“सत्यार्थ-प्रकाश का हिन्दी में लिखा  जाना एक अत्यन्त महत्वपूर्ण घटना”

मनमोहन कुमार आर्य,

सत्यार्थप्रकाश कोई सामान्य ग्रन्थ न होकर वैदिक धर्मियों का धर्मग्रन्थ है जिसका आधार वेद और वेद की निर्भ्रान्त सत्य मान्यतायें एवं सिद्धान्त हैं। हम सत्यार्थप्रकाश को धर्म ग्रन्थ इस लिये कह रहे हैं कि सामान्य व्यक्ति वेदों का अध्ययन कर उससे वह लाभ नहीं उठा सकता जो सत्यार्थप्रकाश से प्राप्त होता है। सत्यार्थप्रकाश में वेदों के प्रायः सभी सिद्धान्तों एवं मान्यताओं को सरल व सुबोध आर्य-हिन्दी-भाषा में ऋषि दयानन्द जी ने प्रस्तुत किया है। यदि किसी जिज्ञासु को इस संसार के उत्पत्ति-कर्ता ईश्वर का ज्ञान प्राप्त करना हो तो वह सत्यार्थप्रकाश के प्रथम व सप्तम समुल्लास को पढ़कर प्राप्त कर सकता है। जीवात्मा और सृष्टि की उत्पत्ति विषयक सिद्धान्त व जानकारी भी सत्यार्थप्रकाश के सातवें व आठवें समुल्लास को पढ़कर हो जाती है। सत्यार्थप्रकाश की विशेषयता यह भी प्रतीत होती है कि इसमें वेद सहित 6 दर्शनों एवं अन्य ऋषियों के वेदानुकूल सिद्धान्तों वा प्रमाणों को प्रसंगानुसार प्रस्तुत किया गया है जिससे पूरा विषय कम समय में हृदयंगम हो जाता है और पढ़े गये विषय के बारे में किसी प्रकार की शंका व भ्रम नहीं होता। ईश्वर व जीवात्मा का जितना शुद्ध व गम्भीर ज्ञान सत्यार्थप्रकाश में उपलब्ध होता है, हमारा अनुमान है कि वैसा व उतना संसार के किसी मत व पन्थ के धर्म ग्रन्थ में उपलब्ध नहीं होता। सत्यार्थप्रकाश की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि विश्व के साहित्य में दुर्लभ आध्यात्मिक व सामाजिक ज्ञान एक ही ग्रन्थ में हिन्दी भाषा में उपलब्ध हो जाता है। आर्यभाषा हिन्दी का महत्व इस कारण से है कि यह आज करोड़ों लोगों की बोलचाल की भाषा है। यह सभी लोग इसी भाषा में सोचते हैं व परस्पर बोलचाल का व्यवहार करते हैं। सत्यार्थप्रकाश से पूर्व सत्यार्थप्रकाश में वर्णित विषयों का ज्ञान किसी एक ग्रन्थ को पढ़कर प्राप्त नहीं होता था। यह वैदिक साहित्य के अनेक ग्रन्थों में बिखरा हुआ था जिसे ऋषि दयानन्द ने आधुनिक काल की आवश्यकता के अनुरूप संकलित कर प्रश्नोत्तर वा वाद-विवाद शैली में उपलब्ध कराया है। इसके अतिरिक्त भी ऋषि दयानन्द ने बहुत सी ऐसी बातें सत्यार्थप्रकाश में प्रस्तुत की है जो उनकी अपनी खोज व विचार शक्ति से हमें उपलब्ध होती हैं। यदि वह यह ग्रन्थ न लिखते तो आज हम इस प्रामाणिक ज्ञान से वंचित होते और लोग स्वयं भ्रमित होकर हमें भी भ्रम में रखकर हमारा शोषण और दोहन करते और हमें वह आत्मिक सुख व शान्ति न मिलती जो सत्य ज्ञान को प्राप्त कर होती है। यह भी जान लें कि सत्यार्थप्रकाश के उत्तरार्ध के चार समुल्लास आर्यावर्तीय मतों, चारवाक-बौद्ध-जैन मत सहित ईसाई व मुस्लिम मत की समीक्षा विषयक हैं जो जिज्ञासु को सत्य मत का निर्णय करने में सहायक एवं ज्ञानवर्धक हैं।

