लेखक परिचय

सुरेश हिन्‍दुस्‍थानी

सुरेश हिन्‍दुस्‍थानी

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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सुरेश हिंदुस्थानी
उत्तरप्रदेश में चल रहा समाजवादी पार्टी का घमासान देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर करारा प्रहार कहा जा सकता है। राजनीतिक पार्टियां लोकतांत्रिक व्यवस्था का भले ही दम भरती हों, लेकिन इस प्रणाली का राजनीतिक दलों के नेता कितना पालन करते हैं, यह कई बार देखा जा चुका है। पूरी तरह से एक ही परिवार पर केन्द्रित समाजवादी पार्टी अलोकतांत्रिक रुप से आगे बढ़ती हुई दिखाई देने लगी है। समाजवादी पार्टी की खानदानी लड़ाई के चलते पिछले कई दिनों से समाचार पत्रों व विद्युतीय प्रचार तंत्र की मुख्य खबर बनी हुई है। प्रचार माध्यम इस खबर को ऐसे दिखा रहे हैं, जैसे देश में और कोई खबर ही न हो। हो सकता है कि यह सब पश्चिम बंगाल में हो रहे बबाल को दबाने का एक षड्यंत्र हो। हम जानते हैं कि पश्चिम बंगाल में पिछले कई दिनों से दंगे जैसे हालात बने हुए हैं। जिसमें हिन्दू समुदाय को परेशान किया जा रहा है।
भारत में वंशवाद की राजनीति का खेल लम्बे समय से चल रहा है, इस प्रकार की राजनीति भारत के लोकतांत्रिक ढांचे पर सवालिया निशान खड़ा करने के लिए काफी है। लोकतंत्रीय व्यवस्था को दरकिनार करते हुए राजतंत्रीय व्यवस्था का संचालन करने वाले कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के नेता इस बात को भूल जाते हैं कि वे लोकतंत्र पर आधारित शासन का संचालन करते हैं। हम जानते हैं कि भारत की वास्तविक सत्ता जनता है, और वह अपने द्वारा ही अपने लिए शासन करती है। चुने हुए नेता जनता के प्रतिनिधि हैं। यानी मुख्यमंत्री और मंत्री या सांसद और विधायक वास्तव में जनता के सेवक हैं। जबकि हमारे देश में इसके विपरीत ही दिखाई देता है। लोकतंत्र की परिभाषा को परे रखकर हमारे राजनेता अपने परिवार को बढ़ाने का ही खेल खेलते हुए दिखाई देते हैं। हालांकि भारतीय राजनीति में वंशवाद को बढ़ावा देने वाला मुलायम सिंह यादव इस प्रकार की राजनीति करने का अकेला उदाहरण नहीं है। हर राज्य में और केंद्र की राजनीति में भी ऐसे अनेक परिवार हैं, जो कई पीढ़ी से राज भोगते आ रहे हैं। किसी लोकतंत्र में वंशवाद की यह राजनीति एक बड़ा प्रश्न खड़ा करती है, परंतु दिक्कत यही है कि सैकड़ों साल तक गुलामी का दंश झेलते-झेलते भारत का आम जनमानस इसे किसी बुराई की तरह देखना और मानना ही भूल गया है। किसी के दादा मुख्यमंत्री थे। फिर पिता बने और उनके बाद पोते को भी मुख्यमंत्री बनने का मौका मिल गया। यह व्यवस्था वास्तव में राजतंत्रीय पद्धति को ही बढ़ावा देते हुए दिखाई देती है। जनप्रतिनिधि बनने के बाद राजनेताओं के परिवार की कई पीढिय़ां सत्ता सुख के सहारे अपना भविष्य बना लेती हैं। इनके लिए देश का हित कतई मायने नहीं रखता। आज हमारा देश ऐसे ही कारनामों की वजह से विश्व के कई देशों से बहुत पीछे होता जा रहा है।
वर्तमान में उत्तरप्रदेश में जिस प्रकार की राजनीति का प्रादुर्भाव होता दिख रहा है। उसकी भनक बहुत पहले से ही मिलने लगी थी, लेकिन फिर पहले जैसे ही सवाल उठने लगे हैं कि क्या राजनीति में कोई नैतिक सिद्धांत बचे हैं या फिर अपने स्वार्थ की बलिबेदी पर नैतिकता की राजनीति एक बार फिर से कुर्बान होने की ओर अग्रसर होती जा रही है। हालांकि इस प्रकार के दृश्य पूर्व में भी कई बार देखे जा चुके हैं कि सत्ता प्राप्ति के लिए राजनीतिक दलों ने बेमेल गठबंधन किए हैं। समाजवादी पार्टी के वर्तमान हालात कमोवेश ऐसे दिखाई दे रहे हैं कि उसके साथ वर्षों तक राजनीति करने वाले महारथी आज सपा से उतरने का मन बना रहे हैं। खबरें यह भी आ रही हैं कि समाजवादी पार्टी के कई बड़े राजनेताओं का आज अपनी ही पार्टी से मोहभंग होता हुआ दिखाई दे रहा है। स्वयं मुलायम सिंह के घर में समाजवादी पार्टी की ओर से दो प्रत्याशी मैदान में ताल ठोकते हुए दिखाई दे रहे हैं।
