लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव
सर्वोच्च न्यायालय ने देशभर के सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्र्रगान अनिवार्य कर दिया है। इस दौरान सिनेमा के पर्दे पर राष्ट्र्रध्वज की लहराती उपस्थिति भी जरूरी है। अर्थात न्यायालय के इस एक आदेशों में राष्ट्र्रगान और राष्ट्रीय झंडे का सम्मान और गरिमा अंतर्निहित हैं। जिस वक्त यह गीत बज रहा हो, उस समय छविगृह में मौजूद सभी दर्शकों को सम्मान में सावधान की मुद्रा में खड़ा होना भी आवश्यक है। अदालत ने राष्ट्र्रगान को संवैधानिक देशभक्ति मानते हुए आदेशों में कहा है कि ‘मातृभूमि के प्रति राष्ट्र्रप्रेम का प्रदर्शन भी जरूरी है। लोगों को अनुभूति होनी चाहिए कि वे अपने देश में हैं और यह हमारी मातृभूमि है। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि विदेशों में तो भारतीय वहां के प्रत्येक कानूनी प्रावधान का पालन करते हैं, किंतु स्वदेशों में कानून और परंपराओं के उल्लंघन को तत्पर दिखाई नहीं देते हैं।‘ इसलिए न्यायालय ने राष्ट्र्रगान का सम्मान हरेक नागरिक का कत्र्वय माना है। राष्ट्र्रगान, राष्ट्र्रगीत और राष्ट्रीय ध्वज को लेकर देशों में सम्मान व अपमान के विवाद व विरोधाभासी पहलू सामने आते रहे हैं, लेकिन अब देशों की सबसे बड़ी अदालत के फैसले के परिप्रेक्ष्य में इस तरह के मुद्दों पर हमेशा के लिए विराम लग जाना चाहिए।
भोपाल के श्यामनारायण चैकसे की जनहित याचिका के क्रम में यह फैसला न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा और अमिताव राय पीठ ने सुनाया है। फैसले में पूरा गीत सुनाने के आग्रह के साथ उसके व्यवसायीकरण पर भी प्रतिबंध लगाया गया है। गोया न तो अब इसका नाट्य रूपांतरण हो सकेगा, और न ही गीत को तोड़-मड़ोर कर इसे विविध रूपों में प्रस्तुत किया जा सकेगा। आपत्तिजनक साम्रगी पर भी राष्ट्र्रगान के अंश नहीं छापे जा सकेंगे। 1962 में चीन से युद्ध के बाद 60 और 70 के दशक में फिल्म समाप्त होने के बाद सिनेमाघरों में इसे बजाया जाता था। लेकिन इस दौरान दर्शक खड़े रहने की बजाय,बाहर निकल जाते थे। धीरे-धीरे यह परंपरा आप से आप बंद हो गई। इसीलिए इस फैसले में निर्देशित किया गया है कि राष्ट्र्रगान के समय सिनेमाघरों के दरवाजे बंद रखे जाएं। ऐसा नहीं है कि सिनेमाघर में राष्ट्र्रगान बजाने का नियम भारत में ही लागू किया गया है। अमेरिका, फ्रांस, चीन, थाईलैंड, श्रीलंका व बांग्लोदेश समेत सौ से अधिक देशों में अपने-अपने राष्ट्र्रगानों का बजाया जाना और उसके सम्मान में खड़े होना जरूरी है।
