लेखक परिचय

अशोक “प्रवृद्ध”

अशोक “प्रवृद्ध”

बाल्यकाल से ही अवकाश के समय अपने पितामह और उनके विद्वान मित्रों को वाल्मीकिय रामायण , महाभारत, पुराण, इतिहासादि ग्रन्थों को पढ़ कर सुनाने के क्रम में पुरातन धार्मिक-आध्यात्मिक, ऐतिहासिक, राजनीतिक विषयों के अध्ययन- मनन के प्रति मन में लगी लगन वैदिक ग्रन्थों के अध्ययन-मनन-चिन्तन तक ले गई और इस लगन और ईच्छा की पूर्ति हेतु आज भी पुरातन ग्रन्थों, पुरातात्विक स्थलों का अध्ययन , अनुसन्धान व लेखन शौक और कार्य दोनों । शाश्वत्त सत्य अर्थात चिरन्तन सनातन सत्य के अध्ययन व अनुसंधान हेतु निरन्तर रत्त रहकर कई पत्र-पत्रिकाओं , इलेक्ट्रोनिक व अन्तर्जाल संचार माध्यमों के लिए संस्कृत, हिन्दी, नागपुरी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ में स्वतंत्र लेखन ।

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अशोक “प्रवृद्ध”

morning walk

यह एक सर्वसिद्ध बात है कि आदि काल से ही प्रकृति और मानव में जन्मजातसाहचर्य रहा है और मानव प्रकृति की शस्य-श्यामल-गोद में जन्म लेता,पलता और उसी के विस्तृत प्रांगण में क्रीड़ा कर अंतर्लीन हो जाता है। मानव शरीर का निर्माण भी पाँच प्राकृतिक तत्त्वों – पृथ्वी (मिट्टी),जल,अग्नि,आकाश और वायु से हुआ है। ये पाँचों ही तत्त्व मानव जीवन के लिये प्रत्येक क्षण कल्याणप्रद हैं। प्रकृति का यह विचित्र विधान है कि जिन तत्त्वों से प्राणी के शरीर का निर्माण हुआ,पुनः उन्हीं तत्त्वों से उसकी प्राकृतिक चिकित्साएँ भी होती हैं और मृत्युपर्यन्त उन्हीं पाँच तत्वों में मिल जाता है । प्रकृति द्वारा प्रदत्त आठ ऐसे चिकित्सक मानव को प्राप्त हैं, जिनके सहयोग तथा उचित सेवन से मानव यथासम्भव आरोग्य प्राप्त कर सकते हैं। वे चिकित्सक हैं- वायु,आहार,जल,उपवास,सूर्य, व्यायाम, विचार,निद्रा।प्रकृति प्रदत्त इन आठ चिकित्सकों में भी वायु को प्रथम माना गया है ।

 

यह सर्वप्रसिद्ध तथ्य है कि मानव-जीवन में वायु का स्थान जल से भी अधिक महत्वपूर्ण है। वेद में कहा गया है कि वायु अमृत है, वायु प्राणरूप में स्थित है। प्रातः काल वायु-सेवन करने से देह की धातुएँ और उपधातुएँ शुद्ध और पुष्ट होती हैं, मनुष्य बुद्धिमान और बलवान बनता है, नेत्र और श्रवणेन्द्रियों की शक्ति बढ़ती है तथा इन्द्रिय-निग्रह होता है एवं शान्ति मिलती है। प्रातः कालीन शीतल वायु पुष्पों के सौरभ को लेकर अपने पथ में सर्वत्र विकीर्ण करता है, अतः उस समय वायु-सेवन करने से मन प्रफुल्लित और प्रसन्न रहता है, साथ ही आनन्द की अनुभूति भी होती है।परमेश्वरोक्त ग्रंथ वेदों में भी प्रातः भ्रमण और प्रातः भ्रमण के लाभों का वर्णन अंकित है । प्रभात बेला के वायु सेवन के लाभों का जिक्र करते हुए अथर्ववेद कहता है –

स्योनाद् योनेरधि बुध्यमानौ हसामुदौ महसा मोदमानौ ।

सुगू सुपुत्रौ सुगृहौ तराथो जीवावुषसोविभाती: ॥- अथर्ववेद 14-2-43

अर्थात – सुखप्रद शय्या से उठते हुए, आनंद चित्त से प्रेममय हर्ष मनाते हुए, सुंदर आचरण सेयुक्त, श्रेष्ठ पुत्रादि संतान,उत्तम गौ, सुखसामग्री से युक्त घर में निवास करते हुएसुंदर प्रकाश युक्त प्रभात वेला का दीर्घायुके लिए सेवन करो।

