लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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डॉ. मधुसूदन
एक कल-कल छल-छल बहती हिन्दी की नाद मधुर लहर के बीच, कोई मूरख बेढंगे रोमन लोटे में ऊबड खाबड कंकडों को डालकर हिला हिला कर, बजा रहा हो; बस ऐसा ही अनुभव होता है; जब कोई हीन-ग्रन्थि गुलाम बडे नाटकीय पर गौरवान्वित ढंग से बीच बीच में अंग्रेज़ी कंकडों को हिन्दी की मणीमाला में पिरोता जाता है।
और सोचता है, कि,बडा पुरूषार्थ या पराक्रम कर दिया।
साक्षात निर्लज्जता को बार बार सुनता रहता हूँ,अब तो कान पक गए हैं; बार बार सुनकर कि,”अब हम हिन्दी भूल गए हैं।” इससे भी इतनी ग्लानि नहीं होती, जितनी तब होती है, जब इस हीन ग्रन्थि को ही गुरूता मान कर मूरख गौरवान्वित होते देखता हूँ।
रोमन में जब संस्कृत या हिन्दी लिखी जाती है, तो ऐसे अनुभव होते है, जिनकी कल्पना शायद स्वप्न में भी नहीं की जा सकती।
1Hindi-EnglishIngPeacePoemएक ऐसी ही घटना घटी जिसने मुझे जैसे हिमालय पर ले जाकर, नीचे फेंक दिया हो, ऐसा अनुभव हुआ।
चलिए, उत्सुकता और बढाने से पूर्व, आपको घटना-प्रसंग ही, सुनाता हूँ।

सुरीनाम के प्रवास में,वहाँ के प्रमुख पाण्डेजी ने सुनाया कि,एक पुरोहितनें, स्वयं अस्वस्थ
होने के कारण,अपने पुत्र को,किसी के अंतिम संस्कार के लिए, भेजा। पुत्र ने वहाँ अंत्येष्टि मंत्रों के बदले, अलग (शायद विवाह)के मंत्र पढ डाले। उस को बार बार विवाह संस्कार में ही जाने का  अनुभव था; और, उसकी सुविधा के लिए, मंत्र भी चेतन भगत की, रोमन नागरी में लिखे गए थे। सज्जन भी सफाई देते हुए बोले,कि पन्ने भी उलट पुलट हो गए थे; हवा भी चल रही थी; वर्षा भी थी।
संस्कृत का अष्टम पष्टम किसी के समझ में आया तो उसने बालक को, टोका, तब बालक संभला,”सॉरी” बोला, फिर सही पन्ने ढूंढे और पढे।
ये “सॉरी” बडे काम की चीज है। बडी बडी गलतियाँ करो, और सॉरी बोलो। समस्या समाप्त।
कुछ लोग इतने आगे बढे हुए हैं, कि, उनको इस पर भी दुःख नहीं होता,वे बिना तर्क, हमें ही पागल समझते हैं। वे पहले ही मर चुके हैं। उनकी अंत्येष्टि के समय उसी बालक को सुरीनाम से, बुलाया जाए।
ऐसे लोगों पर, करुणा, दया,घृणा ऐसे सारे भाव एक साथ उमड पडते हैं।
पर,करुणा कर ही छोड देते हैं; अपने ही बंधु हैं। इन्हीं लोगों का साथ भी तो लेना है।

रोमन हिन्दी उच्चारण उस दिन, विश्वविद्यालय के हिन्दी वर्ग के निकट से, जब निकला, तो अचानक सुनाई दिया, कोई छात्र चिल्ला रहा था: मैं बटाटा हूँ। मैं बटाटा हूँ।
मैं बटाटा हूँ? आलू को बटाटा भी कहा जाता है।
पर एक गोरा छात्र हाथ ऊपर उठा उठाकर उत्तर देना चाहता था। कहना चाहता था, मैं बताता हूँ, मैं बताता हूँ। किन्तु मुँह से निकल रहा था, “मैं बटाटा हूँ, मैं बटाटा हूँ।” ये चेतन भगत के रोमन राक्षस का प्रताप था। रोमन में लिखी हिन्दी भी देवनागरी सीखा हुआ, हिन्दी का जानकार ही सही उच्चारित कर सकता है। अन्य नहीं। चेतन भगत इस तथ्य को कैसे भूल रहे हैं?

वैसे, अमरिका में हर कोई अपने संक्षिप्त पहले नाम से जाना जाता है।
तो हमारे मुँछोवाले, गेंदालालजी ने भी अपनी पहचान गेंदा नाम से कराई थी, जो रोमन में, Genda लिखा जाता था; पर बुलानेवाले उन्हें गेण्डा गेण्डा ही बुलाते थे।
कभी आपको भी ऐसा अनुभव हुआ होगा। जब मैं एक मित्र को मिलने गया। मुझे देखते ही, अंदर पुकारा गया, “पैरेलल युअर फ़्रेन्ड हॅज़ कम।” बिचारा पैरलल बहार आया। प्यारेलाल  का पैरलल बन गया था।ये रोमन नागरी का ही प्रताप था।
एक दिन, पढा कर,कार्यालय लौटा, तो एक संदेश था। पूछा किसका? तो सहायिका बोली,सुनाती हूँ “बट डोन्ट लाफ़”। बोली, तीन बार नाम पूछा, पर मुझे, हर बार “पोर्ट ऑथोरिटी”  ही सुनाई दिया।
सोच में पड गया, कौन होगा?
ऐसे कूट नामों को, अनुमान से, सुलझाने का अभ्यास आप को होगा, मुझे भी था। पर ये नाम, पहली बार सुन रहा था; पहले सुना होता, तो अनुमान हो जाता।
बुद्धि भिडाता रहा, प्रयास करता रहा; पर, कुछ सूझा ही नहीं।
आप बताइए क्या नाम होगा? मुझे तो सूझ ही नहीं रहा था। ऐसा अमरिकन नाम भी तो होता नहीं।
फिर सहायिका कह रही थीं, कि, बलाघात(ऍक्सेण्ट)शैली भारतीय थी। बहुत सोचा,सर खुजलाया। घटना वैसे ८४-८६ की होगी। अंत में, मैं ने सोचा,पोर्ट-ऑथोरिटी से ही संदेश होगा।मैं ने पोर्ट-ऑथोरिटी में काम जो किया था, सोचा वहीं से दूरभाष आया होगा। शैली पहचानने में सहायिका गलती कर गई होगी।
दूरभाष जोडा और नाम सुना, “डोन्ट लाफ प्रॉमिस “भी काम न आया। दोनों हाथों से चेहरा ढक कर हँसा। हँसी रोकने का, प्रयास बहुत किया, पर विफल रहा। रोक ही  नहीं पाया। संदेश था, एक पुराने मित्र “पार्थसारथी” का।
कहाँ पार्थसारथी? और कहाँ पोर्टऑथोरिटी?
ये रोमन अंग्रेज़ी ही गलती का कारण थी।
जिन्हें देवनगर की भाषा ही नहीं आती, उनकी बात समझ में आती है।
पर हमारे रविंद्र के रॉबिन क्यों हो जाते हैं? हरी के हॅरी क्यों होते हैं? अशोक अपने आपको मरने से पहले ही राख (ऍश) क्यों कहलाता है?
मेरे मधु जैसे मधुर नाम  Madhu का  विवाह विच्छेद कर,  Mad और Hu (मॅड-हु )कर देते हैं। और हमारे चेतन भगत जी, श्वेच्छासे “चेटन बॅहगॅट” बन कर बह गए हैं।