 

सृष्टि के आरम्भ से लेकर महाभारत काल व उसके सैकड़ों वर्षों तक विश्व वा आर्यावर्त में सर्वत्र वेदों का ही प्रचार प्रसार था और वैदिक मान्यतायें एवं सिद्धान्तों का आचरण ही लोगों का धर्म होता था। इस लम्बी अवधि में विश्व की भाषा संस्कृत थी। किसी भी भाषा के उद्भव का इतिहास जानना हो तो यह उस भाषा की सबसे प्राचीन उपलब्ध पुस्तक के आधार पर जाना जा सकता है। विश्व की सबसे पुरानी पुस्तक वेद है जिसकी भाषा संस्कृत है। वेद सृष्टि के आरम्भ में तिब्बत में उत्पन्न हुए थे। उन दिनों तिब्बत में ही मानवीय सृष्टि थी। पृथिवी का शेष भाग उन दिनों मानव सृष्टि से रहित था। बाद में तिब्बत से चलकर आर्यों ने सारी सृष्टि को बसाया है। इसका प्रमाण संसार की प्रायः सभी भाषाओं में संस्कृत से मिलते जुलते शब्दों का पाया जाना है। वेद, सृष्टि व मनुष्य परम्परा 1,96,08,53,118 वर्ष पुरानी है। इससे यह ज्ञात होता है कि संस्कृत भाषा की परम्परा भी इतनी ही पुरानी है। संसार की जितनी भी भाषायें हैं, उन भाषाओं के प्राचीनतम ग्रन्थों को देखकर उन-उन भाषाओं का आरम्भ व इतिहास का अनुमान कर सकते हैं। हमारा अनुमान है कि किसी भाषा के प्राचीनतम ग्रन्थ से कुछ सौ वर्ष पूर्व ही उस भाषा का प्रचलन होना आरम्भ होता है। जो भाषा प्रचलन में आती है वह उससे पूर्व की भाषा का किंचित विकार व परिवर्तित रूप होता है। महाभारत काल के बाद संस्कृत का प्रयोग कम होने लगा था और उसके स्थान पर संस्कृत के शब्दों पर आधारित अनेक बोलियों व भाषाओं का जन्म हुआ। वर्तमान समय में जो भी भाषा व भाषायें हैं वह पहले बोलियां रही होंगी जिन्हें बाद में उन उन भाषा के विद्वानों द्वारा उस भाषा का संशोधित स्वरूप दिया गया होगा। अपने समय में प्रचलित किसी अन्य भाषा जिसे प्रयोगकर्ताओं के लिये क्लिष्ट कह सकते हैं, उससे उत्पन्न नवीन भाषा पूर्व भाषा का विकार व संशोधित रूप होती है। कालान्तर में वह पूर्व प्रचलित मुख्य भाषा गौण हो जाती है और वह परिवर्तित बोली उन्नति करके भाषा बन जाती है। भारत की जितनी भी भाषायें हैं वह सभी संस्कृत से आविर्भूत व उत्पन्न हैं। सभी भाषाओं में संस्कृत शब्दों की प्रचुरता है। कुछ भारतीय भाषाओं में पहले संस्कृत के प्रचुर मात्रा में शब्द होते थे परन्तु उस भाषा के लोगों ने संस्कृत के प्रति अपने द्वेष आदि के कारण उन भाषाओं से संस्कृत के शब्दों को शनैः शनैः हटाया है। मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा है कि अल्पज्ञ होने के कारण यह अज्ञान व भ्रम से ग्रस्त हो जाता है और अनेक अविवेकपूर्ण निर्णय भी लिया करता है।

 

