लेखक परिचय

गंगानन्द झा

गंगानन्द झा

डी.ए.वी स्नातकोत्तर महाविद्यालय में वनस्पति शास्त्र के प्राध्यापक के पद से सेवानिवृत होने के पश्चात् चण्डीगढ़ में गत पन्‍द्रह सालों से रह रहे गंगानंद जी को लिखने पढ़ने का शौक है।

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गंगानन्द झा

तब हम पाँच-छः साल के रहे होंगे। पिता के साथ मैं दुमका गया था।. दिन के भोजन के समय मैंने उससे पूछा कि वह किस क्लास में पढ़ता है। उसने कहा, — “बच्चा क्लास”. मैंने कहा—“बच्चा क्लास, कच्चा रोटी”
इण्टर में दाखिला लेने के बाद बोर्ड पर से रूटिन लिखते समय बायलॉजी का कहीं उल्लेख नहीं मिलने पर मैंने उससे अपनी परेशानी बतलाई। उसने कहा – बॉटनी और जूलॉजी ही बायलॉजी हैं। देखो इनका नाम तो लिखा है। मेरी मुश्किल आसान हो गई।
इसके कुछ दिनों बाद उसने कहा—बायलॉजी चलना मुश्किल होगा। मैंने ददा की इण्टर की कॉपी में देखा है। बेंग का फोटो बनाना पड़ता है.। बायलॉजी छोड़कर मैथेमैटिक्स ले लेना ठीक रहेगा।
मैं घबड़ाया तो, क्योंकि ड्रॉइंग मेरी बहुत ही कमजोर थी। पर विषय परिवर्तन का खयाल ठीक नहीं लगा। उसने परिवर्तन कर लिया, मैथेमैटिक्स की कक्षाओं में कुछ दिन गया, पर फिर वापस बायलॉजी में आ गया और हम एक ही सेक्शन में रह गए।
वह इस्ट ब्लॉक होस्टल में रहता था और मैं देवघर लॉज में। मुलाकातें क्लास के बाद भी हुआ करती थीं। अपनी पहचान के बारे में मैं उसे शेकी पाता था। देवघर और दुमका के बीच डोलता हुआ। एक दिन उसे घबड़ाए हुए से कहा – कुरी आता है होस्टल में तो दूर से ही चुटरा कह कर मुझे पुकारता है। उससे कह दो कि मुझे नागेश्वर कहा करे. और यह न बतलाए किसीसे कि मैं देवघर का हूँ। अपना घर वह दुमका ही कहा जाना पसन्द करता था। उसकी तीव्र संवेदनशीलता के बारे में तभी से मैं सजग रहा करता था। मैं कदाचित् उसकी सहायता करना चाहता था ताकि वह सहज हो सके ।
उसने कहा, देखो न. दुमका से घी आता है। मैं मेस में खाने के समय कटोरे में लेकर जाता हूँ। मिथिलेश कहता है कि नागेश्वर मिन माइण्डेड है। घी अकेले अकेले खाता है।
इण्टर करने के बाद मेडिकल में एडमिशन के लिए टेस्ट की तैयारी करने के समय उसने मुझे पटना बुलाया ताकि हम ज्वॉयंट स्टडी कर तैयारी करें।. मैं गया और करीब पन्दरह दिन साथ में रहकर पढ़ाई की हमने। यह अलग बात है कि दोनो में कोई भी टेस्ट में सफल नहीं हुआ।
उसकी शादी का आयोजन था। वह कुछ नर्वस-नर्वस रहा करता। फुरसत मिलते ही वह मेरे पास झौंसागढ़ी स्कूल में चला आता। मेरे पास कदाचित् उसे आश्वासन सा लगता था।
बी.एस.सी. करने के बाद मैंने नौकरी ज्वॉयन की और उसने एम. एस.सी में और फिर मेडिकल में एडमिशन ले लिया। हमारे बीच पत्राचार होता रहा। वह घबराहट व्यक्त करता कि उसे आर्थिक रुप से आत्म- निर्भर होने में अभी देर लगेगी। इस बात का उत्साह व्यक्त नहीं कर पाता कि उसे ऊँचाइयों पर जाने का अवसर मिला है। मैं उसे आश्वस्त करता कि मेडिकल की पढ़ाई पूरी करने का सुअवसर उसे ऊँचाइयों पर ले जाएगा।
उसके पिताजी का असामयिक एवम् आकस्मिक देहांत हो गया था। मैं पटने से देवघर उसके लिए ही आया था। वह घबड़ाया था कि अभी करीब दो-तीन साल की पढ़ाई बाकी है। कैसे निभेगा। मैंने उसे इस तरह की सोच और आशंका को निरर्थक एवम् आधारहीन बताया । और सकारात्मक खयाल रखने को कहा।
मैंने उससे अपनी शादी की योजना के बारे में बतलाया था तो वह मेरे लिए घबड़ा गया था। इसके परिणामों के बारे में उसे बहुत गम्भीर आशंकाएँ थीं। मैंने उसे आश्वस्त करने की चेष्टा की, उसने मुझे अपनी योजना छोड़ने को कहा।
