लेखक परिचय

संजय सक्‍सेना

संजय सक्‍सेना

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के लखनऊ निवासी संजय कुमार सक्सेना ने पत्रकारिता में परास्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद मिशन के रूप में पत्रकारिता की शुरूआत 1990 में लखनऊ से ही प्रकाशित हिन्दी समाचार पत्र 'नवजीवन' से की।यह सफर आगे बढ़ा तो 'दैनिक जागरण' बरेली और मुरादाबाद में बतौर उप-संपादक/रिपोर्टर अगले पड़ाव पर पहुंचा। इसके पश्चात एक बार फिर लेखक को अपनी जन्मस्थली लखनऊ से प्रकाशित समाचार पत्र 'स्वतंत्र चेतना' और 'राष्ट्रीय स्वरूप' में काम करने का मौका मिला। इस दौरान विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं जैसे दैनिक 'आज' 'पंजाब केसरी' 'मिलाप' 'सहारा समय' ' इंडिया न्यूज''नई सदी' 'प्रवक्ता' आदि में समय-समय पर राजनीतिक लेखों के अलावा क्राइम रिपोर्ट पर आधारित पत्रिकाओं 'सत्यकथा ' 'मनोहर कहानियां' 'महानगर कहानियां' में भी स्वतंत्र लेखन का कार्य करता रहा तो ई न्यूज पोर्टल 'प्रभासाक्षी' से जुड़ने का अवसर भी मिला।

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अखिलेश को ताज,मुलायम को सम्मान मिला
  संजय सक्सेना
समाजवादी पार्टी के एक वर्ष में दोबारा अध्यक्ष चुने गये अखिलेश यादव की अगुवाई में अब सपा 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव और 2022 के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में मैदान में उतरेगी। ऐसा इस लिये होगा क्योंकि समाजवादी पार्टी के संविधान में सशोधन करके राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यकाल तीन से पांच वर्ष तक बढ़ा दिया गया है। अखिलेश के पहली बार और दोबारा राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने जाने के दौरान बस फर्क इतना रहा कि पहली बार जब सपा के सत्ता में रहते, नवाबों की नगरी लखनऊ में अखिलेश की अध्यक्ष पद पर ताजपोशी हुई थी तब न तो उन्हें पिता मुलायम सिंह का आशीर्वाद मिला था, न ही चचा शिवपाल यादव ने उन्हें मुबारकबाद दी, हो सकता है सत्ता से बेदखली में बाप-चचा की बेरूखी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो, परंतु मोहब्बत की नगरी आगरा में जब समाजवादी अधिवेशन में पांच वर्षो के लिये अखिलेश को राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित किया गया तो अखिलेश बाप-चचा का आशीर्वाद हासिल करने में कामयाब रहे, यह और बात थी कि मुलायम और शिवपाल ने आगरा अधिवेशन से दूरी बना कर रखी। देखने वाली बात यह होगी कि दूसरी बार अध्यक्ष बने अखिलेश यादव के लिये बाप-चचा का आशीर्वाद 2019 और 2022 में कितना काम आता है। क्योंकि राजनैतिक पंडित तो यही कह रहे हैं कि सिर्फ आशीर्वाद से काम नहीं चलने वाला है। राष्ट्रीय राजनीति में मोदी युग के बाद पूरे देश का सियासी तानाबाना काफी बदल गया है। अखिलेश को इस बात का अहसास  2014 और 2017 में भली प्रकार हो भी चुका है। ‘सबका साथ,सबका विकास’ का नारा देकर वोट बैंक की सियासत में मोदी ने तमाम दिग्गजों को पीछे छोड़ दिया है। कभी समाजवादी पार्टी का मजबूत वोट बैंक समझा जाने वाला पिछड़ा समाज और बसपा का दलित वोटर का बीजेपी के प्रति झुकाव इस बात का प्रमाण रहा,जिसने लोकसभा और विधान सभा दोनों में ही महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाहन किया।
