सीख देती चीटियाॅ

आत्माराम यादव पीव
कभी चीटियों को देखों
मुॅह मिलाकर प्रेम करती है
अंजान चीटी से पहचानकर
नेह का यह मिलाप
असीम अपनत्व का इजहार है
वे मुॅह मिलाकर एक दूसरे को
आभार व्यक्त करने के साथ
नमस्कार करती है।
कभी चीटी जैसे
किसी जीव का
ओढ़ना-बिछाना,
चैका-चूल्हा
थाली बघौनी देखी है
किस रंग के होते है
उनकी आवाज कैसी होती है
भला हाॅड़-माॅस का यह
आदमी क्या समझेगा।
वासना के कीड़े की तरह
रेंगता हुआ
यह प्रेम करता नहीं
प्रदर्शन करता है
आदमी का अभिवादन
दूर से ही
हलो-हाय हो गया है।
कभी गले मिलकर
प्रेमानुभूत से आनन्दित होने वाला
आदमी,
इंसान बनने चला था
पर आपस में हाथ मिलाने का
आविष्कारक यह आदमी
न आदमी रहा न इंसान
उसकी पहचान
अपने ही नहीं गैरों से भी
दूर से हेलो-हाय कर
नमस्कार करने
चरणस्पर्श की जगह
वाय-वाय
करने भर की है
पर चीटियाॅ पीव आज भी
नहीं भूली है
मुॅह से मुॅह मिलाकर
प्रेम करना और
नमस्कार करना।

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