More
    Homeटॉप स्टोरीसवालों के घेरे में अमत्र्य सेन

    सवालों के घेरे में अमत्र्य सेन

    amartya senअरविंद जयतिलक

    दुनिया के श्रेष्ठतम अर्थशासित्रयों में शुमार और नोबेल पुरस्कार विजेता अमत्र्य सेन ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के रुप में अपनी नापसंदगी जाहिर कर खुद को सवालों के चक्रव्यूह में फंसा दिया है। अभी तक भाजपा और शिवसेना ही उनके र्इमान पर सवाल खड़ा कर रही थी, अब देश के अर्थशास्त्री भी उनपर मखमल में पत्थर लपेटकर फेंकना शुरु कर दिए हैं। देश के जाने-माने अर्थशास्त्री जगदीश भगवती ने उनकी सोच पर चोट करते हुए कहा है कि मोदी की रीति-नीति से परिचित हुए बगैर उन्हें वोट न देने की बात करना मूर्खतापूर्ण है। उनका आरोप है कि सेन मोदी को खारिज कर संप्रग की वकालत कर रहे हैं। दूसरी ओर जनता पार्टी के अध्यक्ष डा.सुब्रमण्यम स्वामी ने उन पर हमला बोलते हुए कहा है कि उन्होंने इंग्लैंड में हिंदुओं के स्कूलों के खिलाफ भाषण दिया जिसकी वजह से उन्हें राष्ट्रपति को पत्र लिखकर सेन से भारत रत्न छीन लेने की मांग करनी पड़ी। फिल्मकार अशोक पंडित ने जानना चाहा है कि सेन अल्पसंख्यकों के प्रति चिंता जता रहे हैं, क्या वे कश्मीरी पंडितों के बारे में भी आवाज उठाएंगे? अन्ना की सहयोगी किरण बेदी ने भी ट्वीट किया है कि सेन सरकार, भ्रष्टाचार और गरीबी के अंतरसंबंधों पर प्रकाश डालें। कुछ इसी तरह के तीखे सवालों के गोले फेसबुक के जरिए भी सेन पर दागे जा रहे हैं। लेकिन ऐसा नहीं है कि इस जुबानी महाभारत में अमत्र्य सेन अकेले हैं। कांग्रेस और वामदलों की फौज उनके साथ है। ज्यों ही भाजपा सांसद चंदन मित्रा ने सेन से भारत रत्न लौटा देने की मांग की दोनों दलों के सिपाहसालार उन पर टुट पड़े। सरकार के सूचना प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने भाजपा को फासिस्ट कह डाला। मौका ताड़ अमत्र्य सेन ने भी राग अलाप दिया कि अगर वाजपेयी कहें तो भारत रत्न लौटाने को तैयार हैं। गौरतलब है कि भाजपा नेतृत्ववाली एनडीए सरकार ने अमत्र्य सेन को भारत रत्न से नवाजा था। अब सेन समर्थकों का कहना है कि आखिर उनकी व्यक्तिगत नापसंदगी को इतना तूल क्यों दिया जा रहा है? क्या उन्हें राजनीति पर बोलने या व्यक्तिगत विचार रखने का अधिकार नहीं है? उनसे भारत रत्न लौटाने की मांग कहां तक उचित है? आखिर मोदी के बारे में उनकी राय कैसे अलोकतांत्रिक है? बेशक इन सवालों में दम है और उन्हें खारिज नहीं किया जा सकता। लेकिन यहां सवाल सिर्फ सेन की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मोदी की नीतिगत आलोचना तक सीमित नहीं है। सवाल उन धारणाओं का भी है जिसमें मोदी के प्रति उनकी घृणा स्पष्ट झलकती है। सेन ने एक अंग्रेजी चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री के रुप में पसंद नहीं हैं क्योंकि उनकी साख धर्मनिरपेक्ष नहीं है। यह भी कहा कि अल्पसंख्यकों को सुरक्षित महसूस कराने के लिए उन्होंने पर्याप्त काम नहीं किया। अब सवाल यह कि क्या सेन ने सही कहा है? बेशक वे मोदी को नापंसद करते हैं तो इससे किसी को ऐतराज नहीं हो सकता। मोदी की नीतियों की आलोचना भी गैरवाजिब नहीं है। लेकिन यह कहना कि मोदी धर्मनिरपेक्ष नहीं हैं और उन्होंने अल्पसंख्यकों को सुरक्षित महसूस कराने के लिए कुछ नहीं किया यह जरुर आपत्तीजनक और हैरान करने वाला है। सेन की सोच बताती है कि वे उन्हीं लोगों के विचारों से प्रभावित हैं जो तुष्टिकरण को धर्मनिरपेक्षता का पर्याय मानते हैं। यह तथ्य है कि मोदी के एक दशक के शासन में गुजरात में एक भी दंगा नहीं हुआ और आज की तारीख में यहां के अल्पसंख्यकों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति बिहार और पश्चिम बंगाल समेत देश के अन्य सभी राज्यों से बेहतर है। गुजरात के मुसलमान अपने को सर्वाधिक सुरक्षित महसूस करने की उदघोषणा कर्इ बार कर चुके हैं। गत विधानसभा चुनाव में उन्होंने मोदी का समर्थन भी किया। यह तथ्य प्रमाणित करता हैं कि मोदी धर्मनिरपेक्ष हैं और अल्पसंख्यकों को लेकर उनके मन में किसी तरह का दुराग्रह नहीं है। लेकिन विचित्र है कि इसके बावजूद भी उन्हें बार-बार सांप्रदायिकता की शूली पर लटकाकर उनसे धर्मनिरपेक्ष होने का प्रमाण मांगा जा