ज्ञान को सामान्य व्यक्ति तक पहुंचाना विद्वानों का काम होता है। इसके लिये सामान्य व्यक्ति की भाषा को ध्यान में रखना आवश्यक है। यदि हमारे पास उन भाषाओं में उच्च कोटि का ज्ञान हो जिसे हम जानते नहीं है, तो उससे हम कोई लाभ नहीं उठा सकते। विद्वान हमें जो ज्ञान देते हैं वह क्षणिक व कुछ समय के लिए होता है। उसको स्थिर करने के लिये हमें पुस्तकों के माध्यम से पुनरावृत्ति करनी होती है। महाभारत के बाद वेद ज्ञान के अप्रचलित होने व उसमें अज्ञान व अधंविश्वास आ जाने का एक कारण यह भी था कि संस्कृत के जानने वाले लोग कम होते गये। वेदों के अर्थ लौकिक संस्कृत में सम्भव नहीं हैं। इसका कारण है कि वेदों के शब्द रूढ़ न होकर योग रूढ़, यौगिक वा धातुज हैं। अतः वेदों के रूढ़ अर्थों से यदि संस्कृत का विद्वान काम लेगा तो अर्थ का अनर्थ हो सकता है। ऐसा ही सायण व महीधर के साथ हुआ। वह वेद मन्त्रों के शब्दों के रूढ़ अर्थोंं को ग्रहण करने के कारण यथार्थ अभिप्राय को जान नहीं सके और मिथ्या अर्थ करके वेदों की महत्ता को समाप्त करने का काम किया। ऋषि दयानन्द ने वेदों के सत्यार्थ जानने के लिये अनेक विद्वानों व ज्ञानियों से सम्पर्क किया। अन्त में उन्हें प्रज्ञाचक्षु गुरु स्वामी विरजानन्द सरस्वती, मथुरा का शिष्यत्व वा सान्निध्य प्राप्त हुआ। उन्होंने लगभग तीन वर्ष उनके सान्निध्य में रहकर वैदिक संस्कृत भाषा का अभ्यास किया और अपने योग बल का उपयोग करते हुए वह वेदों के सरल व यथार्थ अर्थ करने में सफल हुए। आज वेदों का सत्यार्थ लोगों को उपलब्ध है जिससे लोगों के ईश्वर, जीव व प्रकृति से सम्बन्धित सभी भ्रम व शंकायें दूर हुईं हैं। ऋषि दयानन्द ने वेदों की मान्यताओं वा सिद्धान्तों को सत्यार्थप्रकाश व ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में प्रस्तुत कर उसे जन-जन तक पहुंचाने का कार्य किया है। यह ऋषि दयानन्द का ‘भूतो न भविष्यति’ के समान कार्य है। आज कक्षा 5 तक हिन्दी पढ़ा हुआ व्यक्ति भी वेद पढ़कर उसके सत्यार्थ को जान सकता है। यह ऋषि दयानन्द की बहुत बड़ी देन है। यदि ऋषि दयानन्द सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका सहित वेदों का भाष्य हिन्दी में न करते तो आज देश भर में वेदों के सहस्रों नहीं अपितु लाखों की संख्या में जो विद्वान हैं, वह कदापि न होते और समाज में अज्ञान, अन्धविश्वास, पांखण्ड और रूढ़िवाद की स्थिति की हम कल्पना भी नहीं कर सकते। यह अत्यन्त वृद्धि को प्राप्त होतीं। ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश को लिखकर इसके पाठक को वैदिक धर्म की श्रेष्ठता का परिचय दिया है और उसे विधर्मियों के धर्मान्तरण के षडयन्त्र से भी बचाया है। अब आवश्यकता सत्यार्थप्रकाश के जन जन तक प्रचार की है जिससे सभी आर्य व हिन्दू सत्यार्थप्रकाश पढ़कर अपने धर्म में आरूढ़ रहकर दूसरों को वैदिक धर्म की विशेषता बताकर उन्हें वेद ज्ञान को स्वीकार करने के लिए प्रेरित कर सकें।

 