समाजवादी पार्टी के अस्तित्व में आने के 25 साल बाद पहली बार पूरी पार्टी अखिलेश यादव की हो गई। 05 अक्टूबर 2017 को राष्ट्रीय अधिवेशन वाले दिन सुबह से ही परिवार में सुलह बढ़ती नजर आने लगी थी। अध्यक्ष के रूप में पांच साल के लिए अखिलेश की ताजपोशी हुई, तो उस पर पिता मुलायम सिंह व शिवपाल की मुहर भी लग गई। लखनऊ में हुए सम्मेलन की तरह इस बार अखिलेश के निशाने पर शिवपाल नहीं थे तो शिवपाल की भी भाव-भंगिमा बदली हुई थी। कुल मिलाकर आगरा में समाजवादी पार्टी का अधिवेशन अखिलेश यादव को नई उर्जा दे गया। वह न केवल समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गये बल्कि उन्हें पिता मुलायम सिंह यादव का आशीर्वाद भी मिल गया जिन्होंने ऐन वक्त पर अलग राजनैतिक दल बनाने का अपना इरादा बदल दिया। सूत्र बताते हैं कि जब आगरा में सपा को अधिवेशन हो रहा था, उसी समय लखनऊ में मुलायम के नेतृत्व में नई पार्टी बनाने की नींव एक तरह से रख ली गई थी, जिसकी रूपरेखा 25 सितंबर को तय कर ली गई थी, लेकिन अखिलेश की चतुराई से ऐसा हो नहीं सका। अन्यथा अखिलेश के लिये बड़ी मुश्किल खडी हो जाती।
खैर, इसके पीछे तमाम किंतु-परंतु हो सकते हैं, लेकिन नेताजी के नई पार्टी बनाने से कदम पीछे खींचने की सबसे बड़ी वजह एक बार नेताजी का पुत्र मोह ही रहा। मुलायम को करीब से जानने वालों को पता है कि नेताजी कहें कुछ भी लेकिन दुनिया में वह अखिलेश से अघिक किसी को प्यार नहीं करते हैं। किसी रिश्ते को तवज्जो नहीं देते हैं। वह अखिलेश को फलता-फूलता देखना चाहते हैं। इसके लिये हर जतन करते हैं। बस, फर्क इतना भर है कि अखिलेश अपने बनाये रास्ते पर चलना चाहते हैं जबकि पिता मुलायम चाहते हैं कि बेटा उसी मार्ग पर आगे बढ़े जिस मार्ग को उन्होंने वर्षो की ‘तपस्या’ के बाद तैयार किया है। नेताजी का पुत्र मोह ही था जो उनका पर्यावरण इंजीनियर बेटा अखिलेश सियासत के मैदान में कूदा। नेताजी ने पहले बेटे को सांसद बनाया, फिर उसकी पत्नी डिपंल यादव को लोकसभा में भेजा। नेताजी के करीबी बताते हैं कि वह दिन में कई बार अखिलेश से फोन पर बात करते थे, अगर एक बार भी अखिलेश फोन नहीं उठाते तो वह बेचैन हो जाते थे। यह सिलसिला लगातार चलाता रहा। पुत्र मोह में ही मुलायम ने परिवार के विरोध की परवाह न करते हुए अखिलेश को सीएम की कुर्सी तक सौपी थी,जबकि वह चाहते तो स्वयं या फिर शिवपाल यादव को जो अपने आप को सीएम पद का प्रबल दावेदार समझ रहे थे, को यह मौका दे सकते थे। अखिलेश को सीएम बनाये जाने से शिवपाल की नाराजगी किसी से छिपी नहीं रह पाई थी। अखिलेश ने सीएम की कुर्सी संभालते ही प्रदेश के विकास को अपना सियासी हथियार बना लिया।
