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चंद्रमौलि चंद्रकांत
भारत को लेकर चीन की बेचैनी आजकल नाकाबिले-बर्दाश्त जैसी होती जा रही है। कभी वह पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर की परियोजनाओं में सहयोग करके हमें चिढ़ाने पर उतर आता है, तो कभी कश्मीरियों को अलग पेपर पर वीज़ा जारी करके हमारे धैर्य की परीक्षा लेने लगता है। यही नहीं, चीन ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अरुणाचल प्रदेश के चुनावी दौरे के दस दिन बाद ये कहकर चौंका दिया कि सीमा-विवाद के जारी रहते उन्हें वहां जाकर गड़बड़ी फैलाने की जुर्रत नहीं करनी चाहिए थी।
मगर भारत सरकार के साथ-साथ अरुणाचल की जनता ने भी विधानसभा चुनाव में 72 प्रतिशत मतदान करके साफ कर दिया है कि उस पर चीन का दावा कितना झूठा है। तब सवाल ये उठता है कि ड्रैगन के यूं बार-बार आंखें तरेरने की वे कौन सी वजहें हैं, जो ऊपर से तो किसी को नज़र नहीं आती, मगर भीतर ही भीतर उसके कलेजे में कांटे की तरह चुभ रही हैं? चीन के गुस्से की इन असली वजहों का जायज़ा ले रहे हैं चंद्रकांत चंद्रमौलि:

पिछले महीने तक एशिया के दो महारथियों चीन और भारत के आपसी रिश्तों को लेकर जो खबरें आ रही थीं, उनसे नेहरू-युग के ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ के नारे की भावना इस हद तक आहत हो गई कि दोनोंे मुल्कों ने अपने-अपने कारणों से इन पर पर्दा डालने में ही भलाई समझी, और मामला किसी तरह खत्म कर दिया। जी हां, हमारा इशारा चीन की ओर से जम्मू-कश्मीर में वास्तविक नियंत्रण रेखा के अतिक्रमण की तरफ है, जिसकी खबरें हमारे मीडिया में लगातार आने से चीन परेशान हो उठा और उसके विदेश मंत्रलय ने इसका ज़ोरदार खंडन करते हुए भारतीय मीडिया के इरादों पर ही सवाल उठा दिया।

ज़ाहिर है, इसके बाद भारत ने भी ‘भाईचारा’ निभाते हुए बाकायदा बयान जारी करके ऐलान किया कि चीन की तरफ से किसी ने सीमा का उल्लंघन नहीं किया है, और उसकी फायरिंग में आईटीबीपी (भारत-तिब्बत सीमा पुलिस) के दो जवानों के घायल होने की खबर भी बेबुनियाद है। यही नहीं, भारत सरकार ने एक कदम और आगे जाकर मीडिया को अपनी हद में रहने की कड़ी चेतावनी के संकेत भी दे दिए। लेकिन इसके बावजूद, एक महीना भी नहीं बीता है कि चीन ने मनमोहन सिंह के अरुणाचल प्रदेश आकर चुनाव प्रचार करने पर ही सख्त ऐतराज जता दिया है। ऐसे में तमाम प्रेक्षक सीमा-विवाद से इतर इसके दबे-ढंके कारणों की पड़ताल में लग गए हैं, और इनकी परतें उघड़ती जा रही हैं। हम यहां एक-एक कर ऐसे संभावित कारणों पर रोशनी डालेंगे।

दलाईलामा से एलर्जी
सभी जानते हैं कि शांति के लिए नोबेल पुरस्कार पा चुके तिब्बती धर्मगुरु दलाईलामा चीन को बिलकुल पसंद नहीं हैं। तिब्बत की आज़ादी के पैरोकार दलाईलामा भारत के धर्मशाला शहर (हिमाचल प्रदेश) में रह कर लंबे अरसे से तिब्बत की निर्वासित सरकार की अगुआई कर रहे हैं, जिससे तिब्बत की जंगे-आजादी की लौ बरकरार है। आपको याद होगा पिछले साल बीजिंग ओलंपिक की मशाल यात्रा के मौके पर दिल्ली समेत पूरी दुनिया में तिब्बती नौजवानों ने दलाईलामा के आशीर्वाद से ही चीन के प्रति अपने असंतोष का खुलकर इजहार किया था।

