लेखक परिचय

निर्मल रानी

निर्मल रानी

अंबाला की रहनेवाली निर्मल रानी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट हैं, पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं...

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-निर्मल रानी

हमारे देश में इस समय सैकड़ों निजी टी वी चैनल्स की भरमार है। इनमें तमाम टी वी चैनल्स तो ऐसे हैं जो विषय विशेष पर आधारित कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं। उदाहरणतया खेलकूद, कार्टून, धार्मिक प्रवचन, मनोरंजन, विज्ञान, सिनेमा, धारावाहिक नाटक आदि विषयों पर आधारित तमाम चैनल्स ऐसे हैं जिन्हें देखकर जनता लाभान्वित होती है,अपना ज्ञान बढ़ाती है अथवा मनोरंजन करती है। परंतु इन्हीं टी वी चैनल्स में समाचार आधरित कुछ प्रमुख चैनल्स ऐसे भी हैं जिनका राष्ट्रीय स्तर पर एकाधिकार माना जा रहा है। इनमें यदि प्रसार भारती के दूरदर्शन के समाचार चैनल्स की हम बात छोड़ दें तो इसके अतिरिक्त लगभग सभी समाचार चैनल्स में इस बात की होड़ लगी सांफ दिखाई दे रही है कि महा अपनी टी आर पी संख्‍या बढ़ाने के चलते यह निजी खबरिया चैनल्स न जाने किस प्रकार से खबरों का संपादन करने लगे हैं।

समाचार चैनल्स का सही मायने में मुख्‍य दायित्व क्या है, इसे लेकर अक्सर चर्चा-परिचर्चा होती रहती है। परंतु पूरी तरह से व्यापारिक हो चुके निजी टी वी चैनल समाचार के स्तर को, समाचार की महत्तता तथा उसकी अहमियत व जनता पर उस समाचार से पड़ने वाले प्रभाव को समझे-बूझे बिना किसी भी ग़ैर जरूरी समाचार को स्वयं प्रमुखता देकर उसे अपने सनसनी फैलाने तथा ढिंढोरा पीटने जैसे विशेष अंदाज में लगातार चलाना व दिखाना देकर शुरु कर देते हैं। मजे की बात तो यह है कि समाचार जगत में देश में अपना एकाधिकार रखने वाले पांच-सात टी वी चैनल्स में इस विषय पर सहमति बनी दिखाई पड़ती है। तभी तो प्राय: यदि इनमें से कोई एक चैनल किसी एक घटना अथवा समाचार को ‘बड़ी खबर’ समझकर उसे प्रमुखता के आधार पर ‘उछालता’ दिखाई देता है तो इसी ‘जुंडली’ के शेष समाचार चैनल्स भी वही राग अलापना शुरु कर देते हैं।

उदाहरण के तौर पर गत् दिनों देश की जनता को डीजल, पैट्रोल, रसोईगैस तथा कैरोसिन ऑयल की मूल्यवृद्धि तथा इनके मूल्यों से सरकारी नियंत्रण हटने जैसी विकट समस्या से रूबरू होना पड़ा। इस महंगाई ने पूरे देश के सभी राजनैतिक दलों को सभी धर्म एवं संप्रदाय के लोगों को यहां तक कि प्रत्येक गरीब-अमीर व हर खास-ओ-आम भारतवासी को प्रभावित किया। निश्चित रूप से यह देशवासियों के लिए एक चिंतित करने वाली अहम खबर थी। नि:संदेह हमारे खबरिया चैनल्स ने इस विषय पर केंद्र सरकार की खूब खाट खड़ी की। करनी भी चाहिए थी। देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी ने इस बढ़ती मंहगाई के विरोध में अगले ही दिन राष्ट्रव्यापी धरना, प्रदर्शन, जुलूस, रैली आदि का आयोजन किया। इत्तेफाक़ से इसी दिन मुंबई में देश की एक प्रसिद्ध मॉडल विवेका बावाजी ने अपने फ्लैट में खुदकुशी कर ली। बस मंहगाई विरोधी प्रदर्शन की खबर तो न जाने कहां चली गई। पूरा देश समाचार टी वी चैनल्स द्वारा जबरन थोपी जाने वाली इस खबर को सुनने के लिए ही मजबूर कर दिया गया कि अमुक मॉडल कौन थी, उसके रिश्ते किस- किस पुरुष मित्रों से थे, वह क्या पहने हुए थी, आत्महत्या के कारण क्या थे, किस प्रकार से उसकी लाश पंखे से लटकी हुई थी वगैरह-वगैरह। मॉडलिंग के क्षेत्र में निश्चित रूप से विवेका बावाजी एक सुपर मॉडल मानी जाती थी। उसका संदेहास्पद तरीके से अंत होना बेशक दुखदायी था। परंतु उसके मरणोपरांत मीडिया देश को यह बता रहा है कि उसके कौन-कौन से पुरुष मित्र थे, उनसे बावा जी के कैसे रिश्ते थे, उसकी लाश के पोस्टमार्टम के बाद उसके पेट से सिगरेट का धुंआ तथा नशीली दवाईयां आदि मिली, इतनी विस्तृत जानकारी को देश को थोपने की आखिर क्या जरूरत थी।

