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    Homeविश्ववार्ताभारत के मानस पुत्र दलाई लामा

    भारत के मानस पुत्र दलाई लामा

    पुर्नजन्मः आध्यात्मिक गुरु का 86वें वर्ष में मंगल प्रवेश

    श्याम सुंदर भाटिया
    भारतीय संस्कृति में अतिथि देवो भव का खा़सा महत्व है। यदि देश की रोटी, माटी, हवा और पानी से किसी का छह दशकों से नाता हो तो वह अतिथि के दायरे में परिभाषित नहीं किया जा सकता है। वह किसी परिवार, किसी गांव या किसी देश के सम्मानित सदस्य के मानिंद हो जाता है, इसीलिए शांति नोबल पुरस्कार विजेता एवं तिब्बत के महान आध्यात्मिक गुरु श्री दलाई लामा भी भारत से गहरा लगाव और अटूट रिश्ता मानते हैं। कहते हैं, मेरा शरीर तिब्बती है। मन बौद्ध विचारों से पोषित है, लेकिन इसकी जड़ें प्राचीन भारतीय ज्ञान में हैं। वह सार्वजनिक मंचों से बार-बार बड़े गर्व से कहते हैं- हां, मैं भारत माँ का बेटा हूँ। भारत मेरा दूसरा घर है। इस नाते यशस्वी आध्यात्मिक गुरु श्री दलाई लामा भारत के मानस पुत्र हुए।
    शांति के अग्रदूत मानते हैं, अहिंसा और धार्मिक सहिष्णुता भारत के दो खजाने हैं। दुनिया को भारत से सीखना चाहिए। यह देश दूसरों के लिए धार्मिक सहिष्णुता और अहिंसा का रोल माॅडल है। अहिंसा प्राचीनकाल से भारत की पहचान रही है। युवाओं को अहिंसा के प्रचार-प्रसार के लिए तत्परता से काम करना चाहिए। लामा की अवधारणा रही है, बापू भारत के सच्चे सपूत थे और भारत के मूल्यों को गहराई से समझते थे। लामा कहते हैं, मैं महात्मा गाँधी के अहिंसा और सद्भाव के सिद्धांतों से प्रभावित हूँ। परम पूज्य दलाई लामा का हमेशा मानना रहा है, सामंती व्यवस्था के बजाए प्रजातांत्रिक प्रणाली बहुुत अच्छी होती है। सामंती व्यवस्था में कुछ लोगों के हाथों में निर्णय लेने की शक्ति होती है, जो बहुत खतरनाक है।
    दलाई लामा दो शब्दों को मिलकर बना है। दलाई यानी महासागर और लामा यानी गुरु। दलाई लामा का अवतार तिब्बत के आमदो प्रांत के टेस्टसर में हुआ था। उनके बचपन का नाम ल्हामों थोंडुप था। तिब्बती में इसका अर्थ होता है- मनोकामना पूर्ण करने वाली मां। दलाई लामा की खोज के बाद उन्हें ल्हासा में पोटाला महल में लाकर बाकायदा बौद्ध धर्म-विचार की शिक्षा दी गई। बाद में उनका नाम तेनजिन ग्यात्सो रखा गया। तिब्बती परंपराओं के मुताबिक 1937 में उच्च तिब्बती लामाओं और अन्य धर्मगुरुओं के दल ने उत्तर-पूर्वी तिब्बत के आम्दो प्रांत के कुंबुम में महज दो बरस के बालक तेनजिन ग्यात्सो अगले दलाई लामा के अवतार के रूप में स्वीकार किया। वह तेनजिन ग्यात्सो 13वें दलाई लामा थुप्टेन ग्यात्सो के अवतार हैं। बालक तेनजिन को वहां से उनके माता-पिता के साथ कुंबुम मठ लाया गया, जहां विशेष समारोह में 14वें दलाई लामा के अवतार के रूप में उनका अभिषेक हुआ। दलाई लामा ने अपनी मठवासीय शिक्षा छह वर्ष की अवस्था में शुरू की। तिब्बत के राष्ट्राध्यक्ष और आध्यात्मिक गुरु श्री दलाई लामा का जन्म 6 जुलाई, 1935 को उत्तर पूर्वी तिब्बत के किसान परिवार में हुआ। 23 वर्ष की उम्र में उन्होंने यह फाइनल परीक्षा ऑनर्स के साथ पास की और उन्हें सर्वोच्च गेशे डिग्री ल्हारम्पा प्रदान की गई। बौद्ध दर्शन में यह पीएचडी की मानिंद डिग्री होती है। 10 दिसम्बर, 1989 में तिब्बत को स्वतंत्र कराने में उनके अहिंसात्मक संघर्ष के लिए उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। चीनी सेना ने 1959 में ल्हासा के तिब्बतियों को बड़ी क्रूरता से कुचला तो उन्हें शरण लेने के लिए बाध्य होना पड़ा। तब से वे उत्तरी भारत के धर्मशाला में निवास करते हैं। यह निर्वासित तिब्बती राजनैतिक प्रशासन का केन्द्र है।