जब अंग्रेज़ भारत में आए तो पहले बंगाल में आए। तब उन्हें वहाँ, बंगला नहीं पर, हिन्दी ही बोलनी पडती थी। उन्हें साँझ-सबेरे   दरवाजा बंद करो, और दरवाजा खोल दो। ऐसा आदेश देना पडता था।
जब दरवाजा बंद करो, कहना चाहते, तो बोलते थे (“There was a brown crow”)देअर वॉज ए ब्राउन क्रो।जब दरवाजा खुलवाना होता था, तो बोलते थे, (There was a cold Day) देअर वाज़ ए कोल्ड डे। हमारे एक बंगला मित्र ने ही बताया।

सारे रोमन वाले इतने बहरे हैं,कि देवनागरी ठीक सुन भी नहीं सकते; उच्चारण क्या करेंगे?
एक बार संदेश था, कि, किसी डिशवाशर का दूरभाष था। सचमुच वह संदेश था ईश्वर शाह का। अब ईश्वर शाह को बना दिया डिशवाशर। ईश्वर शाह सुन लेता,तो, अपमान समझता।
पर,ये रोमन लिपि का हमारी देवनागरी पर आक्रमण है।

एक बार, ऐसी कठिनाई हुयी जब एक दीपावली पर विश्वविद्यालय में भोज आयोजित किया था। खीर-पुरी के भोज में, पुरी बेचारी समस्याग्रस्त हो गयी ।
ये प्राध्यापक लोग बडे जिज्ञासु होते हैं। फिर एक श्वेत अतिथि प्राध्यापक ने पुरी का ही (स्पेलिंग) वर्तनी ही पूछी।
अब आप जानते हैं, कि, पुरी तो खाने की चीज है, स्पेलिंग की नहीं। पर इस अतिथि और फिर प्राध्यापक को कौन समझाए? और पुरी का स्पेलिंग क्या बताएं?
तब, इस गौरांग प्रभु की सेवा में तत्परता से चार यादव-कृष्ण दौड पडे।
सभी यादवों को हाथ से दूर हटा कर एक स्वप्रमाणित वरिष्ठ विद्वान बोले, यह कठिन काम आप मुझ पर छोडिए। और पुरी का स्पेलिंग एक एक अक्षर का उच्चारण कर, जैसे किसी प्राथमिक कक्षा में पढाते हैं, उसी ढंग में बोले; P-O-O-R-I.
“अच्छा तो इसको पुअरी कहते है?” POOR पर I जो लगा तो साहजिक ही उन्हों ने उसे “पुअरी” बना दिया।और पूछने भी लगे, कि “क्या इंडिया के पुअर पिपल” इसको खाते हैं?
मैं मन ही मन सोच रहा, “मर गए”।
भारत का गौरव बढाने, दीपावली का आयोजन करनेवाले, हम, इस “पुअर पिपल इमेज” से बहुत लज्जित रहते हैं। इस लघुता ग्रंथि को भी ६८ वर्ष हो गए,हमें अभी भी सताती रहती हैं।
इस स्पेलिंग का उपाय भी निकट विराजमान स्वयं को बुद्धिमान समझने वाले, सहस्रबुद्धे ने सोचा कि स्पेलिंग बदल देने से समस्या हल हो जाएगी।
हमारी लघुता ग्रंथि गोरे अतिथियों की समस्या हल करने में सदैव तत्पर रहती हैं। वे, मर्त्य सेन की शैली में, आगे बढें,जिनकी नोबेल प्राइस जीतकर हीन ग्रंथि और ही दृढ हो गयी है, बोले, आप लोग हट जाइए, मैं ने इसका हल ढूंढ निकाला है। और, उन्हों ने पुरी का स्पेलिंग बदल कर p-u-r-i बताया। और विजेता की दृष्टि से सर उठाकर चारों ओर देखने लगे।

उधर अमरिकन सज्जन ऐसे हर्षित हुए और न्यूटन की युरेका शैली में, खुशी से प्यूअरी!प्यूअरी!! चिल्लाए। सारी भीड चौंक कर, उनकी ओर देखने लगी कि कौनसी सुन्दरी को ये सज्जन बुला रहे हैं।
चेतन जी, आप बताइए।
यह पुअरी और प्यूरी की समस्या क्या देवनागरी की है? या रोमन की है?
लघुता ग्रंथि की मानसिकता से जकडे हुए लोग इसे देवनागरी की समस्या मानते हैं। ये देवनागरी की नहीं रोमन की समस्या है।

हमारे एक मित्र हैं शिलेन्द्र। हरयाणा से आते हैं। तो बोलने में नाम सिलेन्द्र या सिलेंदर, और रोमन में (स्पेलिंग)वर्तनी silendar बनती है। — अब भाई लोग उन्हें सिलेन्डर सिलेन्डर बुलाते हैं, कुछ लोग बहरे भी हैं, वें रोमन में ही सुनते हैं, देवनगर से उनका परिचय ही नहीं है। वें उन्हें  सिलिन्डर सिलिन्डर ही बुलाते हैं।
सज्जन भी मक्के की रोटी और सरसों का साग खा खाकर, उप्पर से मक्खन वाली लस्सी चढा कर सिलीन्डर जैसे ही बन चुके हैं।
एक कार्यालय में जाना हुआ। वहाँ मुझे देख कर ही भाई लोग एक भारतीय को कॅलेन्डर, कॅलेन्डर पुकार कर मेरे सामने ले आए। सोचकर, एक इंडियन कॅलेन्डर, दूसरे कॅलेन्डर से मिलने आया होगा।
पूछा, तो जाना कि उनका नाम कलिन्द्र था। उसका कलिन्दर उच्चार किया करते थे, कलिन्दर कलिन्दर करते करते उसका कॅलेण्डर कॅलेण्डर हो गया।

उसी प्रकार हमारे दूसरे मित्र सुरेन्द्र पंजाब से हैं। वहा सुरेन्दर उच्चारण होता है। रोमन स्पेलिंग करते हैं Surrender. पर अमरिका में इस पंजाब केसरी को सभी लोग सरेन्डर सरेन्डर बुलाते हैं।
अब सोचिए हमारे हिन्दी के परम हितैषी, समिति के  पूर्वाध्यक्ष “सुरेन्द्र नाथ” का क्या होगा। “सरेन्डर नॉट”। वैसे सुरेन्द्र नाथ सरेन्डर होने वालोंमें से नहीं है।
वे तिवारी भी हैं, तीन बारी भी सरेन्डर नहीं होंगे, नहीं होंगे, नहीं होंगे।