इस बात में कोई संदेह नहीं कि अमुक महिला बहुत महान एवं प्रसिद्ध मॉडल रही होगी। उसकी इस क्षेत्र में बनी प्रतिष्ठा व ख्‍याति के लिहाज से उसकी आत्महत्या के संबंध में खबर प्रसारित किए जाने पर भी कोई आपत्ति नहीं है। परंतु यदि हम महंगाई विरोधी प्रदर्शन तथा मॉडल की खुदकुशी की खबर की आपस में तुलना करें तो हमें कौन सी खबर जनहित से जुड़ी खबर लगती है? मॉडल बाबाजी भले ही कितनी प्रसिद्ध क्यों न रही हों परंतु इसमें कोई दो राय नहीं कि उसके मरणोपरांत इन्हीं खबरिया चैनल्स ने उसे उसके द्वारा अर्जित पहले की प्रसिद्धि से कई गुणा अधिक शौहरत दिला दी। और इस खबर के आगे जनता से जुड़ी हुई महंगाई विरोधी प्रदर्शन संबंधी खबरें फीकी पड़कर रह गईं। गोया इन निजी समाचार चैनल के सभी संपादकों ने सामूहिक रूप से एक ही निर्णय लिया कि मॉडल की खुदकुशी की खबर को प्राथमिकता के आधार पर प्रसारित किया जाए। क्या हम इसे कुशल संपादन की संज्ञा दे सकते हैं।

यह कोई ऐसा पहला मौंका नहीं है जबकि इन निजी समाचार चैनल्स ने ‘बेखबर’ को ‘बाखबर’ न बना दिया हो। यही वजह है कि इन समाचार चैनल्स पर अक्सर यह आरोप भी लगते रहते हैं कि इनका मुख्‍य उद्देश्य सनसनीपूर्ण समाचार देकर अपनी टी आर पी में इज़ाफा करना तथा उसके आधार पर अपने व्यापार को बढ़ाना तथा फिर विज्ञापन आकर्षित करना रह गया है। यहां यह बताना भी जरूरी है कि इन पांच-सात निजी प्राइवेट चैनल्स के संपादकगण भी पत्रकारिता के क्षेत्र में कोई छोटी-मोटी हस्तियां नहीं हैं। बल्कि इनमें अधिकांशत: उस स्तर के संपादक शामिल हैं जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में न केवल राष्ट्रीय स्तर पर ख्‍याति प्राप्त है बल्कि इनमें से कई को राष्ट्रीय स्तर के पत्रकारिता संबंधी तमाम प्रतिष्ठित पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं और आए दिन प्राप्त होते रहते हैं। ऐसे में समाचारों का इस प्रकार का चयन एवं संपादन किया जाना न सिंर्फ इनकी योग्यता पर प्रश्चिन्ह खड़ा करता है बल्कि इन पर लगाए जाने वाले आरोपों को सही समझने के लिए भी मजबूर करता है।

