पटाखों पर रोक का व्यावहारिक पक्ष

प्रमोद भार्गव

सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में इस साल दीपावली के ऐन मौके पर पटाखों की बिक्री पर जो पाबंदी लगाई है, उससे तमाम लोग सांस लेने में राहत महसूस कर सकते हैं, लेकिन इसका दूसरा व्यावहारिक पक्ष यह भी है कि कई व्यापारियों से लेकर पटाखा उत्पादक निर्माताओं को आजीविका का संकट भी खड़ा हो सकता है। यह सही है कि देश की राजधानी दिल्ली दुनिया के अधिक प्रदुषित शहरों में से एक है। यहां कि हवा वैसे तो पूरे साल प्रदुषित रहती है, लेकिन ठंडों में अधिकतम प्रदुषित हो ही जाती है। लिहाजा प्रदूषण के उत्सर्जक कारणों की पड़ताल कर उन पर नियंत्रण जरूरी है, जिससे दिल्ली रहने लायक बने रहे। शायद इसीलिए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि वह यह परिक्षण करना चाहती है कि दिवाली के समय पटाखों की बिक्री पर रोक लगाने से सकारात्मक बदलाव आता भी है अथवा नहीं ? लेकिन लाखों लोगों की रोजी-रोटी और देश के धार्मिक एवं सांस्कृतिक पक्ष की परवाह किए बिना इस प्रतिबंध के निहिताथ को उचित ठहराना थोड़ा मुश्किल ही है। इसे कार्यपालिका के क्षेत्र में न्यायपालिका का हस्तक्षेप भी माना जा रहा है।

दिल्ली में खतरनाक स्तर पर पहुंचे प्रदूषण को नियंत्रित करने वाली हर पहल का स्वागत होना चाहिए। इस नाते 14 वर्ष से कम आयु के कुछ बच्चों की याचिका के आधार पर न्यायालय ने यह रोक लगाई है। हालांकि पाबंदी के ठीक पहले न्यायालय ने एक पटाखा उत्पादक की याचिका पर अस्थाई निर्माण और बिक्री की अनुमति दे दी थी। बाद में जब बालकों के एक समूह ने अदालत में गुहार लगाई तो न्यायमूर्ति ए.के सीकरी की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह रोक लगा दी।  हालांकि हम जानते है कि बच्चे आतिशबाजी के प्रति अधिक उत्साही होते हैं और उसे चलाकर आनंदित भी होते है। जबकि यही बच्चे वायु एवं ध्वनि प्रदूषण से अपना स्वास्थ्य भी खराब कर लेते हैं। पटाखों की चपेट में आकर अनेक बच्चे आंखों की रोशनी और हाथों की अंगुलियां तक खो देते है। बावजूद समाज के एक बड़े हिस्से को पटाखा मुक्त दिवाली रास आने वाली नहीं है। इसीलिए इस आदेश के बाद यह बहस चल पड़ी है कि क्या दिल्ली-एनसीआर में खतरनाक स्तर 2.5 पीपीएम पर प्रदूषण पहुंचने का आधार क्या केवल पटाखें ही है ? सच तो यह है कि इस मौसम में हवा को प्रदुषित करने वाले कारणों में बारुद से निकलने वाला धुआं एक कारण जरूर है, लेकिन दूसरे कारणों में दिल्ली की सड़कों पर वे कारें भी हैं, जिनकी बिक्री पिछले 1 वर्ष के भीतर 64 प्रतिशत बढ़ गई है। नए भवनों की बढ़ती संख्या भी दिल्ली में प्रदूषण को बढ़ा रहे है। पंजाब और हरियाणा में पराली जलाया जाना भी दिल्ली की हवा को खराब करता है। इस कारण दिल्ली के वायुमंडल में पीएम 2.5 का स्तर बढकर 1200 से ऊपर चला जाता है। जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक स्वास्थ्य के लिए बेहतर वायु का स्तर 10 पीएम से कम होना चाहिए। पीएम वायु में घुले-मिले ऐसे सूक्ष्म कण है, जो सांस के जरिए फेफड़ों में पहुंचकर अनेक बिमारियों का कारण बनते हैं।

वायु के ताप और आपेक्षिक आद्रता का संतुलन गड़बड़ा जाने से हवा प्रदूषण के दायरे में आने लगती है। यादि वायु में 18 डिग्री सैल्सियस ताप और 50 प्रतिशत आपेक्षिक आर्द्रता हो तो वायु का अनुभव सुखद लगता है। लेकिन इन दोनों में से किसी एक में वृद्धि, वायु को खतरनाक रूप में बदलने का काम करने लग जाती है। ‘राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मूल्यांकन कार्यक्रम‘ (;एनएसीएमपी) के मातहत ‘केंद्रीय प्रदुषण मंडल‘ ;(सीपीबी) वायु में विद्यमान ताप और आद्रता के घटकों को नापकर यह जानकारी देता है कि देश के किस शहर में वायु की शुद्धता अथवा प्रदूषण की क्या स्थिति है। नापने की इस विधि को ‘पार्टिकुलेट मैटर‘ मसलन ‘कणीय पदार्थ‘ कहते हैं। प्रदुषित वायु में विलीन हो जाने वाले ये पदार्थ हैं, नाइट्रोजन डाईआॅक्साइड और सल्फर डाईआॅक्साइड। सीपीबी द्वारा तय मापदंडों के मुताबिक उस वायु को अधिकतम शुद्ध माना जाता है, जिसमें प्रदूषकों का स्तर मानक मान के स्तर से 50 प्रतिशत से कम हो। इस लिहाज से दिल्ली समेत भारत के जो अन्य शहर प्रदूषण की चपेट में हैं, उनके वायुमंडल में सल्फर डाईआॅक्साइड का प्रदूषण कम हुआ है, जबकि नाइट्रोजन डाईआॅक्साइड का स्तर कुछ बड़ा है।

