‘झूठ’ की बुनियाद पर महल मत खड़ा कीजिए पंकजजी, अंजाम आप जानते हैं

प्रिय पंकजजी,

नमस्‍कार।

आपका आरोपयुक्‍त लेख हमें प्राप्‍त हुआ। आपने प्रवक्‍ता के मंतव्‍य पर सवाल उठाये हैं इसलिए संपादक के नाते आपके आरोपों का जवाब देना हमारा दायित्‍व है।

“मैं तुम्‍हारे विचारों को एक सिरे से खारिज करता हूं, मगर मरते दम तक तुम्‍हारे ऐसा कहने के अधिकार का समर्थन करूंगा।” ऐसा लोकतंत्र के पुरोधा माने जाने वाले वॉल्‍टेयर ने कहा था।

पंकजजी, आपने जगदीश्‍वरजी के लेखों के हवाले से आरोप लगाया है कि ‘प्रवक्ता जैसा ईमानदार माना जाने वाला साईट भी शायद सस्ती लोकप्रियता के मोह से बच नहीं पा रहा है और एक अनजाने से चतुर्वेदी जी को इतना भाव दे कर जाने-अनजाने एक नये बुखारी को ही जन्म दे रहा है।‘ आप चिंता व्‍यक्‍त कर रहे हैं, ‘राष्ट्रवाद को गरियाने की सुपारी अगर प्रवक्ता जैसे खुद को राष्ट्रवाद का सिपाही मानने वाले साईट ने जगदीश्वर जी को दे रखी हो तो आखिर किया क्या जाय?’

आपको दिक्‍कत है कि ‘जगदीश्‍वरजी राष्‍ट्रवाद, हिंदुत्‍व और बाबा रामदेव को गरिया रहे हैं।‘ लेकिन हम मानते हैं कि जगदीश्‍वरजी ने लोकतांत्रिक दायरे में रहकर अपने विचार व्‍यक्‍त किए हैं और आपको भी लोकतांत्रिक मूल्‍यों का ख्‍याल रखते हुए अपनी बात कहनी चाहिए। आपको ठंडे दिमाग से जगदीश्‍वरजी के आरोपों का जवाब देना चाहिए न कि वैचारिक हस्‍तमैथुन का आरोप लगाकर। आपके लेख का लब्‍बोलुआब यह है कि प्रवक्‍ता को जगदीश्‍वरजी के ऐसे लेखन से बचना चाहिए।

दरअसल, आप बौखला गए हैं। आप किसी से सहमत नहीं है तो उसकी कड़ी आलोचना कर सकते हैं। विरोधी पक्ष से संवाद मत करो, उसे बोलने मत दो, क्‍या लोकतंत्र का यही मतलब है? फिर तो हमें एक तालिबानी और फासीवादी समाज में जीना होगा। आप बहस से क्‍यों कतराते हैं, क्‍या आपके तर्क इतने कमजोर हैं या फिर आपकी पोल खुल जाने का डर है। बौद्धिक विमर्श में हिंदू कमजोर पड़ रहा है, तो इसके कारणों की मीमांसा कीजिए। क्‍यों आज दयानंद सरस्‍वती, विवेकानंद, अरविंदो जैसा बौद्धिक योद्धा हिंदू समाज की रक्षा के लिए सामने नहीं आ रहा है और वामपंथी बुद्धिजीवी आज विमर्श में हावी है। इस पर आपको गंभीरता से सोचना चाहिए।

आप प्रवक्‍ता के शुरूआती दिनों से हमसफर हैं इसलिए हमारी पूरी यात्रा को करीब से जानते हैं। हमने बार-बार कहा है, प्रवक्‍ता लोकतांत्रिक विमर्शों का मंच है। प्रवक्‍ता लेखकीय स्‍वतंत्रता का पक्षधर है। यह एक बगिया है, जिसमें भांति-भांति के वैचारिक फूल खिलते हैं। प्रवक्‍ता किसी पार्टी का लोकलहर, कमल संदेश और पांचजन्‍य नहीं है। यह भारतीय जनता की आवाज है। यह एकांगी और संकुचित दृष्टिकोण से मुक्‍त है। हम चाहते हैं कि समाज में विचारहीनता का वातावरण न बने और बहस का रास्ता हमेशा खुला रहना चाहिए।

आप जानते होंगे कि भारत में शास्त्रार्थ की बहुत पुरानी परंपरा रही है, जहां विभिन्‍न विचारधारा के लोग एक ही मंच पर विचार-विमर्श करते थे। और वास्‍तव एक लोकतांत्रिक समाज में तर्कों व चर्चाओं के माध्‍यम से समस्‍याओं के हल निकाले जाते हैं। लेकिन आज ऐसा नहीं हो पा रहा है, यह दुर्भाग्‍यपूर्ण है। संविधान हमें यह अधिकार देता है कि हम अपनी बात कानून के दायरे में रहकर कहें, यही तो लोकतंत्र की मूल भावना है।

पंकजजी, मैं तो यही सलाह दूंगा कि औरों पर थूकना छोडि़ए और अपनी रेखा लंबी कीजिए। अपने कुएं से बाहर निकलकर दुनिया को देखिए, यही समय का तकाजा है।

और अंत में हां, आपका पूरा लेख ही ‘झूठ’ की बुनियाद पर खड़ा है। आपके इतिहास ज्ञान पर तरस ही खाया जा सकता है। पहले भारत के राजनीतिक इतिहास का अध्‍ययन कीजिए तब जाकर रा.स्‍व.संघ पर टिप्‍पणी कीजिए। संघ समर्थित दल ने कभी ‘अब्दुल्ला बुखारी करे पुकार, बदलो कांग्रेस की सरकार’ जैसे नारे नहीं लगाए। दूसरों की अफवाह पर आपने एक पूरा लेख लिख डाला। आपको जानकारी नहीं थी तो किसी संघ के जानकार बुद्धिजीवी से इसकी सत्‍यता परख लेते। और देखिए, सच के सामने आते ही झूठ की बुनियाद पर खड़ा आपका यह लेख भरभरा कर ढह रहा है।

आपका,

संजीव कुमार सिन्‍हा

संपादक, प्रवक्‍ता डॉट कॉम

55 thoughts on “‘झूठ’ की बुनियाद पर महल मत खड़ा कीजिए पंकजजी, अंजाम आप जानते हैं

  1. मेरी उपरोक्त टिप्पणी प्रवक्ता के किसी अन्य लेख के सम्बन्ध में थी. जो गलती से इस लेख में छप गयी है. जो नितांत अप्रासंगिक है. कृपया इसे इस लेख की टिप्पणी के रूप में प्रकाशित न करे.

  2. सही कहा आपने. बरखा दत्त, वीर संघवी जैसे दलालों के कारण आज पत्रकारिता बदनाम है. लेकिन इस खेल में सिर्फ यही नहीं, प्रभु चावला, प्रणव जेम्स रॉय और राजदीप सरदेसाई समेत टाइम्स ऑफ़ इंडिया जैसे मीडिया भी शामिल है. इस बात का अंदाजा उनकी पत्रकारिता से ही लग जाता है. सब के सब चर्च+जेहादी ताकतों+कोंग्रेस+ अमेरिका से पैसा खाते है और उनसे राग मिलाकर एक सुर में गाते है.

  3. बहुत दिनों बाद इंटरनेट पर आने का मौक़ा मिला तो आपका यह घामासन देखने को मिला. जो बहुत ही दुखद है. पंकज जी जैसे लेखक हमारे राष्ट्र की संपत्ति है. राष्ट्र सेवा को समर्पित ऐसे प्रतिभाशाली आजकल बहुत कम ही पैदा होते है. कुछ पैदा होकर वाम और वंश की पूजा में लग जाते हैं. आज जहां अधिकाँश लेखक वाम और वंश की आगोश में समाकर खुद को सुरक्षित कर लेते है वही ऐसे युग में ‘पंकज’ होना भी साहस की बात है. जो व्यक्ति अध्ययन और रीसर्च के तप की साधना करके पूरे मनोयोग से लिखता हो, हर पाठक की आपत्ती का लगन से जवाब देता हो उसके सामने जगदीश्वरजी जैसे लेखक कही नहीं ठहरते. जगदीश्वरजी केवल अनर्गल कलम घिसकर, कुतर्को से भरी खोखली बाते लिखकर गायब हो जाते है. जो उनके लेखन से झलकता है. दर असल वह प्रवक्ता जैसे मंच का दुरुपयोग कर रहे हैं.
    दूसरी तरफ ‘सेकुलरो’ की बेशुमार भीड़ के बीच प्रवक्ता राष्ट्रवाद की प्रखर वक्ता के रूप में उभरी है. ऐसे में उसकी भी जिम्मेदारी बनाती है कि वह राष्ट्रवाद को स्वर दे ना कि किसी संतुलन के मोह में अरुन्धतियो, जगदीश्वरो, का बनाना चाहिए. संजीव जी यह सिर्फ एक आग्रह है, इसे अन्यथा न ले. किसी ‘सेकुलर’ चाल में न फंसे और न ही ऐसे राष्ट्रविरोधी तत्वों की आश्रय स्थली बने कि प्रवक्ता भी वाम-वंश-विदेश की आराधक मंडली में शामिल हो जाए.

