मेरे शहर की यह शांतचित्त सड़क
कभी बहुत खिलखिलाया करती थी
बचपन में इसके तन पर
हम खेला करते थे गिल्लीडंडा
तब कभी कभार दिन में दो-चार
बसें और इक्का-दुक्का वाहन
भोंपू बजाकर सड़क से गुजर जाते थे।
पूरे शहर के हर मोहल्ले के बच्चे
इस सड़क पर इकटठा होते और
कोई गिल्लीडंडा खेलता तो
कोई दो चके वाली गाड़ी में
बच्चें कें बैठा खींचकर ले जाता
तब इस सड़क की पूरी चेतना
चिंतन और विचार तथा हृदय
मनुष्यों की तरह होता और
भूल या गल्ती से गिरने वाले को
यह सड़क अपनी बाॅहों में संभाल लेती।
इस सड़क पर गिरकर
कभी कोई पंगु या लाचार नहीं हुआ
ज्यादा हुआ तो किसी के चोट में
घुटने-पैर में छीलन या मोच आती
और घर जाकर हल्दीवाला दूध पीते ही
वह फिर लौटकर इस सड़क पर
धमाचैकड़ी करता जी भर खेलता
और सड़क का स्पर्श उसे
माॅ की गोद का स्मरण कराता ।
बच्चों को मातृृत्व सुख देने वाली
इस सड़क को बर्सो बाद
खूनी सड़क के नाम से पुकारे जाने पर
हमें गहरा दुख और आश्चर्य हुआ।
आखिर यह आदर्श सड़क
खूनी क्यों हुई इस पर चिंतन हुआ।
पता चला
कुछ सांमतवादी पूंजीपतियों ने
इसे अन्य सड़कों से ज्यादा उपयोगी
महत्वपूर्ण मानकर] अपने लालच से
कुटिलता की सुदृढ़ता प्रदान करने
इसके मूल स्वरूप पर
बेईमानी की कई परतें चढ़ाई गयी
और कई टन-लोहा सीमेंट कंकरीट से
आहत कर इसका मुस्कुराना छीना।
नर्मदा-तवा के हृदय में छेद कर
बेषुमार रेत का अवैध भण्डारन करने
इसी सड़क की छाती पर अंधाधुंध
दौड़ने लगे हजारों वाहन
जो नर्मदा तवा का अस्तित्व समाप्त करने
चैबीसों घन्टे इस सड़क पर
तीव्रगति वाहनों के भार से प्रहार।
जब भी कभी इस सड़क से जुड़ा
कोई अपनापन लिये व्यक्ति
अपने घर,मंजिल की ओर कदम बढ़ाता
तब ये तीव्रगति वाहन
निर्दयी बने उसे रोंदकर मार डालते
तोड़ देते उसके अस्थिपंजर
और जिंदगी भर के लिये अपंग बना देते
तब यह सड़क खुदको चोटिल समझ
चीत्कार उठती थी,उस मनुश्य के लिये।
परन्तु दुनियावाले भारी वाहनों के चालकों पर
इल्जाम लगाने की बजाय इस सड़क को
खूनी सड़क कहने लगे
और यह निदोश सड़क
दुनियावालों की नजर में बदनाम
एक खूनी सड़क हो गयी, जो वह नहीं है।

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