सीपीबी ने उन शहरों को अधिक प्रदुषित माना है, जिनमें वायु प्रदूषण का स्तर निर्धारित मानक से डेढ़ गुना अधिक है। यदि प्रदूषण का स्तर मानक के तय मानदंड से डेढ़ गुना के बीच हो तो उसे उच्च प्रदूषण कहा जाता है। और यादि प्रदूषण मानक स्तर के 50 प्रतिशत से कम हो तो उसे निम्न स्तर का प्रदूषण कहा जाता है। वायुमंडल को प्रदुषित करने वाले कणीय पदार्थ, कई पदार्थों के मिश्रण होते हैं। इनमें धातु, खनिज, धुएं, राख और धूल के कण शामिल होते हैं। इन कणों का आकार भिन्न-भिन्न होता है। इसीलिए इन्हें वगीकृत करके अलग-अलग श्रेणियों में बांटा गया है। पहली श्रेणी के कणीय पदार्थों को पीएम-10 कहते हैं। इन कणों का आकार 10 माइक्राॅन से कम होता है। दूसरी श्रेणी में 2.5 श्रेणी के कणीय पदार्थ आते हैं। इनका आकार 2.5 माइक्राॅन से कम होता है। ये कण शुष्क व द्रव्य दोनों रूपों में होते हैं। वायुमंडल में तैर रहे दोनों ही आकारों के कण मुंह और नाक के जरिए श्वास नली में आसानी से प्रविष्ट हो जाते हैं। ये फेफड़ों तथा हृदय को प्रभावित करके कई तरह के रोगों के जनक बन जाते हैं। आजकल नाइट्रोजन डाईआॅक्साइड देश के नगरों में वायु प्रदूषण का बड़ा कारक बन रही है।

औद्योगिक विकास, बढ़ता शहरीकरण और उपभोगक्तावादी संस्कृति, आधुनिक विकास के ऐसे नमूने हैं, जो हवा, पानी और मिट्टी को एक साथ प्रदुषित करते हुए समूचे जीव-जगत को संकटग्रस्त बना रहे हैं। यही वजह है कि आदमी भी दिल्ली की प्रदुषित वायु की गिरफ्त में है। क्योंकि यहां वायुमंडल में वायु प्रदुषण की मात्रा 60 प्रतिशत से अधिक हो गई है। दिल्ली-एनसीआर में एक तरफ प्राकृतिक संपदा का दोहन बढ़ा हैं, तो दूसरी तरफ औद्योगिक कचरे में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हुई। लिहाजा दिल्ली में जब शीत ऋृतु दस्तक देती है तो वायुमण्डल में आर्द्रता छा जाती है। यह नमी धूल और धुएं के बारीक कणों को वायुमण्डल में विलय होने से रोक देती है। नतीजतन दिल्ली के ऊपर एकाएक कोहरा आच्छादित हो जाता है। वातावरण का यह निर्माण क्यों होता है, मौसम विज्ञानियों के पास इसका कोई स्पष्ट तार्किक उत्तर नहीं है। वे इसकी तात्कालिक वजह पंजाब एवं हरियाणा में खेतों में जलाए जाने वाले फसल के डंठलों औा दिवाली के वक्त चलाए जाने वाले पटाखों को बताकर जुम्मेबारी से पल्ला झाड़ लेते हैं। अलबत्ता इसकी मुख्य वजह हवा में लगातार प्रदुषक तत्वों का बढ़ना है। दरअसल मौसम गरम होने पर जो धूल और धुंए के कण आसमान में कुछ ऊपर उठ जाते हैं, वे सर्दी बढ़ने के साथ-साथ नीचे खिसक आते हैं। दिल्ली में बढ़ते वाहन और उनके सह उत्पाद प्रदुषित धुंआ और सड़क से उड़ती धूल अंधियारे की इस परत को और गहरा बना देते हैं। इस प्रदूषण के लिए बढ़ते वाहन कितने दोषी हैं, इस तथ्य की पुष्टि दो साल पहले इस तथ्य से हुई थी, जब दिल्ली में ‘कार मुक्त दिवस‘ आयोजित किया गया था। इसका नतीजा यह निकला कि उस थोड़े समय में वायु प्रदूषण करीब 26 पतिशत कम हो गया था। इस परिणाम से पता चलता है कि दिल्ली में अगर कारों को नियंत्रित कर दिया जाए तो बढ़ता प्रदूषण से स्थाई रूप से छुटकारा पाया जा सकता है।

दिवाली पर रोशनी के साथ ही आतिशबाजी छोड़कर जो खुशियां मनाई जाती है, उनके सांस्कृतिक पक्ष पर भी ध्यान देने की जरूरत है। अकेली दिल्ली में पटाखों का 1000 करोड़ रुपय का कारोबार होता है, जो कि देश में होने वाले कुल पटाखों के व्यापार का 25 फीसदी हिस्सा हैं। इससे छोटे-बड़े हजारों थोक व खेरीज व्यापारियों और पटाखा उत्पादक मजदूरों की सालभर की रोजी-रोटी चलती है। इसा लिहाज से इस प्रतिबंद के व्यावहारिक पक्ष पर भी गौर करने की जरूरत है। विडंबना यह भी है कि पटाखे चलाने पर तो कानूनी रोक लग गई है, लेकिन इनके चलाने पर रोक नहीं लगी है। ऐसे में लोग पहले से खरीदे गए पटाखों को चला सकते है और राजधानी क्षेत्र के बाहर से भी पटाखे खरीदकर ला सकते है। लिहाजा फैसले पर उदारतापूर्वक पुर्नविचार करने की जरूरत है।

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