  4. श्रीराम तिवारी ने सही कहा – “भाई संजीव सिन्हा पर अनर्गल आरोप लगाने बालो ….अपने गरेवान में झाँक कर देखो” यह काम तिवारी तो कर नही सकते क्योंकि उनके गरेबान के अंदर जो कचरा भरा पडा है उससे इतनी सडांध आ रही है कि झांकने का दुस्साहस करने वाला गश खा कर गिर पडेगा।

  5. mujhe jaan kar hairaanee huii ki dinesh gaud jee kaa koii lekh nahee chhapaa gayaa. zarur kisee bhul ke kaaran aisaa huaa hogaa. main dekh rahaa hun ki kaafee kathor tippaniyaan bhee to chhap rahee hain. kyaa sampaadak mahoday is par kuchh naheen kahenge ?

  6. प्रवक्ता का ध्यान मैंने पहले भी इस ओर आकर्षित किया है की कुछ लोग इस मंच का दुरुपयोग कर रहे हैं जो सबकी नजर में है। गुटबाजी चल रही है लेखक और उनके समर्थकों की । कुछ लोग तो इस मंच पर अपने अन्यत्र प्रकाशित लेखों को भी प्रकाशित कर रहे हैं। हर मंच की एक विचारधारा होती है एवं नियम होते हैं अगर प्रवक्ता ने नहीं बनाए हैं तो बना लेने चाहिए। कुछ लोग जब जवाब नहीं दे पाते तो मंच की निष्ठा और प्रक्रिया पर ही प्रश्नचिन्ह उठाने लगते हैं, ऐसा करके वे एक अनुचित दबाव भी प्रवक्ता पर डालते हैं। ऐसा भी कई लोग आए दिन करते रहते हैं। चतुर्वेदी जी जैसे कई लोग इस मंच का मेरे ख्याल से दुरुपयोग ही कर रहे हैं
    ब्लॉग और प्रवक्ता को एक ही तराजू में नहीं तौला जा सकता। ब्लॉग एक मुक्तांगन है(यह भी पूर्णतह सही नहीं है) जबकि प्रवक्ता एक निजी प्रयास है जिसे अपने नियम कायदे बनाने का अधिकार है । अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता बड़ा अच्छा विचार है, लेकिन तभीतक जबतक यह अपनी सीमा नहीं तोड़ता। यह सीमा निर्धारण कौन करेगा ?

  7. सारी टिप्पणियां पढ़ें और पंकज जी और जगदीश्वर जी को भी पढता रहा हूँ .मेरे ख्याल से आपको जगदीश्वर जी के ‘ घृणा अभियान ‘ का सहयोगी तो नहीं मान सकता , उन्हें प्रवक्ता में स्थान ( जरूरत से ज्यादा) और वह भी एकतरफा ( टिप्पनिओं में उठाये सवाल को अनदेखा भी करते ) लेखों के लिए इतना मान ,स्थान देना सम्पादकीय अभीष्ट नहीं है .न निरपेक्षता ही है .

    ऐसे में पंकज जी के लिए आप की अपनी ( भी ) भाषा और कथ्य का समर्थन नहीं किया जा सकता .प्रवक्ता अवश्य ही निष्पक्ष रहे ,तथ्यात्मक संवाद हो , पर निष्पक्षता के नाम कुछ खास लोगों के स्वान रोदन का अड्डा भी न बने ,विशेस कर ऐसे जो संवाद नहीं वरन निर्लज्ज कुतर्क ही करते हों और तर्कों की अनदेखी करते हों .
    मुझे जगदीश्वर जैसे लोग इसी श्रेणी के नज़र आते हैं .

  8. संजीव जी आप को आरोप में घेर लेना इस बात का सबूत है की प्रवक्ता पे अभिव्यक्ति की कितनी आज़ादी है और इससे इसकी सीमा का अंदाजा भी लगाया जा सकता है. हाँ आपका लेख इस बात का सबूत है की आज़ादी का मतलब यह नहीं के कुछ भी कह दें.
    समस्या तो यह है की लोग लेख को छोड़ लेखक पे अपने विचार देने लगते है जो की स्वस्थ बहस के लिए ठीक नहीं है. आप अपने तर्क दें और मर्यादित भाषा का प्रयोग करें या ऐसी भाषा जिनका प्रयोग अपने निजी व सामाजिक जीवन में करतें हों. आप यक़ीनन बंद कमरे में लिख रहें हैं लेकिन आपके लेख व विचार पढने वालों की कोई सीमा नहीं है.

  9. ‘झूठ’ की बुनियाद पर महल मत खड़ा कीजिए पंकजजी, अंजाम आप जानते हैं……..लेख के शीर्षक पर एतराज….कुछ धमकी की सी बू आ रही है….रही बात झूठ की बुनियाद वो तो चतुर्वेदी जी ने खूब बना ऱखी है….उनकी आवाज तो निहायत ही गैर लोकतांत्रिक है….वो किसी सवाल का जवाब नहीं देते और एक सवाल और खङा कर देते हैं..तर्कों को नकारते हैं..
    बाबा रामदेव ढोंगी हैं. छली कपटी है…प्रचार का भूखा है
    कश्मीर भारत का अंग कभी था ही नहीं…कहने वाली अरूंधति सच्ची भारतीय नारी है….कहने वाले जगदीश्वर जी को इन बातों पर सवाल उठाने वालों का जवाब क्यों नहीं बनता और वे फिर हाजिर हो जाते हैं ……अपनी किसी कुत्सित राष्ट्रविरोजी सोच के साथ….
    .हमारी आशा है कि प्रवक्ता राष्ट्रवाद का धर्म निरपेक्ष मंच बने न कि हिंदुत्व और राष्ट्रविरोधी शर्म निरपेक्ष भौंपू……कुछ ज्यादा लिखा तो क्षमा की अपेक्षा के साथ

  10. जगदीश्वर जी के पास कुतर्क है और जब उन से कोई तर्क रख पूछता है तो उन के पास जवाब नही होता तर्क का जवाब देने की बजाय टिप्पड़ी ही डिलीट करते रहते है . मिडिया पर कुछ देशद्रोही तत्वों ने कब्ज़ा कर रक्खा है . जो हर देशद्रोही कृत्य को सही ठहराने का ठेका ले लेती है .
    आप पंकज जी का आवाज नही दबा सकते .
    अगर आप जगदीश्वर चतुर(वेदी) की देश द्रोही आवाज को मुखर करेंगे तो आप के इस प्रवक्ता . कॉम पर कोई झांकने भी न आएगा ..

  11. जगदीश्वर जी के पास कुतर्क है और जब उन से कोई तर्क रख पूछता है तो उन के पास जवाब नही होता तर्क का जवाब देने की बजाय टिप्पड़ी ही डिलीट करते रहते है . मिडिया पर कुछ देशद्रोही तत्वों ने कब्ज़ा कर रक्खा है . जो हर देशद्रोही कृत्य को सही ठहराने का ठेका ले लेती है .
    आप पंकज जी का आवाज नही दबा सकते .
    अगर आप जगदीश्वर चतुर(वेदी) की देश द्रोही आवाज को मुखर करेंगे तो आप के इस प्रवक्ता . कॉम पर कोई झांकने भी न आएगा .

  12. अरे श्रीराम जी आपको तो मैं खोजता रहता हूँ आप मिलते नहीं अपन लोग कोई ज्ञानी पत्रकार तो है नहीं थोडा सा समय निकल कर प्रवक्ता पढ़ लेते है संजीव जी से सीखना हमें नहीं आपको है संघ में जो लोग ऊंचाई पर पहुँच जाते है सभी ऐसे ही होते है हम जैसे अज्ञानी लोग कभी निष्पक्ष नहीं हो सकते हमें संजीव जी पर गर्व है कि उन्होंने बालपन में ही आपको एक सबक सिखा दिया अब आपको और चतुर्वेदी जी को भी संजीव जी से थोडा ज्ञान प्राप्त करना चाहिए और ज्यादा नहीं तो थोडा निष्पक्ष तो जरूर होना चाहिए

  13. भाई संजीव सिन्हा पर अनर्गल आरोप लगाने बालो ….अपने गरेवान में झाँक कर देखो ….ये लड़का इतनी कम उम्र में भी इतनी उंचाई पर जा बैठा है की स्वयम की निष्ठां संघ के प्रति होते हुए भी धुर वामपंथ से लेकर आप सभी महानुभावों को पूरी निष्पक्षता से प्रवक्ता .कॉम पर प्रकशित करने में कोई भेद भाव nahin karta sahi yadi dushman भी ho to uska samman karta है .galat ydi apna भी ho -pankaj jaisa –to sahan nahin karta ….badhai संजीव सिन्हा .sampadak ..pravkta .कॉम को

  14. संजीव जी मैं अपनी बात कहता हूँ, मैं प्रवक्ता.कॉम पे इसलिए आता था की यहाँ पे काफी हद तक वैचारिक संतुलित आलेख दीखते थे | मुख्यधारा की कॉव-कॉव से अलग स्वस्थ परंपरा को स्थान देने का भरसक प्रयास किया गया |

    dr.rajesh kapoor की बातों से पूर्ण सहमती रखता हूँ | और आपसे अनुरोध करता हूँ की पंकज झा के लेख पे कठोरता ना बरते | आप प्रवक्ता.कॉम के संपादक हैं, संपादक की कलम से इस तरह की भाषा आगे नहीं आये ऐसी ही आशा करता हूँ |

    आपका शुभाकांक्षी
    राकेश

  15. मेरा कहना ये है की संघ विरोधी लेख निकृष्ट कोटि के क्यों हैं?
    अरे यदि संघ का कोई सुयोग्य विरोधी नहीं है, तो फिर हम ही संघ के विरोध की भूमिका में आ जायेंगे. यदि लोकतंत्र का तकाजा है तो चतुर्वेदी जी जैसे लोगों को स्थान देना गलत ही नहीं बल्कि अपमानजनक भी है.
    मैं स्वयं नास्तिक हूँ और राम का परम आलोचक. भाई विरोध भी शालीन होना चाहिए. ऐसे नहीं जैसे चतुर्वेदी या श्रीराम तिवारी जी या कोई और करते हों.
    पंकज जी को भी अपनी भाषा की शुद्धता का ख्याल रखनी चाहिए थी. खासकर के हस्तमैथुन जैसे वर्जित शब्दों का इस्तेमाल से बचा जाना चाहिए था. और वाक्य को भी इतना कठोर नहीं रखना था.
    चतुर्वेदी जैसे भी है कुछ हद तक लोक लाज का ख्याल तो रख ही लेते हैं. ये अलग बात है की उनके वाक्य या भाव विषवमन करते हैं.
    कुल मिलकर इस लड़ाई में चतुर्वेदी साहब पंकज के आगे कहीं नहीं ठहरते.
    संजीव को भी भाषा की पवित्रता का ख्याल रखने की जरुरत है. दो लेखकों की लड़ाई में निर्णायक की भूमिका अदा करने वाले से अपेक्षा की जाती है कि वो donon को tarkon से sheetalta pradan kare. अरे ab तो shabd sirf angreji में ही likha rahe हैं. mujhe viraam देना hoga.