 

इसके आगे के मंत्र में प्रात: भ्रमण के लाभ का वर्णन करते हुए कहा गया है-

नवं वसान: सुरभि: सुवासा उदागां जीवउषसो विभाती:  ।

आण्डात्पतत्रीवामुक्षि विश्वस्मादेनसस्परि ॥ -अथर्ववेद 14-2-44

अर्थात -स्वच्छ नये जैसे आवास और परिधान कपड़े आदि के साथस्वच्छ वायु में सांस लेने वाला मैं आलस्यजैसी बुरी आदतों से छुटकर, विशेष रूप से सुंदर लगने वाली  प्रात:उषा काल में उठ कर अपने घर से निकल कर घूमने चलपड़ता हूं जैसे एक पक्षी अपने अण्डे मेंसे निकल कर चल पड़ता है।

प्रात: भ्रमण के दुर्लभ लाभका वर्णन करते हुए आगे कहा है-

शुम्भनी द्यावा पृथिवी अन्तिसुम्ने महिव्रते ।

आप: सप्तसुस्रुवुदेवीस्ता नो मुञ्चन्त्वंहस: ॥ – अथर्ववेद 14-2-45

अर्थात – सुंदर प्रकृति ने मनुष्य को सुख देने का एक महाव्रतले रखा है। उन जनों को जो जीवन मेंप्राकृतिक वातावरण के समीप रहते हैंसुख देने के लिए मानव शरीर में प्रवाहितहोने वाले सात दैवीय जल तत्व हमारेदु:ख रूपी रोगों से छुड़ाते हैं ।

 

प्रात: कालीन उषा प्रकृति के सेवनद्वारा सुख देने वाले वे मानव शरीर के सातजल तत्व अथर्व वेद के 10-2-11 में उल्लिखित मंत्र में बताए गए हैं-

को आस्मिन्नापो व्यदधाद् विषूवृत: सिन्धुसृत्याय जाता:।

तीव्रा अरुणा लोहिनीस्ताम्रधूम्राऊर्ध्वा अवांची: पुरुषे तिरश्ची:॥- अथर्ववेद 10-2-11

अर्थात – परमेश्वर ने मनुष्य में रस रक्तादि के रूप में(सप्तसिंधुओं) सात भिन्न भिन्नजलों को मानवशरीर में स्थापित किया है । वेअलग अलग प्रवाहित होते हैं । अतिशय रूप से –अलग अलग नदियों की तरह बहने केलिए उन का निर्माण गहरे लाल रंग के, ताम्बे के रंगके, धुएं के रंग इत्यादि के ये जल (रक्तादि)शरीर में ऊपर नीचे और तिरछेसब ओर आते जाते हैं. ।

इस मंत्र में वर्णित सप्तसिंधु की पुष्टि आधुनिक विज्ञान भी करता है ।आधुनिक शरीर शास्त्र केअनुसार ये सात जल तत्व निम्न बताए जाते हैं- मस्तिष्क सुषुम्णा में प्रवाहित होने वाला रस(Cerebra –Spinal Fluid), मुख लाला (Saliva),पेट के पाचन रस (Digestive juices),क्लोम ग्रन्थि अर्थात पाचन में सहायक रस (Pancreatic juices),पित्त रस ( liver Bile),रक्त (Blood), और लिम्फ  (Lymph )।अथर्ववेद के अनुसार यही सात रस मिल कर सप्त आप: अर्थात सप्त प्राण: यथा, पाँच ज्ञानेन्द्रियों,  मन और  बुद्धि का संचालन करतेहैं ।

लोगों के आपस में मिलने पर अभिवादन करने की अपनी विशिष्ट परिपाटी भारत में प्रचलित है ।अथर्ववेद में भ्रमण में पारस्परिक नमस्कार के लाभों का भी वर्णन अंकित है । भारतीयसंस्कृति में प्रात: काल भ्रमण में जितने लोग मिलते हैंउन सब को यथायोग्य नमन करनेकी परम्परा अथर्ववेद 14-2-46 में उल्लिखित मंत्र के आधार परआधारित है। अथर्ववेद 14-2-46 में कहा है –

