्रेस और नैशनल कान्फ्रेंस मिल कर चुनाव लड़ रहे थे । यह पलीता लगाया था पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेन्द्र सिंह ने । उन्होंने अख़बारों में वाकायदा एक लम्बा लेख लिख कर मेजर गोगोई के काम की सराहना ही नहीं की बल्कि यह भी कहा कि यदि उसके स्थान पर मैं होता तो मैं भी यही करता । इससे भी आगे उन्होंने कहा कि आप जम्मू कश्मीर में सेना के हाथ पीठ के पीछे बाँध कर उसे आतंकवादियों से लड़ने के लिए नहीं कह सकते । कैप्टन के लेख से मानवाधिकारवादियों की ब्रिगेड में खलबली मच गई । इस इलाक़े से भी बम्बबारी हो सकती है , इसके बारे में तो रणनीति बनाते समय सोचा ही नहीं था । इस नुक़सान को पूरा करने के लिए दूसरे कैम्प के लिए भी किसी बड़े रुतबे के आदमी को मैदान में उतारना जरुरी हो गया । कैप्टन का मुक़ाबला हुर्रियत कान्फ्रेंस के नेता सैयद अहमद शाह गिलानी के बयानों से नहीं हो सकता था । न ही यासिन मलिक यह काम कर सकते थे । इसके लिए तो किसी बड़ी क़द काठी के सेनानायक की जरुरत थी । वैसे रणनीति के तहत रुतबे के ऐसे सेनापतिओं का इतनी जल्दी पर्दाफ़ाश नहीं किया जाता । उनको अन्त तक पर्दे के पीछे छिपा कर ही रखा जाता है । लेकिन मानवाधिकार ब्रिगेड के लिए भी आपत काल ही उपस्थित हो गया था । मरता क्या न करता । परदा उठाना पड़ा और कैप्टन को जबाब देने के लिए उमर अब्दुल्ला को मैदान में उतारा गया । पत्थर का जबाब पत्थर । गोली का जबाब गोली । आलेख का जबाब आलेख । कैप्टन के आलेख के जबाब में उमर अब्दुल्ला का आलेख अख़बारों में आया । उन्होंने अख़बार में मेजर गोगोई पर गोलाबारी की और फारुख अहमद धर पर हुए अत्याचार के लिए गोगोई को ज़िम्मेदार ठहराया । उसके लिए गोगोई को क्या सज़ा दी जाए ? यह कहने की जरुरत उमर अब्दुल्ला को नहीं थी क्योंकि इसकी घोषणा पार्टी ने अख़बार में नहीं बल्कि कश्मीर घाटी की सड़कों पर पार्टी की विधायक शमीमा फ़िरदौस के नेतृत्व में प्रदर्शन के माध्यम से की थी । गोगोई को फाँसी मिलनी चाहिए । कोई और देश होता तो फारुख अहमद धर की पृष्ठभूमि की जाँच की माँग की जाती । अलगाववादियों से उसके सम्बंधों पर सवाल उठते । लेकिन यहाँ गोगोई को ही घेरा जा रहा था और अहमद को मासूम बताया जा रहा था । मतदान केन्द्र पर उस दिन गोगोई था । गोगोई का कहना है कि फारुख अहमद धर पत्थर फेंकने वालों का रिंगलीडर था और उन्हें इस काम के लिए उकसा रहा था । क़ायदे से तो इस साक्ष्य के आधार पर अहमद धर के ख़िलाफ़ भी प्राथमिकी दर्ज होनी चाहिए थी । जाँच होनी चाहिए । उसके बाद निर्णय होना चाहिए । लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ । इसके विपरीत मेजर गोगोई के ख़िलाफ़ पुलिस के पास प्राथमिकी दर्ज है । अहमद धर का कहना है कि यदि मैं पत्थर फेंकने वालों में से होता तो अपना वोट क्यों डालता ? यह कोई ऐसा रहस्य नहीं है जिसकी तह तक जाने के लिए ज़्यादा माथापच्ची करने की जरुरत पड़े । अपना वोट डाल दिया और दूसरे लोग वोट न डाल सकें , इसलिए बरसाओ पत्थर । यही तो वह रणनीति है जिसके तहत चुनाव का बहिष्कार करने की पद्धति अपना कर भी किसी चहेते प्रत्याशी को जिताया जाता है । फारुक अब्दुल्ला नैशनल कान्फ्रेंस वालों को स्पष्ट तो कह चुके हैं पत्थरबाज़ कश्मीर के नायक हैं लेकिन उन्होंने यह तो नहीं कहा कि मुझे वोट मत डालो । वोट के लिए ही तो वे चुनाव में उतरे हैं । इसलिए वोट भी डालो और पत्थर भी बरसाओ , ताकि अपना प्रत्याशी जीत जाए और दूसरे प्रत्याशी के समर्थक मतदान केन्द्र के पास भी न जा सकें । यदि अहमद धर के ख़िलाफ़ प्राथमिकी दर्ज होती और साक्ष्य के लिए उसने किसे वोट डाला , यह जाँचने की भी क़ानून में अनुमति होती तो शायद मामला और स्पष्ट हो जाता कि वोट वाला हाथ किसके लिए और पत्थर वाला हाथ किसके लिए ।