  16. यह विवाद दो अभिन्न मित्रों के बीच क्षणिक आवेश का परिणाम है ऐसा प्रतीत होता है . इस विवाद को ” संपादक के विशेषाधिकार और लेखन की स्वतंत्रता ” का विवाद न बनाया जाय .अब युद्धविराम ही एक मात्र उपाय है . देश की बुलंदियों के लिए प्रवक्ता और उनके प्रबुद्ध लेखकों को अभी लम्बी राह तय करनी है . साधुवाद

  17. @ आप बहस से क्‍यों कतराते हैं, क्‍या आपके तर्क इतने कमजोर हैं या फिर आपकी पोल खुल जाने का डर है। बौद्धिक विमर्श में हिंदू कमजोर पड़ रहा है, तो इसके कारणों की मीमांसा कीजिए। क्‍यों आज दयानंद सरस्‍वती, विवेकानंद, अरविंदो जैसा बौद्धिक योद्धा हिंदू समाज की रक्षा के लिए सामने नहीं आ रहा है – बिलकुल पते की बात है. वामपंथियों की सुविचारित बौद्धिकता से अगर आपको निपटना है तो मेरा सुझाव है की प्रवक्ता पर हाईस्कूल निबंधों को छापना बंद कर दें. यहाँ तो तर्कों के स्थान पर गलियां और लफ्फाजियां चलती हैं या फिर “अहो रूपं अहो गान” की तर्ज़ पर एक दूसरे की प्रशंसा इस अपेक्षा में कि मुझे भी मिलेगी प्रशंसा. विवेकानंद जो कुछ भी रहे हों वे कट्टर पंथी नहीं थे, आर्य समाज के संस्थापक कट्टर पंथी नहीं थे. सदियों पुराणी मान्यताओं पर तर्कों के प्रश्जना चिन्ह लगाने और उन्हीं के आधार पर एक संप्रदाय का गठन और प्रसारण एक खुले दिमाग वाले व्यक्ति के बस कि बात है पर प्रवक्ता तो क्या संघ और भारत में कोई ऐसा बुद्धिजीवी नहीं है. यहाँ तो बस तर्क के नाम पर ” हस्तमैथुन तक ही पहुँच है. झा साहब का स्तर इसी तुलना से पता लगता है. चतुर्वेदी जी या झा साहब कि अपेक्षा कुछ अच्छे लेखक खोजिये जिनकी लेखनी में ओज हो. ये बुझे तीर तो उबाऊ हैं.

  18. संजीव, क्या तुम नही जानते कि बाबा रामदेव के विषय मे जो कुछ भी चतुर्वेदी बोल रहा है वो सब झूठ है, झूठ ही नही सफेद झूठ। क्या तुम नही मानते कि बाबा रामदेव अपने योग शिविर मे आने वालों के स्वास्थ्य के प्रति निरपेक्ष रहते हैं यह एक घटिया आरोप है, कितनी बार चतुर्वेदी ने यह कैम्प मे भाग लिया है, घर बैठ कर यह कुछ भी लिखता है और तुम छाप देते हो। बाबा ने योग को किस प्रकार से व्यापार बना दिया? क्या उन्होने इसके पेटेन्ट के लिए आवेदन किया? क्या उन्होने कहा कि जो भी योग करेगा उसको बाबा से पहले अनुमति लेनी होगी, या उन्होने जिस योग से जनता डरती थी कि अगर गलत हो गया तो क्या होगा उसे इतना सुलभ बना दिया कि अब भारत की अधिसंख्य जनता अभय हो कर करती है? क्या किसी ज्ञान को फैलाना व्यापार है? कैसे बाबा के लिए योग व्यापारी शब्द को तुम सही ठहरा सकते हो? अगर नही तो कैसे उसे छापा?

    इसने लिखा है कि जो लोग खर्च कर सकते हैं वो प्रतिदिन योग कर सकते हैं, जो नही खर्च कर सकते हैं वो देख देख कर कुढते हैं क्या सम्पादक मुझे बताएंगे कि योग पर कितना खर्च होता है? मैं बचपन से विद्यालय से ही योग करता आ रहा हूँ, अब तक तो पैसे नही लगे कहीं, इसको किसने लूट लिया?

    इस वामपंथ के ढपोर्शंख को बाबा के पास संपत्ति तो दिखती है पर अपने नेताओं के पास की संपत्ति नही दिखती, कोइ पूछे इससे कि हर्किशन सिंह सुरजीत के बेटे की शादी के ५ करोड कहाँ से आए थे?

    RSS के उपर दोष लगाने वाले “हिन्दू धर्म में विचारों की खुली प्रतिस्पर्धा ती परंपरा रही है और यह परंपरा उन लोगों ने ड़ाली थी जो लोग कम से कम आरएसएस में कभी नहीं रहे।” से पूछो कि वह जिस वामपंथ की वकालत करता है उसके आकाओं ने वर्तमान नोबल पुरस्कार विजेता के साथ कैसा विचारों की खुली प्रतिस्पर्धा कर रहा है? क्या प्रवक्ता को इसमे कोइ तर्क नजर नही आता?

    प्रश्न यहाँ पर पक्ष अथवा विपक्ष का नही है, सफेद झूठ और उसको दिए जाने वाले स्थान का है। अगर इतना भी समझ नही है तो मीडिया का काम दो क्योंकि यह एक ऐसा औजार है जो समाज को बना भी सकता है और बिगाड भी पर अगर तुम सुपात्र नही हो तो बिगाडने का दोष अपने सर पर मत लो और दूर हो जाओ इस कार्य से। और अगर तिलक, गणेश शंकर विद्यार्थी जी के विरासत को आगे बढाना है तो विरोधी को स्थान दो झूठों को नहीं। इन दोनो मे फर्क करना सीखो।

  19. साफ़ नज़र आ रहा है की अधिकाँश पाठक डा. चतुर्वेदी जी के भातीयता विरोधी लेखों को प्रवक्ता.कॉम पर ज़रूरत से अधिक स्थान व मान दिए जाने को लोकतांत्रिक व सही नहीं मानते. डा. चतुवेदी जी का अतिवादी व कट्टरपंथी लेखन १-२ अपवादों को छोड़ कर किसी को भी नहीं भाता. करेला और nEEM चढा ” वे पाठकों के उठाये प्रश्नों का जवाब देने की सामान्य सभ्यता का पालसन करने की भी ज़रूरत नहीं समझते.” वही वामपंथी तानाशाही मानसिकता, केवल अपनी बात थोंपनी, मनवानी.
    – पंकज जी भी एक राष्ट्रवादी इमानदार लेखक व बुधीजीवी हैं. यदि उनकी कोई टिप्पणी अनुचित लगी हो तो क्या ही अछा होता कि इस पर दोनों विद्वान संपादकों में व्यक्तिगत संवाद होता. खैर ज़रूरी है कि बड़प्पन दिखाते हुए MAMUTAAW की गुंजाईश भूल कर भी न बने. वैसे पंकज जी की ‘पोस्ट’ बड़ी शालीन व तर्क सगत है, लेख जब रोष में लिखा जाएगा तो भाषा भी वैसी ही होनी थी.
    – डा. जगदीश्वर जी के वामपंथी कट्टरपन व एकांगी लेखों की भरमार सभी को प्रवक्ता.कॉम की छवि को लेकर परेशान कर रही थी. स्पष्टतः संतुलन समाप्त नज़र आ रहा था. विश्वास है कि प्रखर प्रतिभा के धनि सम्पादक संजीव सिन्हा जी सही स्थिति को समझ चुके होंगे. जो विश्वास और प्रतिष्ठा ये पत्रिका अर्जित कर चुकी है, हम ह्रदय से चाहते हैं कि उस पर डा. चतुर्वेदी जी जैसे प्रसंगों से आघात न लगे. पता नहीं सम्पादक महोदय की क्या मजबूरी रही ?
    – पंकज जी जैसे समानित सम्पादक, लेखक के सामान का भी उतना ही ध्यान रखा जाना चाहिए JITANAA कि संजीव जी का.
    – RAASTR WIRODHEE HAR SAMAY DARAAR DHUNDHTE RAHATE हैं. WE TODANE के WISHESHAGY हैं, KAHEEN हम UNAKE SHIKAAR न BAN JAAYEN, SAAWADHAAN.
    – प्रवक्ता,कॉम की TEEM व सभी MITRON, SAATHIYON को DEEPAAWALEE की HAARDIK SHUBHKAAMNAAYEN ..