़ मुलायम पुत्रमोह में फंसे रहे तो अखिलेश ने भी एक आज्ञाकारी बेटे की भूमिका निभाने में कभी कोताही नहीं की। 2012 में विधान सभा चुनाव जीतने के बाद नेताजी की मर्जी के अनुसार अखिलेश ने मंत्रिपरिषद का गठन किया। इस वजह से अखिलेश के कई करीबी नेता जो मंत्री पद के प्रबल दावेदार थे, नाराज भी हो गये थे। नेताजी की खास आईएएस अनीता सिंह को प्रमुख सचिव बनाया, जिनको पांच साल तक नहीं हटाया। अखिलेश को पता था कि मुलायम अपने सभी काम अनीता सिंह के माध्यम से ही कराते हैं,लेकिन सीएम रहते अखिलेश ने कभी इस इसमें दखलंदाजी नहीं की। मुलायम ही नहीं, चचा शिवपाल यादव भी अखिलेश राज में अपने आप को सुपर सीएम समझते थे। वह सभी विभागों में सीधा दखल देते थे। मुलायम सिंह शिवपाल यादव और आजम खान का  ही नहीं प्रमुख सचिव अनीता सिंह का भी अखिलेश राज में सिक्का चलता था। इसी लिये विपक्ष हमेशा साढ़े चार मुख्यमंत्री की बात कहता रहता था। यह सब 2014 लोकसभा चुनाव तक तो चलता रहा, परंतु जब आम चुनाव के नतीजे आये और समाजवादी पार्टी पांच सीटों पर सिमट गई तो नेताजी से लेकर शिवपाल यादव तक ने हार का ठीकरा अखिलेश के सिर फोड़ दिया। अखिलेश ने तेवर बदल लिये। वह फ्रंट मोर्चे पर आ गये। उन्होंने सबसे साथ-साथ नेताजी की भी सुनना बंद कर दिया।
अखिलेश जिद्दी बचपन से ही थे। मगर बचपन की बात और होती है। सीएम की कुर्सी पर रहकर जिद्द कराना उनको भारी पड़ने लगा बाप-चचा के इगो को ठेस लगी तो कुछ लोग घर के झगड़े की आग में घी डालने का काम करने लगे। इसमंें अमर सिंह से लेकर माॅ साधना सिंह, शिवपाल यादव, प्रो0 रामगोपाल यादव सहित तमाम नाम उछले। इसके बाद क्या हुआ, किसी से छिपा नहीं है। अखिलेश ने अपना घर बदला तो माॅ साधना से मनमुटाव की खबरे आने लगी। जिद्दी अखिलेश ने उन चचा को भी मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखा दिया जिनकी गोद में बैठकर वह कभी खेला करते थे। अखिलेश, बाप के आदेश की नाफरमानी नहीं कर सकते थे,इस लिये उन्होंने पिता मुलायम सिंह यादव से सियासी दूरी बना ली। वह सरकारी फैसलों पर उनसे राय-मशविरा करने में कतराने लगे। इस वजह से पिता-पुत्र के बीच दूरियां बढ़ती हीं गईं। समाजवादी पार्टी के नेता भी नहीं समझ पा रहे थे कि वह किसी ओर जायें। इसका अंजाम यह हुआ कि अखिलेश ने बगावत कर दी और लखनऊ में सपा को राष्ट्रीय अधिवेशन बुला कर अपने आप को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित करके नेताजी को संरक्षक बना दिया। चचा शिवपाल यादव को सरकार के बाद संगठन से भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
तब लगा कि पूरे ड्रामें का पटाक्षेप हो चुका है। मगर नेताजी ने हार नहीं मानी। उन्हें बेनी प्रसाद वर्मा, भगवती सिंह, रेवती रमण जैसे नेताओं के अलावा भाई शिवपाल का साथ मिला हुआ था तो तत्कालीन विधान सभा अध्यक्ष माता प्रसाद पांडेय और आजम खान जैसे नेता दोंनो तरफ मेलजोल बढ़ाये हुए थे। सबसे अधिक हिचकोेले शिवपाल यादव की सियासत मार रही थी। अखिलेश ने उन्हें किनारे कर दिया था और मुलायम सिंह भाई के साथ होते हुए भी पुत्र मोह से उबर नहीं पा रहे थे। इसी के चलते कई बार शिवपाल की फजीहत भी हुई। शिवपाल लगातार इस प्रयास में थे कि नेताजी के साथ मिलकर नया सेक्युलर मोर्चा बना कर अखिलेश को चुनौती दी जाये। आगरा अधिवेशन से पहले इसकी रूप रेखा भी बन गई थी,लेकिन ऐन वक्त पर पिता मुलायम से बात करके अखिलेश ने डेमेज कंट्रोल कर लिया। वह पिताश्री को आगरा अधिवेशन का निमंत्रण देने गये तो बाप-बेटे के बीच की दूरियां काफी कम हो गईं।
