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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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कमाल अज़हर

imagesगुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिल्ली के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दिए गए अपने भाषण में राजनीति से दूर केवल विकास की बातें करने के बाद यह चर्चा जोर पकड़ने लगी है कि अब राजनीतिक दल युवा भारत की मानसिकता को समझने लगे हैं। जो धर्म और जाति की बजाए विकास का सपना देखता है। जिसके लिए मंदिर या मस्जिद से कहीं अधिक रोजगार और तकनीकि रूप से विकास महत्वपूर्ण है। राजनीतिक दलों की यह नई विचारधारा पहली बार नरेंद्र मोदी के भाषण से नहीं शुरू हुई है। दरअसल केंद्र में बैठे कई युवा मंत्री की सोच भी कुछ इसी तरह की रही है। केंद्रीय दूरसंचार और टेक्नालॉजी मंत्री कपिल सिब्बल देश में सूचना तकनीक के विकास का सपना देखते हुए इस बात के लिए प्रयासरत हैं कि 2020 तक भारत आईटी के क्षेत्र में आसमान छूता हुआ नज़र आए। इसके लिए उनके मंत्रालय की ओर से प्रत्येक परिवार के एक व्यक्ति को आईटी दक्ष बनाने का भी लक्ष्य रखा गया है। दूसरी ओर युवाओं के आकर्षण का केंद्र रहने वाले कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी अपनी सभाओं में टेक्नालॉजी के साथ कदमताल करते हुए विकास की बात करते हैं।

‘इंडिया शाइनिंग‘ की तर्ज पर बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार भी बिहार शाइनिंग का सपना देखते हैं। अपने कार्यकाल के दौरान गांव गांव में विकास की धारा पहुंचाने की बात करने वाले नितीश जनसभाओं में यह वादा करते नहीं थकते हैं कि यदि चुनाव से पहले गांव गांव तक बिजली नहीं पहुंचाई तो वोट मांगने नहीं आएंगे। जबकि दूसरी ओर विपक्ष नितीश कुमार के इसी वादों को सियासी स्टंड से अधिक कुछ नहीं बता रहा है। राजनीतिक दलों के चमचमाते घोषणाओं और बुलंद दावों के विपरीत यहां एक ऐसी दुनिया मौजूद है जो अमीर गरीब की गहरी और चौड़ी खाई के दूसरे किनारे पर आबाद हर रोज जीने के लिए संघर्ष करता रहता है। बिहार के संदर्भ में यह हकीकत और भी स्पष्‍ट हो जाती है। राजधानी पटना का ऐतिहासिक गांधी मैदान हमेशा से शहर की सामाजिक, आर्थिक और राजनीति का केंद्र बिंदु रहा है। इसी मैदान से गणतंत्र दिवस के अवसर पर राज्य की उपलब्धियों को दर्षाते झांकी गुजरते हैं तो स्वतंत्रता दिवस के मौके पर मुख्यमंत्री अपनी सरकार के कामकाज का चमचमाता चेहरा प्रस्तुत करते हैं। इसी मैदान पर सबसे अधिक राजनीतिक रैलियां होती हैं तो इसी मैदान से सबसे ज्यादा वादे भी किए जाते हैं। लेकिन इसी मैदान से सटा है सलीमपुरा अहरा इलाके की सबसे मलीन बस्ती जिसे चमार टोली के नाम से पुकारा जाता है। यह वह इलाका है जहां से गांधी मैदान में किए जाने वाले वायदों और घोषणाओं की आवाज तो स्पष्‍ट सुनाई देती है परंतु उनमें अधिकतर वायदे इस इलाके़ में कभी भी जमीनी स्तर पर क्रियान्वित नहीं हुए हैं।

