व्यंग्य/ आ वोटर, जूते मार!!

cap1उनका भाषण था कि समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रहा था। एक घंटा…. दो घंटे… यार क्या इस बंदे ने एक ही जगह चुनावी रैली को संबोधित करना होगा? हद है यार, पानी पर पानी पिए जा रहा है और जो मन में आए बकी जा रहा है।’….मैं हूं ही इसी काबिल, चाहे तो मुझे जूते मारो।’ पर सभी न जाने कहां खोए हुए।

अपनी पार्टी की उपलब्धियों को गिनाने के बदले यार ये तो विपक्ष की पार्टियों की उपलब्धियों को भी गिनाने लग गया। कहीं ऐसा तो नहीं कि भीड़ के पैसे विपक्ष से भी ले लिए हों और हमें एक के ही पैसे दे दूसरे पैसे मार गया हो? नेता जी थे कि बिना लगाम के घोड़े की तरह दौड़े जा रहे थे।

‘….आप मुझे जूते भी मारेंगे तो मैं हसंके सह लूंगा।’ पर सबके सब बुत की तरह। किसीने जूता मारना तो दूर, अपने जूते की ओर देखा भी नहीं।

वे कहते-कहते बीच बीच में इधर-उधर कुछ देखते और फिर चेहरे का पसीना पोंछ निराश हो बकने लग जाते। हद है यार! इतना कुछ बकने के बाद भी कहीं से जूता आने की कोई उम्मीद नहीं। किराए पर जो बड़ी मुश्किल से भाषण सुनने के लिए लाए थे अब वे भी बोर हो चले थे। भाषण सुनने के पैसे ही दिए है तो यार इसका मतलब ये तो नहीं होता कि जो मर्जी हो सुनाए जाओ, जितना मर्जी हो सुनाए जाओ। ऐसा तो नहीं था कि वे लोग पहली बार किसी का भाषण सुनने के लिए किराए पर आए हों। बूढ़े हो गए यार चुनाव के दिनों में भाषण सुनने के लिए किराए पर जाते हुए।

‘यार ये बंदा कर क्या रहा है? इसके वर्कर ने तो कहा था कि बस आधे घंटे की बात है पर ये तो रूकने का नाम ही नहीं ले रहा है। साला जीतने से पहले ही शोषण शुरू! काम चार घंटे का और पगार आधे घंटे की। अब दूसरी जगह इतनी जल्दी कैसे पहुंचूगा।’

‘क्या कहूं यार! मैं भी फंस गया। अब साली बीच में उठते हुए भी शरम सी लग रही है। उसको तो शरम आ नहीं रही।’

‘मन करता है कि जूता उतार कर दे मारूं।’

‘अगली रैली के लिए नंगे पांव जाना है क्या! देखता नहीं कितनी गरमी है। पांव झुलस गए तो? इन दिनों वोटर का और चाहे सब कुछ खराब हो जाए पर पांव सलामत रहने चाहिएं।’

‘तो??’

‘तो क्या! बैठा रह। बाद में हिसाब करेंगे बंदे के साथ। अनपढ़ तो हम भी नहीं।’

पर वे थे कि अभी भी उसी तूफानी वेग में कहे जा रहे थे। बिजली जा चुकी थी। उनके लिए लाया पानी खत्म हो चुका था,पर इस सबकी चिंता थी किस मुए को।

आखिर किराए पर लाए सुनने वालों का धैर्य टूटने लगा। वे एक एक कर खिसकने लगे। सुनने की भी एक हद होती है। माना कि यहां सुनने का मतलब एक कान से सुनना तो दूसरे कान से निकालना है,पर फिर भी बेकार के शोर को सहना ही है। जितने पैसे उन्होंने दिए हैं उससे ज्यादा तो कान साफ करवाने में लग जाएंगे। तो फिर बंदे ने कमाया क्या!

पर वे थे कि उधर इधर देखने के बाद निराश हो कहे जा रहे थे। क्या कहे जा रहे थे ये उन्हें भी मालूम नहीं।

किराए के सुनने वाले एक एक कर आखिर जा उठे। रह गए तो बस सुनने वालों के बीच बीच में बैठे दस बीस नारे लगाने वाले। पर उन्हें उसकी भी चिंता नहीं।

बीच में एक वर्कर ने टोका,’ नेता जी!’

‘हां!! क्या है?’

‘सुनने वाले चले गए। सबके रूमालों से आप पसीना पोंछ चुके।’

‘तो??’ वे फिर निराश हो इधर उधर देखने लगे।

‘अब बस कीजिए, नहीं तो???’

‘पर ये बंदे???’

‘इनमें सभी तो किराए के हैं।’

‘पर टोपी तो इन्होंने हमारी पहन रखी थी।’

‘खोल गए हैं। इनका दूसरी टोपी लगाने का टाइम शुरू हो गया है।’

‘पर यार! खेद है कि मैं इतनी देर हर कुछ बोला और उनमें से एक ने भी…..’

‘एक ने भी क्या…’

‘जूता मुझ पर फेंक कृतार्थ नहीं किया।’ कह उनका रोना निकल आया।

‘आप और जूता …आखिर आप चाहते क्या हैं?’

‘यार जूता खाकर मैं पहले ही चुनाव में नेशनल, इंटरनेशनल लेवल का लीडर होना चाहता हूं। कबसे इंतजार कर रहा हूं कि कोई मुझ पर जूता उछाले।

‘पर सर इन्हें पैसे तो भाषण सुनने के दिए गए थे, जूता उछालने के नहीं। ये बहुत गंदे लोग हैं सर! जितना पैसा दो उतना ही काम करते हैं उससे आगे रत्ती भी नहीं।’

‘तो तुम ही जूता उछाल दो न! पत्रकार कबसे इंतजार कर रहे हैं। इनके आगे मेरी इज्जत तो रख लो प्लीज!’

‘सर, हमने आपका नमक खाया है। हम नमक हलाली कैसे करें?’

उधर पत्रकार थे कि बराबर गुस्सा हुए जा रहे थे,’बेकार में टाइम खराब करवाया। पहले बता देते तो कहीं और जाते।’ वे मुंह लटकाए जा उठे।

वे दोनों हाथ भगवान की ओर जोड़ गिड़गिड़ाए, ‘हे भगवान! आप ही ऊपर से जूता फेंक कृतार्थ कर दो! आप का अहसान मैं सात जन्मों तक नहीं भूलूंगा।’ पर चिलचिलाती धूप में उस वक्त भगवान पता नहीं कहां आराम फरमा रहे थे?

-अशोक गौतम
गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड
नजदीक मेन वाटर टैंक,सोलन-173212 हि.प्र.

1 thought on “व्यंग्य/ आ वोटर, जूते मार!!

Leave a Reply

%d bloggers like this: