निजी विश्वविद्यालय: विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह

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प्रो. एस. के. सिंह

पिछले वर्षं मेघालय में एक निजी विश्वविद्यालय (सी.एम.जे. विश्वविद्यालय) द्वारा यू.जी.सी के नियमों की अनदेखी करते हुए एक वर्ष में 434 पी-एच. डी उपाधियां देने एवं 490 पंजीकृत करने का मामला प्रकाश में आया था। मेघालय के तत्कालीन राज्यपाल श्री आर एस मुशहरी ने इस निजी विश्वविद्यालय को भंग (विघटन) करने  के लिए राज्य सरकार को लिखा था, तथा मुख्यमंत्री मुकुल संगमा ने इस घटना की जल्दी सुनवाई के लिए एक विशेष न्यायालय की स्थापना की बात कही थी। इसके अलावा यू.जी.सी ने भी तेजपुर विश्वविद्यालय के कुलपति की अध्यक्षता में एक समिति बना दी थी। इस विश्वविद्यालय के कई अधिकारियों को गिरप्तार कर लिया गया था, तथा इस वर्ष 7 मार्च को जब उच्चतम न्यायालय से इस विश्वविद्यालय के चांसलर की अग्रिम जमानत की अर्जी खारिज हो गई तब उन्हें 22 अपे्रल को बिहार से गिरप्तार कर लिया गया, जो कि वर्तमान में जमानत पर हैं। मेघालय सरकार ने अभी हाल ही में इस विश्वविद्यालय के विघटन को अनुमोदित कर दिया है।
2004 में छत्तीसगढ़ राज्य में थोड़े समय में ही निजी विश्वविद्यालयों की बाढ़ सी आ गई थी। इन निजी विश्वविद्यालयों में व्याप्त अनियमितताएं जब हद से गुजरने लगीं तब 2005 में उच्चतम न्यायालय द्वारा इन विश्वविद्यालयों के संचालन पर प्रतिबंध लगाया गया। इन विश्वविद्यालयों में बहुत से ऐसे विश्वविद्यालय थे जो दूसरे राज्यों में पहले से ही व्यवसाय कर रहे थे।
फरवरी 2013 में दिल्ली स्थित एक निजी शिक्षण संस्थान आई आई पी एम के सम्बन्ध में यू जी सी ने कई तल्ख टिप्पिणयां की थीं, जिसके जबाव में इस संस्थान से संबंध रखने वाले मैनेजमेन्ट गुरू अरिन्दम चौधरी ने यू जी सी एवं ए आई सी टी ई  जैसी संस्थाओं पर ही आरोप जड़ते हुए उन्हें कठघरे में खड़ा कर दिया था।
उपर्युक्त घटनायें उच्च शिक्षा में निजी क्षेत्र की दबंगी का स्पष्ट प्रमाण हैं। ऐसी घटनाओं ने शिक्षा का उद्देश्य एवं शिक्षा की परिभाषा ही बदल दी है। इन निजी शिक्षण संस्थानों की विज्ञापन पालिसी देखने के  बाद सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि आज ये कितने आक्रामक एवं ताकतवर हो गये हैं। विज्ञापन की लालसा के कारण मीडिया भी निजी शिक्षण संस्थानों के कसीदे पढ़ता हुआ नजर आता है।
वर्तमान में देश में 187 निजी विश्वविद्यालय कार्य कर रहे हैं। जिन अधिनियमों के तहत इन विश्वविद्यालयों को संचालित किया जा रहा है उनमें विश्वविद्यालय के चांसलर को बहुत अधिकार दिये गये हैं एवं लगभग सभी जगह संस्था शुरू करने वाले अथवा संस्था में पहले से ही प्रभाव रखने वाले लोग चांसलर नियुक्त हो रहे हैं। सामान्यतः राज्यपाल इन निजी विश्वविद्यालयों में कुलाध्यक्ष (विजिटर) होते हैं अर्थात इन विश्वविद्यालयों का संचालन प्रमुख रूप से चांसलर की देख-रेख में ही होता है।
शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ रोजगार प्राप्त करना ही नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण व्यक्तित्व विकास के साथ-साथ रोजगार प्राप्त करना भी होना चाहिए। वर्तमान समय में सरकार जिस तरह से शिक्षा को निजी हाथों में सौंपती जा रही है इससे आने वाले समय में इस तरह के प्रकरण और भी सामने आ सकते हैं। निजी विश्वविद्यालयों की प्राथमिकतायें बिल्कुल स्पष्ट हैं एवं यह उन्हीं क्षेत्रों पर ध्यान दे रहे हैं जिसमें इन्हें प्रत्यक्ष वित्तीय लाभ की संभावना दिखाई देती है। यह मानव संसाधन पर ध्यान न देते हुए संरचनात्मक ढाचे पर अधिक बल दे रहे हैं। इन निजी शिक्षण संस्थानों में कार्य करने वाले लोगों से इस बात की जानकारी ली जा सकती है कि वे वहां पर कार्य करने से कितने संतुष्ट हैं। इसके अलावा यदि इन विश्वविद्यालयों के द्वारा जारी आंतरिक आदेशों का अवलोकन किया जाये तो हो सकता है कि इन 187 विश्वविद्यालयों में से केवल कुछ विश्वविद्यालय ही निर्धारित नियमों के अनुसार कार्य करते हुए पाये जायें।
इन विश्वविद्यालयों में अध्ययन करने वाले अधिकतर छात्र एक विशेष वर्ग (वित्तीय क्षमता के आधार पर) का ही प्रतिनिधित्व करते हैं, अर्थात् ये इस विशेष वर्ग में ही शिक्षा का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। शोध एवं शोध की गुणवत्ता पर यह निजी शिक्षण संस्थान बहुत अधिक ध्यान नहीं दे रहे हैं क्योंकि इसमें इन्हें कोई प्रत्यक्ष वित्तीय लाभ दिखाई नहीं देता है। जबकि विश्वविद्यालयों का एक प्रमुख कार्य शोध की गुणवत्ता बहाल रखना भी होता है। राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी उच्च शिक्षा में गुणवत्ता एवं नैतिक मूल्यों की स्थापना तथा विश्व के श्रेष्ठ शिक्षण संस्थानों में भारत की दयनीय स्थिति जैसे बिन्दुओं पर अपनी चिन्ता जाहिर कर चुके हैं। अतः आवश्यकता इस बात की है कि निजी शिक्षण संस्थानों को  विश्वविद्यालयों का दर्जा देने में सावधानी बरती जाये।
निजी विश्वविद्यालयों में अकादमिक गुणवत्ता बहाल करने की जिम्मेदारी कुलपति के साथ-साथ चांसलर की भी होनी चाहिए, क्योंकि इन संस्थानों में कुलपति सहित अन्य अधिकारियों की सामान्यतः इतनी हिम्मत नहीं होती है कि वे चांसलर के सामने किसी भी तरह का प्रतिरोध कर सकें, क्योंकि अधिकांश निजी विश्वविद्यालयों में लगभग सभी महत्वपूर्ण पदों पर एक परिवार के सदस्यों का ही कब्जा रहता है, इसके बावजूद भी यदि कुछ निजी विश्वविद्यालय अच्छा कार्य कर रहे हैं तो निश्चित तौर पर इसका श्रेय वहां के चांसलर को दिया जाना चाहिए। यदि सरकार चाहती है कि सी एम जे विश्वविद्यालय जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो एवं ऐसी घटनाओं पर अंकुश लगाया जाये तो कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाने होंगे:-
1-    आॅडिट भारत के नियंत्रक महालेखापरीक्षक (सी ए जी) द्वारा किया जाये।
2-    समस्त कार्यवाही/आदेश नियमित रूप से बेवसाइट पर अपलोड किये जायें।
3-    सूचना के अधिकार के तहत् समस्त जानकारी उपलब्ध करवाई जाये।
4-    प्रवेश प्रक्रिया एवं सभी प्रकार की नियुक्तियां शासन के द्वारा की जायें।