मैं सबौर में था कृषि विभाग की नौकरी में, वह दरभंगा में मेडिकल कॉलेज का छात्र। उसका पत्र मिला घबराहट से भरा। उसके ददिया ससुर पारम्परिक वेषभूषा में उसके होस्टल पहुँच गए थे। मैंने उसे बतलाया था कि हमें अपनी वास्तविकता को स्वीकार तो करना ही होगा।
उसका पत्र मिला था लम्बे अन्तराल के बाद। पत्र में उसने लिखा था। “यह पत्र मैं दमदम हवाई अड्डे से लिख रहा हूँ। मैं F.R.C.S. करने इंगलैंड के लिए रवाना हो रहा हूँ।“
मैं देवघर में घर पर था, एक बच्चे ने कहा, कोई आपको पूछ रहे हैं। बाहर निकला, देखा नागेश्वर है। उसने बतलाया कि वह सुबह ही इंगलैंड से पहुँचा है। F.R.C.S. हो गया था। उसको मालूम हुआ था कि मैं भी आया हुआ हूँ।तो मुझसे मिलने चला आया था। फिर हम साथ निकले तो बब्बू मिल गया । मैंने बताया कि वह नवींं क्लास में पढ़ता है तो उसने भौंचक होने का भान किया। कितना वक्त बीत गया।
सीवान से मेरे एक परिचित मुंगेर जा रहे थे। मुझे उत्सुकता हुई, मैंने उनसे कहा था कि डॉ एन.पी. झा से मिलें।. उन्होंने लौटकर बतलाया था कि मुंगेर में डॉक्टर साहब अत्यन्त कुशल सर्जन तथा अति सज्जन व्यक्ति के रुप में प्रतिष्ठित हैं।
देवघर से सीवान के लिए चला था। रास्ते में अपनी ससुराल के दरवाजे पर वह मिल गया था। उससे बातें होने लगीं। उसने कहा था, एक जगह पोस्टिंग होती है। लोगों के बीच कुशल सर्जन की पहचान बनने में एक आध साल लग जाते हैं। प्रैक्टिस पिक अप करते ही फिर ट्रांसफर की तलवार लटकने लगती है। फिर नई जगह में वही सिलसिला। सर्जन के पास यों भी काम का स्पैन छोटा होता है। उम्र होने पर हाथ काँपने लगते हैं। देवघर के समाज से लड़कों के लिए पहली बार उसमें कन्सर्न देखकर अच्छा लगा, जब उसने कहा कि यहाँ के लड़कों को अधिक संख्या में मेडिकल में आने की कोशिश करनी चाहिए।
बब्बू थर्ड ईयर में आया था। उसने मुझे लिखा था कि नेपाल से विदेशी स्टेथोस्कोप मँगवाने की कोशिश करूँ।. नागेश्वर की पोस्टिंग बेतिया में थी। मैंने उसे पत्र लिखा था। उसने स्टेथोस्कोप खरीदवाकर पटना बब्बू के पास पहुँचवा दिया था।
संयोग उसके पिता, तथा दोनो बड़े भाइयों के श्राद्ध के समय मैं देवघर उसके पास था। उसे अच्छा लगा होगा, यद्यपि उसने कभी ऐसा नहीं कहा। उसका स्वभाव ही नहीं था अपनी बातें कहने का। पर आज मैं वहाँ नहीं हूँ । उससे मैं अब सम्पर्क नहीं कर सकता।
आज मैं सोचता हूँ कि मैं उसके बारे में कुछ possessive रहा कि उसको मैं समझता था। शायद और कोई नहीं।
लम्बे अन्तराल के बाद सन पचास के दशक के अन्त में एक साथ देवघर के तीन लड़के डाक्टर हुए थे। उनमें पढ़ाई में दखल के खयाल से स्पष्टतः कृष्ण नारायण सबसे तेज और नागेश्वर सबसे कमजोर था । पर ऐसा हुआ कि ऐकैडेमिक्स में नागेश्वर की उपलब्धि स्पष्टतः सबसे अधिक हुई। एम.एस तीनों ने किया, पर एकमात्र उसने ही सर्जरी की तब की उच्चतम उपलब्धि F.R.C.S इंगलैंड जाकर हासिल की थी तथा अन्त तक ऐकैडेमिकली सक्रिय रहा। सर्जन्स के राष्ट्रीय और क्षेत्रीय सम्मेलनों एवम् सेमिनार्स में सम्मिलित होता रहा।
ऐसा क्यों हुआ?
मैं अपनी व्यक्तिगत अभिज्ञता से जानता हूं कि असुरक्षा के भय से ग्रस्त रहा करना नागेश्वर की प्रकृति में शामिल था। वह एकदम से प्राइवेट प्रकृति का था। अपने को किसी पर आरोपित नहीं कर पाता था। पिता की मृत्यु के समय वह अभी एम.बी.बी. एस का ही छात्र था। तभी उसने मुझे अपने व्यक्तित्व का यह पक्ष प्रकट किया था। पर इसके साथ उसके ऊपर अपने घर के परिवेश का गहरा प्रभाव था, जहाँ एक न्यूनतम स्तर की उपलब्धि के टार्गेट का दबाव प्रच्छन्न रूप से बना रहा होता था।

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