    1951 का बरस तिब्बत के लिए मनहूस साबित हुआ। चीन के हजारों सैनिकों ने आजाद तिब्बत पर कब्जा कर लिया। हालांकि चीनी कब्जे के बाद तेनजिन ग्यात्सो को 14वें दलाई लामा के तौर पर पद पर बैठाया गया। दलाई लामा के सिंहासन पर विराजमान होने से चीन फिर तिलमिला गया। चीन ने दलाई लामा को एक कार्यक्रम में आने का सशर्त न्योता दिया, वह बिना किसी सुरक्षा गार्ड के आएं। इस पर तिब्बतियों को यह आशंका हुई, चीन के हुक्मरानों की उनके धर्मगुरू को बंदी बनाने की चाल है। हजारों तिब्बतियों ने एकत्रित होकर अपने आध्यात्मिक गुरू को चीन नहीं जाने दिया। इस पर चीन के गुस्से का पारा आसमाॅ पर चढ़ गया। तिलमिलाए चीन ने तिब्बत में जबर्दस्त गोलीबारी का आदेश दे दिया। इस खूनी संघर्ष में चीनी आर्मी ने हजारों तिब्बतियों को मार डाला।
    अपनी आजादी और मूल देश को खोने का दर्द श्री दलाई लामा की जुबां पर बरबस आ जाता है। अमन के इस फरिश्ते का साफ मानना है, 15 साल की उम्र में अपनी आजादी खो दी जबकि 24 वर्ष की उम्र में ही अपना देश खो दिया। तिब्बत और भारत के अतीत से घनिष्ठ सम्बन्ध हैं। श्री दलाई लामा भारत की संस्कृति, संस्कार, मानवीय मूल्यों, लोकतान्त्रिक परम्पराओं के कायल हैं। कहते हैं, भारत में हम दुनिया की सभी आस्था, परम्पराओं को एक साथ देख सकते हैं। दुनिया का दूसरा सबसे अधिक आबादी वाला यह देश इसका जीता-जगाता उदाहरण है कि अंतर-धार्मिक सदभाव संभव है, श्री लामा का मानना रहा है, भारत में सर्वधर्म सद्भाव की परंपरा रही है। यहां से कई धर्मों का उदय हुआ। बावजूद यहां एक दूसरे में एकजुटता मिसाल है, जो किसी भी देश में नहीं है। सभी धर्मों के धर्मगुरूओं को इस परंपरा को संजोने और संरक्षित रखने की जरूरत है। इसीलिए वह कहते हैं, मैं 60 वर्षों से अधिक यहां मिली स्वतन्रता का आनंद ले रहा हंू। वह अब तक के सबसे लम्बे अतिथि के रूप में रहने देने की अनुमति प्रदान करने के लिए भारत सरकार का बारम्बार आभार जताते हैं।
    दुनिया में शांति का संदेश देने वाले तिब्बती बौद्ध गुरू दलाई लामा कहते हैं, बन्दूक से ज्यादा ताकत सच्चाई में होती है। हमारे पास सच्चाई की ताकत है, जबकि चीन के पास बन्दूक की ताकत है। आज अहिंसा और करूणा दुनिया की जरूरत बन गई है। आज के समय में शांति के रास्ते पर चलकर अमन और तरक्की की कल्पना की जा सकती है। लद्दाख पर नियन्त्रण सीमा रेखा को लेकर भारत और चीन के बीच तनाव के मद्देनजर डैªगन को आध्यात्मिक गुरू श्री दलाई लामा के सिद्धांतों पर चलने की दरकार है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को अपना आदर्श मानने वाले दलाई लामा कहते हैं, मित्रता विश्वास पर निर्भर करती है, धन पर नहीं, शक्ति पर नहीं, शिक्षा या ज्ञान पर नहीं। भरोसा होगा तो ही दोस्ती होगी। डैªगन को यह सच्चाई कब समझ में आएगी?

    श्याम सुंदर भाटिया
    श्याम सुंदर भाटिया
    लेखक सीनियर जर्नलिस्ट हैं। रिसर्च स्कॉलर हैं। दो बार यूपी सरकार से मान्यता प्राप्त हैं। हिंदी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित करने में उल्लेखनीय योगदान और पत्रकारिता में रचनात्मक भूमिका निभाने के लिए बापू की 150वीं जयंती वर्ष पर मॉरिशस में पत्रकार भूषण सम्मान से अलंकृत किए जा चुके हैं।

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