मेरे मधुसूदन का बना दिया है ==(Mad-Hu-Sudan) मॅड हु सुडान। मेरे जैसे गौरवान्वित भारतीय को, लोग पूछते हैं, कि तुम क्या सुडान से आए हो?
किसी ने जलदी जलदी में मुझे Md Hussain लिख कर महम्मद हुसैन बना दिया।
परिणाम ऐसा हुआ, कि, मुझे दूर दूर से दूरभाष आने लगे।
ऐसे ही नरेन्डर, बिरिन्डर, बिल्वेन्डर  का गिलिन्डर, कॅलेन्डर बना दिये है।
पर, इस रोमन पुराण को अब समाप्त करते हैं।

एक हमारे मित्र हैं, जिनका नाम है बाल। उन्हें किसी ने पूछा, कि. क्या मैं आपको बाल के बदले बिल बुला सकता हूँ? वैसे उनका नाम बलराम है। बुलाने में बल या बाल का उपयोग सहज है।
पूछनेवाले का नाम था ज्यॉर्ज । तो हमारे स्वाभिमानी बलरामजी ने उस ज्यॉर्ज को पूछा कि क्या मैं तुम्हें ज्यॉर्ज के बदले घसिटाराम बुला सकता हूँ? बलराम जी वैसे भारतीय संस्कृति के और हिन्दी के भी प्रखर प्रेमी ही नहीं, पुरस्कर्ता भी है।
अब हम रोमन के पीछे जाएंगे, हिन्दी को रोमन लिपि में लिखना और पढना चालु करेंगे, तो, क्या होगा जानते हो? संस्कृत की भी जो स्थिति होगी, उसपर सोचकर पाणिनि भी पश्चात्ताप करेंगे। सोचेंगे कि, क्यों मैं ने इस अपात्र प्रजा को,पूर्णातिपूर्ण व्याकरण की धरोहर छोडी?
एक मन्दिर में गया तो वहाँ एक “गौरांग प्रभु” गीता का श्लोक पढ रहे थे।
बिना हिचक,बडे भक्तिभाव से सुना रहे थे; उनके भक्तिभाव का अनादर मैं नहीं करता। वे तो विवश थे। पर, उच्चारण कुछ निम्न प्रकार के थे।
ढर्म क्सेट्रे कुरुक्सेट्रे समवेटा युयुट्सवाहा।
मामकाहा पाण्डवाश्चैव किम कुर्वट संजय।
आगे और…..
यडा यडा हि ढर्मस्य ग्लानिर्बहवटी बहारट।
अबह्युस्ठानमढर्मस्य टडाट्मानं स्रिजाम्यहम्‌
फिर अंत हुआ….
करारविण्डेण पडारविण्डं।
मुकारविण्डे विनिवेशयण्टं॥
वटश्य पट्रश्य पुटे शयाणं।
बालं मुकुण्डं मनसा स्मरामि॥

बच्चों को रोमन से हिन्दी-संस्कृत पढाई जाएगी,तो जो सांस्कृतिक हानि होगी, उसका अनुमान भी किया नहीं जा सकता। मानस विज्ञान कहता है; जो, चीज आप के पास होती है; उसका मूल्य सदैव उपेक्षित होता रहता है।
और,प्रमाण पत्रों से बुद्धि नहीं आती। उपाधियों(डिग्रियों)से भी नहीं आती।
स्वतंत्र विचार के लिए आप सभी को आवाहन है।

सोचिए, कुछ भी कहिए आप, किंतु एक बात माननी पडेगी।
आपको यदि हास्य-व्यंग्य के लेखक या कवि होना है, तो सरल उपाय, बता सकता हूँ। हिन्दी को रोमन लिपि में लिखकर अंग्रेज़ों की भाँति पढिए, आप अवश्य सफल व्यंग्यकार हो जाएंगे।

18 Responses to “देवनगरी में रोमन कंकड”

  1. SherryDwema

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    Reply
  2. Himwant

    जैसा लिखो वैसा बोलो, जैसा बोलो वैसा लिखो, यह सिद्धांत अंगरेजी में नदारद है। सिर्फ अंगरेजी ही नही अनेक प्रमुख भाषाओ में लिखते कुछ और है और बोलते कुछ और है। लेकिन आज की एक और हकीकत है, मैं यहां जो देवनागरी लिपी में शुद्ध हिंदी लिख रहा हूँ, उसे टंकण (type) करने के लिए रोमन वर्णमाला का उपयोग कर रहा हूँ। और रोमन लिपी से शुद्ध लिखना इसलिए हो पाता है की गूगल इनपुट के कृत्रिम बुद्धि (artificial intelligence) शब्दों को भांप (predict) कर लेती है। खैर देवनागरी में लिखने पढ़ने का आनन्द बहुत है, लेकिन यह आनंद आने वाली पीढ़ी को उपलब्ध होगा या नही पता नही। क्योंकी हम तकनीकी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में पिछड़ने वाले है।

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    • डॉ. मधुसूदन

      ्डॉ. मधुसूदन

      हिमवंत जी।आप जुडने के पहले २ आलेख लिखे गए हैं। उनकी कडियाँ बिलकुल नीचे दी हैं। कृपया देख ले। कुल १४७ आलेख डाले हैं।
      चॉम्स्की ने संगणक के परिचालन में पाणिनि के प्रजननशील व्याकरण का उपयोग किया था। साथ साथ भारतीय अंकों के बिना गत देढ- दो शतकों का वैज्ञानिक विकास भी असंभव था। दो आलेख इसी विषय पर प्रवक्ता में ही डाले हैं। ढूँढने की कृपा करें। और देख ले। हमारा योगदान भी गत हज़ार वर्षों की गुलामी से त्रुटिपूर्ण अवश्य रहा था। पर देखिए। निम्न कडियाँ काम आयेगी।
      (१) http://www.pravakta.com/west-of-the-extraordinary-advances-in-basic-arithmetic-hindu/
      (२) http://www.pravakta.com/paninis-computer-compyutr-contribute-to-the-internal-language/

