स्वान्त्र्योत्तर भारत का सर्वाधिक बड़ा निर्णय : उच्च मूल्यवर्ग के बैंकनोटों का विमुद्रीकरण

कल जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए 500 और एक हजार रुपये के पुराने नोट बंद करने की घोषणा की और कि अब लोगों के पास मौजूद पांच सौ और एक हजार के नोट बाजार में मान्य नहीं होंगे तो देश भर में गजब का उत्साह छा गया. सम्पूर्ण देश के आम नागरिक इस स्थिति में अपनी विकट व विकराल समस्याओं को भी समझ रहें थे तब जिस प्रकार के प्रसंशा भाव को वे व्यक्त कर रहे थे या देश के नेतृत्व पर जिस प्रकार विश्वास व्यक्त कर रहे थे वह गजब के चरम राष्ट्रवाद के क्षण थे

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कालखंड या समय या इतिहास को हम दो भागों में विभाजित करते हैं, एक bc अर्थात बिफोर क्राइस्ट और दुसरे dc अर्थात एन्नो डोमिनी. इसी प्रकार अब यह सुनिश्चित हो गया है कि स्वातंत्र्योत्तर भारत की अर्थव्यवस्था अब दो कालखंडो से जानी जायेगी एक नरेंद्र मोदी के पूर्व 500-1000 के नोटों के बंद होने के पूर्व की भारतीय अर्थव्यवस्था और दुसरी नरेंद्र मोदी द्वारा इस प्रतिबंध के बाद की भारतीय अर्थव्यवस्था.
आठ नवम्बर को रात्रि 8 बजे राष्ट्र के नाम सन्देश में नरेंद्र मोदी ने जब देश को यह बताया कि आज रात्रि 12 बजे के बाद देश में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी 500 व 1000 के नोट चलने योग्य नहीं रहेंगे या लीगल टेंडर नहीं रहेंगे तो लोग अतिशय भोचक्के व हो गए व अतिशय प्रसन्नता व मोदी के प्रति प्रसंशा भाव से भी भर गए. मोदी के प्रसंशकों ने मोदी की मुखर प्रसंशा करने लगे तो विरोधियों को अपने मन में आये प्रसंशा भाव को मजबूरी में दबाने को विवश होना पड़ा. स्थिति यह बन गयी कि मोदी विरोधी राजनेताओं को बरबस ही विरोध जताने के लिए थोथे, खोखले व अर्थहीन आरोपों को खोजना पड़ा. मुख्य विरोधी दल कांग्रेस की इस पर जो प्रतिक्रया रही वह बड़ी हास्यास्पद रही. खैर ये तो स्वाभाविक ही था!!
कल जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए 500 और एक हजार रुपये के पुराने नोट बंद करने की घोषणा की और कि अब लोगों के पास मौजूद पांच सौ और एक हजार के नोट बाजार में मान्य नहीं होंगे तो देश भर में गजब का उत्साह छा गया. सम्पूर्ण देश के आम नागरिक इस स्थिति में अपनी विकट व विकराल समस्याओं को भी समझ रहें थे तब जिस प्रकार के प्रसंशा भाव को वे व्यक्त कर रहे थे या देश के नेतृत्व पर जिस प्रकार विश्वास व्यक्त कर रहे थे वह गजब के चरम राष्ट्रवाद के क्षण थे. एक ओर जहां देश भर में इस एतिहासिक निर्णय को लेकर आम जनों में बेहद उत्सुकता, प्रसंशा व राष्ट्रवाद की भावना व्यक्त हो रही थी तो वहीं दूसरी ओर अमेरिका के चुनाव परिणामों में मोदी की प्रसंशा भरा चुनाव अभियान चलाने वाले डोनाल्ड ट्रंप चुनाव में जीत की ओर बढ़ रहे थे.
निश्चित ही यह भारत देश का सर्वाधिक बड़ा व सकारात्मक निर्णय है. देश में बड़ी मात्रा में चल रहे नकली नोटों, आतंकवादी घटनाओं में प्रयुक्त हो रही नकली व अवैध करेंसी, देश में अंदरूनी तौर पर मौजूद काले धन को समेटने, पेपरलेस करेंसी के चलन को बढ़ाने, नशीली ड्रग्स के धंधे को रोकने व अधिकाधिक लेनदेन बैंक के माध्यम से करने के दुर्लभ लक्ष्य को नरेंद्र मोदी ने अपने एक निशाने या निर्णय से लगभग प्राप्त ही कर लिया है. देश में एक चिंताजनक समाचार यह भी आया है कि पड़ोसी पाकिस्तान से 12 हजार करोड़ की नकली नोटों की खेप शीघ्र ही भारत आने वाली थी या आ गई है. यदि इतनी बड़ी संख्या में नकली करेंसी भारतीय बाजारों में विलीन हो जाती तो समझा जा सकता है कि देश की अर्थव्यवस्था को कितना बड़ा व असहनीय धक्का लगता. वैसे ये समाचार कोई नया नहीं हैं पाकिस्तान के सरंक्षण में पल बढ़ रहे आतंकवादी इसके पूर्व बहुधा ही अपने यहां छपी नकली करेंसी को भारत के बाजारों में खपा कर अपने षड्यंत्रों को पैसा भी पुराते रहे हैं और भारतीय अर्थव्यवस्था को खोखला भी करते रहें हैं. ये लोग नकली करेंसी के माध्यम से ही पीढ़ियों को बर्बाद कर देनें वाली ड्रग्स का धंधा भी नकली नोटों के माध्यम से ही चलाते थे. यह बात भी किसी से छिपी नहीं है कि नकली करेंसी का लगभग 100% हिस्सा 500 व 1000 के नोटों के रूप में ही आता रहा है. इस निर्णय को लेनें में कितने बड़े आत्मविश्वास की आवश्यकता हुई होगी यह भारत का प्रत्येक भोला भाला व अनपढ़ नागरिक व शिक्षित नागरिक दोनों ही भली भांति समझ रहें हैं. आम व गरीब नागरिक को इस निर्णय से बड़ी ही विशाल परेशानी होगी उसके बाद भी जिस प्रकार इस निर्णय का ईमानदार आम नागरिक, कारोबारियों, उद्धमियों व नौकरीपेशा वर्ग ने स्वागत किया है वह कल्पना से परे है. निश्चित ही असीमित परेशानी व संकट में यदि कोई पड़ रहा है तो वह है बईमान, भ्रष्टाचारी व काले धंधें में लिप्त लोग ही हैं.

