मोदी ने दो नहीं, तीन तारपीडो मारे हैं।

वीरेन्द्र सिंह परिहार
जहां तक नोटबंदी का सवाल है इसके पक्ष और विपक्ष में बहुत सारी बहसें हुई हैं। नोटबंदी से उम्मीद यह थी कि करीब तीन लाख करोड़ रुपए का कालाधन रद्द हो जाएगा। पर तकरीबन पूरा-का-पूरा कालाधल वापस आ गया। इस तरह से यदि नोटबंदी की योजना का मूल्यांकन हो तो यह कहा जा सकता है कि नोटबंदी कालाधन पर प्रहार करने में उतनी कामयाब नहीं हुई। पर यह बात समझ लेनी चाहिए कि नकद मुद्रा में उपथित कालाधन कुल काली संपदा का एक हिस्सा भर होता है। यानी जो कालाधन मकान, स्विस बैंकों के खातों, सोने आदि की शक्ल में पहले ही बदल दिया गया था, वह नोटबंदी से कतई अछूता रहा है। पर इसका तात्पर्य यह नहीं कि नोटबंदी के सकारात्मक परिणाम नहीं हैं। नकदी की कमी से कश्मीर जैसे आतंकवाद से ग्रस्त राज्य में पत्थरबाजी बहुत कम हो गई, क्योंकि पत्थरबाजों को देने के लिए नकद रकम अलगाववादियों के पास नहीं थी। इसी तरह से नकदीविहीन अर्थव्यवस्था के उद्देश्य से भी नोटबंदी को कामयाब मानना चाहिए। नोटबंदी के बाद ऐसे-ऐसे लोगों के मोबाइल फोनों में पेटीएम जैसे इलेक्ट्रानिक वाॅलेट आ गए जिन्होंने कभी पेटीएम का नाम तक नहीं सुना था। उम्मीद है कि 2020 तक पेटीएम के 50 करोड़ ग्राहक जुटा लिए जाएंगे। क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड के प्रति जागरुकता बढ़ी है। कुल मिलाकर नकदी रहित लेन-देन के प्रति जागरुकता का माहौल बना। इस तरह से नकदी रहित लेन-देन के लिए नोटबंदी मुख्य कारण बनी। इससे जहां लोगों की सुविधाएॅ बढ़ी, वहीं भ्रष्टाचार पर भी प्रभाव पड़ा। नोटबंदी के बाद प्रत्यक्ष कर के संग्रह में करीब 16 प्रतिशत का इजाफा हुआ। 2012-13 में कुल 4 करोड़ 72 लाख मतदाता थे जो 2016-17 में बढ़कर 6 करोड़ 26 लाख हो गए। 2016-17 में करीब नब्बे लाख रुपए नए करदाता जुड़े और हर साल जितने करदाता जुड़ते हैं, उसके मुकाबले यह 80 प्रतिशत ज्यादा बढ़ोत्तरी है। नोटबंदी के बाद की गई कार्यवाहियों में 5400 करोड़ रुपये की अघोषित आय पकड़ी गई।
देखने में यह आ रहा है कि तमाम बैंक हाउसिंग ऋण समेत कई तरह के ऋणों की ब्याज दर में कमी कर रहे हैं। बैंकों का कारोबार नोट रखने से नहीं, नोटों को आगे ऋण पर देकर उनसे ब्याज कमाने से चलता है। चूंकि बैंकों के पास नोटबंदी के चलते बहुत नोट आए, इसलिए उन्होंने ब्याज दर सस्ती कर दी, इसका श्रेय नोटबंदी को ही दिया जाना चाहिए। जहां तक रोजगार का सवाल है अब उसका विश्लेषण पुराने मानकों से नहीं हो सकता। अर्थव्यवस्था में विकास के बावजूद कई क्षेत्रों में नौकरियों का अकाल है। एचडीएफसी बैंक देश में निजी क्षेत्र का बड़ा बैंक है जो लगातार बढ़ता हुआ मुनाफा दर्ज करता है। एक साल में इसके शेयर में 40 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोत्तरी हो चुकी है पर रपटों के मुताबिक यह पिछले करीब एक साल में लगभग दस हजार लोगों को नौकरी से निकाल चुका है। रोबोट काम कर रहे हैं, मशीने काम कर रही हैं। अर्थशास्त्र की भाषा में इसे कुशलता कहा जाता है कि कम लागत से ज्यादा कारोबार करना संभव हो रहा है। दरअसल रोजगार का रास्ता नौकरियों से नहीं स्व रोजगार से निकलता है। जिसके बारे में मोदी