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  3. R L BHAT

    Let me state at the outset that I am not a Roman-vaalaa. I hold that Roman is a thoroughly inadequate script, even for writing English. The way the script is used to spell words in English and other European languages is absolutely confounding. My book Rationalized Roman for Kashmiri (also useful for Hindi/Urdu etc.) discusses at length these inadequacy of the Roman script. It does so in a linguistically reasoned way in a hotch-potch manner, with nebulous tales and incorrect assertions. It should be nobody’s case that Sanskrit or Hindi can be written better in Roman script. The work gives a rationalized scheme for writing these languages in Roman script whenever needed.
    That said, one cannot by feel that Dr Madhuusuudan has become strangely churlish in his response to a very rational comment. It appears that the learned Madhuusuudanji has taken great offense and tells old wives tales about the confusion of scripts. Scripts are simply notations, some inadequate, some less so.
    जब दरवाजा बंद करो, कहना चाहते, तो बोलते थे (“There was a brown crow”)देअर वॉज ए ब्राउन क्रो।जब दरवाजा खुलवाना होता था, तो बोलते थे, (There was a cold Day) देअर वाज़ ए कोल्ड डे। हमारे एक बंगला मित्र ने ही बताया। सारे रोमन वाले इतने बहरे हैं,कि देवनागरी ठीक सुन भी नहीं सकते; उच्चारण क्या करेंगे?
    Now, this is what Dharmendra’s character says, much better and more tersely, in chupke-chupke, when he ridicules the English spellings. Dr M has been expanding on those very simple points in his earlier write up and this response. As mentioned above I have discussed it with pointed examples in my Book. It has been already conceded. The point made in the comment was that Dr M has confused scripts and languages. Now he appears to confuse speakers too, by calling some this-vaalee and that-vaalee, as if it were politicking.
    Now, Deeva Naagarii has a very extensive repertoire. Yet, there is no way that a simple word ‘hot’ can be written correctly in Deeva Naagarii script, because it does not have the particular sound rendered by ‘o’ here. Of course, the Roman is no better, not having this sound either. In fact, it has very few vowel letter and works in a most arbitrary fashion. But English language, (remember language not script) does have this particular sound rendered by ‘o’ in ‘hot’. We have eighteen vowel sounds in Kashmiri. Neither Deeva Naagarii nor Shaaradaa script, carry notations for them. We have two consonant sounds in Kashmiri for which neither Deeva Naagarii nor Shaaradaa scripts have any letters. These are problems in scripts. None needs to get sentimental over these issues. Dr M needs outgrow the elementary mode and get into serious thought. And that is not done by calling your interlocutor names. it is not about the anecdotes but solid research.
    Since Dr M uses the device of bad-mouthing others, I state again that I have written a whole book about how irrational the Roman script and its usage in English in particular is.
    Dr R L Bhat
    Jammu, J&K, India

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    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन

      आ. डॉ. भट –महाराज–
      हास्यात्मक आलेख जो पुराना है; वह आप की साम्प्रत टिप्पणी की प्रतिक्रिया नहीं हो सकती।
      (१)यह व्यङ्यात्मक आलेख है। आप की टिप्पणी की प्रतिक्रिया नहीं है।कम से कम इस लेख का दिनांक(जुलाई ३१-२०१५ ) तो पढ लेते?यह आलेख पुराना है।
      और आप को हँसने के लिए कडी भेजी थी। (ऐसा उस इ मैल में भी लिखा ही था।)–आप ने इसे गम्भीर मान लिया।
      कुछ अन्य टिप्पणियाँ पढते, तो, इसका हास्यात्मक पहलू भी ध्यान में आ ही जाता।
      (२)कुछ स्पष्टीकरण: ==>ऑ, ऍ, उच्चारण भी वैयाकरणियों ने सोचकर, संदिग्ध और अस्पष्टता के कारण त्यजे थे। उसी प्रकार नुक्ता वाले उच्चार भी त्यजे गए थे। *व्यास ह्यूस्टन* ने अध्ययन के बाद ऐसा स्वतंत्र विधान किया है। आप कोई, सिद्धान्त कौमुदी भी देख सकते हैं।
      (३) अनुरोध: इस विषय पर मेरे द्वारा काफी (४५-५०आलेख)लिखा गया है। आप उसपर अपनी प्रतिक्रियाएँ देने की कृपा करें।
      (४) और, आप अपनी पुस्तक के आलेख हिन्दी में लिख कर डालिए। यह प्रेमभरा अनुरोध है। आप शत्रु नहीं है।
      (५) व्यास ह्युस्टन: *सभी संदिग्ध उच्चारणों को वैयाकरणियों ने त्याज्य माना था। उन्हें लिपि निर्दोष बनानी थी।*
      (६) आप भी यदि हिन्दी में लिखेंगे, तो, मुझे सुविधा होगी।

      Reply
  4. ken

    Dr.Madhusoodan,
    We spoil our own language by not teaching/writing correctly in Roman script.
    अ आ इ ई उ ऊ ऍ ए ऐ ऑ ओ औ अं अः………………Devanagari
    a ā i ī u ū æ e ai aw o au aṁ aḥ…………………Roman
    a a: i ii u uu ae e ai o: o au am ah……….Type able
    a a: i ee u oo ae e ai aw o au am ah

    Here is your article in Roman script.

    Dô. Madhusūdan
    Ek kal-kal chal-chal bahtī Hindī kī nād madhur lahar ke bīc, koī mūrakh beḍhaṁge roman loṭe meṁ ūbaḍ khābaḍ kaṁkḍoṁ ko ḍālkar hilā hilā kar, bajā rahā ho; bas aisā hī anubhav hotā hai; jab koī hīn-granthi gulām baḍe nāṭkīy par gauravānvit ḍhaṁg se bīc bīc meṁ aṁgrezī kaṁkḍoṁ ko hindī kī maṇīmālā meṁ pirotā jātā hai|
    aur soctā hai, ki,baḍā purūṣārth yā parākram kar diyā|
    Sākṣāt nirlajjatā ko bār bār suntā rahtā hūm̐,ab to kān pak gae haiṁ; bār bār sunkar ki,”ab ham hindī bhūl gae haiṁ|” isse bhī itnī glāni nahīṁ hotī, jitnī tab hotī hai, jab is hīn granthi ko hī gurūtā mān kar mūrakh gauravānvit hote dekhtā hūm̐|
    roman meṁ jab saṁskṛt yā hindī likhī jātī hai, to aise anubhav hote hai, jinkī kalpanā śāyad svapn meṁ bhī nahīṁ kī jā saktī|
    1Hindi-EnglishIngPeacePoemek aisī hī ghaṭnā ghaṭī jisne mujhe jaise himālay par le jākar, nīce pheṁk diyā ho, aisā anubhav huā|
    calie, utsuktā aur baḍhāne se pūrv, āpko ghaṭnā-prasaṁg hī, sunātā hūm̐|

    surīnām ke pravās meṁ,vahām̐ ke pramukh pāṇḍejī ne sunāyā ki,ek purohitneṁ, svayaṁ asvasth
    hone ke kāraṇ,apne putr ko,kisī ke aṁtim saṁskār ke lie, bhejā| putr ne vahām̐ aṁtyeṣṭi maṁtroṁ ke badle, alag (śāyad vivāh)ke maṁtr paḍh ḍāle| us ko bār bār vivāh saṁskār meṁ hī jāne kā anubhav thā; aur, uskī suvidhā ke lie, maṁtr bhī cetan bhagat kī, roman nāgrī meṁ likhe gae the| sajjan bhī saphāī dete hue bole,ki panne bhī ulaṭ pulaṭ ho gae the; havā bhī cal rahī thī; varṣā bhī thī|
    saṁskṛt kā aṣṭam paṣṭam kisī ke samajh meṁ āyā to usne bālak ko, ṭokā, tab bālak saṁbhlā,”sôrī” bolā, phir sahī panne ḍhūṁḍhe aur paḍhe|
    ye “sôrī” baḍe kām kī cīj hai| baḍī baḍī galtiyām̐ karo, aur sôrī bolo| samasyā samāpt|
    kuch log itne āge baḍhe hue haiṁ, ki, unko is par bhī duḥkh nahīṁ hotā,ve binā tark, hameṁ hī pāgal samajhte haiṁ| ve pahle hī mar cuke haiṁ| unkī aṁtyeṣṭi ke samay usī bālak ko surīnām se, bulāyā jāe|
    aise logoṁ par, karuṇā, dayā,ghṛṇā aise sāre bhāv ek sāth umaḍ paḍte haiṁ|
    par,karuṇā kar hī choḍ dete haiṁ; apne hī baṁdhu haiṁ| inhīṁ logoṁ kā sāth bhī to lenā hai|

