सतत विकास के लक्ष्य के लिए संकल्प और प्रतिबद्धता जरूरी

दिलीप बीदावत

संयुक्त राष्ट्र संघ एवं सदस्य देशों द्वारा सतत विकास लक्ष्य के तहत वर्ष 2030 तक के लिए तय किए गए 17 विकास लक्ष्यों में नागरिक अधिकारों और उनके जीवन स्तर में सुधार की मंशा तो प्रकट होती है लेकिन संकल्प को हकीकत में बदलने की प्रतिबद्धता सभी देशों में एक जैसी हो, इस पर प्रश्नचिन्ह लगता जा रहा है। विकसित राष्ट्र अन्य छोटे और अल्प विकसित राष्ट्रों पर अपनी महत्वकांक्षी योजनाओं को थोपने का प्रयास कर सतत विकास के लक्ष्य को पाने में बाधा उत्पन्न करते हैं। सितंबर 2015 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के ऐतिहासिक शिखर सम्मेलन में 193 सदस्य राष्ट्रों द्वारा अपनाए गए सतत विकास के 17 लक्ष्यों में 2030 तक सबके लिए समान, न्यायपूर्ण और सुरक्षित विश्व की सृष्टि, व्यक्तियों, पृथ्वी और समृद्धि की संकल्पना एक सकारात्मक विकास का मौका देती है। लेकिन देश-दुनिया की सामाजिक, राजनितिक, आर्थिक व्यवस्थाओं, भौगोलिक परिस्थितियों और सांस्कृतिक विविधताओं के मध्य सकारात्मक सहयोग के बिना यह संभव नहीं है। प्रतिस्पर्धात्मक बाज़ार व्यवस्था, हितसाधक व्यापार, कानून, बाज़ार और संसाधनों के दोहन को लेकर राष्ट्रों के बीच उत्पन्न टकराहट के चलते सतत विकास लक्ष्यों की संकल्पना विश्व राजनीति के दोहरे मापदंडों की परिचायक ही प्रतीत हो रही है।

ऐसा नहीं है कि विश्वस्तरीय विकास के संकल्प पहली बार दोहराये गए हैं। वर्ष 2000 में इसी मंच द्वारा सहस्राब्दी विकास लक्ष्य में 2015 तक आठ लक्ष्यों की प्राप्ति का संकल्प पारित किया था। जिसमें भूखमरी और गरीबी को समाप्त करना, सार्वजानिक प्राथमिक शिक्षाएं प्रदान करना, लिंग असमानता को दूर करना तथा महिला सशक्तिकरण, शिशु मृत्युदर घटाना और मातृत्व स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के साथ साथ एचआईवी-एड्स, मलेरिया जैसी महामारियों से छुटकारा पाने पर ज़ोर दिया गया है। इसके अलावा पर्यावरण सतता और वैश्विक विकास के लिए संबंध स्थापित करने की वचनबद्धता भी दोहराई गई थी। भारत ने भी सहस्राब्दी विकास सूचकांक को 2015 तक हासिल करने का संकल्प दोहराया था, लेकिन सभी आठ लक्ष्यों में अपेक्षाकृत सफलता नहीं मिली।

वास्तव में विकास को केवल देश के आर्थिक विकास से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। विकास का अर्थ मानव के जीवन स्तर से है जिसमें लोगों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में सुधार, गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ् य, रोजगार, आवास, पेयजल और स्वच्छता जैसी मूलभूत जरूरतों तक पहुंच तथा सामाजिक न्याय, समानता और मानवीय कौशल है। विकास का मापक पैमाना मानव विकास सूचकांक पर आधारित होना चाहिए, तभी नीतियां और कार्यक्रम इसके आस-पास दिखेंगे। संकल्पना में सभी बातें सतत विकास लक्ष्यों, उप लक्ष्यों में दिखती है, लेकिन आर्थिक क्रियाकलापों में इनका प्रतिबिंबित होना अतिआवश्यक है।

