आदिवासी संस्कृति को संजोते 70 वर्षीय शिव सिंह आंचला

देवलाल नरेटी

भारत विश्‍व के उन चुनिंदा देशों में एक है जहां आज भी आदिकाल की संस्कृति की झलक न सिर्फ जिंदा है बल्कि उसका प्रचार प्रसार भी हो रहा है। अपनी महान संस्कृति को संजोये आदिवासी समाज वक्त के साथ कदम से कदम मिलाकर निरंतर आगे बढ़ने को प्रयासरत हैं। प्राकृतिक संपदा से भरपूर छत्तीसगढ़ आदिवासी बहुल राज्य है। यहां आदिवासियों की विभिन्न जातियां निवास करती हैं। इनमें गोंड और हल्बी प्रमुख है। जनसंख्या की दृष्टि से गोंड सबसे बड़ा आदिवासी समूह है। वैसे तो यह राज्य के सभी अंचलों में निवास करते हैं परंतु दक्षिण क्षेत्र बस्तर में इनकी संख्या बहुल है। गोंड जनजातियां अपने सांस्कृतिक एवं सामाजिक जीवन के लिए महत्वपूर्ण समझी जाती हैं। इनकी समृद्ध विरासत पर अनेकों षोध किए जा चुके हैं। इसी विरासत को संजोने और आने वाली पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए सत्तर वर्शीय वृद्ध शिव सिंह आंचला सक्रिय भूमिका अदा कर रहे हैं।

 

सेवानिवृत शिक्षक श्री आंचला राजधानी रायपुर से करीब 240 किमी दूर कांकेर जिला के दुर्गकोंदल ब्लॉक स्थित दमकसा गांव के रहने वाले है। जबतक शिक्षक की नौकरी में रहे छात्रों को किताबी बातों के साथ साथ मौलिक और नैतिक शिक्षा का भी ज्ञान देते रहे। इस दौरान उन्होंने छात्रों की एक ऐसी पीढ़ी तैयार की जो आदिवासी समाज और संस्कृति का दपर्ण बन चुका है। इनसे शिक्षा प्राप्त किए बहुत से छात्र आज सरकारी सेवा में पहुंच कर न सिर्फ अपने समाज बल्कि क्षेत्र का नाम रौशन कर रहे हैं। शिक्षा के क्षेत्र में उनके इस अविस्मरणीय कार्य के लिए राज्य सरकार ने रायपुर में एक भव्य कार्यक्रम में उन्हें प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित भी किया है।

 

गुरू शिश्य की परंपरा को बखूबी निभाते हुए श्री आंचला सेवानिवृत हुए। सेवा से मुक्त होने के बाद इन्होंने अपना जीवन गोंडी भाषा और संस्कृति के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया है। श्री आंचला कहते हैं कि उन्होंने गोंडी समाज की विलुप्त होती संस्कृति, घोटुल प्रथा, बोली, भाशा और महोत्सव के प्रचार प्रसार को ही एकमात्र लक्ष्य माना है। इसके लिए उन्होंने दमकसा में ही एक ऐसे आश्रम का निर्माण किया है जहां गोंडी समाज के युवक-युवतियों को समुदाय के इतिहास और संस्कृति से परिचित कराया जाता है। गौरतलब है कि गोंडी समाज की संस्कृति भारतीय संस्कृति का ही आईना है। जहां अतिथि को देव के समान सम्मान दिया जाता है। पश्चिमी सभ्यता के विकार के बावजूद आज भी इस समाज के लोग मेहमानों का स्वागत उनका पैर धोकर और तिलक लगाकर करते हैं। शिव सिंह आंचला का कहना है कि उन्होंने कभी भी पश्चिमी अथवा ऐसी किसी शिक्षा का विरोध नहीं किया जो मनुष्य के ज्ञान का विकास करता है। बल्कि उनका प्रयास रहता है कि गोंड समाज की युवा पीढ़ी आधुनिक शिक्षा में भी पारंगत हो, परंतु इसके लिए अपनी परंपरागत संस्कृति की बलि देना जरूरी नहीं है। उन्होंने कहा कि ‘‘गोंडी भाषा और संस्कृति की पहचान मिटती जा रही है। जिसे बचाना मैं अपना प्रथम कर्तव्य समझता हूं।‘‘ इसके लिए वह इस पूरे क्षेत्र में रथ यात्रा निकालकर अलख जगाने का कार्य कर रहे हैं।

