लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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-डॉ. मधुसूदन –

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(एक) हमारा संकीर्ण दृष्टि दोष:
हम चाहते हैं; कि, राष्ट्र की प्रत्येक समस्या के समाधान में, हमारी इकाई को, हमारे प्रदेश को, हमें लाभ पहुंचे। और जब ऐसा होता हुआ, नहीं दिखता, तो हम समस्या को हल करने में योगदान देने के बदले, समस्या के जिस गोवर्धन पर्वत को उठाना होता है, उसी पर्वत पर चढ़कर बैठ जाते हैं। तो, पर्वत का भार बढ़कर, उसे उठाना असंभव हो जाता है। समस्याएँ लटकी रहती हैं। उनके सुलझने से जो कुछ लाभ हमें होना था; उस लाभ से भी हम वंचित रहते हैं।
बंधुओं, ऐसे समस्या का समाधान नहीं निकलता। न देश को समस्या सुलझाने से लाभ होता है। एक घटक के नाते जो लाभ हमें पहुंचना होता है, वह भी नहीं पहुंचता।


(
दो) क्या प्रत्येक समाधान से सभी को लाभ?
हर समस्या के सुलझने से हर कोई को लाभ प्रायः कभी नहीं होता। पर अनेक राष्ट्रीय समस्याएँ सुलझने पर जो कुल सामूहिक लाभ होता है, वह अनुपात में कई गुना अधिक होता है।
पर सारी  कुक्कुरमुत्ता पार्टियाँ  छोटी छोटी इकाइयों के स्वार्थ पर टिकी हैं। किसी समुदाय के स्वार्थ को उकसा कर आप झटपट संगठन खडा कर नेता बन सकते हैं। त्याग के आधार पर संगठन करना कठिन होता है।और राष्ट्रीय दृष्टि से संगठन खडा करना और भी कठिन है। ऐसे, राष्ट्रीय दृष्टिका अभाव चारों ओर दिखता है। वैयक्तिक स्वार्थ को उकसाकर संगठन खड़ा करना तो सरल होता है; इस लिए, छोटी-छोटी इकाइयों के बहुत सारे संगठन आप को देशभर में, दिखाई देंगे। सामान्यतः, ऐसे संगठन उन्नति की बालटी के अंदर अपना, पैर गड़ाकर उसे दूसरों से, उठवाना चाहते हैं; उन्नति के, गोवर्धन पर्बत पर चढ़कर, उसका  भार बढ़ाकर उसे दूसरों से उठवाना चाहते हैं। ऐसे, जब समस्याएँ हल नहीं होती तो अपनी इकाई को छोड़कर शासन सहित अन्य सारों को दोष देते हैं।

पर, कुछ त्यागव्रती निःस्वार्थ संगठन भी हैं, जिनके नेतृत्व में राष्ट्रीय-दृष्टि के कर्णधार हैं, पर ये अपवाद ही माने जाएंगे। भाग्य है, हमारा कि, ऐसे संगठनों ने ही भारत को आपत्तियों में सदैव सहायता की है। 

(तीन) क्या हम जनतंत्र में विश्वास करते हैं?
कहने के लिए हम जनतांत्रिक है, वास्तव में हम स्वार्थतांत्रिक हैं। हमारे लिए हर समाधान या समस्या का हल, मेरे प्रदेश को, मेरी जाति को, मेरे समुदाय को क्या मिला, इसी निकष पर टिका है।

(चार) हमारा निकष: 

हमारा निकष है, ऐसा हल जिस में बिना अपवाद, सभी का लाभ हो। किसी को कुछ देना ही ना पड़े। लाभ ही लाभ होना चाहिए।  तभी, सबका साथ, सबका विकास सार्थक होगा। हम मूर्ख हैं।
ऐसे निकष का अर्थ विस्तार यही होगा, कि, हमारे लिए, प्रत्येक समाधान ==>सारे घटक प्रदेशों के स्वार्थों का जोड़ होना चाहिए। उस जोड़ में यदि मेरे गुट का नाम नहीं है, तो हम चढ़ जाएंगे गोवर्धन पर्वत पर। फिर उठाके दिखाइए, उस पर्वत को। या हम जो बाल्टी उठाने का प्रयास हो रहा है, उस बाल्टी में अपने पैर गाड़ देंगे। दिखाइए उठाकर उस बाल्टी को।
क्या इसे राष्ट्रीय दृष्टि कहा जा सकता है?
नहीं। यह स्वार्थी वृत्ति ही राष्ट्रीय समस्या के हल में अड़ंगा है।
इस भाँति समस्याएँ कभी भी हल नहीं हो सकती। 

