केंद्रीय विद्यालयों में असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय जैसी प्रार्थना पर आपत्ति

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ अब इस पर विचार करेगी कि केंद्रीय विद्यालयों में बच्चों को संस्कृत में प्रार्थना करना उचित है या नहीं? असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय और कुछ अन्य प्रार्थनाओं पर आपत्ति जताने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधीश ने कहा, चूंकि असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय जैसी प्रार्थना उपनिषद से ली गई है इसलिए उस पर आपत्ति की जा सकती है और इस पर संविधान पीठ विचार कर सकती है। क्या इसका यह अर्थ है कि उपनिषद आपत्तिजनक स्रोत हैं और उनसे बच्चों को जोड़ना या पढ़ाना उपयुक्त नहीं है?

शॉपेनहावर, मैक्स मूलर या टॉल्सटॉय जैसे महान विदेशी विद्वानों ने भी यह सुनकर अपना सिर पीट लिया होता कि भारत में असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय जैसी प्रार्थना पर आपत्ति की जा रही है। इस आपत्ति पर भारतीय मनीषियों का दुखी और चकित होना स्वाभाविक है। उपनिषदों को मानवता की सर्वोच्च ज्ञान धरोहर माना जाता है। वास्तविक विद्वत जगत में यह इतनी जानी-मानी बात है कि उसे लेकर दिखाई जा रही अज्ञानता पर हैरत होती है। मैक्स वेबर जैसे आधुनिक समाजशास्त्री ने म्यूनिख विश्वविद्यालय में अपने प्रसिद्ध व्याख्यान ‘पॉलिटिक्स एज ए वोकेशन’ में कहा था कि राजनीति और नैतिकता के संबंध पर संपूर्ण विश्व साहित्य में उपनिषद जैसा व्यवस्थित चिंतन स्रोत नहीं है।

आज यदि डॉ. भीमराव आंबेडकर होते तो उन्होंने भी माथा ठोक लिया होता। ध्यान रहे कि मूल संविधान के सभी अध्यायों की चित्र-सज्जा रामायण और महाभारत के विविध प्रसंगों से की गई थी। ठीक उन्हीं विषयों की पृष्ठभूमि में जिन पर संविधान के विविध अध्याय लिखे गए। उस मूल संविधान पर संविधान सभा के 284 सदस्यों के हस्ताक्षर हैं। दिल्ली के तीन-मूर्ति पुस्तकालय में उसे देखा जा सकता है। उपनिषद जैसे विशुद्ध ज्ञान-ग्रंथ तो छोड़िए, धर्म-ग्रंथ कहे जाने वाले रामायण और महाभारत को भी संविधान निर्माताओं ने त्याज्य या संदर्भहीन नहीं समझा था। उनके उपयोग से कराई गई सज्जा का आशय ही इन ग्रंथों को अपना आदर्श मानना था।

संविधान के भाग 3 यानी सबसे अहम माने जाने वाले मूल अधिकार वाले अध्याय की सज्जा भगवान राम, सीता और लक्ष्मण से की गई है। अगले महत्वपूर्ण अध्याय भाग 4 की सज्जा में श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को गीता के उपदेश दिए जाने का दृश्य है। यहां तक कि भाग 5 की सज्जा ठीक उपनिषद के दृश्य से की गई है जिसमें ऋषि केपास शिष्य बैठकर ज्ञान ग्रहण करते दिख रहे हैं। यह सब महज सजावटी चित्र नहीं थे, बल्कि उन अध्यायों की मूल भावना (मोटिफ) के रूप में सोच-समझ कर दिए गए थे। इस पर कभी कोई मतभेद नहीं रहा।

शायद आज हमारे न्यायविदों को भी इस तथ्य की जानकारी तक नहीं है कि मूल संविधान हिंदू धर्म-ग्रंथों के मोटिफ से सजाया गया था। इसे महान चित्रकार नंदलाल बोस ने बनाया था, जिन्होंने रवींद्रनाथ टैगोर से शिक्षा पाई थी। लगता है कि बहुतेरे वकील भी यह नहीं जानते कि संविधान की मूल प्रस्तावना में ‘सेक्युलर’ और ‘सोशलिस्ट’ शब्द नहीं थे। इन्हें इंदिरा गांधी की ओर से थोपे गए आपातकाल के दौरान छल-बल पूर्वक घुसा दिया गया था।

