लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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डा. राधेश्याम द्विवेदी
मुगल साम्राज्य से प्रेरित पुरानी पीढ़ी बनाम नई पीढ़ीः-उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी में जारी पारिवारिक घमासान भी मुगलों की याद दिलाता है. पार्टी में बाप से बेटे व चाचा भतीजे की बगावत और पार्टी के अंदर एक दूसरे के खिलाफ साजिश और षड्यंत्र से मुगल साम्राज्य की स्मृति ताजी हो आती है. मुगलों के दौर में बाप को सत्ता से हटाने के लिए बेटे न केवल बगावत पर उतर आते थे, बल्कि जरूरत पड़ने पर राजधानी पर चढ़ाई भी कर देते थे. जहांगीर ने अकबर से बगावत की.जहांगीर से शाहजहां ने विद्रोह किया और शाहजहां से औरंगजेब ने. समय के पहियों को और पीछे ले जाएं तो रोमन साम्राज्य में भी सत्ता के लिए संघर्ष होता रहा. पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने पार्टी से बगावत करने के इलजाम में अपने भाई प्रो. राम गोपाल जी तथा बेटे अखिलेश यादव को छह सालों के लिए पार्टी से निकालने का फैसला किया. अगले ही दिन आजमखान के दबाव में उन्होंने अपना फैसला वापस ले लिया. रविवार को अखिलेश यादव के गुट ने मुलायम की जगह पर पार्टी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश बनाए गए, जिसे मुलायम सिंह ने गैरकानूनी करार दिया है. साथ ही कहा है कि इस लेकर वो 5 जनवरी को अपना अधिवेशन करेंगे. रामगोपाल यादव और अखिलेश के जिस विशेष अधिवेशन को रविवार को लखनऊ में आयोजित किया गया, उसे असंवैधानिक घोषित करते हुए मुलायम सिंह ने इस सम्मेलन में शामिल होने वाले लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की चेतावनी भी दी थी.
परिवार के बिखराव के पीछे मांजी का अहम रोलः- समाजवादी पार्टी और यादव परिवार दो गुटों में बंट गया है. एक गुट अखिलेश के पक्ष में है तो दूसरा शिवपाल के. पार्टी मुखिया मुलायम सिंह यादव धर्मसंकट में फंसे हैं. वह रामायण के दशरथ की तरह धर्मसंकट में फंसे हुए हैं. वह अपने आप को दूसरी पत्नी साधना और अखिलेश के बीच में फंसा हुआ पा रहे हैं. अंदरूनी सूत्रों की मानें तो यादव परिवार के ड्रामे के पीछे साधना की भूमिका मानी जा रही है. साधनाजी यहां रामायण की कैकेयी के किरदार में हैं. मुलायम सिंह और साधना का एक बेटा प्रतीक का जन्म 1988 में हुआ. प्रतीक की राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं है. हा,ं उनकी बहू अपर्णा को लखनऊ छावनी का विधानसभा का टिकट मिलने की चर्चा अवश्य है. कुछ लोग आरोप लगाते हैं कि साधना मुलायम को अखिलेश के खिलाफ खड़ा करने में लगी हुई हैं.
पार्टी के प्रमुखों का संकीर्ण स्वार्थः- विधानसभा चुनाव से कुछ ही माह पहले उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी गहरे अंदरूनी संकट का शिकार हो गई है. जब तक राजनीतिक पार्टियां परिवारवाद की गिरफ्त में रहेंगी ऐसे संकट पैदा होते रहेंगे.अनौपचारिक रूप से पार्टी दो खेमों में बंट चुकी है. एक खेमे का नेतृत्व पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई शिवपाल यादव कर रहे हैं और दूसरे का नेतृत्व मुलायम सिंह यादव के पुत्र और राज्य के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कर रहे हैं. परिवार के बड़े सदस्य और पार्टी अध्यक्ष के रूप में मुलायम सिंह यादव की कोशिश दोनों खेमों के बीच सुलह-सफाई कराने की रही है .विवादास्पद रहने वाले अमर सिंह भी झगड़े का एक प्रमुख कारण बताए जाते हैं क्योंकि अखिलेश यादव को वे पसन्द नहीं करते हैं. मुलायम सिंह यादव ने अमर सिंह के सभी गुनाह माफ कर चुके हैं और वे उनके नजदीकी सहयोगी हैं.