(पाँच) गुजरात का अनुभव: 
यदि यही नीति गुजरात में गत १० वर्षों में अपनायी गयी होती, तो, सरदार सरोवर (नर्मदा) बांध बन ही ना सकता। और आज सारे कच्छ को और अंशतः राजस्थान को भूमि सिंचन का पानी न पहुंचता। गुजरात के नगर वासियों को २४ घण्टे पानी ना मिलता। साणंद समृद्धि के मार्गपर आगे ना बढ़ता।
एक गुना घाटा हुआ तो सामने १०० गुना से अधिक लाभ हुआ। यह अनुमान लेखक का नहीं, पर विशेषज्ञों का है।

गुजरात में क्या हुआ?
एक (१) एकड़ की भूमि के बदले, सैंकड़ों (१००+) एकड़ भूमि उपजाऊ हो गयी। पूरे कच्छ और कुछ राजस्थान की भूमि भी उपजाऊ हो गयी। कितने सारे नगरों को २४ घण्टे पानी की आपूर्ति होने लगी, बिजली मिलने लगी।

(छः) युक्तियों की पराकाष्ठा

युक्तियों की पराकाष्ठा भी कम न थीं। नर्मदा की नहर के ऊपर ही छत लगाई गयी। जिस से धूप के कारण भाँप बनकर उड़ जानेवाला पानी बचाया गया। फिर छत के ऊपर सौर ऊर्जा संग्राहक लगाए गए। सौर ऊर्जा का संग्रह कर, बिजली निर्मिति भी की गयी।

सोचिए। नर्मदा का बाँध और नहरें बनाने जितनी भूमि लगी।
(क)  उसके बदले में गुजरात सहित कच्छ की कुल भूमि सिंचित हुयी।
(ख) गुजरात के नगरों को २४ घण्टे पानी मिला ।

विशेषज्ञों के अनुसार:
(लाभ /घाटे) के अनुपात की संख्या १०० से भी काफी बड़ी निकली।
एक एक एकड़ भूमि के बदले कई कई एकड़ों को सिंचन ।

कुल खाद्यान्न की उपज भी कई गुना बढ़ी ।
फिर नर्मदा की नहर पर छत लगी।
उस छत के कारण धूप से, भांप बनकर उड़ जानेवाला पानी बचा।
उस छतपर सौर ऊर्जा से बिजली भी बनाई गई।
सौर ऊर्जा किसी भी प्रकार की दूषित वायु नहीं फैलाती।
नहर पर की छत भांप से पानी का व्यय भी बचाती है।
और सौर ऊर्जा के लिए अतिरिक्त भूमि भी बचती है।

(सात) मेरा प्रत्यक्ष अनुभव:

मैं जब, अहमदाबाद गया तो २४ घण्टे नल में पानी देखकर ही चकित था। पहले नल को खोल खोल कर पानी परखा जाता था। ये ऐसा बदलाव था, जो, महिलाओं को शीघ्र संतुष्ट करता, अनुभव हुआ। दिन भर पानी से काम जो पडता है। यह बदलाव पुरूषों के लिए कोई विशेष अर्थ नहीं रखता।
शेष सारे बदलाव देखकर भी बहुत बहुत हर्षित था।
भूमि दिए बिना  बाँध बन न सकता था, न नहर बन सकती थी,   टाटा का साणंद का उद्योग खड़ा हुआ होता। 

(आठ) हम जादुई छड़ी चाहते हैं।

पर, हम कुछ दिए बिना ही सब कुछ पाना चाहते हैं। यह कपटपूर्ण व्यापार है।
गांधी जी ने भी सात सामाजिक पाप गिनाए, हैं।
१- सिद्धांतों के बिना राजनीति।
२- परिश्रम के बिना संपत्ति का उपभोग।
३- अंतरात्‍मा को मारकर आनंद।
४- चरित्र के बिना ही ज्ञान प्राप्ति।
५- नैतिकता विहीन लेनदेन।
६- मानवता विहीन विज्ञान।
७- बिना त्‍याग की पूजा।

मुझे लगता है; कि आज  (१)- “सिद्धांतों के बिना राजनीति” हो रही है।
(२)- परिश्रम के बिना ही संपत्ति के  उपभोग को, हम पुरस्कृत कर रहे हैं।
(३)- अंतरात्‍मा को मारकर हम सुखी होना चाहते हैं।
(५)- नैतिकता विहीन ही लेन देन  चाहते हैं।
(७)- बिना त्‍याग किए ही, (भारत माता की) पूजा करना चाहते हैं।