सूत्र बताते हैं मुलायम जो शुरू से अखिलेश को सियासत में एडजेस्ट करने में लगे थे उनके सामने अखिलेश ने अपने दिल की बात खुलकर रखी और कहा मैं तो 2000 में इजीनियर बनने के बाद नौकरी करना चाहता था,लेकिन आपने मुझे सांसद बना दिया। मुझे ही नहीं डिंपल को भी लोकसभा भेज दिया। मु.ख्यमंत्री की कुर्सी भी मैंने नहीं मांगी थी,आप चाहते तो स्वयं सीएम बन सकते थे या फिर किसी और अथवा चचाा शिवपाल को यह जिम्मेदारी सौंप सकते थे,परंतु आपने ऐसा नहीं किया। अब मेरे पास सियासत करने के अलावा कोई रास्ता भी तो नहीं बचा है। न मैं नौकरी कर सकता हॅू न ही कोई व्यवसाय। अखिलेश ने कहा, आपने मुझे इतनी बड़ी जिम्मेदारी सौंपी तो मैं पार्टी को मजबूती देने के लिये प्रदेश के विकास में लग गयां। आपनंे कई बार सार्वजनिक मंचों से हमारी क्लास ली मैंने कभी मुंह नहीं खोला। दीपक सिंघल को न चाहते हुए भी चचा के कहने पर मैंने मुख्य सचिव बनाया,जिसकी चर्चा अब जरूरी नहीं है। वह बोले एक्सपे्रस वे बनाने की बात आई तब भी आप नाराज हो गये कि इतना बढ़ा प्रोजेक्ट कैसे पूरा होगा। मैंने यह समय से पहले कर दिखाया।
अखिलेश ने अपना पक्ष रखा तो इस बात पर आश्चर्य भी जताया कि आप ही अपने फैसलों से पलटले रहे। पहले बिहार में गठबंधन किया,फिर तोड़ दिया। हम बीजेपी और मोदी का विरोध कर रहे थे, आप उनके करीब जाते दिखते रहंे। कभी घर के शादी समारोह में बुलाया तो कभी उनके कान में फुसफुसा कर बात की,जिसका जबाव हमें देना पड़ता। कांगे्रस से गठबंधन पर मुलायम सवाल उठाते रहे हैं, इस पर अखिलेश ने कहा गठबंधन में कोई छोटा-बड़ा नहीं होता है। आपने भी तो 1993 में बीएसपी के साथ गठबंधन किया था जिसके उस समय मात्र 11 विधायक थे। अखिलेश ने कहा सार्वजनिक मंच से गलत बयानी से हमारे वोटरों के बीच भी गलत मैसेज जा रहा था। ऐसे ही तमाम मुद्दों पर जब पिता-पुत्र के बीच गलत फहमियां दूर हुई ंतो मुलायम ने यह मान लिया कि उनका बाकी का जीवन तो बैठ कर भी कट सकता है,लेकिन बेटे को अकेले नहीं छोड़ा जा सकता है। इसी के बाद नेताजी ने आगरा न पहंुच कर भी अखिलेश को बधाई दी,जिसका अच्छा मैसेज गया। अब तो यह भी कहा जा रहा है कि शिवपाल भी मान गये हैं कि अखिलेश को किराने करके समाजवादी राजनीति को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है। लगता है इस प्रकार से समाजवादी पार्टी के ड्रामें का पटाक्षेप हो गया है। पुत्रमोह में फंसे पिता मुलायम ने एक बार फिर साबित कर दिया कि उनके लिये अखिलेश के जैसा कोई नहीें है। वह अखिलेश की खुशी के लिये सब कुछ करने को तैयार हैं।

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