नब्बे के दशक के विपरीत, जब चीन के साथ हमारे व्यापारिक संबंध उतने प्रतिस्पर्धी नहीं थे, और भारत चीन के दबाव में आ जाता था, अब चीन को भारत पर इसलिए गुस्सा आ रहा है कि उसकी आपत्ति के बावजूद यहां की सरकार ने दलाईलामा को अगले महीने अरुणाचल प्रदेश जाने की इजाज़त दे दी है। दलाईलामा अरुणाचल प्रदेश के 90 हजार वर्ग किलोमीटर हिस्से पर चीन के तमाम दावों को झुठलाते हुए इसे भारत का अभिन्न हिस्सा मानते हैं, और खबर है कि वे इस बार वहां के प्राचीन बौद्ध केंद्र तवांग भी जाएंगे, जिसे चीन भारत से मांगता रहा है। चीन को डर है कि दलाईलामा के दौरे से तवांग में उसके विरोध में भावनाएं भड़क सकती हैं, और उसके मंसूबे पूरे होने में और अड़चनें आ सकती हैं। जानकारों की राय में, भारत दलाईलामा के अरुणाचल दौरे का इस्तेमाल चीन को व्यापारिक होड़ में पछाड़ने के लिए कर रहा है, जो बिलकुल ठीक रणनीति है।

तवांग का पुराना तनाव
जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है, अरुणाचल प्रदेश का तवांग शहर भारत और चीन के बीच तनातनी की काफी पुरानी वजह रहा है। सत्रहवीं सदी में तत्कालीन तिब्बती बौद्ध लामा द्वारा बसाए गए इस शहर को चीन अपने पास रखना चाहता है, क्योंकि भारत के साथ सामरिक दृष्टि से इसकी लोकेशन (तिब्बत-भूटान सीमा के पास) काफी अहम है। हो सकता है कि चीन मनमोहन सिंह के अरुणाचल दौरे से इसलिए भी खफा हो कि उसे इसमें दलाईलामा के प्रस्तावित तवांग दौरे की तैयारी की बू आई हो। मगर लंबे समय तक चीन में राजदूत रह चुके पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह के अनुसार, तवांग चीन के साथ विवाद का अपेक्षाकृत नया विषय है। उनके मुताबिक, 1953 के भारत के नक्शे में तवांग को नहीं दिखाया गया था, मगर अच्छा होता यदि इस पर भारत का दावा पक्का करने के लिए प्रधानमंत्री हाल के दौरे में तवांग भी हो आते।

बिजनेस मीन्स बिजनेस
चीन के ताज़ा गुस्से की एक बड़ी वजह ये भी है कि भारत अंतर्राष्ट्रीय बिजनेस में तेजी से उसका प्रतिद्वंद्वी बनकर उभरता जा रहा है। हालांकि भारत का अपना सबसे बड़ा दोतरफा बिजनेस पार्टनर अब भी चीन ही है, जिसके साथ केवल पिछले साल में ही 50 अरब डॉलर का कारोबार दर्ज हुआ है। पिछले 10 साल में चीन के साथ भारत का व्यापार 50 गुना बढ़ चुका है।