  20. एक नया “बुखारी” पैदा कर रहा है “ूवक्ता” – by – पंकज झा (posted on ूवक्ता.कॉम ३०-१०-२०१०)

    ———- प्रश्न पंकज झा / लेख का शीर्षक झूठा है ———-

    “अभी हाल में िविभन्न साइटों पर बुखारी से संबंिधत लेख में एक लेखक ने अच्छा तथ्य उजागर िकया है. उसके अनुसार एक सामान्य से मुल्ला, बुखारी को ‘बुखारी’ बनाने का ौेय संघ पिरवार को है. आपातकाल के बाद नसबंदी के कारण मुिःलम, कांमेस से काफी नाराज थे. तब लेखक के अनुसार संघ समिथर्त राजनीितक दलों ने यह नारा लगाना शुरू िकया था. ‘अब्दल्ला बुखारी करेु पुकार, बदलो कांमेस की सरकार.’ यह सन्दभर् देते हए ुलेखक का कहना था िक मुिःलम तो कांमेस से तब नाराज़ थे ही अगर बुखारी का नारा नहीं लगवाया जाता तब भी चुनाव पिरणाम वही होने थे. लेिकन बुखारी की मदद लेकर संघ ने िबना मतलब उसको मुसलमानों का रहनुमा बना िदया. यही िनंकषर् ूवक्ता के बारे में भी िनकालते हए संपादक से यह कहना चाहँगा िक अगर वे िनंपक्षुू िदखने के चक्कर में देश को इतनी गाली नहीं भी िदलवाएंगे तो भी उनकी पठनीयता क़म नही होगी. ज़ािहर सी बात है िक जब आज वामपंथी अूासंिगक होते जा रहे हैं. संसद से लेकर सड़क तक, केरल के पंचायत से लेकर बंगाल के िनगम से जब ये गधे की िसंग की तरह गायब होते जा रहे हैं तो िकसी एक भड़ासी की क्या िबसात. तो िकसी एक अनजाने से चतुवेर्दी जी को इतना भाव दे कर जाने-अनजाने ूवक्ता एक नये बुखारी को ही जन्म दे रहा है. ये नए अब्दल्ला भी ताकतवरु हो कर सबसे पहले पऽकािरता के मुंह पर ही तमाचा मारेंगे. भंमासुर के किलयुगी संःकरणों ने खुद को असली राक्षस से ज्यादा ही खतरनाक सािबत िकया है. संपादक बेहतर जानते होंगे िक नया मुल्ला प्याज ज्यादे खाता है.”

    ———-

    ‘झूठ’ की बुिनयाद पर महल मत खड़ा कीिजए पंकजजी, अंजाम आप जानते हैं –by– संजीव कुमार िसन् हा संपादक, ूवक् ता डॉट कॉम (posted 31-10-2010)

    “और अंत में हां, आपका पूरा लेख ही ‘झूठ’ की बुिनयाद पर खड़ा है। आपके इितहास ज्ञान पर तरस ही खाया जा सकता है। पहले भारत के राजनीितक इितहास का अध् ययन कीिजए तब जाकर रा.ः व.संघ पर िटप् पणी कीिजए। संघ समिथर्त दल ने कभी ‘अब्दल्ला ुबुखारी करे पुकार, बदलो कांमेस की सरकार’ जैसे नारे नहीं लगाए। दसरों की अफवाह पर ू
    आपने एक पूरा लेख िलख डाला। आपको जानकारी नहीं थी तो िकसी संघ के जानकार बुिद्धजीवी से इसकी सत् यता परख लेते। और देिखए, सच के सामने आते ही झूठ की बुिनयाद पर खड़ा आपका यह लेख भरभरा कर ढह रहा है। “

    ———-

    पंकज कुमार झा (posted 31-10-2010)
    “ …..अफसोसनाक है िक आप बुखारी के संबंध में मुझ पर झूठा होने का आरोप लगा रहे हैं. मैंने यह कही नहीं िलखा िक संघ के नेताओं को मैंने बुखारी का नारा लगाते हए ुअपने कानों से सुना था. िजस लेख का मैंने सन्दभर् िदया है वह आपने पढ़ा होगा. अगर नहीं पढ़ा हो तो मैं आपको कई ऐसे िलंक दे दंगाू …..”

  21. संजीव जी , थोड़ा गुस्सा कम कीजिए , नाराजगी का कारन हो सकता है लेकिन संपादक होने के नाते आपसे नरम शब्दों की अपेक्षा रहती है |

  22. प्रवक्ता.कॉम पर अब तक के आलेखों में यह सर्वश्रेष्ठ आलेख है. श्री संजीव सिन्हा जी आप को किसी भी तरह से पदच्युत नहीं किया जा सकता. आपको अपने जीवन की सबसे बेहतर उपलब्धियों में इस परिष्कृत सोच को भी शुमार करने की अपेक्षा करता हूँ. लोकतंत्र, विचारधारा, अभिव्‍यक्ति की स्वतंत्रता तथा निष्पक्षता के लिए आप आदर्श रूप में अभिनंदनीय हैं.

  23. १) “…संजीव जी आप से अपना व्यवहार हर हाल में सौम्य रखने की उम्मीद की जाती है. आपको उत्तेजित होने से बचना चाहिए. आप युवा, उर्जावान और उत्साही हैं इसलिए आप से आशा करता हूँ की आप अपनी उर्जा देश में प्रवक्ता के माध्यम से समाज में फैले अज्ञानता दूर करेंगे.…”
    शिशिर चन्द्रा से सहमत…

    २) “…खैर अब समय आ गया है कि क्म्युनिस्ट वैचारिक द्रोहियो को जवाब मिलने लगा है, इसीलिये मिर्ची लग रही है. आप अपने वैचारिक संतुलन की कसरत जारी रखिये…लेकिन हिन्दुवादी, संघी, और भारतीयता के प्रेमी भी अपनी कसरत जारी रखेंगे. हिन्दुवादी भी मैदान मे आ गये है..”
    अनिल सौमित्र जी से पूर्ण सहमति…

    ३) “…पंकज झा के लेख पर आपकी प्रतिक्रिया आवश्यकता से अधिक सख्त है…”
    प्रेम सिल्ही जी से पूर्ण सहमति…

    ४) “…जिस तरिके से धडाधडा इक के बाद एक जो लेख प्रकाशित हो रहे है उससे ये बाद साबित होति जा रही है कि ये कुछ लोगो का”प्रोफ़ेशन” ही है…”
    अभिषेक से सहमत…

    भाई संजीव जी, यह तो संघ वालों की सदाशयता (या मूर्खता) ही है कि वे अपने मंच से भी वामपंथियों को महिमामण्डित होने का मौका देते हैं… (नामवर सिंह के सम्मान जैसे कई उदाहरण कई दे सकता हूं), मुझे ऐसे उदाहरण दिखाईये जहाँ वामपंथी मंच पर किसी राष्ट्रवादी को सम्मान दिया गया हो…

    जैसा कि अभिषेक ने कहा है, हिन्दुत्व, भारतीय संस्कृति को गरियाना-लतियाना इनका “प्रोफ़ेशन” है, इसके लिये इन्हें या तो बाकायदा भुगतान किया जाता है, या तो कोई पद दिया जाता है, या पुरस्कार-वुरस्कार जैसा कोई लालीपाप लगातार दिया जाता है… दूसरी तरफ़ हिन्दुत्ववादी लेखकों को अव्वल तो अखबारों में जगह ही नहीं मिलती (क्योंकि वहाँ वाम बौद्धिकों का कब्जा है और हिन्दुत्व की बात करने वाले को हिकारत की निगाह से देखा जाता है), संघ-भाजपा से पैसा मिलना तो बहुत दूर की बात है…। फ़िर भी चतुर्वेदी जी को आप “जरुरत से ज्यादा” जगह दे रहे हैं यह आपकी “पोलिटिकल करेक्टनेस” कही जा सकती है… परन्तु अब हिन्दुत्ववादियों की आवाज़ दबाई नहीं जा सकती है…

    वामपंथी अभी भी इसी मुगालते मे हैं कि उन्होंने विश्वविद्यालयों, अकादमियों और संस्थानों में अपने “पेड बौद्धिकों” द्वारा अतिक्रमण कर रखा है तो जनता उन्हीं की सुनेगी… हाँ बिके हुए अखबार और भाण्डनुमा चैनल इन्हें अपने पैनल में बुला-बुलाकर जरुर इन्हें इनकी औकात से अधिक महिमामण्डित करेंगे…

    मुझे भी लगता है कि पंकज जी के प्रति आपकी प्रतिक्रिया उत्तेजना के आधिक्य में कठोर हो गई है… चतुर्वेदी जी जैसे “एकालाप” करने वालों को आपने आवश्यकता से अधिक महत्व दे दिया है…

    और कतई जरुरी नहीं है कि एक “आम आदमी” अपनी प्रतिक्रिया अथवा विचार, विवेकानन्द या अरविन्दो की भाषा में ही व्यक्त करे…

