स्वार्थ चेतना भी अस्वस्थ कर देती है

-ः ललित गर्ग:-

कोरोना महामारी हमें बड़ी सीख दी है कि हम समाज एवं देश में एक साथ तभी रह पाते हंै जब वास्तविक प्रेम, निस्वार्थ भावना एवं संवेदना को जीने का अभ्यास करते हैं। उसका अभ्यास सूत्र है-साथ-साथ रहो, तुम भी रहो और मैं भी रहूं। या ‘तुम’ या ‘मैं’ यह बिखराव एवं विघटन का विकल्प है। ‘हम दोनों साथ नहीं रह सकते’ यह नफरत एवं द्वेष का प्रयोग है। विरोध में सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है। जो व्यक्ति दूसरे के साथ सामंजस्य स्थापित करना नहीं जानता, वह परिवार एवं समाज में रह कर शांतिपूर्ण जीवन नहीं जी सकता।
दूसरों के साथ हमारे रिश्ते में सबसे बड़ा रोड़ा है अहंकार एवं स्वार्थ। यह बड़ी चतुराई से अपनी जगह बनाता है। अहंकारी एवं स्वार्थी अपने फायदे के लिए ही दूसरों के पीछे भागता है। बड़ों से संबंध जोड़ता है और छोटों एवं कमजोर की अनदेखी कर देता है। प्रेम हंसाता है तो अहंकार चोट पहुंचाता रहता है, स्वार्थ बांटता है तो निस्वार्थ जोड़ता है। अहंकारी एवं स्वार्थी गले लगाकर भी दूसरे को छोटा ही बनाए रखता है। यह केवल दूसरों से पाने की चाह रखता है। जब हम अपने हिस्से में से दूसरों को भी देना सीख जाते हैं और अपनी खुशियां दूसरों के साथ बांटना सीख जाते हैं तो जीवन एक प्रेरणा बन जाता है।
स्वार्थ की भावना बड़ी तीव्र गति से संक्रान्त होती है और जब संक्रान्त होती है तो वह अनर्थ एवं विनाश का कारण बन जाती है। उन्नत, शांतिपूर्ण एवं आदर्श समाज-रचना के लिये सामुदायिक चेतना का विकास और सकारात्मक सोच का प्रशस्त चिंतन अपेक्षित है। आज राष्ट्र का और पूरे विश्व का निरीक्षण करें, स्थिति पर दृष्टिपात करें तो साफ पता चल जाएगा कि लोगों में स्वार्थ की भावना बलवती हो रही है। जबकि बड़ा धु्रव सत्य है कि स्वार्थी समाज कभी सुखी नहीं बन सकता।
स्वार्थ एक नकारात्मक भाव है जो केवल मन को ही नहीं तन को भी अस्वस्थ कर देता है। जबकि निस्वार्थ स्पर्श तुरंत मूड को बदल देता है। उससे शरीर में खुशी देने वाले हार्मोन का स्राव होने लगता है। जो निस्वार्थी होगा, उसकी प्यार भरी झप्पी, हजारों शब्दों से बेहतर असर दिखाती है। जीवन में जो कुछ भी है, जैसा भी है, उसके लिए कृतज्ञता जाहिर करें। छोटी-से-छोटी मदद के लिए दूसरों को शुक्रिया कहें और बड़ी-से-बड़ी सहायता के लिये तत्पर हो जाये। आप पाएंगे कि बहुत कुछ ऐसा है, जिसके लिए खुश हुआ जा सकता है।
निस्वार्थ भावों एवं संवेदनशीलता का कोई एक रूप नहीं होता। निस्वार्थी एवं संवेदनशील व्यक्ति हर दिन अपनी दुनिया बढ़ाता रहता है। उससे उपजी करुणा अपने-पराए का भेद नहीं कर सकती। सबसे बड़ी बात कि प्यार और करुणा सुविधा नहीं है, जीवन की जरूरतें हैं। खुद में इन्हें बढ़ाते रहें। कोई साथ है तो उसे यह एहसास कराएं कि आप उन्हें देख, सुन और महसूस कर पा रहे हैं। उन्हें मानते हैं, प्यार करते हैं, उनके आभारी हैं। हमें अपने परिवेश एवं समाज को ठीक करने की कला आनी ही चाहिए। कुछ तरीके होते हैं, जो वाकई झटपट खुशियां देते हैं। शोध कहते हैं मन ना भी हो तो भी जबर्दस्ती की मुस्कान फायदा देती है। इससे शरीर में खुशी देने वाले एंड्रोफिन्स हार्मोन्स पैदा होते हैं। ये हार्मोन चेहरे की मांसपेशियों के फैलने से उत्पन्न होते हैं और शरीर में तनाव को कम रखने वाले कॉर्टिसोल हार्मोन भी पैदा करते हैं। दिल से खुिशयां बांटियें, पर अपनी मुस्कान को पकड़े रहिये।
