आरक्षणः ओबीसी के कोटे के भीतर कोटा

प्रमोद भार्गव

पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा दिए जाने के प्रयास में विपक्ष ने रोड़ा अटकाया तो सरकार ने ओबीसी की विभिन्न वंचित जातियों में पैठ बनाने का रास्ता खोल लिया। केंद्रीय कैबिनेट ने ओबीसी की केंद्रीय सूची के वर्गीकरण के लिए आयोग बनाने के फैसले को मंजूरी दे दी। यानी इस वर्ग में भी पिछड़ेपन की सीमा को देखते हुए उन्हें आरक्षण को हक दिया जाएगा। एक तरह से यह कोटे के अंदर कोटा होगा। वहीं ओबीसी में क्रीमी लेयर की आयसीमा को छह लाख से बढ़ाकर आठ लाख रुपए करने का फैसला भी लिया गया है। अब देखना है कि ओबीसी के अंदर केंद्रीय सूची में शामिल जातियों को क्या उनकी संख्या के अनुरूप सही अनुपात में आरक्षण का लाभ मिल पाएगा ? अगर नहीं ंतो इनका कैसे वर्गीकरण किया जा सकता है, आयोग इसके मापदंडों पर भी विचार करेगा। ध्यान रहे कि पिछड़ा वर्ग आयोग ने तीन वर्गो में वर्गीकरण का सुझाव दिया था। एक वर्ग जो पिछड़ा है। दूसरा वर्ग जो ज्यादा पिछड़ा है और तीसरा जो अति पिछड़ा है। भावी आयोग उन जातियों की संख्या और पिछड़ेपन को ध्यान में रखकर नई सूची तैयार करेगा। यह फैसला भले ही सामाजिक समानता के मुद्दे से जुड़ा है, लेकिन इसका राजनीतिक फलक काफी बड़ा है। दरअसल पिछले चुनावों में भी ऐसे ओबीसी वर्ग का भाजपा के प्रति झुकाव रहा था, जो बहुत प्रभावी नहीं है। इनकी बड़ी संख्या है और केंद्र एवं राज्यों की सूची को मिलाया जाए तो ऐसी जातियां सैकड़ों में हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में जो प्रभावी ओबीसी वर्ग है, वह आरक्षण के 27 फीसद कोटे के अधिकांश हिस्से पर काबिज है। भाजपा की ओर से पहले ही यह संकेत दिया गया था कि वह यह सुनिश्चित करेगी कि पिछड़ों के लिए आरक्षण का लाभ सभी जातियों तक पहुंचे। इसे आगामी चुनावों की तैयारियों के रूप में भी देखा जा रहा है।

ओबीसी में जातियों की उप-वर्ग के लिए आयोग बनाने की सिफारिश राष्ट्रिय पिछड़ा आयोग ने साल 2011 में पहली बार की थी। आयोग की सिफारिश थी कि ओबीसी को तीन उप-वर्ग में बांटा जाएं। इससे पहले 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस संबंध में व्यवस्था दी थी। साल 2012, 2013 व 2014 में संसदीय समितियों ने भी इसकी सिफारिश की थी। उप-वर्ग बनाने का मकसद ओबीसी में सभी वर्गों को बराबर लाभ का मौका देना है। अक्सर आरोप लगते हैं कि पिछड़ी जातियों में से आर्थिक तौर पर मजबूत कुछ वर्ग ही फायदा उठा रहे हैं। उनके अलावा ज्यादातर पिछड़ी जातियों को फायदा नहीं मिल रहा है। उप-वर्ग बनने पर विशेष जातियों के लिए आरक्षण का बंटवारा हो जाएगा। इस आयोग का नाम ‘अन्य पिछड़ा वर्ग उप-वर्गीकरण जांच आयोग‘ होगा। यह ओबीसी की केंद्रीय सूची में शामिल जातियों को आरक्षण के लाभ के असमान वितरण की जांच करेगा। साथ ही असमानता दूर करने के तौर-तरीके और प्रक्रिय तय करेगा। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी एवं अन्य बनाम भारत सरकार मामले में 16 नवंबर 1992 को अपने आदेश में व्यवस्था दी थी कि पिछड़े वर्गों को पिछड़ा या अतिपिछड़ा के रूप में श्रेणीबद्ध करने में कोई संवैधानिक या कानूनी बाधा नहीं है। लिहाजा कोई राज्य सरकार ऐसा करना चाहती है तो वह कर सकती है। इस परिप्रेक्ष्य में ओबीसी आयोग की सिफारिश पर 11 राज्य पहले ही अपनी ओबीसी सूची में उप-वर्ग बना चुके हैं। इन राज्यों में आंध्र प्रदेश, तेलगांना, पुड्डुचेरी, कर्नाटक, हरियाणा, झारखंड, पश्चिम बंगाल, बिहार, महाराष्ट्र, तमिलनाडू और जम्मू-कश्मीर शामिल है।