सरकार का दावा है कि तीन करोड़ बयालीस लाख रुपए के मुद्रा कर्जों से करीब 5.5 करोड़ रोजगार पैदा किए गए हैं। दफ्तर वाली नौकरियों का पैदा हो पाना अब वैसे संभव नहीं है, जैसे पुराने दौर में था। रोजगार सिर्फ नौकरियों से नहीं, उसके लिए स्व रोजगार की व्यवस्था और हुनरमंद प्रशिक्षण जरुरी है और इसके लिए मोदी सरकार पचास हजार रुपये से लेकर दस लाख रुपये तक के ऋण उपलब्ध करा रही है। सरकार मोटे तौर पर ऐसे इंतजाम करने जा रही है कि हरेक के लिए कुछ न्यूनतम व्यवस्था हो सके। यानी सरकार हरेक के खाते में एक न्यूनतम रकम हस्तांतरित करेगी।
जहां तक मंदी का प्रश्न है उसके लिए आर. जगन्नाथ का कहना है कि मंदी की एक बहुत बड़ी वजह यह है कि प्रधानमंत्री मोदी ने कानूनी और गैर कानूनी धन के मध्य एक दीवार खड़ी कर दी है। पहले धनी लोग अपने नम्बर दो के रुपयों को मारीशस या साइप्रस ले जाते थे, वहां पर उन्हें टैक्स नहीं देना पड़ता था। फिर वह उस पैसे को शैल या कागजी कम्पनियों के जरिए भारत ले आते थे। दिखाया यह जाता था कि शैल कम्पनी का शेयर बेचने से भारी लाभ हुआ है, इस तरह से पैसा नम्बर एक का हो जाता था। दूसरे भ्रष्ट लोग किसी वस्तु का दाम विदेशों में कई गुना बढ़ाकर निर्यात करते थे। मजे की बात यह है कि भारत से निर्यात करने वाला और विदेश में उस वस्तु को खरीदने वाला व्यक्ति एक ही होता था। यहां से शैल कम्पनी से निर्यात किया, वहां पनामा या मारीशस से पंजीकृत शैल कम्पनी ने उसे आयात किया। इस तरीके से पैसा नम्बर एक का हो जाता था। अब ऐसे लोगों का कालाधन चाहे भारत में हो या विदेश में फंसा हुआ है और किसी की भी सहायता करने में सक्षम नहीं है। प्रधानमंत्री स्वतः बता चुके हैं कि एक लाख कागजी कम्पनियों का पंजीकरण रद्द किया जा चुका है, जबकि दो लाख शैल कम्पनियों के बैंक एकाउंट फ्रीज हो चुके हैं। चूंकि बड़े उद्योगपतियों और व्यवसाईयों के लिए विदेशों में जमा कालाधन भारत में लाने का रास्ता अवरुद्ध हो गया है तभी एक के बाद एक कांस्ट्रक्शन कम्पनियाॅ बंद हो रही हैं। तभी तो नोटबंदी के विरुद्ध अभियान चलाने वाले पी. चिदम्बरम के पुत्र कार्ति के विदेशों में 28 बैंक खातों का पता चल चुका है। प्रधानमंत्री के कदमों से कोई भी व्यक्ति ईमानदारी और मेहनत के साथ अपना उद्यम लगाकर इन भ्रष्ट लोगों से टक्कर ले सकता है।
इस संबंध में मनमोहन सरकार के दस वर्षों का कार्यकाल और मोदी सरकार के सवा तीन वर्षों के कार्यकाल का तुलनात्मक अध्ययन भी प्रासंगिक होगा। 2004 में मनमोहन सरकार के सत्ता में आने पर उसे वाजपेयी सरकार से 8.2 प्रतिशत की दर से वृद्धि करने वाली राष्ट्रीय विकास दर मिली थी, जो वर्ष 2014 में मोदी सरकार के आने पर 6.9 प्रतिशत हो गई थी। इस परिपेक्ष्य में यह ध्यान रखन जरुरी होगा कि मनमोहन सरकार को उदीयमान अर्थव्यवस्था मिली थी , जबकि मोदी सरकार को सिकुड़ती अर्थव्यवस्था जो पाॅलिसी पैरालिसिस के साथ संगठित लूट का शिकार थी, मिली थी। यदि औसत प्रति व्यक्ति आय को देखा जाए तो मनमोहन सरकार के विदाई के वक्त यह 80.388 रुपये थी, जो वर्तमान में 103.219 रुपये है। 