अंत में एक चुटकुला: कांग्रेस के शासन काल में मनमोहन सिंह ने चवन्नी को बंद कर दिया था. कहा जा रहा है कि जो जितना बड़ा आदमी होगा वह उतना ही बड़ा काम करेगा.

1 thought on “स्वान्त्र्योत्तर भारत का सर्वाधिक बड़ा निर्णय : उच्च मूल्यवर्ग के बैंकनोटों का विमुद्रीकरण

  1. प्रवीण गुगनानी जी,इतिहास को अपने ढंग से लिखने का प्रयत्न मत कीजिये.पता लगाइये कि जनता पार्टी की सरकार १९७८ में यह काम कर चुकी है या नहीं?उस समय की मोरार जी देसाई सरकार ने तो ५०० रुपये से अधिक वाले सब नोटों को बंद कर दिया था.उन्होंने १००० वाले नोट के बदले दो हजार या ५००० वाले नोट के बदले १०००० के नोट नहीं लागू किये थे.यह दूसरी बात है कि बाद की सरकारों ने १००० के नोट फिर से लागू कर दिए थे.अगर विमुद्रीकरण करना ही था ,तो १००० के बदले २००० के नोट लाने का क्या तुक है? कालांतर में यह काला धन रखने वालों और नकली नोट छापने वालों के लिए के लिए अधिक सुविधा जनक होगा.अच्छा तो यह होता कि १०० रूपये से अधिक वाले नोट हमेशा के लिए बंद कर दिए जाते.

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