लेखक परिचय

मृत्युंजय दीक्षित

मृत्युंजय दीक्षित

स्वतंत्र लेखक व् टिप्पणीकार लखनऊ,उप्र

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cartoon-octoberमृत्युंजय दीक्षित
उरी हमले में 18 जवानों की शहादत के बाद पूरे देशभर में पाकिस्तान के प्रति गुस्से का आलम था वहीं उसके 10 दिन के बाद जब जब भारतीय सेना के जांबाजांे ने अपनी सर्जिकल स्ट्राइक के माध्यम से पाकिस्तान की सीमा के अंदर घुसकर कम से कम 40 आतंकियों को मौत के घाट उतार दिया उसके बाद देश का पूरा वातावरण ही बदल गया है। यही नहीं जहां पूरे देशभर में पीएम मोदी के साहसिक निर्णयों की तारीफ हो रही है। वहीं दूसरी ओर सीमा पर भी तनाव लगातार बढ़ रहा है। यहां तक कि आने वाले दिनों में यह तनाव गहराने तक की संभावना व्यक्त की जा रही है। शुरूआत में तो विपक्ष ने सरकार के हर कदम व निर्णयों पर साथ साथ रहने का वादा और दावा किया लेकिन अब वह उन सभी गददार सेकुलर दलों की गले की फॅास बनता जा रहा है। केजरीवाल, कांग्रेसी नेता संजय निरूपम, पी चिदम्बरम और दिग्विजय सिंह सरीखे नेता अब अपनी लोकप्रियता को बढ़ाने के लिए पाकिस्तान के राजदूत की तरह काम कर रहे हैं। यह भारतीय राजनीति का बहुत ही दुखद व दुर्भाग्यपूर्ण अध्याय है कि जब पूरा देश आतंकवाद व युद्ध के मुहाने पर खड़ा है इस समय भारतीय राजनेता ऐसी ओछी बयानबाजी कर रहे हैं जिससे कि सेना व सत्ता प्रतिष्ठान का मनोबल गिरे । अमेरिका ने जब ओसामा बिन लादेन को मारने के लिए आपरेशन किया था तब पूरी दुनिया के किसी भी देश और वहां के किसी भी दल व किसी सांसद ने आतंकी लादेन को मारने के सबूत मांगने का साहस किसी ने नहीं किया था। यह काली और देशद्रोही राजनीति केवल भारत में ही संभव है। कांग्रेस पार्टी में यदि साहस है तो वह कसाब और अफजल गुरू को फांसी दने का वीडियो जनता के बीच जारी करे। यदि कांग्रेस में साहस है तो वह 1965 के युद्ध के वीडियो जनता के बीच जारी करे। यह कांग्रेस पार्टी ही है जिसने 1965 के युद्ध का राजनैतिक लाभ लेने का पूरा प्रयास किया था। कांग्रेस ने हमेशा लाभ की राजनीति की है। वर्तमान समय में कांग्रेस केजरीवाल जैसे गददार और जहरीले सांप के बल पर अपनी राजनीति को चमकाने का प्रयास कर रही है। आने वाले दिनों मे पाक के साथ युद्ध होने की स्थिति व उसके बाद इन दलों व नेताओं की भी सर्जिकल सर्जरी बेहद जरूरी हो जायेगी। नही तो यह नेता परमाणु बम और पता नहीं क्या- क्या सबूत मांगने लगेंगे और देश की सुरक्षा खतरे में पड़ जायेगी।
भारत में इस समय दो प्रकार के देशभक्तों की जमात खड़ी दिखलायी पड़ रही है। एक वह है जो देश की रक्षा व विकास करने में लगातार लगी हुयी हैं। वहीं एक देशभक्त जमात ऐसी है जिसके लोगों को विश्वभर में जब भारत की बदनामी व पराजय होती है तब उन्हें अच्छा लगता है। सर्जिकल स्ट्राइक के बाद पूरे देश में पीएम मोदी की जायकार हो रही हैं। आगामी दिनों में उप्र सहित कई राज्यों में विधानसभा चुनाव संभावित है। सेना की ओर से