उमर अब्दुल्ला और उनकी मानवाधिकार ब्रिगेड यह तो चिल्ला रही है कि मेजर गोगोई को , फारुख अहमद धर को जीप के बोनट पर नहीं बिठाना चाहिए था लेकिन यह नहीं बताती कि उस हालत में उसे इसके स्थान पर क्या करना चाहिए था ? स्थल सेनाध्यक्ष जनरल रावत ने बिल्कुल सही प्रश्न उठाया है कि यदि सीमा पर शत्रुओं के मन में और देश के भीतर देश के खिलाफ बन्दूक़ उठा लेने वालों के मन में सेना का भय नहीं रहेगा तो देश का भविष्य ख़तरे में पड़ जाएगा । बडगाम ज़िला में उस दिन यही हो रहा था । स्थिति स्थानीय प्रशासन के क़ाबू में बाहर हो गई थी । अब यदि सेना की टुकड़ी भी उस स्थिति को क़ाबू न कर सकती तो उसका अंजाम क्या हो सकता था ? पत्थर चल रहे थे , भीड़ में से आतंकवादी गोली भी चला सकते थे । क्या सेना इस बात की प्रतीक्षा करती कि पहले आतंकवादी गोली चलाएँ और फिर सेना के कुछ सैनिक मारे जाते , तब सेना को सक्रिय होने का अधिकार था ? सेना को पैलेटगन का इस्तेमाल करने से रोकने के लिए भी यही मानवाधिकार ब्रिगेड उच्चतम न्यायालय तक दौड़ लगाती रहती है । बन्दूक़ , पैलेटगन नहीं चलाएगी तो सेना उस स्थिति में क्या आतंकवादियों के मनोरंजन के लिए मनोरंजन कार्यक्रमों का आयोजन करेगी ?
नैशनल कान्फ्रेंस के पास तो दोनों विकल्प खुले रहते हैं । हालात देख कर वह पत्थरबाज़ों का विरोध भी कर सकती है और हालात देख कर वह पत्थरबाज़ों में ही शामिल हो सकती है । लेकिन सेना के पास तो पत्थरबाज़ों के साथ मिल जाने का विकल्प उपलब्ध नहीं है । नैशनल कान्फ्रेंस तो समय पाकर पाकिस्तान के पक्ष में भी खड़ी हो सकती है , जैसा आजकल फारुख अब्दुल्ला के बयानों से आभास मिल ही रहा है , लेकिन सेना के पास तो यह विकल्प उपलब्ध नहीं है । सेना को तो हर हालत में बडगाम के उस मतदान केन्द्र में निर्दोष लोगों के प्राणों की रक्षा करनी है । गोगोई का क़सूर केवल इतना है कि उसने रक्षा करने के अपने इस कर्तव्य की पूर्ति में फारुख अहमद धर जैसे पत्थरबाज़ों पर न पैलेट गन चलाई न असली गन । उसने अपनी तरकीब से उसकी भी जान बचा ली और मतदान केन्द्र में फँसे दूसरे लोगों की भी । लेकिन नैशनल कान्फ्रेंस को घाटी में अपनी राजनीति चलाने के लिए लाशों की जरुरत थी । उसके दुर्भाग्य से गोगोई ने उसकी यह माँग पूरी नहीं की । इस क़सूर की सज़ा फाँसी तो होनी ही चाहिए । याद कीजिए शेख़ अब्दुल्ला का 1952 में जम्मू के रणवीर सिंह पुरा में दिया गया भाषण । लगता है नैशनल कान्फ्रेंस वापिस रणवीर सिंह पुरा के युग में लौट आई है । लेकिन नैशनल कान्फ्रेंस और पाकिस्तान दोनों के ही दुर्भाग्य से दिल्ली में पंडित जवाहर लाल नेहरु या उसके वंशजों की सरकार नहीं है । यदि ऐसा होता तो शायद सचमुच मेजर गोगोई को ही सज़ा हो जाती ।

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