क्रीमी लेयर बढ़ने से ओबीसी आरक्षण का फायदा पाने वाले बढ़ेगें। आठ लाख रुपए सालाना तक वाले इस दायरे में आएंगे। पिछड़ा वर्ग आयोग ने 2015 में अपनी रिपोर्ट में कहा था कि 27 फीसदी आरक्षण के बाबजूद सरकारी नौकरी में ओबीसी की संख्या 15 लाख रुपए तक बढ़ानी चाहिए। पिछड़ा कल्याण पर संसदीय समिति ने यह सीमा 20 लाख रुपए तक रखने की सिफारिश की थी। सिफारिषों का अध्ययन कर सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने कैबिनेट के पास 8 लाख रुपए आयसीमा की सिफारिश भेजी थी। इससे पहले 2013 में क्रीमी लेयर को 4.5 लाख से बढ़ाकर 6 लाख किया गया था।

पिछड़े वर्ग को लाभ पहुंचाने के मकसद से केंद्रीय मंत्रीमंड़ल पहले ही राट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की जगह नया आयोग के गठन को मंजूरी दे चुका है। पिछडे़पनं के आधार पर आरक्षण की बढ़ती मांग को देखते हुए यह फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अघ्यक्षता में लिया गया था। इसे संवैधानिक दर्जा भी दिया जाएगा। मौजूदा आयोग को यह दर्जा नहीं है। पिछड़ा वर्ग कल्याण से जुड़ी संसदीय समिति ने भी यही सिफारिश मंत्रीमंडल को की थी। नए आयोग का नाम ’सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ा वर्ग राष्ट्रिय आयोग‘ (एनएसईबीसी) होगा।

इसे नए कदम का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अब पिछड़ा वर्ग सूची में किसी नई जाति को जोड़ने या हटाने का अधिकार राज्य सरकारों के पास नहीं रहेगा। वर्तमान में सूची में जातियों के नाम जोड़ने व हटाने का काम सरकार के स्तर पर होता है। संसद की मंजूरी के बाद ही सूची में बदलाव संभव हो सकेगा। यह फैसला उत्तर प्रदेश चुनाव में भाजपा को मिली शानदार जीत के परिप्रेक्ष्य में आया लगता है। यहां पार्टी की जीत में पिछड़े वर्ग ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अपना दल जैसी छोटी पार्टियों के माघ्यम से भाजपा ने ओबीसी वोट बैंक में पैठ बनाई थी। केंद्र के इस कदम को इसी सामाजिक ताने-बाने के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के तौर पर देखा जा रहा है। इससे भाजपा के दूरगामी राजनीतिक हित सधते दिखाई दे रहे हैे। यह फैसला ऐसे समय आया है जब आरक्षण की मांग देश के अनेक प्रदेशों में उठ रही है। गुजरात के पटेल, राजस्थान के गुर्जर, हरियाणा के जाट और आंध्र प्रदेश के कापू  समुदाय के लोग आंदोलनरत थे। गुजरात में तो इसी साल के अंत में चुनाव होने हैं। माना जा रहा है कि मोदी सरकार ने आयोग के गठन का प्रस्ताव लाकर फिलहाल इन समुदायों को विश्वास में लेने की कोशिश की है। साफ है कि भाजपा इस फैसले के जरिये पिछड़ा और अति पिछड़ो में मजबूत पैठ बना लेगी।

संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ी जातियों को आरक्षण देने को कहा गया है। इसमें शर्त है कि यह साबित किया जाए कि दूसरों के मुकाबले इन दोनों पैमानों पर पिछड़े हैं, क्योंकि बीते वक्त में उनके साथ अन्याय हुआ है, यह मानते हुए उसकी भरपाई के तौर पर आरक्षण दिया जा सकता है। राज्य का पिछड़ा वर्ग आयोग राज्य में रहने वाले अलग-अलग वर्गो की सामाजिक स्थिति का ब्योरा रखता है। वह इसी आधार पर अपनी सिफारिशें देता है। अगर मामला पूरे देश का है तो राष्ट्रिय पिछड़ा वर्ग आयोग अपनी सिफारिशें देता है। देश में कुछ जातियों को किसी राज्य में आरक्षण मिला है तो किसी दूसरे राज्य में नही मिला है। मंडल आयोग मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने भी साफ कर दिया था कि अलग-अलग राज्यों में हालात अलग-अलग हो सकते हैं।

 

वैसे तो आरक्षण की मांग जिन प्रांतों में भी उठी है, उन राज्यों की सरकारों ने खूब सियासी खेल खेला है, लेकिन हरियाणा मे यह खेल कुछ ज्यादा ही खेला गया है। जाट आरक्षण के लिए मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर सरकार ने बीसी ;पिछड़ा वर्ग सी नाम से एक नई श्रेणी बनाई थी, ताकि पहले से अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल आरक्षण का लाभ प्राप्त कर रहीं जातियां अपने अवसर कम होने की आशंका से खफा न हों। साथ ही बीसी-ए और बीसीबी-श्रेणी में आरक्षण का प्रतिशत भी बढ़ा दिया था। जाटों के साथ जट सिख, बिशनोई, त्यागी, रोड, मुस्लिम जाट व मुल्ला जाट बीसी-सी श्रेणी में मिलने वाले 10 प्रतिशत आरक्षण से लाभान्वित हो गए थे। इस विधेयक में यह दृष्टि साफ झलक रही थी, कि जाट आंदोलन से झुलसी सरकार ने यह हर संभव कोशिश की है कि राज्य में सामाजिक समीकरण सधे रहें। लेकिन उच्च न्यायालय ने इन प्रावधानों को खारिज कर दिया था।

आरक्षण के इस सियासी खेल में अगली कड़ी के रूप में महाराष्ट्र आगे आया। यहां मराठों को 16 फीसदी और मुस्लिमों को 5 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान विधानसभा चुनाव के ठीक पहले कर दिया गया था। महाराष्ट्र में इस समय कांग्रेस और राष्ट्रिय कांग्रेस पार्टी की सरकार थी। सरकार ने सरकारी नौकरियों,शिक्षा और अर्द्ध सरकारी नौकरियों में आरक्षण सुनिश्चित किया था। महाराष्ट्र में इस कानून के लागू होने के बाद आरक्षण का प्रतिशत 52 से बढ़कर 73 हो गया था। यह व्यवस्था संविधान की उस बुनियादी अवधारणा के विरुद्ध थी,जिसके मुताबिक आरक्षण की सुविधा 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। बाद में मुंबई उच्च न्यायलय ने इस प्रावधान पर स्थगन आदेश जारी कर दिया। फैसला आना अभी शेष है।

इस कड़ी में राजस्थान सरकार ने सभी संवैधानिक प्रावधानों एवं सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों को दरकिनार करते हुए सरकारी नौकरियों में गुर्जर,बंजारा,गाड़िया लुहार,रेबारियों को 5 प्रतिशत और सवर्णों में आर्थिक रूप से पिछड़ों को 14 प्रतिशत आरक्षण देने का विधेयक 2015 में पारित किया था। इस प्रावधान पर फिलहाल राजस्थान उच्च न्यायालय ने स्थगन दे दिया है। यदि आरक्षण के इस प्रावधान को लागू कर दिया जाता तो राजस्थान में आरक्षण का आंकड़ा बढ़कर 68 फीसदी हो जाएगा, जो न्यायालय द्वारा निर्धारित की गई 50 प्रतिशत की सीमा का उल्लघंन है। साफ है, राजस्थान उच्च न्यायालय इसी तरह के 2009 और 2013 में वर्तमान कांग्रेस की अषोक गहलोत सरकार द्वारा किए गए ऐसे ही कानूनी प्रावधानों को असंवैधानिक ठहरा चुकी है। लेकिन अब पिछड़ा वर्ग में उप-वर्ग बनाए जाने के प्रावधान से नई पिछड़ी जातियों को आरक्षण देने का मार्ग खोल गया है।

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