उठाये गये साहसिक कदमों के बाद राष्ट्रवाद की जयकार होने लग गयी है। जिसके कारण इन सेकुलर दलों के पेट में दर्द उठना स्वाभाविक हो गया था। अभी चूंकि तवा गरम चल रहा था इसलिए यह दल चुप्पी साधकर बैठे थे। इन सभी दलों को अब धीरे – धीरे यह लगने लग गया है कि यदि मोदी सरकार के समय में सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ इसी तरह से अभियान सफलतापूर्वक चला और भारत सरकार ने यदि पाक अधिकृत कश्मीर को आजाद करा लिया और बलूचिस्तान को भी आजाद करा दिया तब तो सेकुलरवादियों की जमीन ही समाप्त हो जायेगी। तब उसके बाद इन तथाकथित देशभक्त सेकुलरवादियों की जमातों की आवाजें बुलंद होने लग गयी हैं।
आजकल पाकिस्तान में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें ऐसा प्रतीत हो रहा है कि वह पाकिस्तान के उस झूठ के प्रोपोगेंडा के साथ हैं जिसमें कहा जा रहा है कि भारत सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत को दुनिया भर के सामने पेश करें। अभी पूरी दनियाके लोगों ने तो भारत से किसी प्रकार का सबूत नहीं मांगा है लेकिन केजरीवल एंड कंपनी , पी चिंदबरम व संजय निरूपम जैसे नेता भारत सरकार व सेना से सर्जिकल सबूत मांगने लग गये है।
सर्जिकल स्ट्राइक पर सबसे गंदे बयान केजरीवाल और संजय निरूपम जैसे नेताआंे के ही आये हैं। भारत के लिए सबसे बड़ा आतरिक व बाहरी खतरा तो इस प्रकार के तथाकथित सेकुलर नेता ही सबसे बड़ा खतरा बन चुका है। यह ऐसे तथाकथित नेता बन गये हैं जो कि कल यदि पाकिस्तान भारत पर बड़ा हमला कर दे तो यह लोग भारत से सबूत मांगने लग जायेंगे। यह सभी दल भारत की खेलो में विजय के सबूत मांगने लग जायेंगे। अब समय आ गया है कि यदि अभी जब पाकिस्तान पर और सर्जिकल स्ट्राइक हो तथा पाकिस्तान के साथ भीषण युद्ध की नौबत आ जाये तब सबसे पहले इन सभी नेताओं को जेल में डाल देना चाहिये। संजय निरूपम और पी चिदम्बरम जैसे नेता देश में बाहर खुलेआम घूमने के लायक नहीं रह गये हैं। इन सभी दलांे ने देशी सेना के जाबंाजों का दिल दुखाया है। इन दलों का कहना है कि सर्जिकल स्ट्राइक का उपयोग राजनैतिक लाभ लेने के लिए किया जा रहा है। यह पूरी तरह से गलत है। यह सभी नेता पाक मीडिया की ओर से जो झूठा प्रचार किया जा रहा है उसके जाल में फंस गये हैं, ऐसा साफ प्रतीत हो रहा है । भारतीय लोकतंत्र में बड़ी गहरायी है । आजकल भारत के नेतागण अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता व अपनी टीआरपी को बरकार रखने के लिए देशद्रोह तक करने को तैयार बैठे हैं। संजय निरूपम जैसे नेता दावा कर रहे हैं कि यूपीए- 2 में भी सर्जिकल स्ट्राइक की गयी थी यदि की गयी थी तो वह भी सबूत पेश करें अन्यथा देश के जवानों का मनोबल गिराने के लिए पूरे देश की जनता से माफी मांगें। यह कांग्रेस के शासनकाल का ही परिणाम है कि आज भारत आतंकवाद व देशद्रोही सेकुलर आवाजों के खतरे से कराह रहा है। अब समय आ गया है कि इन दलों का भी अच्छी तरह से सर्जिकल इलाज कर दिया जाये।

