लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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संदर्भः चबाने वाली तंबाकू के सेवन पर हुए शोधों के विरोधाभासी निष्कर्ष-

लकवा का कारण भी है तंबाकू
प्रमोद भार्गव
तंबाकू ऐसा नषीला पदार्थ है, जिसपर सबसे ज्यादा विरोधाभासी और चोंकाने वाले शोध आते रहे है। ऐसे ही एक नए शोध ने दावा किया है कि चबाने वाली तंबाकू (स्मोकलैस टोबैको) के सेवन से कैंसर होता है यह वैज्ञानिक तथ्य तो सर्वमान्य है, लेकिन तंबाकू के सेवन से लोग लकवाग्रस्त भी होते हैं यह चोंकाने वाला तथ्य हाल ही में सामने आया है। इस शोध से यह भी पता चला है कि तंबाकू से होने वाले कैंसर की तुलना में लकवा से ज्यादा लोग मरते है। मौत की सालाना दर लगभग 1 लाख व्यक्ति हैं। इतना ही नहीं सामान्य व्यक्तियों के मुकाबले चबाने वाली तंबाकू खाने वाले लोगों में लकवाग्रस्त होने का खतरा 37 गुना अधिक रहता है, जबकि कैंसर की चपेट में आने की आशंका 31 गुना रहती हैं।
यह चोंकाने वाला तथ्य विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के ग्लोबल नाॅलेज हब आॅन स्मोकलैस टोबैको और हेलिस खेसरैया इंस्टीटयूट फाॅर पब्लिक हेल्थ के संयुक्त शोध से सामने आया है। इस शोध को चबाने वाली तंबाकू से होने वाली मौत का आकलन करने वाला दुनिया का पहला शोध माना गया है। 133 देशों पर हुए शोध से यह बात सामने आई है कि चबाने वाली तंबाकू से दुनिया में हर साल 6,52,494 मौतें होती है। इसमें 88 प्रतिषत लोग दक्शिण-पूर्वी एशियाई देशों के हैं। शोध से पता चला है कि तंबाकू के हानिकारक तत्वों से खून की नली में सूजन आ जाती है। थक्का बनने के साथ ही रक्त प्रवाह कम हो जाता है। इससे दिमाग की नसों में भी थक्का बनता है। नतीजतन व्यक्ति लकवा की चपेट में आ जाता है। चबाने वाली तंबाकू के सेवन कर्ताओं में तंबाकू नहीं खाने वालों की तुलना में कम उम्र में मौत की अशंका 22 गुना बढ़ जाती है। इसी तरह तंबाकू खाने वालों में मुंह, गले और खाने वाली नली का कैंसर होने की शंका 117 गुना अधिक रहती है। इसी तरह पेट का कैंसर (स्टमक कैंसर) होने की आशंका 33 गुना अधिक रहती है। हृदयाघात का खतरा भी सामान्य व्यक्ति से 10 गुना अधिक रहता है। गोया, शोध ने यह तय कर दिया है कि चबाने वाली तंबाकू से होने वाली कुल मौतों में सर्वाधिक संख्या लकवाग्रस्त लोगों की हैं, कैंसर इस मामले में दूसरे नबंर पर हैं। इस तंबाकू का सेवन सबसे ज्यादा 67 फीसदी भारतीय करते है। साफ है, सर्वाधिक मौतें भारत में ही होती हैं। ऐसे ज्यादातर शोध इसलिए विरोधाभासी व संदिग्ध होते हैं, क्योंकि इन शोधों में धन खर्च सिगरेट बनाने वाली कंपनियां करती हैं। उनकी कोशिश रहती है कि शोधों के निष्कर्ष ऐसे आएं, जिससे चबाने वाली तंबाकू खाने की बजाय लोग सिगरेट पीने लग जाएं ? इस परिप्रेक्ष्य में तंबाकू से जुड़े शोधों की सच्चाई जानते हैं।