सूर्यायै देवेभ्यो मित्राय वरुणाय च ।

ये भूतस्य प्रचेतसस्तेभ्य इदमकरं नम: ॥ – अथर्ववेद 14-2-46

अर्थात – सूर्य इत्यादि प्राकृतिक देवताओं को,  सब मिलने वालेमित्रों जनों को जो सम्पूर्ण भौतिक जगत को प्रस्तुतकरते हैं हमारा नमन है ।

 

 

वैदिक परम्परा के अनुसार शुद्ध वायु, शुद्ध जल, शुद्ध भूमि, शुद्ध प्रकाश एवं शुद्ध अन्न यह पंचामृतकहलाता है। प्रातः कालीन वायुसेवन तथा भ्रमण सहस्रों रोगों की एक रामबाण औषधि है। शरीर, मन, प्राण, ब्रह्मचर्य, पवित्रता, प्रसन्नता, ओज, तेज, बल, सामर्थ्य, चिर-यौवन और चिर उल्लास बनाये रखने के लिए शुद्ध वायु-सेवन तथा प्रातः कालीन भ्रमण अति आवश्यक है। प्रातः काल का वायु-सेवन ब्रह्मवेला का अमृतपानकहा गया है।

 

 

इसमें कोई शक नहीं कि प्रातः भ्रमण अर्थात सुबह की सैर लाभदायी होती है और इससे लोग स्वच्छ हवा का सेवन कर स्वतः स्फूर्त महसूस करते हैं ।प्रातःकाल की खुली स्वच्छ वायु में भ्रमण करने से शरीर रोगमुक्त रहता है अथवा जिन रोगों से मानव ग्रसित रहते हैं, उनमें कुछ राहत अवश्य महसूस होती है । बच्चे हों या बुजुर्ग, महिला हो या पुरुष सभी वय की आयु के लोगों के लिए अच्छी सेहत हेतु प्रातः भ्रमण एक संजीवनी है। प्रातः भ्रमण सेहत बनाने का बहुत सरल, सस्ता और सुविधाजनक उपाय है। प्रातःकाल का समय सर्वोत्तम होता है, क्योंकि इस समय हवा शुद्ध और प्रदूषण रहित होती है एवं प्राकृतिक छटा और सूर्योदय की लालिमा सुहावनी और शांतिप्रिय होती है।

 

आधुनिक विज्ञान के अनुसार भी प्रातः भ्रमण से अनेक लाभ हैं । प्रातः भ्रमण नियमित रूप से करने से न केवल मांसपेशियाँ मजबूत होती हैं, बल्कि बाजुओं, पेट एवं जाँघों से भी अतिरिक्त चर्बी कम होती है। जितनी अधिक हम सैर करेंगे उतनी ही अधिक कैलोरीज बर्न होगी और मोटापा कम होगा। प्रातःकाल की खुली स्वच्छ वायु फेफड़ों में रक्त शुद्ध करने की क्रिया को प्रभावशाली बनाती है। इससे शरीर में ऑक्सीहीमोग्लोबीन बनता है, जो कोशिकाओं को शुद्ध ऑक्सीजन पहुँचाता है।हृदय, रक्तचाप, स्नायु रोग, मधुमेह आदि के रोगियों को भी प्रातः भ्रमण की चिकित्सकों द्वारा सलाह दी जाती है। प्रातः भ्रमण हड्डियों के घनत्व को भी बढ़ाती है। टहलने से न केवल शारीरिक, बल्कि मानसिक क्षमता भी बढ़ जाती है एवं तनाव दूर होता है। इसलिए प्रतिदिन कुछ किलोमीटरप्रातः भ्रमण  अत्यंत व अवश्य लाभकारी है , परन्तु इसमें कुछ ध्यान देने योग्य बातें  भी हैं ।जिन पर ध्यान रख अथवा विशेषज्ञों के सलाह अनुसार  अपनी व्यस्त दिनचर्या में से कुछ समय  निकालअपने तन और मन को स्वस्थ रखने हेतु संकल्प लेकर कुछ समय प्रकृति के उपहारस्वरूप प्राप्त प्रदूषण मुक्त सुबह की ठंडी सुहावनी हवा में व्यतीत करना अत्यंत श्रेयस्कर है।

 

 

 

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