8 Responses to “सर्जिकल स्ट्राइक पर सेकुलरवादियो की आवाजें निकलने लगीं ?”

  1. Arun Kumar Upadhyay

    इनके और पाकिस्तान के क्रोध से स्पष्ट है कि जोरदार सर्जिकल स्ट्राइक हुयी थी। ये केवल पाकिस्तान के आदेश से उसकी पूरी खबर लेना चाहते हैं जिससे अगली बार पाकिस्तान इसका मुकाबला कर सके। यदि कांग्रेस शासन में भी ऐसा हुआ था तो उस समय ऐसी स्ट्राइक से पाकिस्तान या उसके भारतीय नौकर क्यों नहीं गुस्से से बौखलाते थे? या यह बताने में पाकिस्तान के बदले कांग्रेस सरकार को यह कहने में क्यों डर था?

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    • आर. सिंह

      R.Singh

      अरुण उपाध्याय जी,क्या आप यह स्पष्ट करने का प्रयत्न करेंगे कि पाकिस्तान के भारतीय नौकर कौन से हैं? अगर ऐसा ही है, कि वे पहले के सर्जिकल स्ट्राइक से बौखलाए होते,तो क्या आप बता सकते हैं किवे भारतीय नौकर १९६५ और १९७१ के बाद कितना बौखलाए थे?

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  2. आर. सिंह

    R.Singh

    जिनको आपलोग गद्दार और सेक्युलर कहते हैंऔर इस तरह उनको अपनी भाषा में गाली देते हैं,क्या आप बता सकते हैं कि भारत में उनकी संख्या कितनी है?कभी आप जैसे फिरका प्रस्तियों ने कभी यह सोचा है कि अगर वे लोग सचमुच वैसे हैं,जैसा आपलोग सोचते हैं,तो आपलोगों की कितनी दुर्गति करने की ताकत वे लोग रखते हैं?

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    • Banwari Lal

      Main aapki kathan se sahmat huin. Kuchh lekhkon ko ek bhram ye rahta hai ki pathak murkh hote hain or lekhak gyaani. Ab inhi ko dekhiye home work kiya nahi or sab man ghadant likh dala. Ab inhe to ye bhinahi maalum ki Amerika ne Laden encounter.bina puchhe puri duniya ko feedback diya tha. Aaj bhi wo photo jisme President Obama apne sahyogiyon ke saath baitha hue ek ek pal live witness kar rahe hain. Pure vishwa ne daad di thi! Dhanyavaad.
      Banwari Lal.
      banwarilal56@gmail.com

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    • Dr. Arvind Kumar

      आदरणीय, आर सिंह जी
      आपकी दिक्कत ये है कि आप जिस विषय में जानकारी न रखते हो, उस विषय पर भी विषय विशेषज्ञ या माननिय केजरीवाल जी की तरह बात करते हंै। जैसे केजरीवाल जी को एलओसी और बार्डर का फर्क नहीं पता है। उसी प्रकार आपको रेड और सर्जिकल स्ट्राइक का फर्क नहीं पता है। ज्ञान में अभिवृद्धि करे – सर्जिकल स्ट्राइक की यह पहली घटना है। हाॅ रेड पहले भी हुए है, यहाॅ आप विलकुल सही है। हृदय को विशाल करे और देश पर गर्व करे।
      आदर सहित
      आपका
      अरविन्द

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      • आर. सिंह

        R.Singh

        मेरे ज्ञान वर्द्धन के लिए धन्यवाद,पर मेरे साथ ,इस उम्र तक भी दो प्रधान दिक्कते हैं.पहली तो यह कि मैं निरंतर कुछ न कुछ नया सीखने में विश्वास रखता हूँ और दूसरी यह है कि मैं किसी के भी द्वारा दिए गए ज्ञान को उसके फेश वैल्यू या ज्ञान दाता के रूतबे पर नहीं स्वीकार करता.अतः मुझे फिर से इसके तह तक जाना होगा और प्रतिरक्षा से जुड़े हुए उन लोगों के व्यक्तव्य से भी तुलना करनी पड़ेगी,जिहोने इसे पहला सर्जिकल आपरेशन नहीं माना है. ऐसे तो हमारे माननीय प्रतिरक्षा मंत्री ने यह भी कहा है कि हमारी सेना को अभी तक अपनी ताकत का ज्ञान ही नहीं था.अगर रूतबे पर ही जाना होता,तो मैं उसे ब्रह्म वाक्य समझ लेता,पर मैंने उसका प्रतिकार भी यहीं किया है कि तब क्या उनकेपूर्वजों ने १९६५ और १९७१ में विजय प्राप्त की थी?