इसमें कोई शक नहीं कि हुकुमत ने विकास की नीति के एक हिस्से के तौर पर इस इलाके का भी विकास करने का प्रयास किया है इसीलिए इस टोली में सरकारी विद्यालय, आंगनबाड़ी सेंटर और बीपीएल कार्डधारियों की एक लंबी सूची के अतिरिक्त समाज के हाशिये पर जिंदगी गुजारने वालों के हितों में जारी योजनाओं के लंबे चैड़े नारे जगह जगह दीवारों पर लिखे अवश्यप मिल जाएंगे। परंतु इसके बावजूद शहर का दिल कहलाने वाले गांधी मैदान से सटा यह इलाका राज्य के किसी पिछड़े और योजनाओं से वंचित गांव से भी ज्यादा पिछड़ा लगता है। इस इलाक़े के अधिकतर लोगों की सरकारी योजनाओं तक कोई पहुंच नहीं है और इस रूझान से सबसे अधिक यहां आबाद 25 से 30 प्रतिशत दलित परिवार प्रभावित हैं जो शहर की गंदगियों को बहाते एक बड़े से खुले नाले के किनारे आबाद हैं। जिसके कारण इनकी जिंदगी हर दिन खतरे में गुजरती है।

इस टोली का एक रास्ता गांधी मैदान को अवश्‍य जाता है लेकिन स्वंय को सभ्य समाज का नागरिक कहलाने वाला कोई भी व्यक्ति इस रास्ते से गुजरना पसंद नहीं करता है। अलबत्ता जो यहां से नाक पर रूमाल या कपड़े डालकर गुजरते हैं उन्हें केवल नाले के गंदे पानी के अतिरिक्त कुछ नजर नहीं आता है। उन्हें संसाधनों के अभाव में इन्हीं नालों पर कीड़े मकौड़े की तरह जिंदगी गुजारने वाले शायद इंसान ही नजर नहीं आते हैं। लेकिन जो लोग यहां रहते हैं वही जानते हैं जिंदगी की वास्तविक परिभाषा क्या है? टोली की रहने वाली रामसखी देवी बताती है कि किस प्रकार बारिश के दिनों में उन लोगों की रात नाले के घटते बढ़ते पानी को देखते हुए कटती है। जैसे जैसे नाले का पानी बढ़ता है वैसे वैसे हम घरों के सामान को चारपाई के उपर रखना शुरू कर देते हैं। क्योंकि पानी बढ़ने के साथ ही वह घरों में प्रवेश करने लगता है। लेकिन स्वंय को और अपने सामानों को छत से टपकते पानी से बचाने में असमर्थ होते हैं। उन्होंने बताया कि नाले को ढ़ंकने के संबंध में टोली के लोगों ने वार्ड पार्षद से भी गुहार लगाई। लेकिन उन्हें शायद किसी बड़े हादसे का इंतजार है। ऐसी परिस्थिति में छोटे बच्चे सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। विशेष रूप से इसलिए क्योंकि यहां आबाद प्रत्येक परिवार में बच्चों की संख्या मां-बाप की आय से कहीं अधिक है। कई बच्चे ऐसे हैं जो इस उफनते नाले में डूबने से बचे हैं, लेकिन यहां जन्म लेने वाले सभी बच्चों की किस्मत ऐसी नहीं होती है।

बहरहाल देश में जनसंख्या बढ़ने के पीछे चाहे जो भी तर्क दिए जाएं लेकिन सलीमपुरा अहरा के इस टोली के तकरीबन हर घर में अधिक से अधिक बच्चों की संख्या का एक बड़ा कारण यही नाला है। क्योंकि यहां माता पिता इस डर से अधिक बच्चों को जन्म देते हैं कि यदि कोई एक भी उस नाले की भेंट चढ़ गया तो दूसरा वंश को आगे बढ़ाने के लिए जिंदा रहे। हो सकता है यह तर्क किसी भी सभ्य और विकसित समाज के गले नहीं उतरे परंतु यह भी उतना ही सत्य है कि शहर की गंदगी को बहाकर ले जाने वाले इसी नाले से चमार टोली के बाशिंदों की रोजमर्रा की जिंदगी गुजरती है। (चरखा फीचर्स)

One Response to “गंदे नालों से गुज़रती जिंदगी”

  1. इक़बाल हिंदुस्तानी

    iqbal hindustani

    Kevl is bsti का itna बुरा हअल नही है बल्कि sarkar की अस्म्वेदनशीलता और bhrshtachar से देश का बड़ा hissa नर्क मेरेहने को मजबूर है.

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