लगता है, जागने का समय है; बंधुओं उठो, जागो, और अपनी उन्नति में कुछ योगदान दो। समय निकला जा रहा है।

उत्तिष्ठत, जाग्रत, प्राप्य वरान् निबोधत”॥

अब की बार, अषाढ चूकने का अवसर नहीं है। 
पल पल निकला जा रहा है। 

चेतक करो, अब चेत करो 
उन्नति के, चेतक की टाप सुनायी दे रही है।

23 Responses to “भूमि-अधिग्रहण नहीं चाहिए; क्यों? ”

  1. डॉ. मधुसूदन

    Dr.Madhusudan

    DO YOU REALLY WANT TO PREVENT SUICIDES LIKE OF GAJENDRA?

    Statistics speaks an impartial language.

    Wake up friends and PREVENT SUICIDES LIKE OF GAJENDRA?
    (1)avoid suicides of farmers by enriching Bharat.
    Few acres of acquisition=====>
    (2)irrigates hundreds of acres,
    (3) prevents famines and increases # of crops. (Go to Katchh and see…for yourself…do not trust me.)
    (4) raises depleting ground water table. Otherwise Bharat will suffer severe shortage…..remember my words.
    (5) provides for domestic water.
    =====> Well wishers of Bharat…..Wake up.<==========

    Reply
  2. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन

    मित्रों विचारकों को मौलिक चिन्तन करने का अनुरोध है।
    (१) कोई व्यवहार करने योग्य उपाय पर बुद्धि लगाइए।
    (२)You need a handle. अंकुश या लगाम हाथ में आये ऐसी युक्ति सोचनी चाहिए।
    बालक का रोना, माँ सुनती है, तो दूध पिलाती है।
    (३) मोदी जी तो अभी आये हैं। अन्याय पहले हुआ है।
    (क)अर्थ: जन तंत्र में जागरुक जनता का योगदान चाहिए।
    (ख)अर्थ: कृषि से आज तक भारत आत्म निर्भर नहीं हो पा रहा है। तो उद्योगों को विकसित करें-निर्यात करें। और जनता का पोषण करें।
    (४)जिस कृषि से आप का पेट तक भरता नहीं। आत्महत्त्यआएँ हो रही हैं; उसको छोडे, और उद्योग लगाएँ।
    (५)कम से कम इस संभावनापर अध्ययन (Study)तो करें।
    (६)अनुदान देकर Economy नहीं बढती। Economy बढती है, कुछ उत्पादों के कारण। निर्यात से Economy मॆं समृद्धि लाएं।
    (५)शासन सभी को अनुदान देते रहेगा, तो देश ही चौपट हो जाएगा।
    (७) पर बाँध से जो पानी मिलेगा, उसके कारण खेती भी अधिक सफल होगी।
    पर बांध के लिए भूमि-अधिग्रहण तो चाहिए।
    (८) यु पी ए की भ्रष्ट व्यवस्थाका ठीकरा मोदी पर फोडना कौनसी बुद्धिमानी है?
    आगे ८ दिन, मेरा प्रवास है। चिन्तकों को आवाहित करता हूँ।
    सोचिए।
    मधुसूदन

    Reply
  3. Mohan Gupta

    ब्रिटीश शासन काल के दोरान से कृषको की भूमि का अधिग्रहण होता रहा हैं। स्वतंत्रता के पश्चात जितनी भी भूमि अधिग्रहण की गयी हैं उसके अधिकांश भाग पर कोई विकास नहीं हुआ हैं। बल्कि कृषको की अंधिकांश अधिग्रहित भूमि पर राजनीतिज्ञ और माफिआ लोगो ने कब्जा कर लिया और धोके से इस अनिग्रहित भूमि को बहुत अधिक लाभ पर बेचा। इस कारन कई कृषको को रोज़ी रोटी के लाले पड़ गए हैं। कई कृषको ने आत्म हत्या भी की। इसका परिणाम यह हुया के ७६% कृषक खेती वाडी छोड़ना चाहते हैं। क्योंकि कृषको की कमाई बहुत कम हो गयी हैं। इसलिए लगभग ६० % कृषक खेती बाड़ी छोड़ कर नौकरी करने के लिए नगरो में जाना चाहते हैं। CSDS सर्वेक्षण द्वारा , कांग्रेस के MNREGA अनुदान के बाबजूद कृषको की आतम हत्ये कम नहीं क्योंकि हर पीढ़ी के वाद भूमि का वटबारा परिवार के सदस्यों में हो जाता हैं। छोटी छोटी भूमि के टुकड़े परिवार का भरण पोषण नहीं कर सकते। सरकार को चाहिए के कृषको को अनुदान देने में विशाल हिर्दय अपनाये , अनुदान प्राप्त करने के लिए रुकावटे कम करे। और यदि अधिकृत भूमि का विकास ३ वर्ष तक नहीं होता तो भूमि को कृषक को लोटा दी जाये। स्वतंत्रता के पश्चात ३ लाख से अधिक कृषक आतम हत्या कर चुके हैं। सरकार को ऐसे कदम उठाने चाहिये के भबिष्ये में कोई कृषक आत्म ह्त्या ना करे।