  24. संजीव जी
    लोकतंत्र ठीक है लेकिन लोकतंत्र तभी तक ठीक है जब दोनों पक्ष आमने सामने की लड़ाई लादे, चतुर्वेदी महाराज तो अपना राग ही आलाप रहे है, वामपंथियों की वास्तविकता यही है, छुप कर वार करना, जिस लोकतंत्र की आप बात कर रहे है उसने कश्मीर को उग्रवाद के हवाले कर दिया है, कश्मीर में जायेंगे तो पोल खुल जायेगी, इसी लोकतंत्र के बिहार का किया हाल किया है हम सभी जानते है, वामपंथियों ने पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र का कथित दुरूपयोग करके ही आज माओवादी के हाथ का खिलौना बना दिया है, संस्कृतिक राष्ट्रवाद का नारा लगाने वाली भाजपा ने भी लोकतंत्र के कारण अयोध्या का राजनीतिकरण कर दिया है जिसकी वजह से हिन्दू संगठनो से विश्वास घटा, ऐसे अनेको उदहारण है.
    लोकतंत्र वाही लागू होता है जहाँ दूर्सरा भी लोकतंत्र को माने, चंतुर्वेदी महाराज अपनी बकवास सुनाये जा रहे है, उनकी बकवास पर जो प्रश्न खड़े हो रहे उनका वह जवाब भी नहीं देते, और आप इसे लोकतंत्र का नाम देकर कबड्डी कबड्डी खेल कर अपना ही सर फोड़ रहे हे

  25. प्रिय संजीव जी
    एक सम्पादक होने के बावजूद आपकी भाषा इतनी तल्ख है,फिर आप यह अपेक्षा क्योँ करते हैँ कि लेखक अपने दायरे मेँ रह कर लिखेगा? जरा चतुर्वेदी जी की भाषा शैली पर गौर फरमाईयेगा।लेखक किसी का पुच्छला नहीँ होता और हिन्दू बौद्धिक जगत कहीँ भी विचारशून्य नहीँ हो रहा। क्या आपका यह मंच मेरे जैसे लेखकोँ के विचारोँ की गर्मी झेलने को तैयार है?

  26. ऐसा होता आया है कि मीडिया हिन्‍दुत्‍व को गाली देता है और तथाकथित देश के धर्म निरपेक्ष दल हिन्‍दुत्‍व को गाली देने में अपनी शान समझते हैं और बड़े फक्र से धर्म निरपेक्ष कहलाकर गौर्वान्वित महसूस करते हैं प्रवक्‍ता डॉट काम भी ऐसे ही दिशा में चल दिया है आपने दिनेश गौर का लेख “आज़ाद भारत” क्यों नहीं छापा उस समय आपकी तटस्‍थता कहां गयी थी वैसे भी इस मुददे पर बहस चलाना फिजूल समझता हूं क्‍यों गौर की बात सच है कि बहस तो सरदार पटेल पर चलना चाहिये थाा

  27. सभी व्यक्ति के किसी भी लोग या विषय के बारे में अलग अलग विचार हो सकते हैं, हमें उनका तिरस्कार केवल इसलिए नहीं कर देना चाहिए की उनसे हमारे विचार नहीं मिलते, हम इसको इस तरह समझ सकते हैं, भारत बहुत बड़ा देश है, उससे भी बरी बात है यहाँ कई संप्रदाय, कई भाषाए, कई जाति, बहुत-सी विचारधाराएँ, प्रवाहित हो रही हैं, इक चीज जहाँ उचित होती है दूसरी जगह गलत हो जाति है, लेकिन इन सबसे ऊपर राष्ट्र है, हमें सभी चीजों के तह तक जाना चाहिए, चतुर्वेदी के अन्दर सबसे बरी कमी ये बंद दरवाजे की पीछे से बाते करते हैं उन्हें सभी लोगो को जबाब देने चाहिए वे किस कारन ऐसा सोचते हैं, उन्हें कूपमंदुकता से बहार आना कहिये,
    जहाँ तक प्रवक्ता की बात है, वे बहुत ही अच्छा कर रहा है की सभी पछ की बात रख रहा है, वर्तमान समय बहुत बहुत कम ऐसे लोग हैं, जो ऐसा कर रहे हैं, सभी क्षेत्रो में ऐसे लोगो की कमी हैं

  28. सभी व्यक्ति के किसी भी लोग या विषय के बारे में अलग अलग विचार हो सकते हैं, हमें उनका तिरस्कार केवल इसलिए नहीं कर देना चाहिए की उनसे हमारे विचार नहीं मिलते, हम इसको इस तरह समझ सकते हैं, भारत बहुत बड़ा देश है, उससे भी बरी बात है यहाँ कई संप्रदाय, कई भाषाए, कई जाति, बहुत-सी विचारधाराएँ, प्रवाहित हो रही हैं, इक चीज जहाँ उचित होती है दूसरी जगह गलत हो जाति है, लेकिन इन सबसे ऊपर राष्ट्र है, हमें सभी चीजों के तह तक जाना चाहिए, चतुर्वेदी के अन्दर सबसे बरी कमी ये बंद दरवाजे की पीछे से बाते करते हैं उन्हें सभी लोगो को जबाब देने चाहिए वे किस कारन ऐसा सोचते हैं, उन्हें कूपमंदुकता से बहार आना कहिये

  29. पंकज झा के लेख पर आपकी प्रतिक्रिया आवश्यकता से अधिक सख्त है| मेरे विचार में आपके लेख में प्रस्तुत मुख्य अंश प्रवक्ता.कॉम की नीति व्यक्त करने में पर्याप्त था| यदि संपादक के नाते आपको पंकज झा के लेख की झूठी बुनियाद दिखाई दे गई है तो आप को जगदीश्वर चतुर्वेदी के बाबा रामदेव-श्रृंखला के अंतर्गत कीचड उछालते नित नए लेख अपलोड करने के पीछे उनका अच्छा या बुरा उद्देश्य भी समझ आ गया होगा| उनके लेखों पर भी अपने विचार लिख डालिये|

  30. संजीव जी आपने तो हमको लोकतान्त्रिक मर्यादा का पथ पढ़ा दिया. ? सच का आरोप आपको भी बर्दास्त नहीं हुआ इसका मतलब आपकी लेखनी भी न्श्पक्षा नहीं… वो भी तमाम न्यूज़ चेनलों की तरह बिकने लगी हे इस पर थोडा दुःख होता हे .. जरा अपने दिल पर हाथ रख कर कहिये क्या आज के युवाओं को देशभक्ति का पथ छोड़ कर वाम भक्ति का पथ सीखना चाहिए… आपने पंकज जी को तो समझा दिया और उनके लेखो का श्पस्तीकरण भी दे दिया… पर जरा उन महाशय जी से कहिये जो अनर्गल लिखे जा रहे हें… कम से कम बहुमत के आधार पर तो देखिये उनके लेखों की क्या हेसियत हे … इस प्रकार का वर्णन आपको शोभा नहीं देता … आप भी जरा एक भारतीय होने के नाते सोचिये न की वामपंथी.. नहीं तो आपकी इस साईट को भी बिकाऊ माना जायेगा…

  31. मै हैरान हु के शबद कब बदलील से बेदलिल बन जाते है. यहाँ पर देश बकती का बहुत लोगों ने ठेका ले रखा है. 100 VICHAROn KO BHIDNE DENA CHAHIE AUR 100 PHooLOn KO KHILNE DENA CHAHIE. कोमुनिस्ट कोई ग़दर नहीं होता और लाठी के साथ शब्दों को हांकने वाले देश भक्त नहीं होते.

  32. ****चतुर्वेदी जी पाठकों के, प्रश्नों के उत्तर क्यों नहीं देते? कोई उत्तर है? कि अपने लेखोंका नंबर बढाने में लगे होते हैं? या पाठक को नगण्य मानते हैं? क्या, यह पाठकों का अपमान करना चाहते हैं? कुछ कठोर सोदेश्य कहा है।*****
    प्रवक्ता के संपादक की भूमिका निष्पक्ष होनी चाहिए, यह मुझे स्वीकार है। संपादक की भूमिका सर्वाधिक कठिन हुआ करती है।यह आगे भी अपेक्षित है।प्रवक्ता के विकासका लक्षण है, इस लिए, अभिनंदन भी आपका ही करता हूं।
    परंतु, मेरा,और अन्य पाठकों का अनुभव (कुछ अपवादों को छोडकर), यही है, कि चतुर्वेदी जी प्रश्नोंके उत्तर देते नहीं है। {अन्य पाठक मुझ से असहमत हो, तो कृपया बताइए।}
    यदि प्रवक्ता “स्वस्थ बहस” को अपनी विशेषता समझता है, तो कमसे कम हर लेखक से “स्वस्थ बहस” के लिए कुछ प्रतिक्रिया या सामुहिक “निष्कर्ष” जो सभीके मतोंका सार हो, अपेक्षित है, होना चाहिए।
    उसके लिए चतुर्वेदी जी को पूर्वावश्यकता (प्रि-रिक्विज़िट) के रूपमें समझाया जाए।
    पंकज जी ने(स्मरण अनुसार) सदा प्रश्नोपर प्रतिक्रियाएं दी है। कभी कभी अनेक प्रश्नोंको एक ही टिप्पणी में उत्तर दिया है।और हर पाठकका सम्मान किया है।पंकज जी ने “राहुल गांधी” के विषय में स्वेच्छासे अपना मत बदलते हुए भी भिन्न मत वाला लेख लिखा था। बताता है, कि उनकी आत्मा की आवाज़ पर वे लिखते हैं।
    चतुर्वेदी जी ने पाठकको उत्तर देने योग्य भी नहीं समझकर अपमानित किया है।
    मुझे यह भी ज्ञात है, कि हरेक लेखक एक मानव ही है, कुछ मानवीय भूलें क्षम्य है।
    ॥वादे वादे जायते(शास्त्र) सत्य बोधः॥ स्वस्थ बहस होनी चाहिए।