अखिलेश यादव के छवि व कार्यो पर फोकशः- पिछले साढ़े चार साल में राज्य में कानून-व्यवस्था और सांप्रदायिक शांति तो गड़बड़ी का शिकार रही हैं लेकिन अन्य मोर्चों पर अखिलेश यादव सरकार का रिकॉर्ड अच्छा रहा है. जनता के बीच उनकी छवि काफी अच्छी है. 2012 के चुनाव प्रचार से पहले बाहुबली डीपी यादव की सपा में एंट्री को सफलतापूर्वक रोकने का श्रेय लेने वाले अखिलेश ने 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले भी बाहुबली मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल और बाहुबली अतीक अहमद को टिकट देने का जबरदस्त विरोध किया था. अतीक अहमद को सपा का टिकट भी दिया गया और कौमी एकता दल का सपा में विलय भी हुआ. अमर सिंह को भी अखिलेश की मर्जी के खिलाफ सपा में शामिल किया गया. समाजवादी पार्टी में टूट की स्थिति में अखिलेश यादव को इसी छवि का सहारा है. इसके अलावा अल्पसंख्यक समुदाय के एक हिस्से का वोट भी उनकी तरफ खिंच कर आने की संभावना है. ऐसी स्थिति में शेष अल्पसंख्यक वोट मुख्यतः बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस के खाते में जा सकता है. अल्पसंख्यक समुदाय भारतीय जनता पार्टी से जुड़ने में असहज हो जाते हैं.
महागठबंधन की तैयारीः उत्तर प्रदेश में भाजपा और बसपा ही मुख्य लड़ाई में है. सपा के अन्दरुनी उठापटक से जनता उतना आश्वस्त नहीं हो पा रही है. इसका पूर्वानुमान अखिलेशजी को हो गया है. इसलिए वह अन्य दलों से तालमेल की सभावना भी व्यक्त करते रहते हैं. लोकदल और कांग्रेस की हालत व विश्वसनीयता कम होती जा रही है. इसलिए ये पर्टियां तालमेल के लिए बेताब हैं. इससे उनका अस्तित्व समाप्त होने से बच जाएगा. अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव, दोनों ही राष्ट्रीय लोक दल, जनता दल (यूनाइटेड) तथा कुछ अन्य छोटी पार्टियों के साथ मिलकर गठबंधन तैयार करने की सोच रहे हैं. अखिलेश यादव और कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी के बीच गठजोड़ की संभावना भी व्यक्त की जा रही है ताकि युवा नेतृत्व पेश किया जा सके और युवा मतदाता, जिसकी तादाद काफी अधिक है, को आकृष्ट किया जा सके. समाजवादी पार्टी की अंदरूनी कलह के कारण उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति का मैदान अनेक प्रकार की संभावनाओं से भर गया है. इस कलह का चुनाव परिणामों पर निर्णायक असर पड़ेगा, इसमें कोई संदेह नहीं है. तमिलनाडु की डीएमके की तरह ही समाजवादी पार्टी भी एक परिवार के कब्जे में है. अखिलेश खेमे का आरोप यह भी है कि पिता-पुत्र के बीच तनाव पैदा करने में दूसरी पत्नी की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है. जब तक राजनीतिक पार्टियां परिवारवाद की गिरफ्त में रहेंगी और वैचारिक आधार को नजरअंदाज करेंगी तब तक उनमें इस प्रकार के संकट पैदा होते रहेंगे जिनके पीछे शुद्ध संकीर्ण स्वार्थ के अलावा और कुछ नहीं होगा.
समाजवादी पार्टी में जारी उठा-पटक नाटकीय:-कुछ विशेषज्ञ यह मानते हैं कि मुलायम सिंह सियासत के शिखर पर जितना ऊंचा जा सकते थे गए. अब वो और ऊपर नहीं जा सकते. दूसरी तरफ अब अखिलेश यादव का दौर है. कहा जाता है कि नई पीढ़ी में उनकी लोकप्रियता काफी ज्यादा है.अखिलेश ना केवल अपनी पार्टी अपितु अन्यों के बीच भी लोकप्रिय हैं। कुछ तो यहां तक कहने को तैयार हैं कि मुलायम सिंह भी यही चाहते हैं कि पार्टी की बागडोर अखिलेश ही संभालें. वह अपने छोटे भाई शिवपाल यादव के करीब जरूर हैं, लेकिन अगर चुनाव बेटे और भाई के बीच किसी एक का करना हो, तो वो अंत में बेटे को ही चुनेंगे. कुछ विशेषज्ञ तो यह भी कहते हैं कि बाप-बेटे का झगड़ा केवल एक ड्रामा है. समाजवादी पार्टी में जारी उठा-पटक पर नजर रखने वालों को यकीन है कि अंदरूनी विवाद जल्द खत्म होने वाला नहीं है. राज्य में विधानसभा चुनाव होने में अब कुछ ही हफ्ते बाकी हैं. अगले कुछ दिनों में इस जंग का अंत पार्टी के लिए बेहद जरूरी होगा.