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    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन

      (१)मोहन जी आप की बात सही है।
      इस पर कोई व्यवहार करने योग्य उपाय पर बुद्धि लगाइए।
      (२)You need a handle. अंकुश या लगाम हाथ में आये ऐसी युक्ति सोचनी चाहिए।
      बालक का रोना, माँ सुनती है, तो दूध पिलाती है।
      (३)और मोदी जी तो अभी आये हैं। अन्याय पहले हुआ है।
      (क)अर्थ: जन तंत्र में जागरुक जनता का योगदान चाहिए।
      (ख)अर्थ: कृषि से आज तक भारत आत्म निर्भर नहीं हो पा रहा है। तो उद्योगों को विकसित करें-निर्यात करें। और जनता का पोषण करें।
      (४)जिस कृषि से आप का पेट तक भरता नहीं। आत्महत्त्यआएँ हो रही हैं; उसको छोडे, और उद्योग लगाएँ।
      (५)कम से कम इस संभावनापर अध्ययन (Study)तो करें।
      (६)अनुदान देकर Economy नहीं बढती। Economy बढती है, कुछ उत्पादों के कारण।
      (५)शासन सभी को अनुदान देते रहेगा, तो देश ही चौपट हो जाएगा।
      (७) पर बाँध से जो पानी मिलेगा, उसके कारण खेती भी अधिक सफल होगी।
      पर बांध के लिए भूमि-अधिग्रहण तो चाहिए।
      (८) यु पी ए की भ्रष्ट व्यवस्थाका ठीकरा मोदी पर फोडना कौनसी बुद्धिमानी है?

      टिप्पणी के लिए धन्यवाद। आगे ८ दिन, मेरा प्रवास होगा।
      सोचिए।
      मधुसूदन

      Reply
  4. आर. सिंह

    आर. सिंह

    डाक्टर मधुसूदन यह समझ रहे हैं कि मुद्दा भूमि अधिग्रहण क़ानून है,जबकि वास्तविक मुद्दा भूमि अधिग्रहण क़ानून २०१३ को निरस्त्र करने के लिए लाया गया अध्यादेश है.वे बार बार गुजरात के विकास का जो उदहारण दे रहे हैं,उससे साफ़ जाहिर होता है कि वे अभी भी अपनी दुनिया में भ्रमण कर रहे हैं.डाक्टर साहिब गुजरात के जिस विकास की बात कर रहे हैं,उसका इस नए अध्यादेश से दूर दूर तक का नाता नहीं है.मैं डाक्टर साहिब से यही अनुरोध करूंगा कि वे अपनी डफली अपना राग वाला रवैया छोड़े और अपने स्वप्न लोक से बाहर आकर वास्तविक मुद्दे को समझे. अभी तक तो यही हो रहा है कि टिप्पणीकार कुछ और कहना चाहते हैं और वे आँख कान बंद करके अपना राग अलापे जा रहे हैं.

    Reply
    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन

      (१)यह मेरा लेखन स्वातंत्र्य है; मेरा अधिकार भी। मुझे गुजरात का चकाचौंध कर देनेवाला अनुभव, जहाँ, १ पैसा खर्च कर १ रुपया मिला; सामने लाना था।
      (२)आप को अलग लेख लिखनेसे रोक नहीं रहा।
      (३) मुझे, व्यावसायिक गरिमा से नीचे, (सं)वाद अच्छा नहीं लगता।
      (४) आप आखरी टिप्पणी का सम्मान लीजिए; अपवाद केवल ==>दिगभ्रमित स्थिति में ही मैं हस्तक्षेप करूंगा।