बहुत कम लोगों को जानकारी है कि विश्वविख्यात रचनाकर, दार्शनिक, संगीतज्ञ, शिक्षाशास्त्री व बहुमुखी प्रतिभा के धनी रविन्द्र्रनाथ ठाकुर दुनिया के एकमात्र ऐसे कवि हैं, जिनकी दो कविताएं दो देशों का राष्ट्र्रगान बनी हैं। भारत का राष्ट्र्रगान ‘जन-गण मन‘ और बांग्लादेशों का राष्ट्र्रगान ‘अमर-सोनार-बंग्ला‘ टैगोर की ही रचनाएं हैं। इसके अलावा श्रीलंका के राष्ट्र्रगान पर भी इन्हीं गानों के भाव का प्रभाव है। साहित्य में नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले टैगोर एशिया के पहले लेखक हैं। उन्हें दिसंबर 1913 में बांग्ला भाषा में लिखी ‘गीतांजली‘ पर यह अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिला था। गीतांजली में कुल 157 गीत हैं। प्रकृति से विशेष लगाव रखने वाले, गुरुदेव का मानना था कि प्रकृति के सानिध्य में ही विद्यार्थियों को अध्ययन करना चाहिए। इसी सोच को मूर्त रूप देने के लिए रविन्द्रनाथ सियालदेह आए और षांति-निकेतन की स्थापना की। षांति-निकेतन में परीक्षाएं नहीं होती थीं, क्योंकि टैगोर मानते थे कि परीक्षा महज पास कराने के तरीके सिखाती है, व्यावहारिक ज्ञान से इसका कोई सीधा वास्ता नहीं है। हालांकि टैगोर कोलकाता के सेंट जेवियर स्कूल में प्रारंभिक शिक्षा लेने कुछ समय गए थे, लेकिन उनका मन रटने-रटाने वाली शिक्षा में नहीं लगा, जिहाजा उनकी बहुमुखी प्रतिभा को विकसित और बहुआयामी रूप देने वाली शिक्षा घर पर ही दी गई। ऐसा व्यक्ति जिसने षैक्शिक संस्थाओं से कोई प्रमाण-पत्र नहीं लिया, वह दो देशों के राष्ट्र्रगानों का रचियता है और उनकी गीतांजली कई विश्व विद्यालयों के पाठ्यक्रम में षामिल है। गोया जो व्यक्ति पाठषाला नहीं गया, वह कई विधाओं का ज्ञाता और षांति निकेतन का गुरू रहा।
गुरुदेव के राष्ट्र्रगान के पांच पद हैं, लेकिन इसके पहले पद को ही 27 दिसंबर 1911 को कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेषन में गाया गया था। यह पहला पद स्वतंत्रता प्राप्ती के बाद राष्ट्र्रगान के रूप में स्वीकृत किया गया। चूंकि इस पद को राष्ट्र्रगान के रूप में मंजूर कर लिया गया था, इसलिए इसे गाने के नियम, संगीत व समय भी तय किए गए। संगीतमयी यह गीत 52 सेकेंड में पूरा होता है। बजाने के समय उल्लेखित तो यह भी है कि जिस व्यक्ति के कानों में इस गान की आवाज गूंजेगी, वह गीत पूरा नहीं होने तक वहीं खड़ा रहेगा। किंतु सभी जानते हैं कि इस नियम का अकसर पालन नहीं होता है। केवल सेना, सुरक्षा बलों और 15 अगस्त व 26 जनवरी के दिन इस गाने से जुड़े नियमों का पालन अधिकतम लोग पूरे सम्मान से करते हैं। 23 मई 2014 को तमिलनाडू की मुख्यमंत्री जयललिता के षपथ-ग्रहण समारोह में राष्ट्र्रगान 20 सेंकेड ही बजा। इसी अपमान से आहत होकर ष्यामनारायण चैकसे ने पहले भोपाल की अदालत में याचिका लगाई थी, बाद में जबलपुर उच्च न्यायालय में लगाई गई और फिर षीर्श न्यायलय पहुंची और उक्त फैला आया।
हालांकि राष्ट्र्रगान और राष्ट्र्रगीत के सम्मान व आपमान को लेकर सवाल उठते व विवाद सामने आते रहे हैं। जबकि इस बावत ‘राष्ट्रीय सम्मान व अपमान विधेयक 1971‘ अस्तित्व में है। इसकी धारा तीन के अनुसार यदि कोई राष्ट्र्रगान में बाधा उत्पन्न करता है, तो उसे अधिकतम तीन साल की सजा और जुर्माना हो सकते हैं। अब अदालत के इस आदेशों से 1971 के कानून को ताकत मिलेगी। यह फैसला 10 दिन के भीतर लागू करना होगा। इस आषय का आदेशों सभी राज्यों के प्रमुख सचिवों को भेजा गया