वास्तविक संकट या बनावटी ड्रामा:-समाजवादी पार्टी का ताजा राजनीतिक संकट मुलायम सिंह यादव के इसी राजनीतिक ड्रामे का सीक्व्ल है. सरकार चलाते समय कुनबे और पार्टी के अन्य वरिष्ठ चेहरे बगावत ना करें, इसके लिए जरूरी था कि उन्हें उनके मन मुताबिक मंत्रालय मिलें और अपने तरीके से काम करने की आजादी मिले . मुलायम इस तरह पार्टी को भी साधते रहे और अखिलेश को भी संभावित खतरों से बचाते रहे. चुनाव की दहलीज पर खड़ी पार्टी में अब कुनबा अपना हिस्सा मांग रहा है. सबको टिकटों के बंटवारे में अपना अपना हिस्सा चाहिए. टिकट बंटवारे के आर्थिक पहलू भी होते हैं और अपने खेमे की ताकत बढ़ाने की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं भी. इससे निपटना एक खासा कठिन काम है. अखिलेश शायद पहली बार इतने मजबूत और अडिग नजर आ रहे हैं और वह भी एक बहुत ही अहम और मजबूत आदमी के खिलाफ जो खुद उनके कुनबे से आता है. इस ड्रामे के सूत्रधार मुलायम सिंह यादव और नायक अखिलेश यादव अब अजेय योद्धा हैं. उनकी पार्टी और परिवार के लोग अखिलेश के आगे अब छोटे किए जा चुके हैं. अखिलेश अब पार्टी का भविष्य भी हैं और सत्ता के शीर्ष भी.
पार्टी के भविष्य पर फैसला:- साल 2016 के आखिरी दिन तथा 2017 के शुरुवाती दिनों में उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी के भविष्य पर भी फैसला होना है। अब यह तय होगा कि पार्टी का असली नेता मुलायम सिंह यादव या अखिलेश यादव में कौन होगा? जिसको लेकर सीएम अखिलेश यादव और पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने अपने-अपने आवास पर मौजूदा विधायकों और उम्मीदवारों की बैठक की जिसमें अखिलेश मुलायम पर भारी पड़े। इस सम्मेलन में करीब 5000 कार्यकर्ता शामिल हुए. इस सम्मेलन में मुलायम को पार्टी का रहनुमा बताते हुए उनके खास सहयोगी शिवपाल यादव का राज्य अध्यक्ष पद छीन लिया गया और उनके दिल के करीब बताए जाने वाले अमर सिंह को पार्टी से निकाल दिया गया. अखिलेश की बैठक में जहां 190 से ज्यादा विधायक पहुंचे वहीं मुलायम की बैठक में सिर्फ 11 मौजूदा विधायकों ने ही हिस्सा लिया। जिसके बाद मुख्यमंत्री अखिलेश और रामगोपाल यादव को पार्टी में वापस ले लिया गया। शिवपाल यादव ने इस संबंध में ट्वीट कर कहा, मुलायम सिंह के आदेश अनुसार, अखिलेश यादव और रामगोपाल यादव का पार्टी से निष्कासन तत्काल प्रभाव से समाप्त किया जाता है। पुनः कुछ घण्टों में राम गोपाल जी को पुनः निष्कासित कर दिया गया. इस बार अखिलेश को बरखास्त ना करने के पीछे भी मुलायम सिंह जी की कोई चाल छिपी हुई लगती है. सब साथ मिलकर दोनों गुट ये दावा करते दिख रहे हैं कि वे सांप्रदायिक ताकतों से लड़ेंगे और उत्तर प्रदेश में फिर से पूर्ण बहुमत की सरकार बनाएंगे.