ऐसा इसलिए भी संभव हुआ कि चीन ने सिक्किम का कड़वा घूंट पीकर, 40 साल बाद नाथू-ला र्दे को भारत के साथ व्यापार के लिए खोल दिया था। लेकिन दीगर मुल्कों में भारतीय प्रोडक्ट क्वालिटी और साख में चीन के माल को कड़ी टक्कर दे रहे हैं, जिससे चीन बुरी तरह चिढ़ा हुआ है। चीन की चीप-टाइप बिजनेस ट्रिक्स के कारण कई मुल्कों के साथ तो उसके कारोबार और मुनाफे में गिरावट भी आई है। कुछ माह पहले, चीन ने कुछ अफ्रीकी देशों में अपने कारोबार को भारत से कड़ी चुनौती मिलने के बाद वहां भारतीय प्रोडक्ट्स को बदनाम करने की मुहिम छेड़ दी थी, और ‘मेड इन इंडिया’ के नकली ठप्पे लगाकर बड़े पैमाने पर अपना घटिया माल बाज़ार में उतार दिया था। ज़ाहिर है बिजनेस में सीधे ढंग से भारत का मुकाबला न कर पाने के कारण चीन खामख्वाह अरुणाचल जैसे मुद्दे उठाकर इसकी बांहें मरोड़ने की चाल चल रहा है।

भारत-अमेरिका की घनिष्ठता
सोवियत संघ के विभाजन और शीत युद्ध के अंत के बाद, चीन अमेरिका के खिलाफ रूस की जगह लेने की कोशिश कर रहा है। मगर अर्थव्यवस्था के उदारीकरण में अमेरिका का साथ देकर भारत दिनोंदिन उसके नज़दीक आते जा रहा है। लोकतंत्र से मुंह चुराने वाले चीन को लोकतांत्रिक भारत की यह नीति इसलिए रास नहीं आ रही कि इससे एशिया में ही उसे चुनौती देने वाली एक बड़ी ताकत पैदा हो सकती है।

उसे डर है कि इससे दुनिया के ‘बैलेंस ऑफ पावर’ में उसकी भूमिका उतनी असरदार नहीं रह पाएगी। चीन को मालूम है कि भारत में मानव संसाधन और बाज़ार का आकार तकरीबन उसके जैसा ही है, जिसका फायदा उठाकर अमेरिका न केवल भौगोलिक रूप से चीन के काफी नजदीक आकर उसके व्यापार को प्रभावित कर सकता है, बल्कि परोक्षत: रक्षा और राजनय के मामले में भी उसे चुनौती पेश कर सकता है।

मिसाल के तौर पर, हाल में बराक ओबामा अपने नागरिकों को भारतीय और चीनी छात्रों से दिमागी तौर पर मुकाबला करने की नसीहत दे चुके हैं। यही नहीं, पिछले साल जॉर्ज डब्ल्यू. बुश के प्रशासन ने भारत के साथ जो न्युक्लियर डील की थी, उससे भी चीन के माथे पर बल पड़ गए थे। तब चीन की नज़दीकी समझे जाने वाली भारत की मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने यूपीए सरकार से समर्थन वापस लेकर इसे गिराने की कोशिश की थी, लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने गजब की सियासी सूझबूझ दिखाते हुए (अमर सिंह के ज़रिए) कांग्रेस के कटु आलोचक मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी का साथ लेकर सरकार और डील दोनों को बचा लिया था। चीन अमेरिका के साथ भारत की ऐसी ही गलबहियों से झुंझलाया हुआ है, और बहाना मिलते ही भारत को आंख दिखाने लगता है।

पाकिस्तान की पहेली
प्रधानमंत्री के अरुणाचल प्रदेश के दौरे के 10 दिन बाद इस पर आपत्ति जताकर चीन ने साबित कर दिया है कि वह पाकिस्तान के साथ अपनी दोस्ती निभाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। नोट करने वाली बात यह है कि चीन का आपत्ति वाला बयान ऐसे समय आया, जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री युसूफ रज़ा गिलानी चीन के दौरे पर आए हुए थे। जैसा कि ऊपर बताया गया है, अमेरिका और भारत की नजदीकियां आतंकवाद के ‘अंतर्राष्ट्रीय सरदर्द’ पाकिस्तान पर बहुत भारी पड़ रही है।