रहा है? आखिर क्यों? क्या यह उनके साथ ज्यादती और गुजरात की जनता का अपमान नहीं है? जहां तक 2002 के गुजरात दंगे का सवाल है तो उस आधार पर भी मोदी को सांप्रदायिक नहीं कहा जा सकता। इसलिए कि देश में इससे भी भीषण दंगे हुए हैं और हजारों लोग मारे गए हैं। लेकिन क्या अमत्र्य सेन जैसे लोग कभी इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों को सांप्रदायिक कहने की हिम्मत दिखाए हैं? अगर नहीं तो फिर गुजरात दंगे की आड़ में मोदी को सांप्रदायिक कहने का क्या मतलब है? धर्मनिरपेक्ष होने के दो पैरामीटर नहीं हो सकते। उचित होता कि अमत्र्य सेन जैसा महान अर्थशास्त्री मोदी को  धर्मनिरपेक्षता की कसौटी पर कसने के बजाए भारत की बदहाल अर्थव्यवस्था को पटरी पर चढ़ाने में अपने ज्ञान का इस्तेमाल करते। कितना अच्छा होता कि यूपीए सरकार और कांग्रेस के नुमाइंदे अमत्र्य सेन के कंधे पर बंदूक रख मोदी को टारगेट करने के बजाए सेन के अर्थज्ञान का लाभ उठाते। लेकिन यहां सब कुछ उल्टा-पुल्टा हो रहा है। अर्थशास्त्र के ज्ञानी सांप्रदायिकता पर भाषण दे रहे हैं और जाति और वंशवाद की राजनीति करने वाले धर्मनिरपेक्षता का पैमाना गढ़ रहे हैं। ऐसे में सवाल तो उठेगा ही कि जब बदहाल भारतीय अर्थव्यवस्था की वैशिवक आलोचना हो रही है, रेटिंग एजेंसियां लगातार सरकार की नाकामी पर सवाल दाग रही हैं, निवेशक अपनी पूंजी बाजार से खींच रहे हैं और महंगार्इ छलांग लगा रही है तो अमत्र्य सेन इसपर टिप्पणी करने के बजाए मोदी की धर्मनिरपेक्षता पर वितंडा खड़ा क्यों कर रहे हैं? एक श्रेष्ठ अर्थशास्त्री होने के नाते उनका धर्म है कि वे अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए मंत्र सुझाएं। लेकिन उनकी चुप्पी हैरान करने वाली है। वामपंथी विचारधारा से उर्जा पाने वाले अमत्र्य सेन तब भी चुप रहे जब पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार सिंगूर और नंदीग्राम में किसानों के खून से होली खेल रही थी।  आखिर क्यों? एक हिटलरशाही सरकार का समर्थन आखिर किस तरह की धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक शूरवीरता का प्रमाण है? मोदी को कठघरे में खड़ा करने वाले अमत्र्य सेन को हिंसक माओवादियों के कुकृत्यों से भी परहेज नहीं है। उन्होंने आज  तक एक बार भी उनकी आलोचना नहीं की है। हद तो तब हो गयी जब वे माओवादी समर्थक विनायक सेन के पक्ष में अभियान चलाते देखे गए। क्या ऐसे में अमत्र्य सेन की विवादास्पद टिप्पणी पर सवाल नहीं उठना चाहिए? सच तो यह है कि अमत्र्य सेन में सच को स्वीकारने का माददा ही नहीं है। दुर्भाग्य है कि देश में ऐसे ही लोगों को बौद्धिक और महान बता इनके सिर सेक्यूलर होने का ताज रखा जा रहा है। यह एक खतरनाक स्थिति है। छदम धर्मनिरपेक्षता कभी भी देश व समाज के हित में नहीं होता। अमत्र्य सेन ने साक्षात्कार में यह भी कहा है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश के पास बड़ा दृष्टिकोण है और वे शिक्षा और स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दे रहे हैं। दूसरी ओर उन्होंने गुजरात माडल से असहमति जताते हुए गुजरात में स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में बहुत कुछ किए जाने की बात कही है। बेशक मोदी सरकार ने शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बेहतरीन काम नहीं किया है तो उसकी आलोचना होनी चाहिए। यह अधिकार अमत्र्य सेन को भी है। लेकिन गुजरात माडल की तुलना बिहार माडल से करना एक अलग किस्म की राजनीतिक सड़ांध पैदा करती है। दो राय नहीं कि नीतीश ने बिहार में बेहतरीन काम किया है और उसकी सराहना होनी चाहिए। लेकिन जिस अंदाज में अमत्र्य सेन ने बिहार की शिक्षा और स्वास्थ्य को उम्दा बताकर मोदी को नीचा दिखाने की कोशिश की है यह उन जैसे व्यक्तित्व को शोभा नहीं देता। बिहार में शिक्षा और स्वास्थ्य कितना उम्दा है उसकी बानगी मिल चुकी है। अभी पिछले दिनों ही सारण जिले में 23 बच्चे मीड मील खाकर मौत के मुंह में चले गए। अगर बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध होती तो कर्इ बच्चों की जान बच सकती थी। सवाल अब यह कि क्या अमत्र्य सेन के दावे में दम है? या किसी के इशारे पर मोदी को खलनायक साबित करने की कोशिश कर रहे हैं?

