लेखक परिचय

जालाराम चौधरी

जालाराम चौधरी

लेखक जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय,जोधपुर में अध्ययनरत हैं,स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। हाल ही में साहित्य के क्षेत्र में नेशनल अवार्ड से सम्मानित। मोबाइल नं.9166993382

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जालाराम चौधरी

राष्ट्रवाद एक ऐसी अवधारणा हैं जिसमें राष्ट्र सर्वोपरि होता है। एक सूत्र में पिरोने का कार्य राष्ट्रवाद की भावना ही करती है। राष्ट्रवाद अर्थात् राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना। जो देशहित में खड़े होने की प्रेरणा देता है। आज के इस दौर में देश जिस मोड़ पर खड़ा है इनकी अपेक्षा देश कई गुनी उन्नति कर सकता है। विकसित देशों से कंधा मिलाने एवं अन्य देशों की नज़र में प्रेरणादायक साबित हो सकता है। इस संदर्भ में कल्पना के घोड़े आज भी दौड़ाए जा रहे हैं किंतु आदर्श राष्ट्रवाद की कामना अधूरी ही हैं। इस हेतु सर्वप्रथम ‘आदर्श’ और ‘कल्पना’ के सह-संबंधों को जानना जरूरी हैं। बेहद सकारात्मक होती हैं,बस उसमें व्यावहारिकता का समावेशन जरूरी हैं। आज राष्ट्र में कहीं-न-कहीं इसी व्यवहारिकता का लोप रहा हैं जिस कारण ये फलीभूत नहीं हो पाए। एक राष्ट्र लम्बे-प्रयासों,त्याग और निष्ठा का चरम बिंदु होता हैं। जिसमें किसी भी प्रकार के भेदभाव,हिंसा,ऊँच-नीच आदि के लिये कोई स्थान न हों तथा एक-दूसरे की विविधता के प्रति सम्मान हों। सपनों की पूर्णता हेतु कर्तव्यबध्द होना अतिआवश्यक हैं। देश की सर्वाङ्गीण उन्नति के लिए देशभक्ति परम आवश्यक हैं। जिस देश के निवासी अपने देश के कल्याण में अपना कल्याण,अपने देश के अभ्युदय में अपना अभ्युदय और अपने देश की समृद्धि में अपनी सुख-समृद्धि समझते हैं वह देश उत्तरोत्तर उन्नतिशील होता हैं,अन्य देशों के सामने गौरव से अपना मस्तक ऊँचा कर सकता हैं। देश की सामाजिक व आर्थिक उन्नति के लिए देशवासियों का देशभक्त होना नितान्त आवश्यक हैं। देश,ऐसे असंख्य उज्ज्वल उदाहरणों से भरा पड़ा हैं जिनमें लोगों ने अपने देश की रक्षा के लिए हँसते-हँसते प्राण न्यौछावर कर दिये। आज देश के युवा वर्ग को इनसे प्रेरणा लेनी चाहिए। क्योंकि युवा ही देश के रीढ़ की हड्डी हैं। युवाओं को देशहित में अपनी पूर्ण शक्ति लगा देनी चाहिये। तब नि:सन्देह हमारा भारतवर्ष संसार के उच्चतम राष्ट्रों में गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त करेगा। विद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों के  पाठ्यक्रमो में स्वतंत्रताओ एवं देशभक्ति की गाथाओं का समावेश हों! युवाओं के प्रेरणा के लिए आज हमारी सरकार और नीति-नियंताओ को नए परिप्रेक्ष्य में अपनी शिक्षा प्रणाली के मूल्यांकन की जरूरत हैं जो पढ़े-लिखे बेरोजगारों की फौज तैयार कर रही हैं। जिनके चलते भविष्य के न्यूटन,आइंस्टीन और कालिदास बनने वाली न जाने कितनी प्रतिभाएँ फाँसी के फंदों को चूम लेती हैं। पिछले कुछ वर्षों में,पथ से भटके हुए हमारे ही कुछ बंधुओं ने तर्कहीन धर्मोन्माद में राष्ट्रीय एकता को खण्डित करने का दुष्प्रयास किया हैं। इस समस्या का सामना करना होगा। समवेत स्वर में ही “विविधता में एकता” कायम रहेगी। जब देश में स्वार्थियों एवं भ्रष्टाचारियों का कोई स्थान नहीं होगा। न्याय व्यवस्था बिना भेदभाव किये निष्पक्ष एवं सर्वथा दोषमुक्त होगी। नारी को समुचित आदर के साथ गृहलक्ष्मी माना जाएगा। धर्म की दीवार ढहा दी जायेगी। गाँवो को शिक्षित किया जायेगा। शासन लोकतांत्रिक होगा। प्रत्येक नागरिक अपने अधिकारों व कर्तव्यों के प्रति जागरूक हो जायेगा।
गाँवो की उन्नति के साथ-साथ,ग्राम पंचायतो की स्थापना की जाएं। जो देश को स्वावलम्बन एवं आत्म-निर्भरता की ओर ले जाने में समर्थ हो सकेगी। तब सच्चे अर्थों में राष्ट्रवाद की कल्पना साकार हो पायेगी। सभी को एक ही राष्ट्रभाषा में शिक्षा दी जायेगी ताकि सभी एकता के सूत्र में बंध सकें जिससे आने वाली पीढ़ी भी अपने देश की सभ्यता व संस्कृति से जुड़ी रहें। जब प्रत्येक दृष्टि से एक आदर्श राष्ट्र होगा जिन्हें देखने के लिए विदेशी भी लालायित होंगे। अतः वर्तमान राष्ट्र व्यवस्था की विद्रूपताओं व संभावनाओ को परखते हुए
राजनीतिक,आर्थिक,सामाजिक,सांस् कृतिक,मनोवैज्ञानिक,
धार्मिक व पर्यावरणीय रूप से कैसा होगा,इसी का रूपांकन हमारा अभीष्ट हैं। जिसमें रोजगारोन्मुख तथा ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय ‘ की अवधारणा से पोषित हों ! जो वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना को पूर्ण करेगी।

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