      Reply
  5. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन

    सभी पाठकों को नमस्कार।
    (१) आप ने अपने विचार व्यक्त किए। यह कोई कम उपलब्धि नहीं।
    (२)जनतंत्र में, यह विचारों का व्यक्त होना भी एक आवश्यक विधा है।
    (३) कुछ पाठक छोडकर भूमिअधिग्रहण का विरोध करते कोई दिखाई नहीं देते।
    (४) गुजरात भी भारत में ही है। और वहाँ की सफलता भूमि अधिग्रहण की सफलता है।
    वहां की जानकारी मुझे (कुछ)प्रत्यक्ष है। इस लिए, उसका उदाहरण देना बिलकुल तर्क सम्मत है।वहाँ, जो लाभ १०० गुना आंका गया है; उसे उपेक्षित कैसे किया जा सकता है? और, क्यों उपेक्षित करे? यह पक्षपात क्यों?===> इस लिए, कि वहाँ सफलता प्राप्त हुयी है? सफलता का तो अनुकरण किया जाना चाहिए। क्या कुतर्क है आपका ?
    (५) अधिग्रहण की सूक्ष्म क्षतियाँ स्थानीय प्रतीत होती हैं। यह विफलता, अंशतः स्थानीय जनता के अपने अधिकारों के प्रति, अज्ञान के कारण से भी संबंधित है।
    जनतंत्र भी सजग प्रजा में ही सफल होता है। जनता को जागृत करें।
    (६) आप की सारी प्रतिक्रियाएँ, अभी अंशतः ही पढ पाया हूँ। समय मिलनेपर फिरसे पढूंगा। शुक्रवार से एक सप्ताह प्रवास पर भी जाना है।
    जानकारी की सीमामें उत्तर दिया जाएगा।

    (७)अंतमें…..सुभाषितेन समापयेत।
    त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् ।
    ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ॥
    ===>भारत की उन्नति हम/आप के निर्णय पर निर्भर करती है।पढे लिखे आप, सोच कर निर्णय करें।<===
    धन्यवाद।

    मधुसूदन

    Reply
  6. आर. सिंह

    आर. सिंह

    अगर इस आलेख से सम्बंधितसभी टिप्पणियों पर निगाह डाला जाए तो यही लगता है कि विद्वान लेखक को किसी टिप्पणी को पढ़ने की फुर्सत नहीं है और न वे उनपर विचार करना चाहते हैं.अरुणजी ने जो मुद्दे उठाये हैं,उनको नजर अंदाज नहीं किया जा सकता,पर वाह रे डाक्टर साहिब,उनकीनिगाह में तो अन्य लोग तो जो कुछ कह रहे हैं,वह सब बकवास है. उनकी निगाह गुजरात और भूमि अधिकरण बिल के संशोधन से आगे बढ़ ही नहीं रही है.ऐसे में सार्थक बहस हो ही नहीं सकती.सब बजाते रहें अपनी डफली अपना राग.

    Reply
  7. इक़बाल हिंदुस्तानी

    Iqbal hindustani

    मधुसूदन जी
    और इस अहम लेख पर कमेंट करने वाले विद्वानों में मैं सब से कम जानकार हूँ लेकिन सिर्फ दो सवाल करना चाहता हूँ
    1-ज़मीन किसान की है तो सरकार उसी के वोट से सत्ता में आकर उसकी ज़मीन जबरन कैसे छीन सकती है? बेशक भूमि लो लेकिन पर्याप्त मुआवज़ा तत्काल समय रहते पुनर्वास और वैकल्पिक रोज़गार देकर उसकी सहमति से नहीं तो कोर्ट जाने का रास्ता बन्द मत करो।
    2-बीजेपी जब विपक्ष में थी वो बड़े बड़े दावे और सरकार पर आरोप लगाती थी अब यही काम विपक्ष कर रहा है तो गलत कैसे हो गया? नहीं तो कालाधन पाकिस्तान आयकर सीमा सहित 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून जैसे अनेक मुद्दों पर वो मुकर न रही होती……।

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  8. arun

    नमस्ते भाईसाहब
    आपने सच कहा, सभी जन की इच्छा एक सी नहीं हो सकती.
    ऐसे में निर्णय करने की आवश्यकता होती है कि संसद. विधानसभा और ग्रामसभा, ये तीन सरकारें किसकी इच्छा को अपनी इच्छा और प्राथमिकता बनाएं. किसका विकास, कैसा विकास भी एक बिंदु है.

    असल मुद्दा यह नहीं है, असल मुद्दा हैं भूमि अधिग्रहण सम्बन्धी कानून २०१३ और उसमे किये गए संशोधन. इन पर यदि चर्चा करनी हो, तो बिन्दुवार चर्चा करनी चाहिए.; ज़मीनी हक़ीक़त के साथ करनी चाहिए.
    बिन्दुवार चर्चा करता लेख प्रवक्ता पर उपलब्ध है. कृपया पढ़ें.

