अकेलेपन की समस्या से जूझता समाज

– ललित गर्ग-
संचार के बढ़ते साधनों के बीच अकेलापन आधुनिक जीवन की त्रासदी बनती जा रही है। विडम्बनापूर्ण एवं भयावह अकेलापन आधुनिक जीवन की एक बड़ी सच्चाई है। यह न केवल भारत की समस्या है बल्कि दुनिया भी इससे त्रस्त एवं पीड़ित है। समस्या इतनी बड़ी है कि इससे निपटने के लिए ब्रिटिश सरकार ने तो बाकायदा एक मंत्रालय ही गठित कर लिया है।
अकेलापन जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप है और दुर्भाग्यवश ऐसे अभिशप्त लोगों की संख्या में दिन-प्रतिदिन बढ़ोत्तरी होती जा रही है। इसमें जीवन के हर जाति, आयु, वर्ग के स्त्री-पुरुष शामिल हैं। अकेलेपन की त्रासदी भोगने वाले इस समूह में सिर्फ वे लोग नहीं हैं जो किसी कारणवश अकेले रहने को मजबूर है, बल्कि वे लोग भी हैं जो परिवार के साथ रहते हुए, कार्यस्थल पर भरेपूरे माहौल में एवं भीड़ के बीच भी खुद को अलग-थलग और अकेला महसूस करते हैं एवं अपने को बेहद तन्हा पाते हंै।
अकेलेपन की समस्या विश्वव्यापी है। यह आधुनिक जीवन की देन है। जिसमें समाज ‘हम’ से ‘मैं’ पर आ गया है। व्यस्तताएं कुछ इस कदर बढ़ गई हैं कि मित्रों के लिए क्या, परिवार के सदस्यों के लिए भी क्या, अपनी जीवनसंगिनी के साथ जीवन में स्थान बना पाना कठिन हो गया है। आज जीवन की पूरी जद्दोजहद खुद के लिए है, शेष सारे रिश्तें एवं खुशियां गौण हो गई हैं। इसी समस्या से जूझते ब्रिटिश में, इस समस्या को लेकर वहां की प्रधानमंत्री टरीजा बहुत गंभीर है। उनका का कहना है कि मैं अपने समाज के लिए इस समस्या का सामना करना चाहती हूं। अकेलेपन की समस्या कितनी भयावह है, इस ओर सांसद जो कॉक्स ने सम्पूर्ण ब्रिटेन का ध्यान खींचा था। उन्होंने एक कमिशन गठित किया था, जिसका मकसद इस समस्या का आकलन करना और इसे दूर करने के उपाय ढूंढना था। इसी आयोग ने अकेलापन मंत्रालय गठित करने का सुझाव दिया था। दुर्भाग्य से 2016 में दक्षिणपंथी उग्रवादियों ने कॉक्स की हत्या कर दी। आंकड़ों के मुताबिक वहां हर दस में एक से ज्यादा लोग इस समस्या से जूझ रहे हैं। 75 साल से ज्यादा उम्र के ज्यादातर लोग वहां अकेले रहते हैं और दो लाख की आबादी ऐसी है जिसे किसी मित्र या रिश्तेदार से बात किए महीना गुजर जाता है। वहां ज्यादातर डॉक्टरों के पास रोजाना एक से पांच मरीज सिर्फ इसीलिए आते हैं क्योंकि वे अकेले होते हैं। यह स्थिति तकरीबन सभी विकसित देशों की है।
बात केवल ब्रिटेन की ही नहीं है, पूरी दुनिया और भारत भी इस समस्या से पीड़ित हैं। भारत में संयुक्त परिवारों के विघटन और एकल परिवारों के चलन ने इस समस्या को बढ़ावा दिया है। हम कहने को तो युवा देश हैं, लेकिन अपने यहां बुजुर्ग आबादी तेजी से बढ़ रही है। अगर आंकड़ों की बात करें तो 60 से 70 आयु वर्ग के लोगों की संख्या इसमें सबसे ज्यादा है। हाल के वर्षों में 60 साल से ज्यादा उम्र के लोगों की आबादी जनसंख्या वृद्धि की सामान्य दर के मुकाबले दोगुना तेजी से बढ़ी है। फिलहाल इस श्रेणी के लोगों की कुल संख्या 10 करोड़ बताई जाती है, लेकिन अनुमान है कि 2050 तक कुल जनसंख्या का चैथाई हिस्सा बुजुर्ग लोगों का होगा। इनमें शहर और खासकर महानगरों में रहने वाले लोग ज्यादा हैं। इन शहरों में बच्चे मां-बाप को अपनी सुविधानुसार रहने के लिए तो बुला लेते हैं, पर उन्हें वक्त नहीं दे पाते। ऐसे बुजुर्ग प्रायः अपना अकेलापन दूर करने के लिए अत्यन्त लोकप्रिय हो रही सोशल नेटवर्किंग साइट का सहारा लेते हैं और उसी के इर्द-गिर्द अपनी दुनिया बसा लेते है। ये बुजुर्ग देर रात तक अपने आप को इसमें व्यस्त रखते हैं। अकेलेपन से जूझते इन बुजुर्गों की तकलीफ समझने के लिए किसी आंकड़े की जरूरत नहीं है। अपने बाल-बच्चों की जिंदगी से दूर पड़े ये लोग गली-मुहल्लों में जानवरों पर प्यार लुटाते नजर आते हैं, हालांकि उनसे इनकी समस्या नहीं सुलझती, असुरक्षा नहीं दूर होती। सबसे बड़ी बात यह है कि अपने देश में अकेलेपन की यह भीषण समस्या बुजुर्गों तक सीमित नहीं है, महिलाएं और युवक भी इसके शिकार हैं। करियर संवारने की कोशिश में अपने मां-बाप, भाई-बहन से दूर महानगरों में जाकर रहने वाले बहुतेरे युवा भी अकेलेपन से पीड़ित एवं परेशान हैं। इस तरह भारत भी अकेलेपन की समस्या से जूझ रहा है, दुर्भाग्यवश हमारे देश में भी यह समस्या जिस तेजी पांव पसार रही है, उसे देखते हुए कोई-न-कोई उपाय करना ही होगा। लेकिन हमारे यहां का नेतृत्व एवं सरकारें अभी इतनी संवेदनशील नहीं हुई है और उनके सामने दूसरी राजनीतिक लाभ वाली समस्याओं के अंबार भी है, फिर वे कैसे इंसान के अस्तित्व एवं अस्मिता से जुड़ी इस गंभीर समस्या के लिये सोचे?
बड़े होते शहरों ने परिवार के साथ-साथ समाज को भी बहुत छोटा और व्यक्ति को कहीं-न-कहीं अकेला कर दिया है। इसी का नतीजा समाज, परिवार एवं व्यक्ति के जीवन में पसरा अकेलापन है। अब तक लोगों के अकेलेपन से अवासदग्रस्त होने की सूचना आती थी। लगता था कि परिवार छोटा हो रहा है और अकेलापन लोगों को खा रहा है। हालत यह है कि बड़े अपार्टमेंटों और सोसायटियों में रहने वाले लोग यह नहीं जानते कि उनके बगल के फ्लैट में कौन रह रहा है। पढ़ा-लिखा और आधुनिक माना जाने वाला इंसान किस तरह केवल अपने परिवार से नहीं, अपने आप तक से कट रहा है। यह अकेलापन अनेक विसंगतियों एवं विडम्बनाओं का कारण भी बन रहा है। अनेक हिंसक एवं अनहोनी घटनाएं इसकी निष्पत्ति के रूप में सामने आ रही है, जो डराती भी है और अनेक प्रश्न भी खड़े करती है। बड़ा प्रश्न तो यही है कि खाते-पीते लोगों को उनका अकेलापन कहां ले के जा रहा है? अकेलेपन के अपने बनाए दायरे ने परिवार के अंदर भी एक दीवार खड़ी कर दी है। इस तरह का एकाकीपन सभी सुविधाओं से संपन्न रिहाइशी इलाकों के बाशिंदों में ज्यादा दिख रहा है। खाते-पीते तबकों में अपनों के साथ की कमी का भाव खुद के प्रति विद्रोह पैदा कर देता है। अपना ही अस्तित्व बेगाना लगने लगता है। सवाल है मन की ग्रंथियों में ये भाव कहां से घुसपैठ कर लेते हैं कि कोई अपने प्रति भी इतना बेहरम हो जाता है?