2013-14 में 96 लाख करोड़ की अर्थव्यवस्था का दायरा था जो 2016-17 में 185 लाख करोड़ का हो गया है। विदेशी मुद्रा भण्डार 2013-14 में 315 अरब डाॅलर से 2016-17 में 400 अरब डाॅलर को पार कर चुका है। पूर्व में वित्तीय घाटा जहां 4.50 प्रतिशत था, वहीं अब 3.50 प्रतिशत है। 2013-14 में औद्योगिक विकास दर जहां 4.2 प्रतिशत थी, वहीं अब 4.5 प्रतिशत है। एफ.डी.आई. 36 बिलियन डाॅलर से 60 बिलियन डाॅलर हो गई है। सबसे बड़ी बात यह कि महंगाई दर जो पूरे आर्थिक विकास को अस्त-व्यस्त कर देती है, वह यू.पी.ए. सरकार के दौर में 9.49 प्रतिशत थी जो मोदी सरकार के दौर में 4 प्रतिशत के अंदर ही है। थोक मुद्रा की स्थिति जहां यू.पी.ए. के दौर में 5.98 प्रतिशत थी, वहीं अब 1.20 प्रतिशत मात्र है। तस्वीर का एक पहलू यह भी है कि समाज कल्याण के कार्यों में भी मोदी सरकार आगे है। 2013-14 में शिक्षा पर खर्च 65.867 करोड़ रुपये था, जो 2016-17 में 78.868 रुपये है। स्वास्थ्य सेवाओं में खर्च जहां 37.330 करोड़ रुपये था वहीं अब 48.878 करोड़ रुपये है। यहां तक कि मनरेगा में जहां 2013-14 में 1.518-160 करोड़ रुपये खर्च किए गए वही 2016-17 में 1.522-346 करोड़ खर्च किए गए। भारत का चालू घाटा नियंत्रण में है, यह फिलहाल सेफ जोन में है और 2 फीसदी से नीचे है। यू.पी.ए. सरकार के दौर में जहाॅ मात्र दो कि.मी. राजमार्ग बन रहे थे वहीं अब तीस कि.मी. राजमार्ग बन रहे हैं। रेल पटरियों का विस्तार काम तेजी से चल रहा है। सागरमाला योजना के माध्यम से नौ परिवहन के क्षेत्र में द्रुतगति से काम हो रहा है, जिससे ट्रेन की पटरियों और सड़कों पर दबाव कम तो होगा ही, माल की कर दुष्प्रचार कर रहे हैं, क्योंकि ऐसे सभी लोग जांच एजेंसियों की राडार में है और उन्हें देर-सबेर परिणाम भुगतना ही पड़ेगा। दुनिया का इतिहास यही बताता है कि कोई भी दीर्घकालीन हितों को ध्यान में रखकर क्रान्तिकारी कदम उठाने पर कुछ हद तक संक्रमण के दौर से गुजरना पड़ता है। फिर भी भारतीय अर्थव्यवस्था की तस्वीर कहीं से भी निराश और हताशा करने वाली नहीं है। सरकार का आधारभूत ढाॅचे के विनिर्माण से लेकर गरीबों के कल्याण के लिए कहीं भी पैसों की कमी नहीं होने दे रही है। अभी हाल में बैंकों को 2.11 लाख करोड़ की मदद एवं मेगा हाईवे प्लान के लिए 7 लाख करोड़ दिया जाना हमारी अर्थव्यवस्था की मजबूती को बताता है। कुछ समय के लिए तकलीफ जरुर है, जैसे कोई बड़ी सर्जरी के बाद स्वस्थ होने पर भी तेजी से चलने में कुछ समय लगता है। बड़ा सच यह कि जैसा कहा जाता है कि रोम का निर्माण एक दिन में नहीं हुआ था, वही बात सर्वत्र लागू होती है।
राहुल गाॅधी गुजरात की जन सभाओं में कहते घूम रहे हैं कि मोदी ने नोटबंदी और जीएसटी के माध्यम से भारतीय अर्थ व्यवस्था पर दो तारपीडो मारे हैं। पर हकीकत में मोदी ने दो नहीं बल्कि मुख्यतः तीन तारपीडो मारे हैं। पर ये भारतीय अर्थ व्यवस्था पर नहीं वरन भारतीय अर्थ व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार, कालाधन और लूट की संस्कृति पर मारे गये तारपीडो हैं, जिससे भारतीय अर्थ व्यवस्था युवा एवं स्वस्थ्य होने की राह पर द्रुतगति से चल पड़ी है। मोदी विरोधी चाहे जो कहें पर औसत भारतीय मोदी के इन तारपीडो के हमलों को लेकर उनके साथ खड़ा है।

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