लेखक परिचय

विवेक कुमार पाठक

विवेक कुमार पाठक

स्वतंत्र पत्रकार

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विवेक कुमार पाठक
स्वतंत्र पत्रकार

मध्यप्रदेश में आदिवासी मूक बधिर युवतियों के साथ दुष्कर्म के खुलासे ने पूरे प्रदेश को हिलाकर रख दिया है। बिहार के मुजफफपुर का वहशियाना कृत्य लोग भूल भी न पाए थे कि मध्यप्रदेश में मूक बधिर युवतियों से दुष्कर्म का मामला अखबारों के प्रथम पेज पर रौंगटे खड़ा करने वाला समाचार बन गया। जिन आदिवासी बालिकाओं के साथ ये वीभत्स वारादात हुई है वे मुख्यमंत्री निशुल्क आईटीआई प्रशिक्षण लेने के लिए गई हुईं थी।

देश में इस समय बालिकाओं और युवतियों के साथ जिस तरह से दुष्कर्म के मामले सामने आ रहे हैं वे मानवता को शर्मसार करने वाले हैं। जिस देश में नारियों को देवताओं की तरह पूजने की संस्कृति हो जहां हर बाला देवी की प्रतिमा बच्चा बच्चा राम का उद्घोष किया जाता हो वहां बालिकाओं और युवतियों व ये वहशी जुल्म तमाम सवाल खड़े करते हैं।

बिहार के मुजफफरपुर में सरकारी अनुदान से चलाने वाले छात्रावास में बालिकाओं का दैहिक शोषण हुआ। मध्यप्रदेश में मूक बधिर आदिवासी युवतियों के साथ दुष्कर्म उस छात्रावास में हुआ है जो सरकार की मदद से चलता है। सरकार की मदद से चलने वाले छात्रावासों के प्रति आम जनमानस में एक सम्मान का भाव होता है। गांव देहात और कस्बे के करोड़ों लोग नहीं जानते कि सरकारी छात्रावास और सरकारी अनुदान से चलने वाले छात्रावास में क्या अंतर है। इन भोले भाले नागरिकों की यह सोच गलत भी नहीं है क्योंकि सरकार का संचालन के लिए जहां पैसा लग रहा है वहां सरकार के कुछ अधिकार होते हैं, सरकार के दायित्व भी हैं कि टैक्सपेयर्स की खून पसीने की जो कमाई वो अनुदान के रुप में जिन छात्रावासों के लिए बांट रही है वे सरकार के लक्ष्य को पाने की ओर कितने अग्रसर हैं।
छात्रावासों को बनाने का प्रयोजन रहा है कि वहां रहकर छात्र छात्राएं शिक्षा, ज्ञान और हुनर को सीखने के दौरान रहने का सुरक्षित ठिकाना पा सकें। सरकारों का इन संस्थाओं को दिया अनुदान इस बात की गारंटी है कि ये संस्थाएं और इनके छात्रावास सही दिशा में सही लक्ष्य के लिए चलाए जा रहे हैं। सरकार के समाज कल्याण विभाग के अफसरों और अमले ने इनको वेरीफाइड किया है और तभी इनके काम को सरकार का लक्ष्य मानते हुए इनको सरकारी मदद भी दी जाती है मगर ये क्या।
अनुदान दिया जाता है बालिकाओं और युवतियों को सुरक्षित आवास और रिहायश के लिए मगर उसका उपयोग किस दिशा में हो रहा था देश के सामने है।
मुजफफरपुर में बिहार के समाज कल्याण विभाग से अनुदान पाने वाले छात्रावास में दर्जनों बालिकाओं और युवतियों का निरंतर दैहिक और मानसिक शोषण किया गया और ये सब सरकारी सिस्टम के निरंतर पर्यवेक्षण के बीच चलता रहा। इससे खौफनाक सच और क्या हो सकता है।
मध्यप्रदेश को बीमारु राज्य के दर्जे से बाहर निकालने के दावे कई महीनों और बहुत लाव लश्कर वाले विशाल चल समारोह निकालकर पूरे प्रदेश में गर्व के साथ किए जा रहे हैं मगर इस तरह की हकीकत उन सभी आसमानी सुलतानी दावों को खोखला साबित करते हैं। अगर सिस्टम बीमार है, सिस्टम जिन लोगों को अनुदान और पुरस्कार दे रहा है वे बीमार हैं तो सूबा बीमारु राज्य के तमगे से कैसे बाहर आ रहा है।
मुख्यमंत्री निशुल्क आईटीआई का प्रशिक्षण लेने मूक बधिर आदिवासी युवतियां इस आत्मविश्वास के साथ गईं थीं कि वे अपने जीवन को आत्मविश्वास और स्वाबलंबन की ओर ले जाने वाला हुनर सीखेंगी। उन्हें विश्वास था उस छात्रावास पर जो पूरे सूबे को बार बार दिए जा रहे विश्वास और भरोसे के कारण बना था मगर ये क्या।
सरकार आप सोचिए। आपके दावे, वादे और सामाजिक सुरक्षा देने की प्रदेशव्यापी भव्य गर्जना के बीच आदिवासी मूक बधिर बालिकाओं और युवतियों का करुण कं्रदन बिना शब्दशक्ति के पूरा देश सुन रहा है। राजधानी भोपाल के अवधपुरी में सरकार से अनुदान लेकर चल रहे छात्रावास में मूक बधिर बालिकाओं के सुनहरे सपनों को तार तार कर दिया गया।
मप्र के समाज कल्याण विभाग की निगरानी और आर्थिक सहयोग से चलने वाले छात्रावास में भले ही कुछ आदिवासी शब्दहीन बालिकाओं के साथ दुष्कर्म हुआ हो मगर असल में ये सबसे सरोकारपरक सबसे ज्यादा संवेदनशील बताए जा रहे सिस्टम के साथ किसी वीभत्स दुष्कर्म से कम नहीं है।
मप्र में रोजगार की आशा लेकर पहुंची निशक्त आदिवासी युवतियों के साथ दुष्कर्म की ये वारदात मप्र सरकार के दावों पर जोरदार तमाचा है। आत्ममुग्धता के नए कीर्तिमान स्थापित कर रही मप्र की सरकार को कुछ पल ढोल ढमाका ब्रांड प्रमोशन राजनीति से विराम लेना चाहिए। आप खुद करोड़ो बेटियों और युवतियों का मामा कहते हैं तो आपसे इनके लिए इस वक्त गुजारिश है कुछ तल्खी के साथ।
आपकी चुनावी हुंकार और यश जरुर सुन लेंगे
पर जनाब आप इन बेजुबान बेटियों का दुख कब सुनेंगे।

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