अखिलेश सपा के अध्यक्ष बनेः- लखनऊ के जनेश्वर मिश्र पार्क में समाजवादी पार्टी के प्रतिनिधियों के राष्ट्रीय अधिवेशन में रामगोपाल यादव ने नेताजी मुलायम सिंह यादव को पार्टी का मार्गदर्शक और उनकी जगह अखिलेश यादव को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव पारित किया. इसके साथ ही उन्होंने शिवपाल यादव को प्रदेश अध्यक्ष पद तथा अमर सिंह को पार्टी से हटाने का भी प्रस्ताव भी पार्टी कार्यकर्ताओं के ध्वनि मत से पास किया.
कार्यालय पर अखिलेश खेमे का कब्जा:-अखिलेश खेमे द्वारा बनाए गए नए प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम अपने समर्थकों के साथ समाजवादी पार्टी के कार्यालय पर पहुंचकर उस पर कब्जा कर लिया. रविवार को लखनऊ में अधिवेशन के दौरान रामगोपाल यादव ने शिवपाल यादव को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया था. पार्टी कार्यालय के बाहर भारी संख्या में पुलिस की तैनाती कर दी गई है.
मुलायम ने अधिवेशन बुलायाः- रामगोपाल की इस घोषणा के बाद मुलायम सिंह यादव ने रविवार के अधिवेशन को असंवैधानिक करार देते हुए इसमें लिए फैसलों को रद्द कर दिया. मुलायम ने अब लखनऊ के उसी जनेश्वर मिश्र पार्क में 5 जनवरी को पार्टी अधिवेशन बुलाया है. इसके साथ ही उन्होंने रामगोपाल यादव को छह साल के लिए निष्कासित कर दिया है. साथ ही अधिवेशन में शामिल होने पर पार्टी महासचिव और राज्यसभा सांसद नरेश अग्रवाल और सपा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष किरनमय नंदा को भी पार्टी से निकाल दिया है.
चुनाव चिह्न पर कब्जे की जंग शुरू:- दो फाड़ हो चुकी समाजवादी पार्टी में अब उसके चुनाव चिह्न पर कब्जे की जंग शुरू होने वाली है. दोनों ही साइकिल चुनाव चिह्न पर दावा जता रहे हैं. अपनी दावेदारी को लेकर सोमवार को चुनाव आयोग पहुंचेंगे. मुलायम सिंह यादव सोमवार को दिल्ली में ही अमर सिंह से मुलाकात करेंगे और उनके साथ शिवपाल यादव भी होंगे. अमर सिंह लंदन से दिल्ली पहुंच रहे हैं. चुनाव आयोग जाने की तैयारी अकेले मुलायम खेमे में ही नहीं है, अखिलेश खेमा भी साइकिल पर दावेदारी के लिए चुनाव आयोग पहुंचेगा. मतलब साफ है कि झगड़ा इस कदर बढ़ चुका है कि सुलह के रास्ते बंद नजर आ रहे हैं.
वर्तमान समाजवादी पार्टी किसकीः- अब सवाल यह उठता है कि वर्तमान समाजवादी पार्टी किसकी होकर रहेगी? मुलायम की या अखिलेश की? चुनाव आयोग में एक निर्धारित प्रक्रिया है, आयोग ये देखेगा कि कार्यकारिणी के कितने सदस्य या विधायक, सांसद और पार्टी के कितने उम्मीदवार किसके साथ हैं. आयोग ही यह तय करेगा कि असली समाजवादी पार्टी कौन है? इसमें निर्णय लने में समय लगेगा और चुनाव आयोग के निर्णय के खिलाफ अदालत जाने का विकल्प भी खुला रहेगा. खतरा यह भी है कि चुनाव आयोग समाजवादी पार्टी का चुनाव चिन्ह साइकिल को फ्रीज भी कर सकता है. दोनों घटकों को अस्थाई चुनाव चिन्ह देकर चुनाव सम्पन्न कराया जा सकता है. बाद में बड़े गुट को असली होने का राष्ट्रीय दल की मान्यता देकर दूसरे गुट को राज्य स्तरीय मान्यता दे सकता है. यह भी संभव है चुनाव बाद हारने की स्थिति में दोनों गुट आपस विलय भी कर सकते हैं और पार्टी के पद बांटकर ले सकते हैं.

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