    हक़ीक़त यह है कि सेज़ के लिए अधिग्रहित हुई कुल भूमि के मात्र ६२ प्रतिशत पर ही अभी काम हुआ है. पर्यावरण मंज़ूरी और सामाजिक आकलन के अलावा इन्हे १,७५ लाख करोड़ रुपये का कर अवकाश भी दिया गया. इसके बावजूद भारत के कुल निर्यात में इनका योगदान नगण्य है. सरकार कह रही है कि भूमि अधिग्रहण न होने की वजह से ४ लाख करोड़ के प्रोजेक्ट लटके पड़े हैं. सच्चाई यह है कि सरकार ऐसे कोई सूची उपलब्ध कराने में अक्षम इसलिए रही है, कारण कि ऐसी कोई सूची है ही नहीं. २०१५ के ताज़ा सर्वेक्षण की रिपोर्ट भी ऐसे नकारती है; तदनुसार आधारभूत ढांचे से सम्बंधित परियोजनाओं के रास्ते के रोड़ा बने कारकों में ज़मीन शामिल नहीं है. प्रमुख पांच राज्यों के आंकड़े बताते हैं कि अधिग्रहित भूमि में से ४५ प्रतिशत बगैर इस्तेमाल किये पड़ी है. सार्वजानिक उपक्रमों के पास १७ लाख एकड़ भूमि बिना उपयोग पड़ी है. सरकार की निगाह रेलवे की ज़मीन पर भी है. भारत के स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कारपोरेशन की साइट्स पर जाइये, बिना आवंटन प्लाट खाली पड़े हैं.

    क्या सरकार को नहीं चाहिए कि वह पहले अधिग्रहित भूमि का इस्तेमाल सुनिश्चित करती फिर ज़रुरत के अनुसार कानून में बदलाव पर सोचती. अभी तो २०१३ का कानून ठीक से ज़मीन पर उतरा ही नहीं. सरकार ने कैसे अंदाजा लगा लिए कि कानून ठीक नहीं. जबकि उसे पास करने में उसकी पार्टी खुद सहयोगी बनी थी.
    सरकार चीन- जापान की होड़ में फँसी है. मैने पहले भी लिखा है कि भारत का विकास मॉडल, चीन या जापान जैसा नहीं हो सकता. जापान एकसार जनता का देश है. भारत में विविधता चरम पर है. चीन में हर साल करीब ७५००० भू संघर्ष के आंकड़े हैं . सालभर आपदा ही आपदा है . सामाजिक और पारिवारिक जीवन में मुस्कान का ग्रोथ रेट भारत से बहुत पीछे है.

    समझना होगा कि १९९६ में ही विश्व बैंक ने भारत को निर्देश दे दिया था कि उसे अपनी आबादी में से ४० करोड़ लोगों के हटकर २०१५ तक शहरों में ले जाना है. यह आंकड़ा ब्रिटेन, फ्रांस एयर जर्मनी की कुल आबादी की दोगुना है. इतनी आबादी को शहरों में बसा देना क्या अभी भारत के हित में है ? क्या सरकार द्वारा लिए १०० स्मार्ट सिटी के सपने को अभी वाजिब ठहराया जा सकता है, जबकि भारत में करीब पौने ४००० नगर अभी पूर्णतया अनियोजित और बगैर नगरपालिका / निगम के समस्याओं से जूझ रहे हैं.

    लोगों को जानबूझकर खेती से वंचित किया जा रहा है. ऐसे हालात पैदा कर दिए गएँ हैं कि यूरिया, पोटाश का अधिकतम विदेश से आयात करना पड़ रहा है. फल और सब्ज़ी फसलें उत्पादन के बाद ४० प्रतिशत नष्ट हो जाती हैं. उनके रखरखाव का उचित इंतज़ाम नहीं है. क्या हमारी प्राथमिकता यह नहीं होनी चाहिए. जिन गावों में खेती बदल रही है, वहां खेती घाटे का सौदा कतई नहीं है. तमाम मौसमी दिक़्क़तों के बावजूद ऐसे इलाके स्वावलम्बन से अपने पैरों पर आज भी खड़े हैं.
    आधारणीय प्रोफेसर साहब, यह समझना ज़रूरी है की गावं और खेत आधारित आर्थिकी के कारण ही दुनिया में आई भयावह मंदी के दौर में भी भारत टिक सका
    इस स्वावलम्बन को तोड़ने की साजिश को समझना ज़रूरी है.
    हमारा दायित्व यही है कि हम यह समझें कि कंपनी और उद्योग भी ज़रूरी हैं और खेत भी. विकास और उसके प्राप्तकर्ता एकांगी नहीं हो सकते.
    जय हिन्द
    आपका अरुण

