भारत में राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया

भारत में राष्ट्रपति के चुनाव का तरीका अमेरिका की तरह नहीं है यहां पर संविधान में राष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया निहित है। माना जाता है कि भारत के संविधान निमार्ताओं ने विभिन्न देशों की चुनाव पद्धतियों का खासा अध्ययन करने के बाद कई अच्छे प्रावधानों को शामिल किया है। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल 24 जुलाई, 2017 को समाप्त हो रहा है साथ ही उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी का भी कार्यकाल 10 अगस्त, 2017 को समाप्त होने वाला है। संविधान के  नियमों के अनुसार उपराष्ट्रपति को जहां लोकसभा और राज्यसभा के वर्तमान सांसद चुनते हैं, वहीं राष्ट्रपति को लोकसभा, राज्यसभा और सभी राज्यों के विधायक चुनते हैं। जिसमें इसके सदस्यों का प्रतिनिधित्व आनुपातित होता है। तथा उनकी दूसरी पसंद की भी गिनती होती है। संविधान के अनुच्छेद 54 में इसका वर्णन है। चूंकि जनता राष्ट्रपति का चयन सीधे नहीं करती है, इसलिए इसे परोक्ष निर्वाचन कहा जाता है। ज्ञात हो कि जिन सांसदों को राष्ट्रपति नामित करते हैं वे सांसद राष्ट्रपति चुनाव में वोट नहीं डाल सकते, इसके अलावा भारत में 9 राज्यों में विधानपरिषद भी हैं जोकि राष्ट्रपति चुनाव में मत का प्रयोग नहीं कर सकते। और अधिक स्पष्ट कर दूं कि राष्ट्रपति का चयन जनता के द्वारा चुने गए प्रतिनिधि ही करते हैं इसलिए राष्ट्रपति परोक्ष रूप से जनता द्वारा ही चयनित होता है एकल मत स्थानांतरण प्रक्रिया पर आधारित प्रक्रिया भारत में राष्ट्रपति के चुनाव में एक विशेष तरीके से वोटिंग होती है इसे सिंगल ट्रांसफरेबल वोट सिस्टम कहते हैं। लेकिन वह कई उम्मीदवारों को अपनी प्राथमिकी से वोट देता है यानी वह बैलेट पेपर पर यह बताता है कि उसकी पहली पसंद कौन है और दूसरी, तीसरी कौन यदि पहली पसंद वाले वोटों से विजेता का फैसला नहीं हो सका, तो उम्मीदवार के खाते में वोटर की दूसरी पसंद को नए वोट की तरह ट्रांसफर किया जाता है इसलिए इसे एकल ट्रांसफरेबल वोट कहा जाता है । वोट डालने वाले सांसदों और विधायकों के वोट का प्रमुखता अलग-अलग होती है। इसे आनुपातिक प्रतिनिधित्व व्यवस्था भी कहते हैं।

यह प्रक्रिया समझने में थोड़ी से जटिल है परन्तु अत्यधिक जटिल नहीं इसे समझने के लिए थोड़ा सा ध्यान देना पड़ेगा और पूरी प्रक्रिया समझ में आ जाएगी। यह चुनाव सीधे-सीधे नहीं होता कि जैसे लोक सभा और राज्य सभा का चुनाव होता है। सांसदों के मतों की गणना कुछ अलग तरीके से की जाती है। सबसे पहले सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुने गए सदस्यों के वोटों की गणना की जाती है और उसे जोड़ा जाता है, उसके बाद लोकसभा के चुने हुए सांसदों को राज्यसभा के कुल सांसदों की संख्या से भाग दे दिया जाता है।  इसके बाद जो भी अंक मिलता है, वह एक सांसद के वोट का मत प्रतिशत होता है। एक बात और भी खास है कि यदि इस तरह से भाग देने पर शेष 0.5 से ज्यादा अंक बचता हो तो मत के आधार में एक की वृद्धि हो जाती है। विधानसभा के सदस्यों की संख्या को भी देखा जाता है और मत प्रतिशत निकालने के लिए उस प्रदेश की जनसंख्या के द्वारा चुने गए विधायकों की संख्या से भाग दिया जाता है इस तरह जो अंक मिलता है, उसे फिर 1000 से भाग दिया जाता है अब जो अंक आता है, वही उस राज्य के एक विधायक के वोट का मत प्रतिशत होता होता है।