दरअसल, महानगरों में बच्चों के पालन-पोषण के जो तरीके अपनाए जा रहे हैं, उनमें हैसियत का तत्त्व सबसे ऊपर होता है। लेकिन उसमें जो आभिजात्य फार्मूले अंगीकार किए जाते हैं, किसी बच्चे के एकांगी और अकेले होने की बुनियाद वहीं पड़ जाती है। आज यह वक्त और समाज की एक बड़ी और अनिवार्य जरूरत मान ली गई है कि एक आदमी एक ही बच्चा रखे। एकल परिवार के दंपत्ति इस बात को लेकर बेपरवाह रहते हैं कि वे अपने छोटे परिवार के दायरे से निकल कर बच्चों को अपना समाज बनाने की सीख दें। काम के बोझ से दबे-कुचले माता-पिता डेढ़ साल के बच्चे को ‘कार्टून नेटवर्क’ की रूपहली दुनिया के बाशिंदे बना देते हैं या आया के भरोसे या फिर क्रेच के हवाले कर देते हैं। बच्चे के पीछे ऊर्जा खर्च नहीं करनी पड़े, इसलिए उसके भीतर कोई सामूहिक आकर्षण पैदा करने के बजाय उसकी ऊर्जा को टीवी सेट में झोंक देते हैं। इसी टीवी में बड़ी हुई पीढ़ी कैसी बहकी-बहकी कहानियां गढ़ती है?
वह ऐसा क्यों नहीं होगा? उसकी दुनिया को समेटते हुए क्या हमें इस बात का भान भी हो पाता है कि हमने उसे इस दुनिया से कैसे काट दिया। होश संभालते ही जिस बच्चे को अपने साथी के रूप में ‘टॉम-जेरी’ और ‘डोरेमॉन’ मिला हो, वह क्यों नहीं आगे जाकर अपने मां-बाप से भी कट जाएगा? हम तथाकथित आधुनिक मां-बाप बच्चे को पूरे समाज से काटते हुए बड़ा बनाते हैं। उसके पास अपना कहने के लिए सिवा अपने मां-बाप के अलावा और कोई नहीं होता। और जब वही मां-बाप साथ छोड़ देते हैं तो वह अपने को निहायत बेसहारा महसूस करने लगता है। अपने घर की चारदीवारी को ही अपनी जीवन की सीमा का अंत मान लेता है।
यह अकेलापन इंसान को जीते-जी मार देता है। बर्नार्ड शाॅ के मुताबिक ‘लोग मरते तो बहुत पहले हैं, लेकिन दफनाए बहुत बाद में जाते हैं। मरने और दफनाते के बीच का यह फासला ही अकेलापन की त्रासदी हैं, जिसमें आदमी घूट-घूट कर मरता हैं। अकेलेपन का कारण मन है। लेखिका जेम्स एलेन ने लिखा है कि व्यक्ति का मानस एक बगीचे की तरह होता है, जिसे चाहें तो आप अपनी सूझबूझ से संवारें या उसे जंगली बन जाने दें। हमारा मन भी नकारात्मक विचारों से भर जाता है तब बीमार हो जाता है, तब अकेला हो जाता है। मनोचिकित्सक मानते हैं कि एक बीमार आदमी तन से अधिक मन से बीमार होता है। अकेलापन एक मानसिक बीमारी है। जुगनू तभी तक चमकता है, जब तक उड़ता है। यही हाल मन का हैं। इसलिये मन को कमजोर न होने दें, मन के द्वारा अपना नजरियां बदलें, अकेलेपन को अभिशाप नहीं, वरदान बनायें। समाज एवं सरकार को मिलकर इस समस्या के समाधान हेतु जागरूक होना होगा, तभी इस अकेलेपन के रोग महात्रासदी बनने से रोका जा सकता है।

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