ऋषि दयानन्द ने सन् 1874 के उत्तरार्ध में सत्यार्थप्रकाश की रचना की थी। इसका दूसरा संशोधित संस्करण उन्होंने सन् 1883 में तैयार किया था। आजकल सत्यार्थप्रकाश का संशोधित संस्करण ही प्रचलित है। इस सत्यार्थप्रकाश की देश को आधुनिक रूप देने में बहुत बड़ी भूमिका है। सत्यार्थप्रकाश में ईश्वर, जीव व प्रकृति का सत्य स्वरूप विद्यमान है और वेदाध्ययन की प्रेरणा करने सहित ईश्वरोपासना और अग्निहोत्र यज्ञ करने की प्रेरणा भी विद्यमान है। अज्ञान व पाखण्डों का नाश करने में भी सत्यार्थप्रकाश की मुख्य भूमिका है। देश को आजाद करने की सबसे पहले स्पष्ट प्रेरणा भी सत्यार्थप्रकाश ने ही की थी। सत्यार्थप्रकाश ब्रह्मचर्यपूर्वक वैदिक गुरुकुलीय शिक्षा सहित आधुनिक शिक्षा का भी प्रेरक है। वह सबको शिक्षा का समान अधिकार देता है। शिक्षा सबके लिये अनिवार्य व निःशुल्क सुविधाओं वाली होनी चाहिये। कोई भी निर्णय बहुमत से नहीं अपितु विद्या व गुण-दोष के आधार पर लिये जाने चाहिये। देश में एक समान आचार संहिता होनी चाहिये। धर्म का पालन निजी तौर पर किया जाना चाहिये। उसका देश व नागरिकों पर बुरा प्रभाव नहीं होना चाहिये। देश को जनसंख्या की नीति भी बनानी चाहिये जिससे भविष्य में भुखमरी व अव्यवस्था के साथ हिंसा आदि उत्पन्न न हो। मत-मतान्तरों के अनुयायियों की जनसंख्या भी समान दर से ही बढ़नी चाहिये, किसी वर्ग व समुदाय की कम व किसी की अधिक नहीं होनी चाहिये। देश में जनसंख्या वृद्धि से साधनों का अभाव होने सहित अनेक प्रश्न जुड़े हुए हैं। इसे स्थिर रखने के प्रयत्न किये जाने चाहियें। सत्यार्थप्रकाश की सत्य व अकाट्य बातों को सबको स्वीकार करना चाहिये। सत्यार्थप्रकाश को पढ़ने से मनुष्यों की बुद्धि का विकास होता है। सत्यार्थप्रकाश पढ़कर मनुष्य की विश्लेषण क्षमता में वृद्धि होती है। वह देश व समाज के हित-अहित के कारणों को जानने में समर्थ होता है। सत्यार्थप्रकाश मानव मात्र का सम्पूर्ण धर्मग्रन्थ है। हिन्दी में होने से हम इसे पूर्ण रूप से जानने में समर्थ होते हैं। सभी को सत्यार्थप्रकाश को अपना कर अपने दोनों लोकों का सुधार करना चाहिये।

3 thoughts on ““सत्यार्थ-प्रकाश का हिन्दी में लिखा  जाना एक अत्यन्त महत्वपूर्ण घटना”

  1. ज्ञानवर्धक निबंध के लिए मैं श्री मनमोहन आर्य जी को धन्यवाद देता हूँ| बहुत समय से D.A.V. लघुरूप को ले मन में जिज्ञासा बनी हुई है जिसे मैं विद्यालयों, महाविद्यालयों अथवा प्रशिक्षण के अन्य संस्थानों के नाम में जुड़ा देखता आया हूँ और तिस पर उनके नाम में विस्तारपूर्वक Dayanand Anglo Vedic कम ही लिखे पाता हूँ| मेरा अनुरोध है कि आप पाठकों को बताएं कि Anglo शब्द क्योंकर प्रयोग में लाया गया होगा और आज स्वतन्त्र भारत में क्योंकर इसका आज भी १८८६ जैसा ही महत्व बना हुआ है?