तंबाकू खाने के पक्ष में दो साल पहले आए शोध ने नई आवधारणा गढ़ी थी कि तंबाकू के पौधों में पाया जाने वाला एक कण अथवा अणु मनुश्य में जड़ें जमा चुकी कैंसर कोशिकाओं को खत्म करने में उपयोगी है। मसलन अब तक जिस तंबाकू को कैंसर का जनक माना जाता था, वहीं तंबाकू कैंसर के निदान में प्रतिरोधी दवा के रूप में काम आएगी। वैसे माना जाता है कि तंबाकू दुनिया भर में प्रत्यक्ष रूप से 40 लाख लोगों की जान लेती है। ऐसे में क्या यह शोध तंबाकू कंपनियों ने अपना मुनाफा बढ़ाने के लिए प्रायोजित ढ़ंग से कराया है,यह आशंका पैदा होना स्वाभाविक है।
ट्रोब विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट फाॅर मालूक्यूलर सांइस के वैज्ञानिकों ने तंबाकू के पौधों के फूल में इस अणु की पहचान की है। इसमें कवक और वीशाणु प्रतिरोध के अलावा कैंसर कोशिकाओं की पहचान करने और उन्हें मारने की क्षमता भी है। इस अणु को एनडी-1 नाम दिया गया है। शोध के परिणाम का प्रकाषन ई-लाइफ जर्नल में किया गया है। प्रमुख शोधकर्ता मार्क हुलेट ने कहा है कि इसमें एक खास पदार्थ विकसित होता है। जिसके निशाने पर केवल कैंसर रहता है। जबकि स्वास्थ्य कोशिकाएं बेअसर रहती हैं।
तंबाकू या धूम्रपान के फेबर में यह कोई नया शोध नहीं था। धूम्रपान से शारीरिक हानि कम दिखे,इसके लिए वैज्ञानिक और बुद्विजीवियों को तंबाकू कंपनियां प्रायोजित ढ़ंग से ललचाती है। दवा कंपनियां भी इन शोधो को प्रोत्साहित करती हैं,जिससे लोग खूब धूम्रपान करें और बीमार हों। इस संदर्भ में कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों के साथ एक अध्ययन केलरैडो की एन लैंडमेन ने प्रकाशित किया है। 80 लाख की संख्या में ये दस्तावेजी साक्ष्य लीगेसी तंबाकू दस्तावेज पुस्तकालय से प्राप्त हुए हैं। इन दस्तावेजों के अध्ययन की पड़ताल से पता चला कि लोगों के दिल-दिमाग पर असर डालने की दृष्टि से तंबाकू कंपनियों ने अर्थशास्त्रियों,दार्षनिकों,समाज विज्ञानियों और वैज्ञानिकों की गोलबंदी की। नतीजतन धूम्रपान के पक्ष में जोरदार मुहिम छेड़ दी गई। कैंसर के पक्ष में आया यह शोध भी इसी मायाजाल की अगली कड़ी लगता है।
इस अध्ययन के मुताबिक मनोवैज्ञानिक हैंस आइसेन्क और दार्षनिक राॅजर स्क्रटन इस नेटवर्क से जुड़े थे। यह नेटर्वक 1970 में वजूद में आया था। यही वह समय था,जब धूम्रपान के खतरों पर गंभीर व व्यापाक बहस की शुरूआत हुई थी। दस्तावेज बताते हैं कि दुनिया की 7 प्रमुख सिगरेट कंपनियों की एक बैठक 1977 में हुई थीं,जहां परस्पर सहयोग से काम करने का फैसला लिया गया था। दलील दी गई की धूम्रपान से लोग एक-दूसरे के करीब आते हैं। यानी धूम्रपान के सामाजिक लाभ हैं। हैंस आइसेन्क ने बताया कि तंबाकू से जुड़ी बींमारियां आनुवंशिक कारणों से होती हैं।