सबसे पहले सभी मत पत्रों पर दर्ज पहली वरीयता के मत गिने जाते हैं यदि इस पहली गिनती में ही कोई प्रत्यासी जीत के लिए जरूरी मतों की सीमा जय कर लेता है तो उसकी जीत हो जाती है। लेकिन अगर ऐसा न हो सका, तो फिर एक और कदम उठाया जाता है। पहले उस प्रत्यासी को रेस से बाहर किया जाता है, जिसे पहली गिनती में सबसे कम वोट मिले। लेकिन उसको मिले वोटों में से यह देखा जाता है कि उनकी दूसरी पसंद के कितने वोट किस उम्मीदवार को मिले हैं फिर सिर्फ दूसरी पसंद के बचे हुए वोटों को उम्मीदवारों के खाते में ट्रांसफर कर दिया जाता है। यदि यह वोट मिल जाने से किसी उम्मीदवार के कुल वोट तय संख्या तक पहुंच गई तो वह उम्मीदवार विजयी माना जाता है अन्यथा दूसरे दौर में सबसे कम वोट पाने वाला उम्मीदवार भी रेस से बाहर हो जाता है। और यह प्रक्रिया फिर से दोहराई जाती है।

इस तरह वोटर का वोट ट्रांसफर होता है। यहां यह बात गौर करने की है कि जिस पार्टी के पास लोकसभा में बहुमत है वह अपने दम पर राष्ट्रपति का चयन नहीं कर सकता। यदि उस दल का राज्यसभा में भी बहुमत है तब भी वह अपने प्रत्याशी के लिए चुनाव आसानी से नहीं जीत सकता यानी ऐसे वोटिंग सिस्टम में कोई भी बहुमत समूह अपने दम पर जीत का फैसला नहीं कर सकता। छोटे-छोटे दूसरे समूहों के वोट निर्णायक साबित होते हैं। इसलिए की यह प्रक्रिया ही ऐसी है इस चुनाव में आसानी से कोई भी पार्टी अपने प्रत्यासी को विजयी नहीं बना सकती। अर्थात यह आवश्यक नहीं कि लोकसभा और राज्यसभा में जिस पार्टी का बहुमत हो उसी का दबदबा चले ऐसा नहीं है। क्योंकि राज्यों के विधायकों का वोट भी अहम योगदान होता है।

अर्थात यह प्रक्रिया आम चुनावों की तरह नहीं होती कि प्रत्यसियों के द्वारा प्राप्त किए गए मतों का आंकलन करके जीत को निश्चित किया जा सके। राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया अलग है इसमें पहले मतों की गणना होती है उसके बाद सांसदों और विधायकों के मतों को अलग किया जाता है, इसके बाद उनके मतों का आंकलन उनके प्रदेश की जनसंख्या के आधार पर किया जाता है।

राज्य की जनसंख्या के आधार पर विधायकों के मतों का प्रतिशत निकाला जाता है। इसी तरह की प्रक्रिया सांसदों के साथ भी होती है, राज्यसभा और लोकसभा के सांसदों को मिलाकर जोड़ा जाता है उसके बाद उनमें भी भाग दिया जाता है इसके बाद जो भी मत प्रतिशत निकलकर सामने आता है उसी से सांसदों के मतों आंकलन किया जाता है। क्योंकि सांसदों का क्षेत्र विधयकों के क्षेत्रों के अनुपात में काफी बड़ा होता है इसलिए सांसदों के मतों का आंकलन उनके क्षेत्र की जनसंख्या के आधार पर किया जाता है। यह प्रक्रिया राष्ट्रपति चुनाव की है। जबकि उपराष्ट्रपति पद के चुनाव की प्रक्रिया इससे पूरी तरह से अलग है, उपराष्ट्रपति पद के चुनाव में सांसदों की भागीदारी होती है और किसी नहीं।

 

Leave a Reply

%d bloggers like this: