लेखक परिचय

श्रीराम तिवारी

श्रीराम तिवारी

लेखक जनवादी साहित्यकार, ट्रेड यूनियन संगठक एवं वामपंथी कार्यकर्ता हैं। पता: १४- डी /एस-४, स्कीम -७८, {अरण्य} विजयनगर, इंदौर, एम. पी.

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kiku-shardaगोस्वामी तुलसीदास जी कह गए हैं कि “प्रीत विरोध समान सन ,,,,,”अर्थात दोस्ती -दुश्मनी तो बराबरी वाले से ही ठीक है। ज्यादा ताकतवर से रार ठानना या असमान दर्जे की दोस्ती हो दोनों ही स्थति में कमजोर की दुर्गति होना सुनिश्चित है। वैसे यह ज्ञान आम तौर पर सभी को है। लेकिन लगता है कि यह अति सामान्य सांसारिक ज्ञान के अभाव में कुछ सीधे -सादे बन्दे नाहक उलझ जाया करते हैं। यह सामान्य सा लौकिक व्यवहार शायद उस मिमिक्रीबाज गुमनाम हास्य व्यंग कलाकार -किकू शारदा को कदाचित मालूम नहीं रहा होगा। वर्ना वह “गुरमीत राम रहीम उर्फ़ मेसेंजर ऑफ गॉड ” की नकल उतारने की जुर्रत कदापि नहीं करता। उसे मालूम होना चाहिए था कि यदि कोई धूर्त, बदमाश ,पाखंडी ,हत्यारा, ठग,भाँड बलात्कारी सत्ता का दलाल बन जाए तो वह एक व्यक्ति नहीं ‘गैंग’ कहलाता है। यदि वह सत्ताधारी पार्टी के नेताओं का वित्त पोषण करता हो ,वर्ग विशेष के वोटों पर उसकी पकड़ हो तो वह सिर्फ पाखंडी धर्म गुरु घंटाल या बाबा ही नहीं बल्कि खुद ही संविधानेतर सत्ता का केंद्र हो जाता है। उसका रुतवा और ताकत किसी सामंत कालीन राजा से कमतर नहीं होता । उससे टकराने वाला कोई दूसरा राजा या सामंत ही हो सकता है। ये दाऊद इब्राहीम,अजहर मसूद ,हाफिज सईद ही इस पाप के पोखरे की बराबरी कर सकते हैं। किकू शारदा ने अनजाने में उस दाढ़ी में हाथ दाल दिया ,जिसमें असंख्य साँप -बिच्छू पल रहे हैं।

यदि किकू शारदा की जगह सलमान खान या कोई और दबंग होता तो बाबा राम रहीम को १३ साल लग जाते मुकदमा लड़ते -लड़ते। किन्तु सलमान खान को एक दिन की भी जेल नहीं होती। बन्दा बाइज्जत बरी होकर घर आ जाता। जिन लोगों पर देश की रक्षा की जिम्मेदारी है ,जिन्हे सरकार तनखाह देती है, ऐंसे लोग ही यदि आतंकियों की मदद करते हों , मात्र सौ रुपया लेकर उन्हें मुंबई मरीन के मार्फ़त होटल ताज के अंदरकमरे तक पहुंचाते हों ,जो लोग मात्र बीस -बीस रूपये की रिस्वत लेकर पठान कोट एयरबेस में पाकिस्तानी आतंकियों को घुसाने में लगे रहे हों ,उन्हें गिरफ्तार करने की फुर्सत या ताकत जिस पुलिस -प्रशासन या सरकार में न हो , जिस पुलिस के एसपी ही संदेह के घेरे में हों वह किकू जैसे माटी के लौंदे को गिरफ्तार कर अपना शौर्य दिखला रही है।

हाफिज सईद ,अजहर मसूद और तमाम पाकिस्तानी आतंकी हमारे देश का मजाक उड़ा रहे हैं। वे हमारे प्रधान मंत्री का और हमारी फौज का भी मजाक उड़ा रहे हैं। उनके मात्र आधा दरजन आतंकी हम सवा करोड़ लोगों का उपहास कर जाते हैं ,हमारी सरकार और पुलिस उनकी गिरफ्तारी के लिए क्या कर रहे हैं ? क्यों पाकिस्तान से चिरौरी कर रहे हैं? क्योंकि हमारी राष्ट्र चेतना में सिर्फ मजहबी पाखंड और वयक्तिगत मान-अपमान का भूसा भरा हुआ है। इसलिए हम देश के दुश्मनों का तो बाल भी बांका नहीं कर पा रहे हैं। उलटे एक अदने से मिमिक्री – बाज कलाकार की कला को बर्दास्त नहीं कर सकने की सूरत में उसे जेल अवश्य भेज देते हैं । वैसे भी आतंकी मरजीवड़ों ने भारत की हँसी छीन रखी है। सीमाओं पर जवान शहीद हो रहे हैं, हमारी सरकार इस का निदान करने के बजाय विदूषकों ,साहित्यकारों ,बुध्दिजीवियों और कलाकारों पर हल्ला बोल रही है।

डेरा सच्चा सौदा के ‘गुरमीत राम-रहीम ‘ की किसी ने ज़रा सी नकल क्या उतारी ,सरकार ने उस बेचारे को जेल में ठूंस दिया। सरकार की ऐंसी तत्परता तब कहाँ चली गयी जब अजहर मसूद के गुर्गे पठानकोट एयरबेस पर गोले बरसा रहे थे। देश की ३२ लाख फ़ौज और ५० लाख पुलिस और एक करोड़ चड्डीधारियों के होते हुए भी सिर्फ ६ आतंकी भारत की छाती पर मूँग दलते रहे। किसी ने एक हत्यारे -बलात्कारी बाबा की मिमिक्री या नकल क्या उतार दी मानों संसद पर हमला बोल दिया हो !या देश के खिलाफ जंग छेड़ दी हो। अच्छा हुआ जमानत देकर जल्दी छोड़ दिया वरना इस बाबा को भी आसाराम बनने में देर नहीं लगती।