    roman hindī uccāraṇ us din, viśvavidyālay ke hindī varg ke nikaṭ se, jab niklā, to acānak sunāī diyā, koī chātr cillā rahā thā: maiṁ baṭāṭā hūm̐| maiṁ baṭāṭā hūm̐|
    maiṁ baṭāṭā hūm̐? ālū ko baṭāṭā bhī kahā jātā hai|
    par ek gorā chātr hāth ūpar uṭhā uṭhākar uttar denā cāhtā thā| kahnā cāhtā thā, maiṁ batātā hūm̐, maiṁ batātā hūm̐| kintu mum̐h se nikal rahā thā, “maiṁ baṭāṭā hūm̐, maiṁ baṭāṭā hūm̐|” ye cetan bhagat ke roman rākṣas kā pratāp thā| roman meṁ likhī hindī bhī devanāgrī sīkhā huā, hindī kā jānkār hī sahī uccārit kar saktā hai| any nahīṁ| cetan bhagat is tathy ko kaise bhūl rahe haiṁ?

    vaise, amrikā meṁ har koī apne saṁkṣipt pahle nām se jānā jātā hai|
    to hamāre mum̐chovāle, geṁdālāljī ne bhī apnī pahcān geṁdā nām se karāī thī, jo roman meṁ, Genda likhā jātā thā; par bulānevāle unheṁ geṇḍā geṇḍā hī bulāte the|
    kabhī āpko bhī aisā anubhav huā hogā| jab maiṁ ek mitr ko milne gayā| mujhe dekhte hī, aṁdar pukārā gayā, “pairelal yuar frenḍ hæz kam|” bicārā pairlal bahār āyā| pyārelāl kā pairlal ban gayā thā|ye roman nāgrī kā hī pratāp thā|
    ek din, paḍhā kar,kāryālay lauṭā, to ek saṁdeś thā| pūchā kiskā? to sahāyikā bolī,sunātī hūm̐ “baṭ ḍonṭ lāf”| bolī, tīn bār nām pūchā, par mujhe, har bār “porṭ ôthoriṭī” hī sunāī diyā|
    soc meṁ paḍ gayā, kaun hogā?
    aise kūṭ nāmoṁ ko, anumān se, suljhāne kā abhyās āp ko hogā, mujhe bhī thā| par ye nām, pahlī bār sun rahā thā; pahle sunā hotā, to anumān ho jātā|
    buddhi bhiḍātā rahā, prayās kartā rahā; par, kuch sūjhā hī nahīṁ|
    āp batāie kyā nām hogā? mujhe to sūjh hī nahīṁ rahā thā| aisā amarikan nām bhī to hotā nahīṁ|
    phir sahāyikā kah rahī thīṁ, ki, balāghāt(ækseṇṭ)śailī bhārtīy thī| bahut socā,sar khujlāyā| ghaṭnā vaise 84-86 kī hogī| aṁt meṁ, maiṁ ne socā,porṭ-ôthoriṭī se hī saṁdeś hogā|maiṁ ne porṭ-ôthoriṭī meṁ kām jo kiyā thā, socā vahīṁ se dūrbhāṣ āyā hogā| śailī pahacānne meṁ sahāyikā galtī kar gaī hogī|
    dūrbhāṣ joḍā aur nām sunā, “ḍonṭ lāph prômis “bhī kām na āyā| donoṁ hāthoṁ se cehrā ḍhak kar ham̐sā| ham̐sī rokne kā, prayās bahut kiyā, par viphal rahā| rok hī nahīṁ pāyā| saṁdeś thā, ek purāne mitr “pārthasārthī” kā|
    kahām̐ pārthasārthī? aur kahām̐ porṭaôthoriṭī?
    ye roman aṁgrezī hī galtī kā kāraṇ thī|
    jinheṁ devangar kī bhāṣā hī nahīṁ ātī, unkī bāt samajh meṁ ātī hai|
    par hamāre raviṁdr ke rôbin kyoṁ ho jāte haiṁ? harī ke hærī kyoṁ hote haiṁ? aśok apne āpko marne se pahle hī rākh (æś) kyoṁ kahlātā hai?
    mere madhu jaise madhur nām Madhu kā vivāh vicched kar, Mad aur Hu (mæḍ-hu )kar dete haiṁ| aur hamāre cetan bhagat jī, śvecchāse “ceṭan bæhagæṭ” ban kar bah gae haiṁ|

    jab aṁgrez bhārat meṁ āe to pahle baṁgāl meṁ āe| tab unheṁ vahām̐, baṁglā nahīṁ par, hindī hī bolnī paḍtī thī| unheṁ sām̐jh-sabere darvājā baṁd karo, aur darvājā khol do| aisā ādeś denā paḍtā thā|
    jab darvājā baṁd karo, kahnā cāhte, to bolte the (“There was a brown crow”)dear vôj e brāun kro|jab darvājā khulvānā hotā thā, to bolte the, (There was a cold Day) dear vāz e kolḍ ḍe| hamāre ek baṁglā mitr ne hī batāyā|

    sāre roman vāle itne bahre haiṁ,ki devanāgrī ṭhīk sun bhī nahīṁ sakte; uccāraṇ kyā kareṁge?
    ek bār saṁdeś thā, ki, kisī ḍiśavāśar kā dūrbhāṣ thā| sacmuc vah saṁdeś thā īśvar śāh kā| ab īśvar śāh ko banā diyā ḍiśavāśar| īśvar śāh sun letā,to, apmān samajhtā|
    par,ye roman lipi kā hamārī devanāgrī par ākramaṇ hai|

    ek bār, aisī kaṭhināī huyī jab ek dīpāvlī par viśvavidyālay meṁ bhoj āyojit kiyā thā| khīr-purī ke bhoj meṁ, purī becārī samasyāgrast ho gayī |
    ye prādhyāpak log baḍe jijñāsu hote haiṁ| phir ek śvet atithi prādhyāpak ne purī kā hī (speliṁg) vartanī hī pūchī|
    ab āp jānte haiṁ, ki, purī to khāne kī cīj hai, speliṁg kī nahīṁ| par is atithi aur phir prādhyāpak ko kaun samajhāe? aur purī kā speliṁg kyā batāeṁ?
    tab, is gaurāṁg prabhu kī sevā meṁ tatpartā se cār yādav-kṛṣṇ dauḍ paḍe|
    sabhī yādvoṁ ko hāth se dūr haṭā kar ek svapramāṇit variṣṭh vidvān bole, yah kaṭhin kām āp mujh par choḍie| aur purī kā speliṁg ek ek akṣar kā uccāraṇ kar, jaise kisī prāthmik kakṣā meṁ paḍhāte haiṁ, usī ḍhaṁg meṁ bole; P-O-O-R-I.
    “acchā to isko puarī kahte hai?” POOR par I jo lagā to sāhjik hī unhoṁ ne use “puarī” banā diyā|aur pūchne bhī lage, ki “kyā iṁḍiyā ke puar pipal” isko khāte haiṁ?
    maiṁ man hī man soc rahā, “mar gae”|
    bhārat kā gaurav baḍhāne, dīpāvlī kā āyojan karanevāle, ham, is “puar pipal imej” se bahut lajjit rahte haiṁ| is laghutā graṁthi ko bhī 68 varṣ ho gae,hameṁ bhī bhī satātī rahtī haiṁ|
    is speliṁg kā upāy bhī nikaṭ virājmān svayaṁ ko buddhimān samajhne vāle, sahasrabuddhe ne socā ki speliṁg badal dene se samasyā hal ho jāegī|
    hamārī laghutā graṁthi gore atithiyoṁ kī samasyā hal karne meṁ sadaiv tatpar rahtī haiṁ| ve, marty sen kī śailī meṁ, āge baḍheṁ,jinkī nobel prāis jītkar hīn graṁthi aur hī dṛḍh ho gayī hai, bole, āp log haṭ jāie, maiṁ ne iskā hal ḍhūṁḍh nikālā hai| aur, unhoṁ ne purī kā speliṁg badal kar p-u-r-i batāyā| aur vijetā kī dṛṣṭi se sar uṭhākar cāroṁ or dekhne lage|