पहले 9/11, और अब 26/11 के बाद सारी दुनिया जान चुकी है कि दहशत का असली सौदागर पाकिस्तान ही है, जिसके एटमी हथियार ही उसे अंतर्राष्ट्रीय सैनिक कार्रवाई से बचाए हुए हैं। खासकर ओबामा की ताजपोशी के बाद पाकिस्तान अमेरिका की आंखों में उतनी आसानी से धूल नहीं झाेंक पा रहा है, जितना पहले करता था। अब अमेरिका उसे आंख मूंदकर इमदाद देने के बजाय कड़ी शर्ते लगा रहा है, जिससे परेशान होकर गिलानी और ज़रदारी चीन की ओर ज्यादा मुंह ताक रहे हैं। और चीन दक्षिण एशिया के मामलोंे में भारत पर दबाव बनाए रखने के निहित स्वार्थ के चलते पाकिस्तान का पूरा इस्तेमाल करने से नहीं हिचकता।

सीमा विवाद तो है ही 
सीमा विवाद के चलते चीन के साथ भारत 1962 में जंग भी लड़ चुका है, जिसके बाद पं. नेहरू और चाऊ एन लाई ने बड़े जोरशोर से पंचशील के सिद्धांत का पालन करते हुए ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ का नारा दिया था, मगर आपसी बातचीत के 13 दौर बीत जाने के बावजूद आजतक ये मसला हल नहीं हुआ है। 95 साल पहले खींची गई मैकमहोन सीमा रेखा को चीन शुरू से ही नामंजूर करता रहा है, और तिब्बत को अपना हिस्सा बताता आ रहा है।

इधर भारत का कहना है कि चीन ने जम्मू-कश्मीर के 38,000 वर्ग किलोमीटर अक्साई चिन इलाके पर कब्जा कर रखा है, और पाकिस्तान ने भी 1955 में उसकी 5,000 वर्ग किलोमीटर जमीन पर अवैध कब्जा करके चीन को सौंप दिया है। जबकि चीन का आरोप है कि भारत ने अरुणाचल प्रदेश में उसके 90,000 वर्ग किलोमीटर इलाके पर कब्जा कर रखा है, लेकिन भारत इसे सरासर झूठ बताता है।
राहुल गांधी से उम्मीद?
भारत और चीन के आपसी रिश्तों पर नज़र रखने वाले विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर दोनों देशों के राजनीतिक प्रतिष्ठानों के बीच आपसी संवाद उचित स्तर पर बने रहें, तो सीमा समेत कोई भी विवाद ज्यादा तीखे नहीं होंगे, और उनके देर-सबेर सुलझने की उम्मीद भी बनी रहेगी। चीन के साथ मौजूदा कटुता की एक वजह ऐसे संवाद का न होना भी है। खासकर डेढ़ साल पहले अमेरिका के साथ परमाणु समझौते को लेकर वाम दलों और कांग्रेस के रिश्तों में आई तीखी खटास के कारण चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से राजनीतिक संवाद लगभग टूटा हुआ है।

पिछले साल कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी जब अपनी माँ सोनिया गांधी के साथ बीजिंग ओलंपिक के उद्घाटन के मौके पर चीन गए थे, तो उन्होंने कांग्रेस और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ आपसी मेलजोल बढ़ाने के लिए वहां के उपराष्ट्रपति ज़ी जिनपिंग के साथ एमओयू पर दस्तखत किए थे। जिनपिंग को सर्वोच्च चीनी नेता हू जिंताओ का उत्तराधिकारी माना जाता है। लेकिन इस ‘सीधी पहुंच वाले’ एमओयू का कोई भी असर अभी तक दोनों देशों के आपसी रिश्तों की ज़मीन पर तो नज़र नहीं आया है। पर उम्मीद अभी बाकी है।

One Response to “चीन की बेचैनी”

  1. Binay Yadav

    चीन, रूस और अमेरिका – एक त्रिकोण है. कोई भी एक दुसरे के प्रति इमानदार नहीं है. सभी चतुराई करते है. सारे विश्व में आर्थिक तथा सामरिक दादागिरी करते नजर आते है. इनमे रूस और चीन हमारी मित्रता के काबिल है. अमेरिका तो कत्तई नहीं है.

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