  33. आदरणीय संजीव जी आपके द्वारा शुरू की गयी इस बहस से सबका ध्यान यहाँ खींचा चला आया और इस बहस में हम यह भी भूल गए कि आज हमारे देश को जोड़कर एक करने वाले लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल के जन्म दिवस कि १३५वी वर्षगाँठ है| बेहतर होता कि हम उन पर कुछ चर्चा करते| इससे प्रवक्ता का मान ही बढ़ता| किन्तु अपने मान अपमान की चिंता में अब इस बहस में फंसकर रह गए और उस महान हस्ती को भूल गए जो हमें जोड़ कर एक कर गए किन्तु हम आज भी आपस में ही लड़ रहे हैं|

  34. मीडिया में अन्दर घुसने के लिये पहचान बनाने के लिये वामपंथीयो की चरण वन्दना अनिवार्य तत्व है . और प्रवक्ता उसे अपना रहा है . संजीव जी की पार्टी भी तो दो मुअसल्मानो को सिर पर उठाये हुये अपने को हिन्दूवादी कहलाने पर गर्व करती है

  35. आदरणीय संजीव जी…नमस्कार…आपने कहा की चतुर्वेदी ने लोकतांत्रिक दायरे में रहकर अपने विचार व्यक्त किये हैं| मै इस बात पर आपसे सहमत नहीं हूँ| अगर यह लोकतांत्रिक तरीका होता तो एक दो लेखों से बात समझा कर कहानी ख़त्म कर सकते थे, किन्तु एक सीरीज लॉन्च कर देना केवल चतुर्वेदी जी का दिमागी दिवालियापन ही है| पहले अयोध्या निर्णय के बाद देश में शान्ति स्थापित करने का समय था, किन्तु चतुर्वेदी जी ने जिस प्रकार ज़हर उगला है साम्प्रदायिक तो उन्हें कहना चाहिए| उस समय भी इन्होने एक सीरीज आपके द्वारा लॉन्च की थी| आपकी व् प्रवक्ता की राष्ट्रभक्ति पर हमें कोई शंका नहीं है| किन्तु यदि कोई नया पाठक उस समय प्रवक्ता की ओर रुख करके देखता तो उसे प्रवक्ता एक ऐसा मंच नज़र आता जो कि हिन्दू विरोधी प्रचार कर रहा है| उसके बाद बाबा रामदेव पर एक सीरीज लॉन्च कर डाली| अपनी बात रखना अच्छी बात है| किन्तु एक के बाद एक लेख में ज़हर उगलने के बाद किसी भी हालत में इसे लोकतांत्रिक दायरा तो नहीं कहा जा सकता| पाठकों ने भी इन्हें दो टूक जवाब देना शुरू कर दिया था| तब बौखलाए चतुर्वेदी ने अरुंधती को ही राष्ट्रद्रोही मानने से इनकार कर दिया| यदि किसी भी प्रकार के विचार रखने की स्वतंत्रता आप लेखक को देते हैं तो लिखने के लिए बहुत कुछ ऐसा है जो आप प्रवक्ता पर छापने की गलती भी नहीं करेंगे| और यदि स्वतंत्रता आप देते हैं तो क्षमा करें यह बोलने के लिए लेकिन आपने मेरा वह लेख “आज़ाद भारत” क्यों नहीं छापा जिसमे मैंने नेहरु के विरोध में लिखा था| वह भी तो लोकतांत्रिक दायरे के अंतर्गत ही आना चाहिए था| मैंने कोई बदतमीजी से उसमे कुछ नहीं लिखा था| सब कुछ सभ्यता के दायरे में रहकर ही लिखा था| खैर मुझे कोई फर्क नहीं पड़ा किन्तु जब चतुर्वेदी को यहाँ चिंघाड़ते देखा तो कहीं ऐसा लगा कि इससे तो मेरा लेख हज़ार गुना लोकतांत्रिक था|
    चतुर्वेदी का लोकतांत्रिक दायरा उसी समय ख़त्म हो गया था जब सभी पाठकों की भावनाओं को आहत करके उन्होंने हमारे पूजनीय स्वामी रामदेव के विरोध में अपनी सीरीज लॉन्च की थी| और आज चतुर्वेदी जी सफल भी हो गए| आप और पंकज भाई जैसी दो राष्ट्रवादी हस्तियों को आपस में उलझता देख वह तो मन ही मन लड्डू फोड़ रहे होंगे| आपने गौर किया होगा कि आपका लेख छापते ही किस प्रकार डॉ. मीणा जी ने बड़े ही उत्साह के साथ आपको शाबाशी दे डाली| पंकज जी से यदि कोई गलती हुई है तो उन्हें आप उनकी गलती का एहसास आसानी से करवा सकते थे| किन्तु आपके द्वारा इतनी कठोर भाषा उपयोग में ली गयी जिसे सहन करना कठिन है|
    आदरणीय संजीव जी हमें आपसे कोई शिकायत नहीं है, न ही आप पर व प्रवक्ता पर किसी प्रकार की कोई शंका है| आप हैं तो प्रवक्ता है और प्रवक्ता है तो हम जैसों का यहाँ अस्तित्व है| मै तो बस इतना ही कहना चाहता हूँ कि समय मिल कर राष्ट्र द्रोहियों को मूंह तोड़ जवाब देने का है न कि खुद ही आपस में उलझने का|
    क्षमा करें संजीव जी किन्तु इस जगह मेरा पक्ष आदरणीय पंकज जी की ओर है|
    आशा है मेरी कोई भी बात आपको बुरी न लगी हो| हम आपका बहुत सम्मान करते हैं इस लिये यदि कुछ बुरा लगा हो तो क्षमा प्रार्थी हूँ|
    धन्यवाद|

  36. आदरणिय सम्पादक जी,
    नम्स्कार.
    आपने अतिव सुन्दर एवं बहुत ही अच्छा कार्य शरु किया है,हम सब इअसके समर्थक है तभी तो सभी बन्धु अपने अत्यधिक व्यस्त समय में से कुछ समय निकाल कर यहा पर लिखने आते है,लेकिन आप विचार करिये जिस तरिके से कुछ विषेश विचारधारा को मानने वाले लोग जिस तरिके की भाषा का प्रयोग कर संघ-हिन्दु-व विषेश जाती को गालीया बकने में ही अपना विचार मानते है और आप भी अनाव्शय रुप से बहुत ज्यादा उनको प्रकाशित करते है उससे संशय होना स्वाभाविक ही है,सहाब एसा है हम लोगॊ का यह “प्रोफ़ेशन” नही है कि हम हर व्यक्ति को बार बार “रिपलायी” कर कर उसके महत्व को बढाये,ना हमारे पास इतना समय है,एक की विचार को एक ही आदमी दवारा एक की प्रकार के खोल में परोस पअरोस कर विअचारिक भर्म का निर्माण करने की जो कोशिश हमारे वामपंथी बन्धु करते है उसको बहुत ज्यादा बडावा देकर क्या आप गलती नही कर रहे है??निश्चित रुप से उनको अपने मत रखने का अधिकार है,पर किसी गालिया बकने का नही,वो अपनी विचार्धारा रखे हम अपनी,लेकिन कोयी हमें “फ़ासीवादी कहे.कोयी ब्राह्म्ण्वादी से नवाजे” ओर बदले मे हम्से ही अपेक्षा करे गालिया सुनते रहे और तर्क करने पर केस करने की धमकी देवे और आप उसे प्रकाशित भी करे,तो सहाब एसा अपनी इज्जत सब्को प्यारी होती है,संघ जो हिन्दु को भारत को गाली बकना हम खुद को कहना मानते है,और हमें वापस तर्क करने का अधिकार है ना केवल अधिकार बल्कि वाप्स उसी भाषा मे भी बोलने का अधिकार है।
    जिस तरिके से धडाधडा इक के बाद एक जो लेख प्रकाशित हो रहे है उससे ये बाद साबित होति जा रही है कि ये कुछ लोगो का”प्रोफ़ेशन” ही है रही बाद विवेकानन्द जैसो के तर्क की तो विवेकानण्द को त्र्क की जरुरत नही है उसकी उपस्तिथि ही पर्याप्त होती है,”गाली गलोच” की भाशा को आप तर्क मानते है,केवल केवल आरोप लगना को त्र्क मानते है गध्दारो का महिमा मंडन आप तर्क मानते है जातिवाद को फ़ैलाना तर्क मानते है तो हमारि आप से थोडि मत भिन्नता है,लिकिन उसके बाद भी अपना प्रेम बना रहे यहि शुभकामना है……………………क्योकि आप सही काम कर रहे है,हमें पता तो चला की वाकिये मए “कम्युनिस्ट” कितने काले होते है अंदर से……………

    धन्यवाद:

  37. @श्रीराम तिवारी जी ये संघी ही है जो विरोधियों का सम्मान पाने के लिए अपने लोगों से ही झगडा मोल ले लेते है ऐसी परंपरा वामपंथियों में नहीं मिलेगी प्रवक्ता से किसी को कोई परेशानी नहीं लेकिन केवल एक ही लेखक को जरुरत से ज्यादा महत्व देना समझ नहीं आता

  38. मैं वामपंथी ग्रंथि से ग्रस्त जगदीश्वर जैसे आदमी के लिए बहस में अपना कीमती समय बर्बाद नहीं कर सकता। ये व्यक्ति सिर्फ एकतरफा लिखता है और उसके लेख पर दिए किसी कमेन्ट का यह कभी जबाब नहीं देता, तो बहस का कोई फायदा ही नहीं। जहाँ तक पंकज द्वारा प्रवक्ता.कॉम पर सवाल उठाये गए है उसके बारे में आप द्वारा लिखी पोस्ट पर पंकज को अपनी सफाई जरुर देनी चाहिए।