    udhar amarikan sajjan aise harṣit hue aur nyūṭan kī yurekā śailī meṁ, khuśī se pyūarī!pyūarī!! cillāe| sārī bhīḍ cauṁk kar, unkī or dekhne lagī ki kaunsī sundarī ko ye sajjan bulā rahe haiṁ|
    cetan jī, āp batāie|
    yah puarī aur pyūrī kī samasyā kyā devanāgrī kī hai? yā roman kī hai?
    laghutā graṁthi kī mānasiktā se jakḍe hue log ise devanāgrī kī samasyā mānte haiṁ| ye devanāgrī kī nahīṁ roman kī samasyā hai|

    hamāre ek mitr haiṁ śilendr| haryāṇā se āte haiṁ| to bolne meṁ nām silendr yā sileṁdar, aur roman meṁ (speliṁg)vartanī silendar bantī hai| — ab bhāī log unheṁ silenḍar silenḍar bulāte haiṁ, kuch log bahre bhī haiṁ, veṁ roman meṁ hī sunte haiṁ, devangar se unkā paricay hī nahīṁ hai| veṁ unheṁ silinḍar silinḍar hī bulāte haiṁ|
    sajjan bhī makke kī roṭī aur sarsoṁ kā sāg khā khākar, uppar se makkhan vālī lassī caḍhā kar silīnḍar jaise hī ban cuke haiṁ|
    ek kāryālay meṁ jānā huā| vahām̐ mujhe dekh kar hī bhāī log ek bhārtīy ko kælenḍar, kælenḍar pukār kar mere sāmne le āe| sockar, ek iṁḍiyan kælenḍar, dūsre kælenḍar se milne āyā hogā|
    pūchā, to jānā ki unkā nām kalindr thā| uskā kalindar uccār kiyā karte the, kalindar kalindar karte karte uskā kæleṇḍar kæleṇḍar ho gayā|

    usī prakār hamāre dūsre mitr surendr paṁjāb se haiṁ| vahā surendar uccāraṇ hotā hai| roman speliṁg karte haiṁ Surrender. par amrikā meṁ is paṁjāb kesrī ko sabhī log sarenḍar sarenḍar bulāte haiṁ|
    ab socie hamāre hindī ke param hitaiṣī, samiti ke pūrvādhyakṣ “surendr nāth” kā kyā hogā| “sarenḍar nôṭ”| vaise surendr nāth sarenḍar hone vāloṁmeṁ se nahīṁ hai|
    ve tivārī bhī haiṁ, tīn bārī bhī sarenḍar nahīṁ hoṁge, nahīṁ hoṁge, nahīṁ hoṁge|

    mere madhusūdan kā banā diyā hai ==(Mad-Hu-Sudan) mæḍ hu suḍān| mere jaise gauravānvit bhārtīy ko, log pūchte haiṁ, ki tum kyā suḍān se āe ho?
    kisī ne jaldī jaldī meṁ mujhe Md Hussain likh kar mahammad husain banā diyā|
    pariṇām aisā huā, ki, mujhe dūr dūr se dūrbhāṣ āne lage|
    aise hī narenḍar, birinḍar, bilvenḍar kā gilinḍar, kælenḍar banā diye hai|
    par, is roman purāṇ ko ab samāpt karte haiṁ|

    ek hamāre mitr haiṁ, jinkā nām hai bāl| unheṁ kisī ne pūchā, ki. kyā maiṁ āpko bāl ke badle bil bulā saktā hūm̐? vaise unkā nām balrām hai| bulāne meṁ bal yā bāl kā upyog sahaj hai|
    pūchanevāle kā nām thā jyôrj | to hamāre svābhimānī balarāmjī ne us jyôrj ko pūchā ki kyā maiṁ tumheṁ jyôrj ke badle ghasiṭārām bulā saktā hūm̐? balrām jī vaise bhārtīy saṁskṛti ke aur hindī ke bhī prakhar premī hī nahīṁ, puraskartā bhī hai|
    ab ham roman ke pīche jāeṁge, hindī ko roman lipi meṁ likhnā aur paḍhnā cālu kareṁge, to, kyā hogā jānte ho? saṁskṛt kī bhī jo sthiti hogī, uspar sockar pāṇini bhī paścāttāp kareṁge| soceṁge ki, kyoṁ maiṁ ne is apātr prajā ko,pūrṇātipūrṇ vyākraṇ kī dharohar choḍī?
    ek mandir meṁ gayā to vahām̐ ek “gaurāṁg prabhu” gītā kā ślok paḍh rahe the|
    binā hicak,baḍe bhaktibhāv se sunā rahe the; unke bhaktibhāv kā anādar maiṁ nahīṁ kartā| ve to vivaś the| par, uccāraṇ kuch nimn prakār ke the|
    ḍharm kseṭre kurukseṭre samveṭā yuyuṭsavāhā|
    māmkāhā pāṇḍavāścaiv kim kurvaṭ saṁjay|
    āge aur…..
    yaḍā yaḍā hi ḍharmasy glānirbahavṭī bahāraṭ|
    abahyusṭhānamaḍharmasy ṭaḍāṭmānaṁ srijāmyaham‌
    phir aṁt huā….
    karāraviṇḍeṇ paḍāraviṇḍaṁ|
    mukāraviṇḍe viniveśayaṇṭaṁ||
    vaṭaśy paṭraśy puṭe śayāṇaṁ|
    bālaṁ mukuṇḍaṁ mansā smarāmi||

    baccoṁ ko roman se hindī-saṁskṛt paḍhāī jāegī,to jo sāṁskṛtik hāni hogī, uskā anumān bhī kiyā nahīṁ jā saktā| mānas vijñān kahtā hai; jo, cīj āp ke pās hotī hai; uskā mūly sadaiv upekṣit hotā rahtā hai|
    aur,pramāṇ patroṁ se buddhi nahīṁ ātī| upādhiyoṁ(ḍigriyoṁ)se bhī nahīṁ ātī|
    svataṁtr vicār ke lie āp sabhī ko āvāhan hai|

    socie, kuch bhī kahie āp, kiṁtu ek bāt mānnī paḍegī|
    āpko yadi hāsy-vyaṁgy ke lekhak yā kavi honā hai, to saral upāy, batā saktā hūm̐| hindī ko roman lipi meṁ likhkar aṁgrezoṁ kī bhām̐ti paḍhie, āp avaśy saphal vyaṁgyakār ho jāeṁge|