 

सादगीपूर्ण जीवन जीने वाले शेर सिंह आंचला छत्तीसगढ़ प्रदेश के गोंडी धर्माचार्य भी हैं। इसके साथ साथ वह एक कुशल वैद्य भी हैं और जड़ी-बूटी के माध्यम से कई गंभीर रोगों का सफल इलाज भी करते हैं। दमकसा स्थित इनके आश्रम में विभिन्न प्रजाति के दुलर्भ वनस्पतियां मिल जाती हैं। इलाके में उप स्वास्थ्य केंद्र मौजूद होने के बावजूद कई बार लोग प्राकृतिक इलाज के लिए इन्हीं के पास आते हैं। दूसरे आदिवासी समुदाय की तरह गोंड भी पर्यावरण प्रेमी होते हैं और इन्हें देवी देवता का स्थान देते हैं। पर्यावरण संरक्षण के प्रति इनकी चिंता को इसी से समझा जा सकता है कि गांव वाले वनों की सुरक्षा का जिम्मा स्वंय संभालते हैं और प्रति परिवार एक पेड़ की रक्षा करता है। यदि किसी भी अनाआवश्य क कारणों से उसने पेड़ काटा तो पूरी पंचायत उसे सजा सुनाती है। सजा के तौर पर उसे एक पेड़ के बदले दस पेड़ लगाने होते हैं। पर्यावरण सरंक्षण के लिए षेर सिंह आंचला भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे हैं। उन्होंने गोंड समाज की पूज्नीय और भाषा की जननी देवी जंगो रायतार के नाम पर ‘जंगो रायतार विद्या केतुल‘ की स्थापना की है। पांच एकड़ में बनी एक प्रकार की नर्सरी उनकी निजी भूमि थी जिसे उन्होंने समाज के लिए समर्पित कर दिया। यहां विविध प्रकार के दुलर्भ पेड़ पौधे, वनस्पतियां, कंकड़ पत्थर और जड़ी बूटियों का सरंक्षण और उत्पादन किया जाता है। इस कार्य के लिए श्री आंचला और उनके परिवार ने अपनी ओर से करीब सात लाख रूपये भी खर्च किए हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने वन पर्यावरण को बढ़ावा देने के लिए ‘अंतराष्ट्रीतय दिव्य ज्ञान शोध संस्थान एवं ज्ञान मणि शिक्षा द्वीप विलक्षण विद्यालय‘ की स्थापना का भी विचार कर रखा है। जहां आदिवासी समाज के देवी देवताओं और वनों की महत्ता में दिलचस्पी रखने वालों को प्रशिक्षित किया जाएगा। उन्होंने कहा कि आदिवासी पर्यावरण मित्र रहे हैं क्योंकि वह सदैव पेड़ों-पत्थरों और वनों को अपना भगवान मानते हैं। परंतु पिछले कुछ वर्षों से इन क्षेत्रों में तेजी से हो रही वनों की कटाई इस बात का प्रमाण है कि आदिवासी जीवनदायी अपने भगवान को भूल रहे हैं। शिव सिंह आंचला अपने सपने को मूर्त रूप देने के लिए कई स्तरों पर कार्य को अंजाम दे रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों से क्षेत्र के सामाजिक मुद्दों पर कार्य कर रही गैर सरकारी संस्था चरखा डेवलपमेंट कम्यूनिकेशन नेटवर्क के शम्स तमन्ना कहते हैं कि ‘‘इस उम्र में जब दूसरे सेवानिवृत होकर घर में आराम करते हैं ऐसे में समाज और पर्यावरण के प्रति श्री आंचला के प्रेम और सेवा को देखकर यही कहा जा सकता है कि वह 70 वर्षीय युवा हैं।‘‘ आगे बढ़कर दूसरों को मजि़ल दिखाने का जज़्बा रखने वाले श्री आंचला को सरकार से कोई शिकायत नहीं है। उन्हें चिंता इस बात की है किस तरह आने वाली पीढ़ी के लिए पर्यावरण को संरक्षित किया जाए। देर सवेर ही सही उनकी मेहनत अवश्य रंग लाएगी। (चरखा फीचर्स)

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