है। हालांकि इसके पालन में कठिनाइंया आती रहेंगी। क्योंकि देशों में कई लोग राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय प्रतीकों से ऊपर धर्म को मानते हैं। यहां तक कि सांसद और विधायक जैसे पदों पर निर्वाचित होने और संविधान की षपथ लेने के बावजूद षफीउर्र रहमान बर्क ने संसद में राष्ट्र्रगीत का बहिश्कार किया था। बर्क उस समय बसपा से सांसद थे। वे सपा से भी सांसद रह चुके हैं। हालांकि 2014 के आम चुनाव में बर्क नहीं जीत पाए। दरअसल देशों के दिग्गज सांसदों ने संसद सत्र का शुभारंभ राष्ट्र्रगान, यानी ‘जन-गण-मन‘ से होगा और सत्रावसान राष्ट्र्रगीत ‘वंदे मातरम‘ से करने का निर्णय लिया था। इस फैसले के वक्त कोई एक धर्म विशेष के सांसद, संसद में मौजूद नहीं थे, बल्कि सभी धर्मों के थे, गोया यह फैसला सभी धर्मावलंबियों को मान्य था। ऐसे में जरूरी तो यह था कि राष्ट्रीय सम्मान व अपमान विधेयक-1971 के तहत बर्क को कानून के दायरे में लाया जाता, लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं। संसद की गरिमा और राष्ट्रीय प्रतीकों की अवहेलना की ऐसी ही वजह देश में संकीर्ण सोच को बढ़ावा देती हैं। वैसे भी कोई सांसद या जन-प्रतिनिधि संसद के बहुमत और संविधान की मार्यादा के पालन की प्रतिबद्धता की शपथ लेता है, इसलिए इनके द्वारा किए अपमान को कतई बर्दास्त नहीं किया जाना चाहिए। इस तरह जान-बूझकर किए अनादर का असर उन छात्रों व युवाओं की अपरिक्व मानसिकता पर गलत पड़ता है, जो राष्ट्रीय प्रतीकों और मूल्यों से संस्कार ग्रहण कर रहे होते हैं। राष्ट्र्रगान किसी भी देशों के सम्मान से जुड़े गौरव-गाथा का प्रतिफल होता है, इसलिए उसके अनादर को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। शायद इसी परिप्रेक्ष्य में अदालत ने कहा है कि ‘देश स्वतंत्र है, इसीलिए लोग स्वतंत्रता का लाभ ले पा रहे हैं।‘ इसलिए राष्ट्र्रगान के प्रति सम्मान जताने में न तो किसी पूर्वग्रही मानसिकता से काम लेने की जरूरत है और न ही सम्मान में संकोच बरतना चाहिए।
अदालत ने राष्ट्र्रगान के नाटकीय प्रयोजनों पर रोक लगाई है। दरअसल अनेक फिल्म, धारावाहिक और नाटकों के निर्माता राष्ट्रीयता की भावना उभारने के लिए इसके मूल लिखित रूप को परिवर्तित करने के साथ-साथ उत्तेजक संगीत भी जोड़ देते हैं। ऐसा राष्ट्रीयता को मजबूत करने की बजाय, व्यावसायिक लाभ के लिए किया जाता है। कई फिल्मों में इसकी लय और धुन को बदला गया है। राष्ट्र्रगान के मूल स्वरूप को बदलकर उससे आर्थिक दोहन करना भी एक तरह से अपमान ही है। इन वजहों से भ्रष्ट-पाठ के प्रचलन में आ जाने के खतरे भी बने रहते हैं। इसलिए कथित मनोरंजन व देशोंभक्ति के गठबंधन पर रोक लगाकर न्यायालय ने उचित ही किया है। लिहाजा अब कोई व्यक्ति विशेष धर्म के आधार पर राष्ट्र्रगान के सम्मान में असहज अनुभव करता है, तो इस स्थिति से व्यर्थ का टकराव सामने आएगा, जो देशों की एकता और सामाजिक सद्भाव के लिए नुकसानदेह होगा।

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