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    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन

      आप देवनागरी में जो भी कहना हो, लिखें।

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  5. बी एन गोयल

    बी एन गोयल

    यह एक कटु सत्य है कि हम ने अपनी भाषा को ठीक ढंग से विकसित करने की अपेक्षा उसे नकारा ही है । 67 वर्ष में हम भाषा के क्षेत्र में पिछड़े ही हैं क्योंकि हम ‘कान्वेंट शिक्षित बनना चाहते हैं । ठीक हिन्दी लिखना और पढ़ना अब असभ्यता का प्रतीक है। मुझे अपने बचपन की याद है जब 1947 में देश के स्वतंत्र होते ही हमारे गाँव के स्कूल का हिंदीकरण हुआ था । इस से पहले हमें उर्दू पढ़ाई जाती थी । उस समय स्कूल में श्रुतलेख (इमला) अनिवार्य था जिस से कि हम ठीक हिन्दी लिखना और पढ़ना सीख जाएँ – अब श्रुतलेख शायद कोई जानता भी नहीं होगा। आज भारत के हिन्दी क्षेत्र में भी माता पिता अपने बच्चे को अँग्रेजी बोलते देख कर प्रसन्न होते हैं । क्योंकि यह आज के समाज की मांग है । चेतन भगत उन में एक हैं । रोमन में लिखना या पढ़ना एक समय की आवश्यकता थी आज नहीं है । संविधान में हिन्दी लागू करने की एक तिथि निश्चित की गई थी लेकिन वह अब किसी को याद नहीं – अब बस सरकारी तौर पर कुछ पुरस्कार बाँट कर खाना पूरी की जाती है । भाई मधुसूदन जी आप का दर्द जब तक सर्वव्यापी नहीं होगा तब तक कुछ नहीं होने वाला। ईश्वर से प्रार्थना है वह आप की सहायता करे।

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  6. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. प्रतिभा सक्सेना-द्वारा .

    आ. मधु भाई
    आपका हास्य-व्यंग्य इससे पहले भी पढ़ा है -पर इस लेख की रेशम में लपेट कर जूते लगाती भंगिमा मुग्ध कर गई .वार पैने हैं क्योंकि वास्तव में जो होता है वही कहा है आपने अपनी रोचक शैली में विनोद का पुट दे-दे कर हँसाते हुए जो कटाक्ष किये उनकी चोट का कोई इलाज नहीं.
    डट कर धुलाई कर डाली आपने ,मैंने खूब आनन्द लिया.

    अपनी कुछ मित्रों को भी पढ़वाया , आपकी आभारी हूँ .
    सादर,
    प्रतिभा सक्सेना.

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    • Kumar Arun

      श्राद्धीय मधु जी-

      आपने बहुत ऐसे हिंदी भाषी भारतीओं के भाषण सुने होंगे जो अंग्रेजी में बोलते वक्त भगवन राम नहीं बोलते, लार्ड रामा का उच्चारण करने में गर्ब मह्शूश करते है / ऐसे नकली विद्वानों से क्या अपेछा किया जाये / मैंने अपने साथ काम करने बालों को मेरा नाम अरुण कैसे बोलना सिखाया, उसे बताता हूँ / रोबर्ट को रोबोट बोल तो उसने कहा “मेरा नाम रोबर्ट है / मैंने कहा कि मेरा नाम भी एृंरन नहीं अरुण है / जबतक अंग्रेजों को उनकी गलतिओं के लिए ललकारा नहीं जाये वे हम हिन्दुओं को आधे दिमाग बाल ही समझने की बेबकूफी करते रहते हैं /

      कुमार अरुण

      Reply
  7. Mohan Gupta

    आजकल तो ऐसी प्रथा बन गयी हैं के हर जगह हिंदी में कंकड़ डाले जाते हैं भले फिल्म उद्योग हो या पदार्थो के लेबल की बात हो। प्राया हिंदी फिल्मो के नाम देवनागरी लिपि में नहीं लिखे जाते वल्कि रोमन लिपि में लिखे जाते हैं। कई बार हिंदी फिल्म के नाम को रोमन लिपि में लिखने से शब्द ठीक से समझ में नहीं आता। इसी प्रकार भारतीया पदार्थो के नाम भी रोमन लिपि में लिखे होने के कारण जल्दी से समझ नहीं आते और ना ही उपयुक्त जानकारी मिलती हैं। कुछ समय पहले बीबीसी ने भी एक ऐसा कार्यक्रम प्रसारित किया था जिसमे एक लड़की ने हिंदी भाषा में अंगेजी शब्दों के प्रयोग को बहुत प्रोतसाहित किया था। ऐसा लगता हैं के हिंदी प्रसारण के लोगो खान पीन, पहनावे में , रहन सहन में भाषा में शुद्धता का कोई विचार नहीं हैं। यह लोग हिंदी का एक भी वाक्या
    बिना कंकड़ डाले पुरा नहीं कर सकते। इन लोगो का यह प्रयास रहता हैं के हिंदी में जितने भी उर्दू और अंग्रेजी शब्दों के कंकड़ डालेंगे उतने ही उनके पाठक बढ़ेंगे या श्रोता बढ़ेंगे। हिंदी माध्यम लोगो का हमेशा यह प्रयत्न रहता के हिंदी भाषा को सरल बनाने के नाम पर इसमें अधिक से अधिक कंकड़ फेंके जाए। हिंदी माध्यम के लोगो में से कोई यह नहीं चाहता के हिंदी को संस्कृत मय बनाया जाये ता के लोगो को संस्कृत भाषा सिखने में आसानी हो जाए।
    नासा ने अपने कामकाज के लिए संस्कृत को उपयुक्त भाषा स्वीकार किया हैं। संस्कृत को उपयुक्त मानने के लिए देवनागरी लिपि का भी बहुत बड़ा योगदान हैं. रोमन लिपि में जैसे but , और put शबदो का उच्चारण अलग अलग ढंग से होता हैं किन्तु देवनागरी लिपि में ऐसी समस्य नहीं हैं , जैसा लिखा जाता हैं वैसा ही पढ़ा जाता हैं रोमन लिपि के दोस पूर्ण होने के बाबजूद भारत में बहुत से बुद्धिजीवी लोग यह सुझाव देते हैं के हिंदी के लिए देवनागरी की जगह रोमन लिपि अपना लेनी चाहिये। जिन लोगो के पास हिंदी फ़ॉन्ट्स नहीं हैं बह लोग हिंदी को रोमन लिपि में लिखते हैं। रोमन लिपि में लिखी हिंदी को समझना कठिन हैं। डॉ. मधुसूदन जी ने इस समस्सया को बहुत रोचक डंग से प्रसुत किया हैं।