    अरविंद जयतिलक
    अरविंद जयतिलकhttps://www.pravakta.com/author/arvindjaiteelak
    लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं और देश के प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में समसामयिक मुद्दों पर इनके लेख प्रकाशित होते रहते हैं।

    3 COMMENTS

    1. वैसे भी अर्थशास्त्र में नोबेल का कोई विशेष महत्व नहीं है. अर्थशास्त्र की गूढ़
      पेंचों से किसी का कोई फायदा नहीं हुआ. हमलोग सेन को बेकार ही इतना
      महत्व दे रहे है. यह बेकार आदमी है. भारत आ कर भांजता है. वह अपने को
      atheist मानता है. उसकी बीबी विदेशी है.

    2. amartya sen ka अर्थशास्त्र शोसन पर आधारित है . अथाह हमारे लिए तूच है. कभी हमारे साहित्य के दुसरे नोबेल पुरुस्कार विजेता को भी yad कर ले.

    3. आल्फ्रेड नोबेल स्वयं कह गए हैं,
      — ” प्राईज़ का उद्देश्य राजनैतिक ही है, जिससे कुछ दबाव बनाया जाए।”
      इस लिए, अमर्त्य सेन के नोबेल प्राईज़ को कितना महत्व दिया जाए?
      उत्तर में निम्न तथ्य आपको कुछ अनुमान करा देंगे।
      कुछ सच्चाइयाँ भी जान ले।
      (१)
      प्रेसिडेंट ओबामा को कुछ महीने ही प्रेसिडेंट रह चुकने पर नोबेल प्राईज़ मिलने के पीछे राजनीति नहीं कहना नितांत गलत ही होगा।
      (२)
      अब तक ११९ पिस प्राईज़ दिए जा चुके हैं, उनमें से केवल १५ महिलाओं को दिए गए हैं।
      (३)
      उसी प्रकार १९७३ में सेक्रेटरी ऑफ स्टेट हेन्री किसींजर को और विएतनामी (Le Duc) ले डुक को।

      जब आल्फ्रेड नोबेल स्वयं कह गए हैं,
      — ” प्राईज़ का उद्देश्य राजनैतिक ही है, जिससे कुछ दबाव बनाया जाए।”

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here

    * Copy This Password *

    * Type Or Paste Password Here *

    11,724 Spam Comments Blocked so far by Spam Free Wordpress

    Captcha verification failed!
    CAPTCHA user score failed. Please contact us!

    Must Read