    जगदीश्वर के लेखों को मैं सिर्फ वामपंथी उल्टी से ज्यादा कुछ नहीं समझता।

  39. प्रवक्‍ता डॉट कॉम लोकप्रियता की ओर अग्रसर है। इस पर सभी विचारधारा के लोगों को प्रकाशित किया जाता है। चूंकि इसकी पृष्‍ठभूमि संघ परिवार से जुड़ी है अतएव यह स्‍वाभाविक ही है कि इसकी पक्षधरता तथाकथित हिंदूवादियों की ओर ज्‍यादा है किन्‍तु 19-20 के अंतर से अन्‍य विचारधारा जैसे कि वामपंथ, मुस्लिम, दलित और नारी-विमर्श को भी इसमें स्‍थान दिया जाता है।

  40. क्या किसी मानसिक कुष्ट रोगी को आप अपने मंच पर इसी प्रकार अहमियत देते रहेंगे . एक सेकुलर शैतान को अपने मंच पर अनाप शनाप बक बक की आज्ञा दे कर आप ‘प्रवक्ता’ की मर्यादा का ही उलंघन कर रहे हो जी. … उतिष्ठकौन्तेय

  41. संजीव जी, आपकी सम्पादकीय प्रतिक्रिया और और उसपर आदरणीय पुरुषोत्तम मीणा जी की शाबाशी काबिले तारीफ है. एक मीडिया एक्टीविस्ट के नाते प्रवक्ता के नये रुप से मुझे भी बहुत कुछ सीखने को मिल रहा है. अखबार, पत्रिका, न्यूज चैनल ही नही वेबसाइट चलाने के लिये कई प्रकार के हथकंडे अपनाने पडते है उसमे से एक यह भी कि लोकतंत्र, सविधान, अभिव्यक्ति की आजादी और ऎसे ही जुमलो के आधार पर “अनचाहे” लेखको और विचारो को भी जगह दी जाये. अपने बगिया के सौन्दर्य के लिये कुछ कैक्टस और अमरबेल भी लगाना होता है.
    कुछ जुमलो का सहारा लेकर कुछ लोग कुछ भी लिखे, उसपर कुछ भी न कहा जाये ? कोई कुछ कहे तो उसे कुतर्की, झूठा, तालिबानी और फासीवादी बता दिया जाये.
    जगदीश्वर जी ने क्या किया अपने लेखकीय कौशल से अरुधति का समर्थन किया, मुसलमानो से प्रेम और हिदुत्ववादियो का गालिया दी. आप भी सोचिये दयानंद सरस्‍वती, विवेकानंद, अरविंदो है तो लेकिन मीडिया के पक्षपात और वैचारिक संतुलन की कसरत मे वे दबे -छुपे ही क्यो है ? आपने भी अपने एक लेखक के बारे मे लिखा – जगदीश्‍वरजी ने लोकतांत्रिक दायरे में रहकर अपने विचार व्‍यक्‍त लेकिन पंकज जी को थूकना छोडने की सलाह दे दी…गजब की सम्पादकीय सलाह है !
    खैर अब समय आ गया है कि क्म्युनिस्ट वैचारिक द्रोहियो को जवाब मिलने लगा है, इसीलिये मिर्ची लग रही है. आप अपने वैचारिक संतुलन की कसरत जारी रखिये…लेकिन हिन्दुवादी, संघी, और भारतीयता के प्रेमी भी अपनी कसरत जारी रखेंगे. हिन्दुवादी भी मैदान मे आ गये है..जगदीश्वर जी से कहिये वे भी मैदान मे बने रहे.

  42. माननीय सम्पादकजी
    प्रवक्ता पर चतुर्वेदीजी के लेखों की बाढ़ पर मुझे भी आपत्ति है . प्रवक्ता डोट कॉम के दो वर्ष पूरे होने पर आपके लेख पर टिपण्णी करते हुए मैंने प्रश्न किया था की क्या एक राष्ट्रविरोधी विचारधारा के प्रतिपादन को प्रवक्ता में इतना अधिक स्थान दिया जाना उचित है? प्रवक्ता की नीति निर्धारण करना आपका और केवल आपका अधिकार है पर एक पाठक होने के नाते यह मेरा कर्त्तव्य है की मुझे यदि यह लगे की आप अपने घोषित लक्ष्य से भटक रहे हैं तो आप का ध्यान आकर्षित करूँ. वैसे तो पूर्व घोषित आदर्शों को बदल देना भी पूर्णतया आपका अधिकार है मुझे ऐसा लगा था की राष्ट्रीय सूचना तंत्र जो पूर्णतया दूषित हो चुका है प्रवक्ता उस से अलग रह कर राष्ट्रीय हितों पर गंभीर विचार विमर्श के मंच के रूप में उभर रहा है. यदि यहाँ भी छद्म सेकुलरिस्टों अथवा उनके सहयोगिओं का प्रभुत्व हो जाए तो आश्चर्य की कोई बात नहीं. कुछ लोगों को खेद अवश्य होगा पर जब चहुँ ओर शोचनीय दृश्य ही प्रकट हों तो क्या किया जा सकता है
    “एक तर्ज़े तगाफुल है सो वो उनको मुबारक
    एक अर्जे तमन्ना है सो हम करते रहेंगे”

  43. नमस्कार संजीव जी.
    धन्यवाद आपकी प्रतिक्रिया के लिए. अगर मेरे उठाये तमाम सवालों का आपने यही निष्कर्ष निकाला है तो यही सही. वास्तव में मैं स्वामी विवेकानंद या दयायानंद सरस्वती नहीं हूँ, न ही ऐसा होने का कभी दावा किया जा सकता है. चतुर्वेदी जी पर लिखे अपने पहले लेख में खुले दिमाग और बड़े मन से मैंने पंडित जी को हिंदू संस्कृति में वर्णित तमाम ऐसे गुरुओं से तुलना की थी जो पूज्य तो हैं लेकिन जिनके सरोकारों पर सवाल उठाये जाते रहे हैं.
    अब अगर आपके साईट पर सवाल उठाया जाएगा तो आपका बौखलाना लाजमी ही है. लेकिन भला मैं क्यू बौखलाने लगा? मेरी कोई भैस तो खोल के ले नहीं गए थे चतुर्वेदी जी जो मैं बौखलाता. रही बात विमर्श की परंपरा की तो शायद आप इस अभिमान में आ गए हैं कि लोकतांत्रिक विमर्श करना केवल आप या आपकी साईट ही जानता है. ऐसा बिलकुल नहीं है संजीव जी. आप पर मैंने जो सवाल उठाये हैं, उससे आप बड़ी कुशलता से कन्नी काट गए. मैंने यह सवाल उठाये थे कि विमर्श अपनी जगह, लेकिन कोई ऐसी साईट का नाम बता दें जहां अकारण एक ही लेखक के बाबा रामदेव पर एक ही सप्ताह में इतने लेखों को जगह दी गयी हो.
    यही सवाल अयोध्या वाले मामले पर भी था और अन्य मामले पर भी. कितना अफसोसनाक है कि आप बुखारी के संबंध में मुझ पर झूठा होने का आरोप लगा रहे हैं. मैंने यह कही नहीं लिखा कि संघ के नेताओं को मैंने बुखारी का नारा लगाते हुए अपने कानों से सुना था. जिस लेख का मैंने सन्दर्भ दिया है वह आपने पढ़ा होगा. अगर नहीं पढ़ा हो तो मैं आपको कई ऐसे लिंक दे दूंगा.
    चुकी मैंने आक्रमण आप पर भी किया है तो आपका आक्रोश स्वाभाविक है. अतः हम आपसे सही निष्कर्ष की उम्मीद नहीं कर सकते. इस बहस में कौन सही है कौन गलत इसका फैसला प्रवक्ता के प्रबुद्ध पाठक गण ही कर सकते हैं. अभी तक जो भी टिप्पणियाँ इस सम्बन्ध में मिली है वह तो मेरा उत्साह बढाता सा प्रतीत हो रहा है. बाकी आप बुद्धिमान हैं…आपको धन्यवाद…..सादर.
    -पंकज कुमार झा.

  44. आदरनीय सिन्हा जी,
    आपका लेख पढ़ कर अच्छा लगा की कहीं न कहीं आप भी मौजूद हैं! मेरे सवाल का उत्तर मिल जाए तो मैं और मेरे जैसे अज्ञानी टिप्पणीकारों की जिज्ञासा का शमन हो सकेगा:
    क्या चतुर्वेदी जी ने जो लेख लिखे आप उस से पूरी तरह सहमत हैं?