हमारा अज्ञान जैसे बढ़ रहा है उसे देखते हुए हैरत नहीं कि मूल संविधान की उस सज्जा पर भी आपत्ति सुनने को मिले और उस पर न्यायालय विचार करता दिखे। ऐसे तर्क दिए जा सकते हैैं कि एक सेक्युलर संविधान में हिंदू धर्म-ग्रंथों का मोटिफ क्यों बने रहना चाहिए? उन सबको हटाकर संविधान को सभी धर्म के नागरिकों के लिए सम-दर्शनीय किस्म की कानूनी किताब बना देना चाहिए। आखिर, जब उपनिषद को ही आपत्तिजनक माना जा रहा है तब राम और कृष्ण तो हिंदुओं के साक्षात भगवान ही हैं। ऐसी स्थिति में संविधान में उनका चित्र होना सेक्युलरिज्म के आदर्श के लिए नाराजगी की बात हो सकती है। यह पूरा प्रसंग हमारी भयंकर शैक्षिक दुर्गति को दर्शाता है। स्कूल-कॉलेजों से लेकर विश्वविद्यालयों तक हमारी महान ज्ञान-परंपरा को बाहर रखने से ही यह स्थिति बनी है। हमारे बड़े-बड़े लोग भी भारत की विश्व प्रसिद्ध सांस्कृतिक विरासत से परिचित तक नहीं हैं। उपनिषद जैसे शुद्ध ज्ञान-ग्रंथ को मजहबी मानना अज्ञानता को दिखाता है। जबकि रामायण को भी मजहबी नहीं, वैश्विक सांस्कृतिक धरोहर माना जाता है। तभी इंडोनेशिया जैसे मुस्लिम देश राम-लीला का नाट्य राष्ट्रीय उत्साह से करते हैं।

अभी जो स्थिति है उसमें संविधान पीठ इस आपत्ति को संभवत: खारिज कर देगी। इस पर देश-विदेश में होने वाली कड़ी प्रतिक्रियाओं से उन्हें समझ में आ जाएगा कि उन्होंने किस चीज पर हाथ डाला है। पर यह अपने-आप में कोई संतोष की बात नहीं। यदि हमारी दुर्गति यह हो गई कि हमारे एलीट अपनी महान ज्ञान-परंपरा से ही नहीं, बल्कि अपने हालिया संविधान की भावना तक से लापरवाह हो गए हैं तो हम निश्चित ही दिशा भटक गए हैं। तब वह दिन दूर नहीं जब संविधान, कानून और शिक्षा को और गर्त में डाला जाएगा।

भारत में यहां की मूल धर्म-ज्ञान-संस्कृति परंपरा के विरोध का मूल हिंदू-विरोध में है। इस प्रसंग को राष्ट्रवादी जितना ही भुना लें, उन्हें समझना चाहिए कि सदैव अपनी पार्टी, चुनाव और सत्ता की झक में डूबे रहने से भारतीय धर्म-संस्कृति और शिक्षा की कितनी हानि होती गई। उन्हें इसकी कभी परवाह नहीं रही। आज जो सरकारी स्कूलों में उपनिषद पर आपत्ति कर रहे हैं कल वे रामायण, महाभारत और उपनिषद को सरकारी पुस्तकालयों से भी हटाने की मांग करने लगें तो हैरत नहीं। इस दुर्गति तक पहुंचने में हमारे सभी दलों का समान योगदान है। उनका भी जिन्होंने अज्ञान और वोट-बैंक के लालच में हिंदू-विरोधियों की मांगों को स्वीकार करते हुए संविधान तथा शिक्षा को हिंदू-विरोधी दिशा दी। साथ ही, उनका भी जिन्होंने उतने ही अज्ञान और भयवश उसे चुपचाप स्वीकार किया। केवल सत्ताधारी को हटाकर स्वयं सत्ताधारी बनने की जुगत में लगे रहे। यही करते हुए पिछले छह दशक बीते और हमारी शिक्षा-संस्कृति, कानून और राजनीति की दुर्गति होती गई है।

केवल देश के आर्थिक विकास पर सारा ध्यान रखते हुए तमाम बौद्धिक विमर्श ने भी वही वामपंथी अंदाज अपनाए रखा। इसी का लाभ उठाते हुए हिंदू-विरोधी मतवादों ने स्वतंत्र भारत में धीरे-धीरे सांस्कृतिक, शैक्षिक, वैचारिक क्षेत्र पर चतुराईपूर्वक अपना शिकंजा कसा। उन्होंने कभी गरीबी, विकास, बेरोजगारी, जैसे मुद्दों की परवाह नहीं की। अनुभवी और दूरदर्शी होने के कारण उन्होंने सदैव बुनियादी विषयों पर ध्यान रखा। यही कारण है कि आज भारत का मध्य-वर्ग दिनों-दिन अपने से ही दूर होता जा रहा है। इसी को विकास और उन्नति मान रहा है। केवल समय की बात होगी कि विशाल ग्रामीण, कस्बाई समाज भी उन जैसा हो जाएगा, क्योंकि जिधर बड़े लोग जाएं, पथ वही होता है। जिन्हें इस पर चिंता हो उन्हें इसे दलीय नहीं, राष्ट्रीय विषय समझना चाहिए। तद्नुरूप विचार करना चाहिए। अन्यथा वे इसके समाधान का मार्ग कभी नहीं खोज पाएंगे। दलीय पक्षधरता का दुष्चक्र उन्हें अंतत: दुर्गति दिशा को ही स्वीकार करने पर विवश करता रहेगा। जो अब तक होता रहा है और जिसका दुष्परिणाम यह दु:खद प्रसंग है।

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