इसी तरह 1985 में एक किताब ‘स्मोकिंग एंड सोसाइटीः Towards more balanced perspective शीर्षक से छपी थी। इस किताब को लिखने और प्रकाशित करने का पूरा खर्च तंबाकू उद्योग ने उठाया था,लेकिन इस सहयोग का किताब में कहीं उल्लेख नहीं था। इसी तर्ज पर 1998 में राॅजर स्क्रटन ने ‘दी टाइम्स‘ में धूम्रपान के पक्ष में एक बेहद शर्मनाक और हस्यास्पद तर्क दिया था कि ‘धूम्रपानी लोग स्वास्थ्य सेवाओं पर कम दबाव डालते हैं,क्योंकि वे जल्दी मर जाते हैं‘। बाद में पता चला कि स्क्रटन को जापान टोबैको इंटरनेशनल से सलाना मानदेय मिलता था। तंबाकू कंपनियों ने 1990 के दशक में 50 लाख डाॅलर देकर ‘एसोसिएट्स फाॅर रिसर्च इन टू दी सांइस आॅफ एन्जाॅयमेंट की स्थापना कराई। यह संस्था ने स्वास्थ्य में ‘शुद्धतावाद‘के खिलाफ प्रचार मुहिम चलाई थी।
तम्बाकू कंपनियां प्रयोजित शोध करती हैं,यह इस तथ्य से भी साबित होता है कि कुछ समय पहले कई शोध पत्रिकाओं ने निर्णय लिया था कि वे तंबाकू कंपनियों से धन लेकर जो शोध किए जा रहे हैं, उनके निष्कर्ष प्रकाशित नहीं करेंगे, क्योंकि ये संदिग्ध होते है। इस फैसले में अग्रणी पात्रिका ‘प्लाॅस मेडिसन‘ रही है। इसके संपादक जिनी बार्बोर का कहना था कि वे उन हालातों और कारकों को प्राथमिकता देंगे,जो सबसे ज्यादा बीमारियों का कारण बनते हैं। जाहिर है,तंबाकू बीमारियों की बड़ी कारक है,क्योंकि इसके सेवन से हरेक साल 40 लाख लोग मौत के मुंह में समा जाते हैं। इस कड़ी में ‘प्लाॅस वन‘, ‘प्लाॅस बायोलाॅजी‘, ‘ब्रिटिश जर्नल आॅफ कैंसर‘, और ‘अमेरिकन थाॅरोसिक साॅसाईटी जर्नल‘ भी शामिल हैं।
शोध पत्रिकाओं के इस फैसले के बाबत यह सवाल उठाया गया था कि नई दवाओं का परीक्षण अक्सर दवा कंपनियों के पैसे से होते हैं। लिहाजा इस धन से होने वाले क्लीनिकल ट्रायल में कंपनी के पक्ष में नतीजे तय करने की उम्मीद ज्यादा होती है,गोया केवल तंबाकू कंपनियों के शोधों के परिणामों पर प्रतिबंध लगाने का फैसला क्यों लिया गया ? इस सवाल के जवाब में बार्बोर का मत है कि कंपनियों द्वारा दवाइयों के परीक्षण में जटिलताएं तो हैं,कितु दवा उपचार में लाभदायी भी हो सकती है, यह उम्मीद भी बनी रहती है। लेकिन तंबाकू का इस्तेमाल तो हमेशा ही हानिकारक होता हैं,इसमें कोई संदेह ही नहीं है। इसलिए तंबाकू का ममला भिन्न है, लिहाजा तंबाकू के बाबत कैंसर ठीक होने का जो शोध हुआ है, वह शंका के घेरे में है। नतीजतन इस शोध के परिणामों को यदि प्रोत्साहित किया गया तो तंबाकू का सेवन बढ़ेगा, जिसका असर मानव स्वास्थ्य के लिए घातक साबित होगा। साथ ही तंबाकू, लकवा का भी कारक है, इसका सत्यापन तभी होगा जब कुछ और संस्थाएं चबाने वाली तंबाकू पर शोध करके ऐसे ही मिलते-जुलते परिणाम दें।

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