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        • Dr. Arvind Kumar

          आदरणीय आर सिंह जी
          नया सीखने का अर्थ, तथ्यों के सही होने की गारंटी नही होती। अहंकारी चित्त सत्य के करीब नहीं हुआ करता। उम्र दराज होने का अर्थ सही तथ्यों को नजर अंदज करना नही होता और ना ही ये बडप्पन की निशानी है। न चाहते हुये भी रेड और सर्जिकल स्टाªक का अन्तर दे रहा हूॅ। खूब शोध कर लिजिए तब कुछ लिखिएगा।
          रेड
          ऽ इसमें सरकार से मंजूरी की आवश्कता नहीं होती।
          ऽ नुकसान की जिम्मेदारी सेना की होती है।
          ऽ यह छोटे स्तर का नियोजन होता है।
          ऽ इस तरह के रेड सेना अक्सर करती रहती है।
          ऽ घात लगाकर दुश्मन को मारना ‘‘ एम्बुश ’’ कहलाता है।
          ऽ इसमें सबसे बडा हथियार 7.62 एसएलआर से लेकर 7.62 एलएमजी तक होता है।
          ऽ युद्धों को यदि छोड दिया जाय तो अभी तक रेड या एम्बुश की कार्यवाही के तहद् इस प्रक्रिया को अपनाया गया है।
          सर्जिकल स्ट्राइक
          ऽ इसमें सरकार की मंजूरी की आवश्यकता होती है।
          ऽ नुकसान की जिम्मेदारी सरकार की होती है।
          ऽ यह बडे स्तर का नियोजन होता है।
          ऽ इस तरह की कार्यवाई कभी कभार होती है।
          ऽ इसमे सेटलाईट के द्वारा निगाह रखते हुये, एनआईए की सहायता से दुश्मन की जानकारी इक्ठ्ठा की जाती है।
          ऽ कार्यवाई के पूर्व इनको आरट्री ( तोपखाना ब्रिगेड ) सहायता दी जाती है।
          ऽ लेजर गन से लेकर सारे अत्याधुनिक हथियार प्रयोग में लिए जाते है।
          ऽ यह सर्जिकल स्ट्राइक 1947 के बाद पहली बार हुआ है।
          ऽ इसका दायरा 200 किमी के लगभग होता है।
          और अन्त में मैं बच्चो से भी सीखने को तैयार रहता हूॅ पर गलत तथ्य स्वीकार नहीं करता। सेना और अध्यापन यही मेरे परिवार की पूॅजी है। आपसे भी कहना चाहूॅगा। ‘‘ चरण स्र्पश करके कहना चाहूॅगा देश हमेशा प्रथम स्थान पर है। क्या इसपे भी विवाद है ? किसी बात से ठेस लगी हो क्षमा चाहूॅगा। छोटा हूॅ आर्शिवाद दीजिए।
          आपका
          अरविन्द

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          • आर. सिंह

            R.Singh

            एक बात मैं फिर दोहराना चाहूँगा.मैं अपने को अन्य वरिष्ठ नागरिकों से भिन्न समझता हूँ,क्योंकि मैं समझता हूँ कि उम्र बढ़ने के साथ अनुभव बढ़ता है,पर इंसान सर्वज्ञानी हो जाता है,मैं यह नहीं मानता. आपने सर्जिकल आपरेशन की अपनी तरफ से अच्छी व्याख्या की है,हो सकता है कि आप इसे मेरी हठ धर्मिता समझे,पर मैं आपसे पूर्ण रूप से सहमत नहीं हूँ,क्योंकि जो व्याख्या आप दे रहे हैं,घटना केवल उसी क्रम से घटने से ही सर्जिकल आपरेशन कहा जायेगा,यही क्यों?दूसरी बात पहले की घटनाएं इस तरह नहीं घटी थी,इसका सबूत?तीसरी बात ,सेना और राष्ट्र प्रमुख के बीच बहुत बातें ऐसी होती हैं,जो हमेशा लिपिबद्ध न नहीं की जाती और न उसका कोई रिकॉर्ड रखा जाता है.यह सरकार इसका भी नाजायज लाभ उठाने में नहीं चुकेगी. फील्ड मार्शल मानेकशॉ से इंदिरा गाँधी ने अप्रैल में पाकिस्तान पर आक्रमण करने को कहा था,जब कि आक्रमण दिसम्बर में हुआ. जब तक फील्ड मार्शल ने स्वयं इसका ख़ुलासा नहीं किया,तब तक क्या किसी को यह मालूम था? तब आप कैसे कह सकते हैं कि जो आपरेशन पहले हुए,उनमे मन मोहन सिंह की स्वीकृति नहीं थी?

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