नथुनी बाबू

बात का सिलसिला सन 1971 ई से शुरु होता है। मेरा बड़ा बेटा हाई स्कूल का छात्र था। उसकी पढ़ाई के बारे में अपने मित्र श्री महेन्द्र कुमार से चर्चा हो रही थी। उन्होंने नथुनी बाबू के पास ट्यूशन के लिए भेजने का सुझाव दिया। नथुनी बाबू वी.एम. हाई स्कूल में महेंन्द्र बाबू के शिक्षक रहे थे और अब सेवानिवृत्त होकर घर पर ट्यूशन करते हैं। उन्हें no-non·sense  शिक्षक की ख्याति मिली हुई थी। वे लड़कों को बैच में पढ़ाते थे, दस रुपए प्रति छात्र फीस थी उनकी। मुझे महेन्द्र बाबू का सुझाव व्यावहारिक लगा। हम दोनो नथुनी बाबू के घर पर उनसे मिले। उन्होंने मेरे बेटे को पढ़ाना स्वीकार किया। यहाँ से एक स्थाई पारस्परिक सम्मान और स्नेहसिक्त अनुभव की शुरुआत हुई।
नथुनी बाबू लम्बे समय तक बी.एम. हाई स्कूल के साइंस टीचर रहे थे। वे बहुत ही दक्ष और अनुशासनप्रिय शिक्षक के रुप में जाने जाते थे। सायकिल उनकी जानी पहचानी सवारी थी। दुर्भाग्यवश एक दुर्घटना में सायकिल से गिर जाने के कारण उनके पैर की हड़ी टूट गई और लम्बे समय तक पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल में चिकित्साधीन रहने को बाध्य हुए थे। फिर सेवानिवृत्त होकर अपने निवास पर ही ट्यूशन करते थे।  सीवान के अब के जयप्रकाशनगर मोहल्ले में एक खपरैल मकान में वे रहते थे। उसके एक कमरे में कई एक बेंच लगे थे छात्रों के बैठने के लिए, एक टेबल था और मास्टर साहब की एक काठ की कुर्सी। सुबह से लड़के कई बैच में आते, पढ़ते और चले जाते। शाम का वक्त मास्टर साहब ने अपने लिए रखा हुआ था। शाम को उनके मित्र बिहार बैंक के मैनेजर बिन्ध्यवासिनी बाबू, और संस्कृत  कॉलेज के प्राचार्य श्री रामचन्द्र त्रिपाठी  मास्टर साहब के आवास पर पहुँचते और फिर मास्टर साहब अद्धी का गिलहा किया हुआ कुर्ता और शफ्फाक धोती में अपनी मशहूर छड़ी हाथ में लिए उन लोगों के साथ सैर में निकलते। कभी कभार बाबूसाहेब दारोगा साहब(सेवानिवृत्त) बाबू जंगबहादुर सिंह भी साथ में उसी राजसी ठाठ में साथ में हुआ करते। बहरहाल, बात कुछ यों हुई कि हमारा साथ बना तो बना रह गया।  देर शाम को अपने आवास पर लौटते हुए मैं अक्सर मास्टर साहब का दरवाजा खटखटा लिया करता और कुछ देर उनके साथ का आनन्द लिया करता।
नथुनी बाबू ने अपने नियम खुद बनाए थे और सख़्ती से उनपर अमल करते थे। छात्र के घर पर जाकर पढ़ाना उन्हें मंजूर नहीं था , न ही किसी सम्पन्न अथवा उच्चपदस्थ अधिकारी के लड़के को अपने घर पर ही अलग से पढ़ाना. उनकी बात साफ थी—जिसे भी पढ़ना हो बैच में बेंच पर बैठकर उनके उस कमरे में ही पढ़ना होगा। मास्टर साहब के इस नियम को लेकर एक दिलचस्प प्रसंग की चर्चा प्रासंगिक होगी। तत्कालीन अनुमण्डल पदाधिकारी श्री सुखनन्दन सिंह का लड़का सोमेश भी नथुनी बाबू के छात्रों में से एक था।  