    Reply
  9. p k

    भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध नही हूँ । लगता है जो भूमी अधिग्रहण बिल प्रस्तुत किया गया है, उसमे कुछ त्रुटियाँ हैं । इसलिये सबका दृष्टिकोन देखना आवश्यक है । काश की जब भाजपा विपक्ष मे थी, तब उन्होने संयम दिखाया होता । फिर आज वे विपक्ष से दावे के साथ बात कर सकते ।

    विपक्ष क्या, अब तो अकाली दल, विश्व हिन्दु परिषद और शिव सेना सभि मिलकर भाजपा को बदनाम करने मे लगे हुए हैं ।

    Persons (read political parties) are known by the company they keep!

    Reply
  10. Vishwa Mohan Tiwari

    yadi kisee Agricultural society ko modern tathaa udyogsheel banaana ho tb kuchh bhoomi ka adhigrahan to karana hee padegaa !!
    vishwa mohan tiwari

    Reply
    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन

      आ. विश्वमोहन जी—-
      निम्न वस्तुस्थिति अभी भी भारत की जनता को पता नहीं लगती।
      ***जिस कच्छ की लाखो एकड भूमि बिना पानी की सुविधा, उपजाऊ नहीं होती थी, या,/ अल्प उपजाऊ थी; उसको पूर्णतः उपजाऊ बनाया गया है।
      अब कितनी फसलें निकलती है, नहीं जानता।***
      गुजरात में, भूमि अधिग्रहण से कृषि उत्पादन *काफी* बढा है, *घटा* नहीं है।
      ——————————–
      कच्छ के “गढसीसा” नगर में मेरे संबंधी पर विश्वास कर सकता हूँ।
      ***जिस कच्छ की लाखो एकड भूमि बिना पानी की सुविधा, उपजाऊ नहीं होती थी, या,अल्प उपजाऊ थी; पूर्णतः उपजाऊ बनाया गया है।
      अब कितनी फसलें निकलती है, नहीं जानता।***
      सारा कच्छ प्रदेश, और अंशतः राजस्थान उपजाऊ हो गया है।
      “नर्मदा बाँध” नामक आलेख में मैंने आँकडे दिए है।
      केवल एक नया पैसा देकर वापस रुपया मिल रहा है। पर हमें नहीं चाहिए।
      आप की बात लोग मानते हैं, अपने व्याख्यानो में तथ्य प्रसारित करें।
      सविनय प्रणाम।

      Reply
      • आर. सिंह

        आर. सिंह

        मुद्दे से आप सब भटक गए लगते हैं.बहस इस बात पर नहीं हो रही है किभूमि अधिग्रहण होना चाहिए या नहीं .बहस का मुद्दा तो यह यह है कि भूमि अधिग्रहण क़ानून में सरकार जो संशोधन करना चाहती है,वह आखिर क्यों? उससे किसका भला होगा?

        Reply
  11. ARUN

    आदरणीय मधु जी
    तथ्यों को नकारने की यह जिद्द क्यों ?
    आपसे किसने कहा कि भूमि अधिग्रहण नहीं चाहिए ?
    भूमि अधिग्रहण चाहिए, किन्तु जिसके गरीब के विकास के नाम पर भूमि अधिग्रहण का ढंका पीटा जा रहा है, उसकी सहमति लेने में बुरा क्या है ?
    आप कैसे भूल सकते हैं कि किसान महज एक इकाई नहीं है, वह हमारे पेट के लिए सबसे ज़रूरी चीज का उत्पादनकर्ता है. कभी ज़मीन पर उतर सोचिये. हम अपनी- अपनी राय रख रहे हैं; कभी जाकर उनकी राय भी तो पूछें .
    विषय को एक दल या दूसरे दल में खड़े होकर सोचने की बजाय, एक भूमिधर की तरह सोचें, तो ही न्याय कर पाएंगे.