पारिवारिक एवं सामाजिक शांति के लिए सहिष्णुता के साथ विनय और वात्सल्य भी आवश्यक है। आज का पढ़ा लिखा आदमी विनम्रता को गुलामी समझता है। उसका यह चिंतन अहंकार को बढ़ा रहा है। विनय भारतीय संस्कृति का प्राणतत्व रहा है। जिस परिवार एवं समाज में विनय की परंपरा नहीं होती, उसमें शांतिपूर्ण जीवन नहीं हो सकता। एक विनय करे और दूसरा वात्सल्य न दे तो विनय भी रूठ जाता है। वात्सल्य मिलता रहे और विनय बढ़ता रहे तो पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन में शांति का संचार बना रहता है। सामंजस्य, समझौता, व्यवस्था, सहिष्णुता, विनय और वात्सल्य इन्हें जीवन में उतारें तभी पारिवारिक एवं सामाजिक शांति बनी रहेगी। जब तक आप दिमाग से संचालित होते हैं, आपको सच्चा प्रेम नहीं हो सकता। प्रेम का एहसास हो सकता है, लेकिन वह सच्चा प्रेम नहीं होता। मसलन- हममें से ज्यादातर लोगों ने अपने जीवन में महसूस किया होगा कि उन्हें प्यार हो गया है। लेकिन वास्तव में एक-दो लोग ही होते हैं, जो सचमुच प्यार में होते हैं। ज्यादातर लोगों में कुछ समय बाद ही प्यार का एहसास समाप्त हो जाता है।
जरूरी है हम पहले अपनी मदद करना सीखें। दूसरों की मदद तभी कर पाएंगे। खुद को थामे रखे बिना दूसरों को पकड़ने की कोशिश निराशा ही देती है। यहां तक कि आप अपने लोगों पर ही बोझ बन जाते हैं। इसलिए दूसरों को बदलने से पहले हम खुद को भी बदलना सीख लें। हमारे दुश्मन दूसरे कम होते हैं, हम खुद ज्यादा होते हैं। और लेखिका आयरीन बटर कहती हैं, ‘दुश्मन वो है, जिसके बारे में हमें पता नहीं।’
अपनी गरिमा महसूस करना और उसे बनाए रखना किसी चुनौती से कम नहीं होता। पर यही चुनौती हमें बेहतरी की ओर भी ले जाती है। हमें खुद पर काम करना ही होता है, क्योंकि हम खास हैं, बहुत खास। अमेरिकी लेखिका जोन डिडियॉन कहती हैं, ‘हमें आत्म-विश्वास से अपने जीवन का उत्तरदायित्व लेना होता है, तभी आत्म-सम्मान उपजता है। व्यक्तिगत गरिमा ही जीवन को बेहतर बनाती है।’ इसी से देने की भावना, कृतज्ञता उपतजी है। हमारे सुख-दुख की बड़ी बाधा है स्वार्थ एवं संकीर्णता। दोनों साथ-साथ चलते रहते हैं। निस्वार्थ जहां हमारे सुखों को बढ़ा देता है, वहीं स्वार्थ परेशानियों का कारण बन जाता है। हम खुद की आदतों को बदलने को राजी नहीं होते और दूसरों को दोष देने लगते हैं। आचार्य महाप्रज्ञ कहते हैं, ‘खुद को देखो। किसी दूसरे को स्वयं के आकलन का पैमाना मत बनाओ।’
स्वार्थी समाज की एक बड़ी विडम्बना यह भी है कि उसमें कई बार लगता है कि हमें छोड़कर सभी बेहतरीन जिंदगी जी रहे हैं। सब आगे बढ़ रहे हैं और आपके यहां दुख पंक्ति बनाकर खड़े हैं। क्या वाकई दूसरों के यहां सब बहुत आसान और सही होता है? लेखिका लॉरा फ्रेशर कहती हैं, ‘ऐसा नहीं होता कि दूसरी तरफ की घास ज्यादा हो। बात यह है कि आप एक समय में मैदान के दोनों तरफ नहीं हो सकते।’
हर रिश्ते को संवेदना से जीने के लिये जरूरी है प्रेम एवं विश्वास। प्यार एवं विश्वास दिलों को जोड़ता है। इससे कड़वे जख्म भर जाते हैं। प्यार की ठंडक से भीतर का उबाल शांत होता है। हम दूसरों को माफ करना सीखते हैं। इनकी छत्रछाया में हम समूह और समुदाय में रहकर शांतिपूर्ण जीवन जी सकते हंै। लेखिका रोंडा बायन कहती हैं कि जितना ज्यादा हो सके हर चीज, हर व्यक्ति से प्यार करें। ध्यान केवल प्यार पर रखें। पाएंगे कि जो प्यार आप दे रहे हैं, वह कई गुणा बढ़कर आप तक लौट रहा है।

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