मेरे बड़े बेटे के बाद छोटा बेटा और फिर बेटी भी उनके पास पढ़ते रहे। बेटी ने जैसे जिद कर लिया कि मैं भी उनसे ही पढ़ूँगी। वह शायद पहली लड़की थी,जिसे मास्टर साहब इनकार नहीं कर सके। सुखनन्दन बाबू की बेटी ने भी मेरी बेटी के साथ योगदान किया। इसके बाद तो मेरे सहकर्मियों और स्थानीय वकीलों के लिए नथुनी बाबू ट्यूटर के रुप में पहली पसन्द थे। मास्टर साहब किसी को इनकार नहीं करते थे। उनके पास कुछ दिन पढ़ने के बाद छात्र खुद ही टिके रहते या हट जाते थे। हमारी समझ थी कि नथुनी बाबू के पढ़ाने का तरीका कुछ ऐसा था कि छात्र की सम्भावनाएँ  विकसित होने का पथ और ऊर्जा पा लेती थीं। उनके छात्रों में से अनेक आज भी समाज और प्रशासन के उच्चतम स्थानों पर राष्ट्र निर्माण में सार्थक योगदान कर रहे हैं।
एक दिलचस्प वाकया पेश आया जब तत्कालीन जिलाधीश श्री हैदर ने अनुमण्डल पदाधिकारी श्री सुखनन्दन सिंह से अपने बेटे के लिए उपयुक्त ट्यूटर के सम्बन्ध में जानकारी चाही तो उन्होंने नथुनी बाबू का नाम लिया. लेकिन साथ ही यह भी  बता दिया कि वे अपने घर पर ही बैच में पढ़ाते हैं।। शायद कलक्टर साहब को विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने मास्टर साहब से खुद मिलना तय किया। एस.डी.ओ. साहब से कहा कि उन्हें खबर करें कि कलक्टर साहब ने बुलाया है। सुखनन्दन बाबू खबर करने बजाय खुद मास्टर साहब के पास आए और उनसे अनुरोध किया कि कलक्टर साहब का बुलावा आए तो कष्ट कर चले जाएँ और उनसे अपनी बात कह दें। नथुनी बाबू किसी तथाकथित बड़े आदमी के दरवाजे नहीं जाया करते थे, लेकिन स्नेहधन्य व्यक्तियों के लिए कोई बन्दिश नहीं थी। हाँ तो हुआ यह कि  नथुनी बाबू कलक्टर की भेजी गाड़ी पर सवार होकर उनके बंगले पर गए तो ठीक, पर बात वही कही जो उन्हे कहना था। दूसरे दिन हैदर साहब का बेटा मास्टर साहब की झोंपड़ी पर पढ़ने आया। उसके पास कोई किताब नहीं थी। उसने बतलाया कि इसके पहले के शहर के मास्टर ही किताबें उसे मुहैय्या कराते थे। मास्टर साहब ने कहा, लेकिन मैं किताबें नहीं देता। दूसरे दिन से उसका आना नहीं हुआ, न ही हैदर साहब ने मास्टर सहब से कोई सम्पर्क किया।
जैसा मैंने पहले कहा है, देर शाम को मैं अक्सर उनका दरवाजा खटखटा लेता। उनके व्यक्तित्व के कोमल पहलू की छुवन मिला करती मुझे। हर साल की सर्दी की एक शाम मुझे मकई की रोटी और मछली का भोजन मिला करता। मेरे तीनो बच्चों को उन्होंने महत्वपूर्ण और स्नेह किए जाने लायक होने के एहसास से सम्पन्न किया।
वे दिन अलग थे, कोचिंग इंस्टिट्यूट्स की संस्कृति नहीं आई थी। फोकस में बस शिक्षक ही हुआ करते थे, शिक्षक अभी शिक्षक ही था, फैसिलिलेटर नहीं बना था वह।

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