राजनीति में कब क्या हो जाए कुछ भी नहीं कहा जा सकता। उत्तरप्रदेश में डूबे हुए जहाज की परिभाषा को शत प्रतिशत चरितार्थ करने वाली कांग्रेस के समक्ष इधर कुआ तो उधर खाई जैसी स्थिति बनती हुई दिखाई दे रही है। बाहर से आयात किए गए नेताओं के सहारे के बाद भी उसकी नैया पार होती हुई नहीं दिखाई दे रही। इसके अलावा करोड़ों रुपए व्यय करने के बाद चुनावी रणनीति को अंजाम देने वाली पीके टीम भी अब कांग्रेस से दूर भागती हुई दे रही है। अपनी वाहवाही लूटने की गरज से वह समाजवादी पार्टी से गठबंधन करने के लिए उतावले होते दिखाई दे रहे। इससे ऐसा ही लगता है कि पीके टीम की देश में जो छवि बनी हुई है उसे बरकरार बनाए रखने के लिए ही येनकेन प्रकारेण कांग्रेस की सीटों की संख्या में विस्तार देखना चाह रहे हैं। वर्तमान में प्रशांत किशोर की राजनीतिक टीम को संभवत: यही लग रहा होगा कि कांग्रेस के रणनीतिक कौशल की जिम्मेदारी लेने में उसने भूल कर दी।
समाजवादी पार्टी के बारे में राजनीतिक अध्ययन किया जाए तो शायद यही कहना तर्कसंगत होगा कि उसके सामने भी भविष्य को लेकर कई प्रकार के अनसुलझे सवाल खड़े होते हुए दिखाई दे रहे हैं। ताजा सर्वेक्षणों से उपजी राजनीतिक स्थितियों के कारण समाजवादी पार्टी के भविष्य को लेकर असमंजस पैदा हो रहा है। यह तो समझ में आता है कि कांग्रेस अपने राजनीतिक पुनरुत्थान के लिए किसी सहारे की तलाश करने के लिए उतावली हो रही थी, उसे होना भी चाहिए, लेकिन समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव गुट के समक्ष भी आज लगभग कांग्रेस जैसी ही स्थिति बनती हुई दिखाई दे रही है। वह स्वयं भी गठबंधन की दिशा में बढ़ते हुए दिखाई दे रहे हैं। इससे यह साफ पता चलता है कि समाजवादी पार्टी का कोई भी गुट हो अपने अकेले दम पर वह इज्जत बचाने लायक सीट प्राप्त नहीं कर सकती। पिछले कई चुनावों में यह साफ देखा गया है कि जो भी राजनीतिक दल कांग्रेस के साथ गया, वहां पर कांग्रेस का तो भला नहीं हुआ, साथ ही साथी दल को भी अस्तित्वहीन कर दिया। तमिलनाडु में जो कुछ हुआ, वह सबको याद होगा ही। वहां तमाम राजनीतिक आंकलनों ने करुणानिधि और कांग्रेस के गठबंधन को बहुमत दिया था, लेकिन जब परिणाम सामने आए तो कांग्रेस करुणानिधि को भी ले डूबी।
समाजवादी पार्टी का चुनाव चिन्ह साइकिल किसको मिलेगा फिलहाल यह बहुत बड़ा सवाल है। लेकिन सपा के दोनों गुटों ने अपने अपने विकल्प तलाश कर लिए हैं। यह समाजवादी पार्टी की राजनीतिक चाल भी हो सकती है कि चुनाव से पूर्व प्रदेश के छोटे दलों को अपने पाले में कर लिया जाए। इससे सपा की ताकत बढ़ेगी। सपा के दोनों गुटों के अलग अलग चुनाव लडऩे की स्थिति में वोटों का विभाजन होगा और सपा एक दम से कमजोर होती जाएगी। इसी आशंका को ध्यान में रखते हुए ही सपा ने कांग्रेस सहित अन्य कई दलों की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया है।
मुलायम सिंह के परिवार में चल रही लड़ाई के बारे में अध्ययन किया जाए तो यही दिखाई देता है कि इस घमासान में केवल उन्ही के परिवार का हित और अहित है, इस लड़ाई से आम जनता को कोई सरोकार नहीं है, फिर भी हमारे देश के प्रचार माध्यम इस लड़ाई को ऐसे प्रस्तुत कर रहा है, जैसे इसी खबर से देश का सब कुछ लेना देना हो। वास्तव में प्रचार माध्यमों को ऐसी सभी खबरों से दूर रहना चाहिए, जिससे केवल एक ही परिवार को बढ़ावा मिल रहा हो। हालांकि देश में जिस प्रकार की पत्रकारिता की जा रही है, उससे यही संकेत मिलता मिलता है कि इस प्रकार की खबरें समाज के सामने परोसना उनकी मजबूरी बन गई हो। इसके पीछे कई प्रकार के निहितार्थ भी हो सकते हैं। कहने वाले तो यह भी कहते हुए दिखाई दे रहे हैं कि इसके पीछे बहुत बड़ा लेनदेन का खेल चल रहा है। एक चैनल के संवाददाता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि हमने परिश्रम करके समाजवादी पार्टी के विरोध में एक खबर भेजी, लेकिन वह किसी कारण से प्रसारित न हो सकी। आज के समय में ऐसे कारणों की तलाश करना बहुत जरुरी है। देश में वास्तव में लोकतंत्र का शासन है तो फिर प्रचार और प्रसार माध्यमों को भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि सुर्खियों बटोरने की कवायद के चलते कहीं हम अपने देश के सांस्कृतिक और लोकतांत्रिक ताने बाने को नजरअंदाज तो नहीं कर रहे। राजनीतिक दलों के साथ ही देश के प्रचार माध्यमों को यह भी ध्यान रखना है कि जनता जब किसी को सत्ता सौंप सकती है तो वह सत्ता से उतार भी सकती है। उत्तरप्रदेश में निकट भविष्य में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, जनता सब कुछ देख रहीं हैं। चुनाव के बाद यह पता चलेगा कि प्रदेश की जनता किसे प्रदेश की सत्ता सौंपेगी।
सुरेश हिंदुस्थानी

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