5-    जिस तरह से चुनाव आयोग ने चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों के खर्चे की सीमा निर्धारित कर दी है उसी प्रकार इनके विज्ञापन की सीमा भी निर्धारित की जाये।
6-    संस्थान में रक्त सम्बन्धियों की सहभागिता की संख्या निश्चित की जाये।
7-    पदाधिकारी अपने जीवनकाल में एक निश्चित अवधि के लिए ही पद पर रह सकें।
8-    जिन उद्देश्यों के लिए संस्था शुरू की गई है, उन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए संस्था कार्य कर रही है अथवा नहीं, इस पर सतत् रूप से निगरानी रखी जाये।
9-    यू जी सी द्वारा कुलपति के लिए निर्धारित योग्यता की तरह चासंलर के लिए भी योग्यता निर्धारित की जा सकती है।
10-    जो निजी विश्वविद्यालय अच्छा कार्य कर रहे हैं, सरकार द्वारा उन्हें माॅडल विश्वविद्यालय के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है एवं उनके प्रचार-प्रसार में सरकार द्वारा सक्रिय भूमिका निभाई जा सकती है।
मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा 30 जुलाई, 2014 को पूर्व यू जी सी  अध्यक्ष प्रो private universities हरि गौतम की अध्यक्षता में चार सदस्यीय समिति का गठन किया गया है, जिसे यू जी सी  की वर्तमान स्थिति की समीक्षा, इसके पुनर्गठन एवं पुनर्निर्माण से संबंधित रिपोर्ट छह माह में प्रस्तुत करनी है। इसी पत्र में निजी विश्वविद्यालय एवं निजी शिक्षण संस्थानों के संबंध में यू0जी0सी0 की भूमिका को लेकर सवाल खड़े किये गये हैं, तथा यू0जी0सी0 द्वारा की गई कार्यवाही पर सन्देह एवं असंतोष व्यक्त किया गया है। इसके साथ ही एक निजी विश्वविद्यालय द्वारा पी-एच डी  डिग्री दिये जाने में की गई अनियमितता का उल्लेख भी प्रमुख रूप से इसमें किया गया है।
शिक्षा को व्यवसाय मानने वालों को शिक्षा से दूर रखना होगा। यदि दुनिया के किसी भाग में कोई व्यवस्था सफल है तो यह आवश्यक नहीं है कि वह व्यवस्था हर जगह सफल ही हो। भारत जैसे देश में जहां लगभग एक चैथाई आबादी को दो वक्त की रोटी के लिए प्रतिदिन संघर्ष करना पड़ता है, वहां पर शिक्षा को निजी हाथों में सौंपने से पहले अच्छी तरह विचार करना बहुत जरूरी है। दिल्ली में एक पुस्तक विमोचन समारोह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डा मोहन भागवत ने मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी से कहा है कि पेशेवर व उच्च शिक्षा को सस्ती करने के लिए आवश्यक कदम उठाये जायें, जिससे वह सामान्य लोगों के लिए सर्वसुलभ हो। उनकी यह चिन्ता शिक्षा के निजीकरण पर प्रश्नचिन्ह है।
यदि समय रहते सरकार द्वारा ऐसे निजी विश्वविद्यालयों को चिन्हित नहीं किया गया जो नियमानुसार कार्य नहीं कर रहे हैं, एवं समाज के प्रति अपने दायित्वों का सही ढंग से निर्वहन नहीं कर रहे हैं तो कहीं ऐसा न हो कि बैंकों के राष्ट्रीयकरण की तरह इन विश्वविद्यालयों के संबंध में भी सरकार को कड़े निर्णय लेने के लिए बाध्य होना पड़े।

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