सतत विकास के सत्रह लक्ष्यों में लक्ष्य ‘आठ’ एक छतरी जैसी अवधारणा लिए हुए है, जिसमें नागरिकों के आर्थिक विकास की मूल धूरी में विकास के विभिन्न पहलुओं को पिरोया गया है। लक्ष्य आठ के 12 उपलक्ष्यों में रोजगार उपलब्धता वाले सभी क्षेत्रकों को इस तरह विकसित करने की बात दोहराई गई है, जिससे सभी नागरिकों का टिकाऊ आर्थिक विकास संभव हो। इसके लिए कृषि, सूक्ष्म-लघु-मध्यम दर्जे के उद्योंगो के आर्थिक व तकनीकी विकास को प्रोत्साहन, श्रमिक अधिकारों की सुरक्षा, समान वेतन, बाल श्रम उन्मूलन, युवाओं का कौशल विकास, पर्यावरण संरक्षण संबंधी नीतियां बनाने एवं उन पर काम करने जोर दिया गया है।

भारत विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शुमार होने के बावजूद मानव विकास सूचकांक, हंगर इंडेक्स और स्वास्थ्य जैसे सूचकाकों में अन्य अल्प विकसित देशों से भी काफी नीचे पायदान पर है। प्राकृतिक और मानव संसाधन की अकूत संपदा के बावजूद गरीबी, बेरोजगारी, भूखमरी, स्वा स्थ्य, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्र में पिछड़ापन और लोगों के जीवन स्तर में सुधार के आशानुकूल जैसे संकेत ज़मीनी हक़ीक़त में नहीं दिखने के कई सारे कारण हैं, जिन को दूर किए बिना सतत विकास लक्ष्य को पाना संभव नहीं होगा। भारत कृषि प्रधान और ग्रामीण परिवेश वाला देश है। जनसंख्या के बड़े हिस्से का रोजगार और आजीविका कृषि और इससे पैदा होने वाले रोजगार पर निर्भर है। 2011 की जनगणना के अनुसार देश की कुल जनसंख्या में 68.84 प्रतिशत लोग गांवों में निवास करते हैं। प्राकृतिक आपदाओं और भौगोलिक विविधताओं के साथ-साथ सरकारी क्षेत्र में कृषि विकास की अनदेखी से किसानों विशेषकर युवा किसानों का कृषि एवं पशुपालन से मोहभंग हुआ है। कृषि में लागत और आय में असमानता की खाई के कारण किसान खेती को वैकल्पिक आजीविका के रूप में देखने लगे हैं।

दाने-दाने को जोड़कर देश-दुनिया के खाद्यान्न भंडार भरने वाले छोटे और मझौले किसानों की आर्थिक दशा सबसे खराब है। आंकड़ों के अनुसार भारत में 13.78  करोड़ कृषि भूमि धारकों में से 11.78 करोड़ छोटे और मझौले किसान हैं, जो खेती और मजदूरी की मिश्रित कमाई से अपनी आजीविका चलाते हैं। युवा और प्रौढ़ सदस्य असंगठित क्षेत्र में मजदूरी के लिए प्रवास करते हैं। युवाओं का तेजी से शहरों की तरफ पलायन बढ़ रहा है।

पलायन से न केवल शहरों पर जनसंख्या का अतिरिक्त बोझ बढ़ रहा है बल्कि स्वास्थ्य और रोजगार की आवश्यकताओं को भी जन्म दिया है. ऐसे में प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना, प्रधानमंत्री रोज़गार प्रोत्साहन योजना, मुद्रा योजना, रोज़गार सृजन योजना और राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा जैसी केंद्र की अनेकों योजनायें हैं जो सतत विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने में अहम योगदान दे सकता है। हालांकि भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्था में दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले युवा मानव संसाधनों की उपलब्धता, गरीबी, भुखमरी, बेरोज़गारी और सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा, खाद्य सुरक्षा जैसे कानून और कल्याणकारी कार्यक्रमों का 70 फीसदी क्रियान्वयन कार्यक्रम में निहित मंशा के अनुरूप होना सुनिश्चित हो जाए, तो कोई कारण नहीं है जो भारत को मानव विकास एवं विश्व बिरादरी के अन्य अग्रणी विकसित देशों की बराबरी में खड़ा होने से रोक सके।

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