    अरुण

    Reply
    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन

      अरुण जी—आलेख सभी को लक्ष्य कर लिखा है।
      (१) और स्थूल निर्णयोंपर ही लिखा है।
      (२)जब प्रवास की सोचते हैं, तो –“जाए या नहीं” का निर्णय पहले करते हैं।
      (३) फिर सूक्ष्मताओं पर सोचते हैं। ऐसे, सोचने के लिए, प्रदत्त (डेटा) आवश्यक होता है।
      (४) पहले से पैंतरा लेना गलत मानता हूँ। सूक्ष्मताएँ सामूहिक परामर्श से सुलझानी चाहिए। उनको आगे कर विरोध ना हो।
      (५) जो यु पी ए शासन में भ्रष्टाचार हुआ, दुबारा ना हो, उसके लिए सज्ज रहकर प्रक्रिया गढनी और सतर्क रहना चाहिए।
      (६) प्रजा जन भी भ्रष्ट हैं। उन्नति की बालटी में पैर डालकर उसी को उठवा रहे हैं।
      ——————————————————————————-
      जनतंत्र (Democracy)की अंग्रेज़ी व्याख्या दी जाती है, ’Government of the people, by the people, for the people.’
      अर्थात—> ’जनता का शासन, जनता द्वारा, जनता के लिए’ कितनी सरल है, यह व्याख्या?==> जनताका, जनता द्वारा जनता के लिए, शासन।
      अर्थात ’लोकतंत्र में राज्य जनता की इच्छाओं के अनुसार चलता है।’
      अब बोलो, जनता की इच्छा क्या है? और जनता की इच्छा कौन-सी समझी जाय?
      जानते हैं आप? नहीं ना?
      किन्हीं भी दो व्यक्तियों की इच्छाएं एक-सी नहीं हो सकतीं।
      यहाँ तो करोडों का प्रश्न है।
      और क्या राष्ट्र के सभी जन एक ही इच्छा करेंगे?
      यह सामान्यतः संभव भी नहीं।
      आप की प्रतिक्रिया के लिए आभार।

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  12. आर. सिंह

    आर. सिंह

    इस आलेख को भावुकता का जामा पहनाया गया,जिससे तथ्यों की और से ध्यान हटाया जा सके. हम जो कहते हैं,वही ठीक है,बाकि सब वकवास है,ऐसा नहीं होता,न यह होता है कि केवल हम राष्ट्र वादी हैं, अन्य सब देश द्रोही हैं.कौन इस बात से इंकार करता है कि सिंचाई के लिए नहर बनाने के लिए भूमि अधिग्रहण नहीं होना चाहिए?कौन इस बात से इंकार करता है कि सौर ऊर्जा के लिए प्रयत्न नही करना चाहिए?विरोध वहां आता है ,जहाँ मूर्खता पूर्ण बातें की जाती हैं.जब कोई यह कहता है कि जब जापान ५४% खाद्यान आयात कर सकता है,तो हम क्यों नहीं?विरोध वहां किया जाता है,,जहां बड़े बड़े शहर बसाने के लिए भूमि अधिग्रहण की जाती है और वह भी किस मूल्य पर? मैं केवल मुआवजे की बात नहीं करता,वह तो एक छोटा पहलू है.मैं पूछता हूँ कि बहु फसलीय जमीन का अधिग्रहण कर उस भूमि में बड़े बड़े फ़्लैट या पेंट हाउस बनाने से क्या लाभ? विरोध अनाप सनाप भूमि अधिग्रहण में है,न कि आवश्यक अधिग्रहण में?नए भूमि अधिग्रहण संशोधन को आपलोग ठीक से समझिए.यह किसका भला करेगा?जमीन हम अधिग्रहण कर लेंगे.उससे किसान को या समाज को जो लाभ हो रहा था,उसको ख़त्म कर देंगे और उसको सालों तक पड़े रहने देंगे.कोई उसको चुनौती नहीं दे सकता.अभी
    केवल एक और प्रश्न,किसी भी भूमि अधिग्रहण क़ानून में उस किसान को को भागीदार कोई नहीं बनाया जाता,जिसकी जमीन ली जाती है?

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      • आर. सिंह

        आर. सिंह

        डाक्टर साहिब,आप बताइये तो सही कि मैंने कैसे गलत अर्थ निकाला है?

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        • आर. सिंह

          आर. सिंह

          डाक्टर साहिब,आपने अभी तक बताया नहीं कि मैंने क्या गलत अर्थ निकाला है?

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  13. mahendra gupta

    राजनीति करने वाले लोगों को देश व जनता के फायदे से क्या काम इन्हें तो लोगो को बरगला कर अपनी दुकान चलानी है,कांग्रेस तो अपनी हार का बदला इस प्रकार के अड़ंगे लगा कर भा ज पा को बदनाम कर लेने चाहती है , आम व्यक्ति को इन बातों की इतनी समझ नहीं है उसका ये लाभ उठाते हैं

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    • आर. सिंह

      आर. सिंह

      महेंद्र गुप्त जी,यह एक संवेदनशील मुद्दा है.इस पर गोल मटोल उत्तर देना छोड़िये.जब आप देश और जनता की बात करते हैं,तो यह तो समझाइये कि इससे जनता के किस हिस्से का भला होगा?

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