    Reply
  8. इंसान

    मधुसूदन जी, आपका आलेख पढ़ते आई हँसी के कोलाहल में अकस्मात् विषय की गंभीरता ने मुझे यह सोचते लज्जित कर दिया कि हम कहाँ जा रहे हैं|

    Reply
  9. डॉ. मधुसूदन

    Dwara: शकुन्तला बहादुर

    आदरणीय मधुसूदन भाई,
    मेरी सखी प्रतिभा जी ने आपके आलेख का भरपूर आनन्द लेने के बाद मुझे भी आनन्दित करने के लिये वह आलेख अग्रसारित कर दिया । आपके गम्भीर विषयों का प्रतिपादन करते हुए और भाषा संबंधी अनेक लेख पढ़ती रही हूँ । वैसे तो ये आलेख भी हमारी देवनागरी के मनोहर स्वरूप को विद्रूप / कुरूप बनाकर अनिष्टार्थक बनाने वाली रोमन लिपि के द्वारा की गई यंत्रणाओं का द्योतक है और उन दोषों को पूरी गम्भीरता से उद्घाटित करता है । फिर भी आपके द्वारा दिए गए उदाहरणों को पढ़ पढ़ कर इतना उन्मुक्त हास्य
    ( ठहाका ) बिखर गया कि उसमें आनन्द तो आया किन्तु हिन्दी की दुर्दशा से बाद में मन कुंठित भी हो गया । इस स्थिति से दैनिक जीवन में नित्य ही सामना होता रहता है ।
    ऐसे अंग्रेज़ी के ग़ुलाम भारतीयों को धिक्कार है , जो हमारी मातृभाषा और भारत की राष्ट्रभाषा पर ऐसा कुठाराघात करते हैं ।
    रोमन के कोई निश्चित नियम तो हैं नहीं , उच्चारण पारम्परिक यानी कन्वेशनल है , ये बात इंग्लिश के एक शब्दकोश में लिखी भी थी और हम बराबर उसे झेलते भी रहते हैं । क्या कहा जाए ? रट्टूतोता बनकर स्पेलिंग्स और उच्चारण को रचना उन्हें सरल लगता है , सरलतम उच्चारण वाली , जैसा लिखा हो वैसा पढ़ो और जैसा बोलो / सुनो , वैसा ही लिख डालो की बात उनकी
    समझ में कभी आएगी ही नहीं । कहीं पढ़ा था –
    ” अंग्रेज़ बेचारे चले गए , देकर भारत को आज़ादी ।
    पर अभी तलक तुम नहीं गईं, चर्चिल चाचा की परदादी ।।”
    आपके आलेख के लिये अनेकानेक साधुवाद !!!
    सादर,
    शकुन्तला बहादुर

    Reply
  10. डॉ. मधुसूदन

    सुरेन्द्र नाथ तिवारी

    आदरणीय मधु भाई, नमन|
    आपका “देवनागरी में रोमेन…” पढ़ा|

    हँसता रहा हूँ| लेख बड़ा सामयिक है…….बहुत सुन्दर …….| आप अच्छे व्यंगकार बन सकते हैं , अबतो सभी व्यंगकार अपने को कवि कहते हैं| भगवान आपको भी ऐसी सद्बुद्धि दें !

    जब मैं सेना में था तब एक बार सैनिक दूरसंचरण महाविद्यालय ( मिलिट्री कॉलेज ऑफ़ टेलीकम्युनिकेशन इंजीनिरिंग) में मुझे देश-विदेश के अफसरों और सिपाहियों को प्रशिक्षण देने का मौका मिला था| उस वक्त एक मजे की बात यह होती थी कि सिपाहियों को पढ़ाने वाली पुरानी पाठ्य-पुस्तिकाएं रोमन लिपि में हिन्दीं में होतीं थी, क्यों कि सिपाही अंग्रेजी नहीं समझ सकते थे, और अंग्रेज अफसर केवल रोमन ही पढ़ सकते थे| लेकिन हिंदी हर सिपाही समझता था चाहे वह किसी भी प्रान्त का हो| धीरे धीरे स्वतन्त्रता के बाद वे सभी पुस्तिकाएं देवनागरी में लिख लीं गईं थी | पर मेरे कुछ दक्षिण भारतीय मित्र अफसरों को जो देवनागरी ठीक ठीक नहीं पढ़ पाते थे कभी कभी रोमन लिपि वाली पुरानी पुस्तिकाओं का सहारा लेना पड़ता था | तब आपने जो उदाहरण दिए हैं, ऐसे कई उदाहरणों से पाला पड़ता था और हम सब खूब हँसते |

    सादर
    सुरेन्द्र नाथ तिवारी

    Reply
  11. Rekha Singh

    मेरा अनुभव भी बहुत अलग है । मुझे रोमन मे हिन्दी कभी लिखनी और पढ़नी नही आई । मेरे बच्चे VHP-A कैंप मे ओम जय जगदीश की आरती रोमन मे लिखी हिन्दी , मे पढ़ लेते थे । उन्हे आरती तो शायद वैसे भी आती थी । चूँकि हमारे बच्चे हिन्दी अच्छे से बोलते थे तो लय मे ओम जय जगदीश की आरती सब बच्चो के साथ गा लेते थे । मैने कभी इसको बढ़ावा नही दिया । मुझे बड़ा अजीब सा लगता था ।
    २००९ या २०१० की बात है मेरा पुत्र ऋषि कालेज से घर आया और बहुत खुशी से हसते और चहकते हुए बोला , मॉम किसी दोस्त ने मुझे फेस बुक पर हिन्दी मे ‘नमस्ते” लिखा । उसने सोचा मै बहुत खुश हो जाऊगी और मै बहुत खुश भी हो गई । उसने मुझे संगणक पर दिखाया भी । उसके बाद ही दुबारा जब ऋषि कुछ महीने बाद घर फिर कालेज से वापस आया तो बहुत खुश था और फिर मुझसे बोला माँ आप जी मेल हिन्दी मे लिख सकते हो और उसने मुझे सिखाया कैसे कैसे । इसके पहले मधु भाई ने बरहा साफ़्टवेएर की चर्चा की थी हिन्दी टाइपिंग के लिए ।
    धीरे धीरे हिन्दी का विकास संगणक बहुत विकसित हो गया ।
    लेख को पड़कर बहुत जानकारी प्राप्त हुई । बच्चो को भी पढ़ाना है । लेखक को लेख के लिए धन्यबाद ।

    Reply
  12. Vishwa Mohan Tiwari

    Enjoyed it thoroughly.
    It comes lt clearly that ‘Language is a strong part of culture.’

    Reply
  13. Dr Ranjeet Singh

    पूर्णतः सत्य कहा आपने -“आपको यदि हास्य-व्यंग्य के लेखक या कवि होना है, तो सरल उपाय, बता सकता हूँ। हिन्दी को रोमन लिपि में लिखकर अंग्रेज़ों की भाँति पढिए, आप अवश्य सफल व्यंग्यकार हो जाएंगे”!

    बहुत दिनों उपरान्त एक अच्छा लेख पढ़ने को मिला! बहुत आभार​।

    डा० रणजीत सिंह

    Reply

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