ऐसे में यह सोचना जरूरी हो गया है कि आखिार निजी समाचार चैनल की देश की जनता के प्रति वास्तव में जिम्‍मेदारी है क्या? भारत जैसे विशाल देश में आए दिन कहीं न कहीं केंद्र सरकार अथवा राज्‍य सरकार की ऐसी योजनाएं शुरु की जाती हैं जिनसे देश की जनता का सीधा संबंध होता है। प्रसार भारती दूरदर्शन के अपने केंद्रीय प्रसारण के माध्यम से तथा राज्‍य स्तरीय क्षेत्रीय प्रसारण के माध्यम से उन विकास कार्यों को जनता के समक्ष रखने की पूरी कोशिश करता है। भले ही वह सरकारी कहा जाने वाला चैनल सरकारी आलोचनाओं व सरकार विरोधी कार्यकलापों की अनदेखी भी क्यों न करता हो परंतु विकास संबंधी समाचारों को जरूर उजागर करता है। किसी मॉडल की खुदकुशी संबंधी खबर देश के चैनल के लिए हालांकि या तो कोई खास अहमियत नहीं रखती अथवा केवल एक लाईन के समाचार की अहमियत मात्र रखती है। परंतु निजी चैनल्स तो ऐसी खबरों के इस तरह पीछे पड़ जाते हैं गोया यह वर्तमान समय की देश की सबसे महत्वपूर्ण घटना हो। और ‘फालोअप’ बनाए रखने के नाम पर भी कई दिनों तक ऐसी ही खबरों को प्रमुखता से प्रसारित करते रहते हैं।

अभिषेक बच्‍चन की शादी, राखी सावंत का स्‍वयंवर उसके बाद राहुल महाजन का स्‍वयंवर, सानिया मिर्जा की सगाई होना, उसका टूटना, फिर सगाई और फिर उसकी शादी से पूर्व उठा बवंडर और अंत में सानिया की बिदाई जैसी कुछ ऐसी खबरें हैं जो दरअसल बडी ही निजी खबरें कही जाएंगी।

परंतु इन लोगों के सेलिब्रेटी होने की वजह से यह भी माना जा सकता है कि इन खबरों को प्रमुखता से इनके चाहने वालों तक निजी समाचार चैनल पहुंचाएं भी। परंतु यह बात तो हरगिज स्‍वीकार नहीं की जा सकती कि देश के विकास से जुडी खबरों को आम जनता के नफे-नुकसान से खबरों को तथा देश में चलने वाली योजनाओं के लाभ हानि संबंधी खबरों को दरकिनार करते हुए ग्‍लैमर की दुनिया से जुडी किसी के निजी जीवन की खबरों को उन पर हावी कर दिया जाए।

निजी समाचार चैनल के इस प्रकार के समाचार संपादन का वर्तमान तरीका तो कम से कम हमें यही संदेश दे रहा है कि निजी समाचार चैनल अपनी जिम्‍मेदारी का सही ढंग से निर्वहन नहीं कर रहे हैं। निजी चैनल्‍स के संपादकों तथा इनके जिम्‍मेदार लोगों को अपनी जिम्‍मेदारियों को समझने तथा ठीक ढंग से इनका निर्वहन करने की सख्‍त जरूरत है।

One Response to “‘खबरें’: निजी समाचार टी वी चैनल की”

  1. VIJAY SONI

    लोकतंत्र में समाचार इसका चौथा स्तम्भ माना गया है ,ये सच भी है किन्तु समाचारों और समाचार चेनल्स के व्यवसायीकरण ने एक अलग प्रकार का वातावरण तैयार किया है ,कई कई समाचार इस प्रकार से उछाले जाते हैं की घर परिवार में इस प्रकार की अनावश्यक सनसनी देखना संस्कारों के न केवल विपरीत बल्कि अपराध और अपराधियों को मार्गदर्शन कर व्यवस्था को बिगड़ने में सहायक सिद्ध हो रही हैं ,समाचार चेनल्स पर राशिफल का क्या औचित्य है ? क्या राशिफल समाचार हैं ?क्या उलजलूल प्रकार के सर्वे समाचार है ? एक समाचार चेनल पर एक विशेष सर्वे का प्रसारण किया गया की महानगरों में लगभग ५०% से ज्यादा कुंवारे लड़के लड़कियों के लिए कौमार्य का कोई मतलब नहीं है ,विवाह पूर्व यौन संबंधों को जायज माननेवालों का भी ऊँचा प्रतिशत दिखया गया …क्या मतलब है इस प्रकार के सर्वे प्रसारण का ,क्या भला हो रहा है इस देश का ,इस प्रकार के उलजलूल समाचारों का इन चेनलों पर भरपूर भंडार है समझ नहीं आता की ये क्या हो रहा है ?इसे कौन रोकेगा ?समय की नजाकत और इसकी गंभीरता को समझते हुवे तत्काल कदम उठाना होगा अन्यथा कहावत है की “अब पछताए क्या होय -जब चिड़िया चुग गई खेत -विजय सोनी अधिवक्ता दुर्ग छत्तीसगढ़ .

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