  45. संजीव जी ऐसा लगता है की बौखला आप गए है लोकतंत्र का मतलब सभी लेखको को बराबर का मौका देना है आप अपने आखों की पट्टी हटायेंगे तो पाएंगे कि प्रवक्ता मतलब जगदीश्वर हो गया है पंकज जी की वैयक्तिक आलोचना तो आपको दिखाई दी लेकिन भागवत जी की आलोचना और रामदेव जी की बेहद व्यक्तिगत और तर्कहीन आलोचना आपको दिखाई नहीं देती और एक ही व्यक्ति के विरोध में इतने सारे लेखों का प्रकाशन क्या साबित करता है क्या स्वामी रामदेव जी इस मंच पर अपने ऊपर लगे आरोपों का जवाब देने के लिए प्रस्तुत है जब तक बात संघ से जुडी थी हमने भी उसे विचारधारात्मक विरोध माना था लेकिन उसके बाद अयोध्या फैसले का कुतार्किक विरोध हम अज्ञानी हो सकते है लेकिन क्या माननीय जज भी अज्ञानी है इसके बाद अरुंधती का समर्थन और फिर स्वामी रामदेव का चीर-हरण किसी विषय पर एक दो लेख हो तो बात समझ आती है लेकिन लेखो की पूरी श्रृंखला और उसका प्रवक्ता पर प्रकाशन क्या साबित करता है क्योंकि आप भी जानते है कि स्वामी रामदेव एक बिकाऊ ब्रांड है तो क्यों न अपनी भी तिजोरी भर ली जाये
    अब आपने शुरुआत कर ही दी है तो आपने प्रिय पाठकों कि प्रतिक्रियां का भी इन्तेजार कीजियेगा आपको अपनी गलती का अहसास जरूर हो जायेगा
    शुभकामनाये

  46. मेरे ख्याल से भ्रष्ट नेताओं के बारे में लिखते वक्त किसी लेखनी की मर्यादा की पालन करने की जरूरत नहीं है …इन सालों ने पूरी इंसानियत को जानवर में बदलने का जघन्य अपराध का काम किया है….लेकिन किसी ब्लोगर या पत्रकार की किसी अभिव्यक्ति को तर्कों से सही या गलत साबित किया जाय तो ठीक रहेगा ..क्योकि ज्यादातर पत्रकार और ब्लोगर अगर किसी के पक्ष या विपक्ष में बिना सत्य आधारित तथ्यों के लिख रहें हैं तो ये उनकी जीने की मजबूरी भी हो सकती है..इन साले भ्रष्ट नेताओं की तरह एय्यासी के लिए देश और समाज के प्रति गद्दारी नहीं …वैसे हम सबको अब एकजुट होकर सिर्फ अपने लेखनी में इन साले भ्रष्ट नेताओं के करतूतों को ही मुद्दा बनाकर जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास करना चाहिए क्योकि इससे बड़ा मुद्दा आज कोई है ही नहीं …

  47. मैंने पंकज जी को कोई अनजान सा लेखक समझ बैठा था. मैंने तो उनकी पूरी लेख ही पढ़ी है. पंकज जी निस्संदेह एक सुलझे हुए और बुद्धिजीवी व्यक्ति हैं. उनकी लेखों पर इतनी हलकी टिपण्णी की अपेक्षा नहीं थी. (प्रवक्ता के संपादक द्वारा). खैर, संपादक ने नोटिस नहीं किया लगता है कि चतुर्वेदी कि लेखों को लगभग सभी ने एक स्वर में नकारा है, लेख निचले स्तर का है और वामपंथी दुराग्रह से पूर्णतया प्रेरित है. सभी लेखों में वामपंथी यूटोपिया हासिल करने कि हसरत नजर आती है. चतुर्वेदी के बचाव के लिए संपादक को आगे आने कि जरुरत नहीं थी. इसको अपने आप होने देना था.

  48. संजीव जी, याद है की आपने कहा था की प्रवक्ता पर रोज बहुत सारे लेख कूड़े की टोकरी में डाल दिए जाते हैं, जगदीश्वर जी पर आपकी विशेष कृपा है, यह स्पष्ट है और इसे आप झुठला नहीं सकते, आपको निरपेक्ष बनने के लिए ऐसा करना पड़ा हो ऐसा भी संभव है.
    प्रवक्ता का पाठक होने के नाते मैंने यह महसूस किया है एक ही विषय और कुछ घंटो के अंतराल पर जगदीश्वर जी के कई-कई लेख प्रकाशित हुए हैं, यह सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का साधन नहीं तो और क्या है. जगदीश्वर जी निश्चित रूप से विद्वान होंगे लेकिन संपादक होने के नाते आपने अपने दायित्व के साथ न्याय किया ऐसा प्रवक्ता का नया पाठक भी कह सकता है.
    पंकज जी पर आपने आरोप लगाने के लिए आपने पहले उनकी पोस्ट को प्रकाशित किया और फिर दुर्भावना से ग्रसित हो अपनी पोस्ट जारी कर दी, इसके क्या मायने हैं और आपने इससे क्या साबित करने की कोशिश की है, यह कम से कम मुझे समझ नहीं आया.

  49. संजीव जी आप का पंकज जी को दिया जवाब पढ़ा. मुझको लगता है आपको अपनी भाषा को नम्र रखना चाहिए. खासकर के कठोर , अप्रिय और अस्वीकार्य शब्दों के प्रयोग से बचा जाना चाहिए. हो सकता है लेखक के लेख का कोई अंश गलत हो सिर्फ उसी को टार्गेट करके लेखक पर हमला नहीं किया जाना चाहिए. खास कर के तब जब लेखक ने वह गलती अज्ञानता वश की हो. हो सकता है कि अब्दुल्ला बुखारी वाले वाकया में लेखक की जानकारी अधूरी हो. लेकिन जिस कदर आपने हमला किया है वह पूरी तरह से अस्वीकार्य है. किसी लेख पर लेखक के बुद्धि को इस कदर गलत ठहराना किसी संपादक को शोभा नहीं देता. आपने पाञ्चजन्य जैसी पत्रिका को नेगटिव सेन्स में लिया है और प्रवक्ता को उससे ऊपर दिखने की कोशिश की है, जिससे बचा जा सकता था. संजीव जी आप से अपना व्यवहार हर हाल में सौम्य रखने की उम्मीद की जाती है. आपको उत्तेजित होने से बचना चाहिए. आप युवा, उर्जावान और उत्साही हैं इसलिए आप से आशा करता हूँ की आप अपनी उर्जा देश में प्रवक्ता के माध्यम से समाज में फैले अज्ञानता दूर करेंगे.
    पंकज को लोग उतना वाच नहीं करते संजीव जी जितना आप को करते हैं. आशा है मेरे सुझाव आप अन्यथा नहीं लेंगे. – शिशिर

  50. एक तरफ आप कह रहे है ”प्रवक्‍ता किसी पार्टी का लोकलहर, कमल संदेश और पांचजन्‍य नहीं है। यह भारतीय जनता की आवाज है” दूसरी तरफ संघ का समर्थन में कहते हैं – “पहले भारत के राजनीतिक इतिहास का अध्‍ययन कीजिए तब जाकर रा.स्‍व.संघ पर टिप्‍पणी कीजिए। संघ समर्थित दल ने कभी ‘अब्दुल्ला बुखारी करे पुकार, बदलो कांग्रेस की सरकार’ जैसे नारे नहीं लगाए…………….”और “आपको जानकारी नहीं थी तो किसी संघ के जानकार बुद्धिजीवी से इसकी सत्‍यता परख लेते” ।यह दोमुँहापन क्यों ? कहीं आपको यह गलत फहमी तो नहीं हो गई कि संघ की आवाज पूरे भारत की आवाज है ? ।

  51. प्रवक्ता यदि वैचारिक विविधता को स्थान नहीं देगा तो वह प्रवक्ता नहीं रहेगा … विविधता ही तो वह कसौटी है जिस पर चढ़ कर विचार निखरते हैं .

    शायद कुछ विचारधाराओं को एक लम्बे समय से निष्पक्ष स्थान कहीं और नहीं मिल रहा था – ऐसी शिकायत कई लेखकों की रही है – जो कि प्रवक्ता ने दिया, इसीलिये कुछ लेखक प्रवक्ता में विपरीत विचारधारा के लेख देख कर नाराज हो जाते हैं .

    आप कारवां आगे बढ़ाते रहिये, ऐसी छुटपुट आंधियां आती रहती हैं !

  52. शाबाश श्री संजीव जी,
    साधुवाद।
    पहली बार लगा है कि सम्पादक का अस्तित्व है।
    सब कुछ तो आपने शानदार तरीके से कह दिया है, केवल एक ही बात कहना चाहूँगा। प्रवक्ता पर निराधार या मनगढन्थ आरोप लगाने पर आपने जो रुख अपनाया है, क्या वैसा ही रुख तब नहीं अपनाया जाना चाहिये, जबकि कोई टिप्पणीकार किसी अन्य टिप्पणीकार या लेखक के विरुद्ध भाषा का संयम खोकर अपनी रुग्ण मानसिकता से ओतप्रोत विचारों में व्यक्त करता है? जब देशद्रोही और धर्मद्रोही ठहराया जाता है? यदि वैचारिक अभिव्यक्ति के नाम पर हम लोगों की अनर्गल बातों को प्रकाशित होने देते हैं तो वैचारिक क्षरण की शुरूआत भी करते हैं।
    एक आग्रह –
    आपने उक्त आलेख में लिखा है कि-
    “प्रवक्‍ता किसी पार्टी का लोकलहर, कमल संदेश और पांचजन्‍य नहीं है। यह भारतीय जनता की आवाज है।”

    क्या इसमें एक “नहीं” की कमी नहीं है? शायद इसे निम्न प्रकार होना चाहिये-
    “प्रवक्‍ता किसी पार्टी का लोकलहर, कमल संदेश और पांचजन्‍य नहीं है। यह भारतीय जनता की आवाज “नहीं” है।”

    शुभकामनाओं सहित।
    आपका
    -डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) एवं सम्पादक-प्रेसपालिका (जयपुर से प्रकाशित हिन्दी पाक्षिक समाचार-पत्र), मो. ०९८२९५-०२६६६
    दि. ३१.१०.१०

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