किसी दार्शनिक ने बहुत खूब कहा है “पवित्र मजाक से बढ़कर कोई पूजा नहीं हो सकती ” भारतीय समाज के देवर-भावी, जीजा -साली के विनोदपूर्ण संवादों में ही नहीं बल्कि विश्व के सम्पूर्ण सभ्य समाजों की पुरातन लोक परम्पराओं में ,लोक गीतों में और उनके जीवंत सामाजिक ,पारिवारिक ,धार्मिक सरोकारों में भी हँसी – मजाक ,वाग्विनोद ,व्यंगोक्ति और मिमिक्री इत्यादि का प्रचलन हमेशा से रहा है। यह मानवीय सद्गुणों की थाली में पापड़-आचार जैसी भूमिका अदा करता है। लेकिन जब कभी इस विधा के व्यवहार से ओरों को जान-बूझकर दुःख पहुँचाया गया हो तो सर्वनाश रोक पाना भी मुश्किल हुए हैं। द्रौपदी ने जब दुर्योधन से कहा “अंधे के लड़के अंधे ही रहे ” तो महाभारत हो कर ही रहा । सीता ने भी जिस व्यंग बाण का प्रयोग करते हुए लक्ष्मण को स्वर्ण मृग के पीछे भागते श्रीराम के पीछे भेजा वह राम-रावण युद्ध का कारण बना। सिर्फ मिथ- पौराणिक कथाओं में ही नहीं बल्कि ज्ञात इतिहास में अनेक प्रमाण हैं जब ‘हंसी-मजाक’ जानलेवा बना गया। लेकिन जिस किसी राजा या सम्राट ने इस विधा को सम्मान दिया वह बीरबल का दोस्त अकबर महान हो गया। किसी भी रामलीला या पौराणिक नाटक का मंचन बिना ‘स्वांग’ अर्थात विदूषक के बिना अधूरा ही है। इस बिधा के द्वारा उपस्थ्ति जन समूह में से कुछ खास-लोगों का मजाक उड़ाकर उनका सम्मानपूर्वक संज्ञान लेना या उपस्थ्ति दर्ज करने का अलिखित विधान शताव्दियों से चला आ रहा है।

वेशक किसी का वैमनस्यपूर्ण मखौल या मजाक उड़ाना अनैतिक कर्म है। लेकिन यह भी सच है कि प्रत्येक सभ्य समाज ने स्वतः ही साहित्य और कला की विभिन्न विधाओं का विकास करते हुए इसे स्वीकृत किया है। महज अतीत के क्रूर सामंत युग में ही नहीं बल्कि बीसवीं सदी के हिटलर ,मुसोलनि जैसे नाजी-फासिस्ट दौर में भी साहित्य -कला-संगीत में व्यंग- उपहास,सटायर,मेटाफर को जीवंतता की कसौटी माना गया है। विशुद्ध मनोरंजन के मंच से लेकर ‘कला ‘ के मानवतावादी लोकानुकरण में भी नृत्यकला , नाट्यकला एवं फिल्म इत्यादि के तमाम माध्यमों में ‘पवित्र मजाक’की तरह मिमिक्री ,नकल और व्यंगोक्ति को सम्मान प्राप्त रहा है। चर्चिल,हिटलर मुसोलनि,तोजो जैसे तानाशाहों के घोर अमानवीय बिचलन के दौर में भी चार्ली चैप्लिन जैसे कलाकारों ने इस कला का भरपूर प्रदर्शन किया है। यदि हम एक जीवंत लोकतान्त्रिक राष्ट्र हैं तो साहित्य-कला -संगीत में में नादिरशाही का क्या काम है ? क्या आज के शासक उस औरंगजेब के अवतार हैं ,जिसने साहित्य कला संगीत की मैय्यत वालों से कहा था ‘ इन्हें इतना नीचे गाड़ दो कि दुबारा न उठ सके ”

3 Responses to “किकू शारदा ने अनजाने में उस दाढ़ी में हाथ दाल दिया ,जिसमें असंख्य साँप -बिच्छू पल रहे हैं।”

  1. js negi

    aisi kya baat he ki hindu dharm birodhi communisto ke nam hinduo ke bhagwan par hote hey.

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  2. bapu

    Secularism ka matlb Hindu virodhi hotahekya .or 1 nai 100 crd sangi he hm or ham chaheto ithashi nahi bhugolbhi badalsaktehe jnab

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  3. Himwant

    मजाक करके किसी की आस्थाओ पर ठेस पहुंचाना उचित है तो फिर मजाक मजाक में विश्व युद्ध शुरू हो सकता है, मजाक में मर्यादाए नही नांघी जानी चाहिए. चार्ली एब्दो के मजाक ने क्या गुल खिलाया, हमे मालुम है. अब कोई मुहम्मद का भोंडा और अमर्यादित मजाक उड़ाने की हिम्मत नही करेगा. हिन्दुओ की सहिष्णुता का अर्थ यह नही की कोई हमारी आस्थाओ पर भोंडा और अमर्यादित मजाक उड़ाए. लेकिन हमारी आष्ठाओ एवं मान्यताओ पर बहस के लिए हम तैयार है, अन्य लोग भी बहस के प्रति सहिष्णु बने. अमर्यादित मजाक को आतंकी घटना से बराबरी कर के लिखना कुतर्क है. अब चोर डाकू यह कहे की हमे क्यों पकड़ा जब पठानकोट में 20 रुपए में वे घुस गए, यह बात ठीक नही।

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