  2. विश्व में नंबर एक पर हिन्दी बोलने वाले ( 1200 मिलियन ) , दूसरे नंबर पर चीनी ( 1050 मिलियन) और आपकी अङ्ग्रेज़ी बोलने वाले तीसरे नंबर पर (मात्र 950 मिलियन ) रह गए हैं ! भारत के 10 राज्यों की राजभाषा हिन्दी है — क्या अन्य कोई भारतीय भाषा या लुटेरे अंग्रेजों की भाषा इस स्तर को छू सकती है !! पाटलिपुत्र का सुपर-30 जिनके पढ़ने – पढ़ाने वाले दोनों हिन्दी भाषा -भाषी है आईआईटी में वे 100 % चयनित हो रहे हैं — कहाँ ठहर पा रही है आपके गुलाम मानसिकता की अङ्ग्रेज़ी ??? इसलिए हिन्दी को अविलंब राष्ट्रभाषा बनाना चाहिए — क्योंकि दक्षिण भारत की अधिकांश जनता भी हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाना चाहती है — मैंने प्रधान मंत्री और गृहमंत्री को जो ज्ञापन ओमान से भेजा है उनमें 98% दक्षिण भारतीयों के हस्ताक्षर उनके फोन नंबर और रेजीडेंट कार्ड नंबर के साथ हैं जिन्हें उनकी प्रतियाँ चाहिए अपनी आईडी भेजकर मुझसे ले सकते हैं —-

    1. लेख को पूरी तरह पढ़ लेने पर “आपकी अङ्ग्रेज़ी बोलने वाले तीसरे नंबर पर (मात्र 950 मिलियन ) रह गए हैं!” विशेषकर वाक्य के अंत में विस्मय बोधक चिह्न लगाने से आपका वक्तव्य, केवल लेखक के प्रति उलाहना भरा दिखाई देता है जब कि उन्होंने लेख में अंग्रेजी शब्द का प्रयोग तक नहीं किया है| आगे “कहाँ ठहर पा रही है आपके गुलाम मानसिकता की अङ्ग्रेज़ी ???” पूछते पौष्टिक व् स्वादिष्ट खीर स्वरूप लेख में आप राख मिलाते दिखाई देते हैं| वैसे हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने हेतु आपकी भावना का मैं आदर करता हूँ और अच्छी प्रकार समझता हूँ कि उस लक्ष्य में “आपकी” “हमारी” व “अन्य सभी” की अंग्रेजी के प्रचलन का अब तक कांग्रेस द्वारा मचाए राजनैतिक व शासकीय खलल ने आपको कुंठित किया हुआ है| आज “मात्र ९५ करोड़” अंग्रेजी भाषा बोलने वालों ने कभी संगठित हो पृथ्वी के अधिकांश भूभाग पर अधिपत्य जमाए रखा था और उस काल की इंडिया में अन्य भारतीय मूल की भाषाओं की भांति हिंदी भाषा को कभी आंच नहीं आ पाई थी| लेकिन तथाकथित स्वतंत्रता के पश्चात अंग्रेजी-राज द्वारा उनकी संतति कांग्रेस-राज में सीमित संख्या में मूल निवासियों द्वारा अंग्रेजी भाषा का निरंतर आधिकारिक उपयोग—संविधान में अंग्रेजी को पंद्रह वर्षों बाद हटा देने का प्रावधान था—और अन्य भेद-भाव के बीच अनेक भाषाओं में भारतीयों को विभाजित कर बिना चुनौती १८८५ में जन्मी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को सत्ता में बनाए रखने का क्रूर षड़यंत्र था| भारतीय मूल की किसी एक सामान्य भाषा के अभाव में कांग्रेस ने अंग्रेजी भाषा में शासन करते अधिकांश भारतीयों के सामाजिक व आर्थिक आकांक्षाओं को पनपने ही नहीं दिया और इस प्रकार निर्बल बना उन्हें आधुनिक जीवन की उपलब्धियों से सदैव वंचित रखा है|

      डॉ. अशोक कुमार तिवारी जी, आप प्रधान मंत्री और गृहमंत्री को लिखते हैं तो उन्हें अनुरोध करें कि आगामी लोक सभा निर्वाचनों हेतु अब कांग्रेस-युक्त इंडिया को हटा पूर्णतया कांग्रेस-मुक्त देश केवल भारत के नाम से पहचाने जाने का अभियान चलाया जाए| मात्र “भारत” शब्द के उच्चारण में हमारी भारतीयता, हमारी भाषाएँ, हमारे भारतीय दर्शन व परम्पराएं उभर कर हमारे ह्रदय को प्रफुल्लित करने में समर्थ हैं और हम प्रेम मुदित मन से भारत माता की जय पुकारते हैं|

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