लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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डॉ. मधुसूदन उवाच

==>शासकीय मानक शब्दावली

==>मेडिकल टर्मिनॉलॉजी (शब्दावली )

==>संस्कृत छन्द का विशेष गुण,

==>शब्द रचना शास्त्र की झलक

==>दो सौ वर्षों का ग्रहण

अनुरोध: विशेष क्षेत्र से परिचित पाठक टिप्पणी अवश्य करें.

सूचना:तीनों सूचनाए महत्त्वपूर्ण है.

(१) यह आलेख गहराई से, बहुत विचार-मनन-मन्थन-चिन्तन-चर्चा इत्यादि करने के पश्चात ही लिखा गया है. पाठकों से भी वैसी ही अपेक्षा है. ऐसा किए बिना, सांगोपांग समझने में कठिन लग सकता है. आपके समझ में यदि आ जाए, तो मित्रों को भी आमन्त्रित कीजिए. तर्क ही हमें काम आएगा.जितनी जानकारी फैलेगी, जागृति आएगी.

(२)आलेख पर खुलकर प्रश्नों का भी अनुरोध है. यह कुछ विशेषज्ञों के क्षेत्र से संबद्धित भी है. कई दूरभाष (फोन) पर पूछें गये प्रश्नों के उत्तर है.

(३) निरूपित विषय राष्ट्र-भाषा, भाषा-भारती, राज-भाषा, हिन्दी, या प्रादेशिक भाषाएं, सभी को लागू होता है. इसी लिए शीर्षक ”अंग्रेज़ी से (कडी) टक्कर” दो, रखा है. यह लेख हिन्दी सहित सभी भाषाओं के लिए लागू होता है. 

एक : एक प्रश्न

एक प्रश्न बार बार दूरभाष (फोन) पर आता रहा है. प्रश्न है, मेडिकल टर्मिनॉलॉजी (शब्दावली ) कहां से लाओगे? और पहले पाठ्य पुस्तकें तो होनी चाहिए ना ?

शब्द रचना शास्त्र, एक स्वतन्त्र पुस्तक की क्षमता रखता है, इस लिए कुछ ही उदाहरण प्रस्तुत किए जा सकते हैं. कुछ अनुमान हो सके, इस लिए, एक झलक ही दिखाई जा सकती है. पाठ्य पुस्तकों की चर्चा आगे के अलग लेखों में की जाएगी. 

दो : शासकीय मानक शब्दावली पहले परिचित होने के कारण, सहज समझ में आए ऐसी, शासकीय और संविधान एवं समाचार पत्रों में भी प्रयोजी जाती शब्दावली के उदाहरणों से श्री गणेश करते हैं।

आप जानते ही होंगे, कि–

Constitution= संविधान

Law =विधान

Legislation= विधापन

Bill =विधेयक

Illegal =अवैध

Legal= वैध, इत्यादि शब्द अंग्रेजों के साथ ही भारत पहुंचे.

नोट कीजिए, कि, ये सारे अंग्रेजी शब्द एक दूसरे से स्वतंत्र है. Law का अर्थ जानने से Constitution, Legislation, Bill, Illegal, Legal इत्यादि शब्दों का अर्थ जाना नहीं जाता. ये सारे शब्द स्वतंत्र रूप से सीखने पडते हैं, डिक्षनरी में देखने पडते हैं. प्रत्येक का स्पेलिंग और अर्थ रटना पडता है.

किन्तु संस्कृत/हिन्दी पर्याय एक “धा’’ धातु पर “उपसर्ग’’ और “प्रत्यय’’ लगाकर नियमबद्ध रीति से गढे गये हैं. जिसे संस्कृत शब्द सिद्धि की प्रक्रिया की जानकारी है, उसे ये शब्द आप ही आप समझ में आते हैं. यह शब्दावली प्रायः समस्त भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त होती है, कोई अपवाद नहीं जानता. यदि आज किसी को, ऐसे शब्द समझ में नहीं आते, तो यह हमारी संस्कृत के प्रति उपेक्षा का ही परिणाम है. 

वैसे बहुसंख्य भारतीय अंग्रेज़ी भी नहीं जानते, यह सच्चाई है, और सदा के लिए रहेगी ही. आप बहुसंख्य भारत को अंग्रेज़ी पढने-पढाने का कानून नहीं बना सकते, न उन को चिरकाल तक अंधेरे में रहने के लिए बाध्य कर सकते हैं. आप की भाँति वे भी स्वतंत्र हुए हैं. यह अन्याय नहीं किया जा सकता. उन्हें परतंत्रता में कब तक रहना चाहिए?

पर उपरि निर्देशित शब्दों के प्रति-शब्द रचने की, संस्कृत की आश्चर्यकारक क्षमता यदि जान जाएं, तो संस्कृत जैसी भाषा का हमारा गौरव बढे बिना नहीं रहेगा. 

निम्न शब्द समूह देखिये, और उन शब्दों का ध्यान से, निरिक्षण कीजिए. कुछ प्राथमिक संस्कृत की जानकारी ना भी हो, तो बहुतेरे हिंदी के शब्द, संस्कृत के ”धा” धातु पर व्याकरणिक प्रक्रिया से रचे गए हैं. कम से कम ५ आलेखों के बिना इस व्याकरणिक प्रक्रिया को समझाया नहीं जा सकता. पर ध्यान से देखने पर आप जानेंगे कि ये शब्द आपस में अर्थ समझने में भी अवश्य सहायता करते हैं.

जैसे ”धा” के आगे, वि+धा=विधा, फिर उसी से विधान, फिर विधान+सभा=विधान सभा, विधापन, विधायी,विधेय ….. इत्यादि इत्यादि।

शब्दावली ( अर्थ सहित)

यह शब्दावली प्रत्येक भारतीय भाषाओं में, आवश्यकता पडने पर, बनाई गयी थी, जो आज चलन में है. ऐसी संस्कृत जन्य शब्दावली भारत की सभी प्रादेशिक भाषाओं में चल पाती है, यह इसकी विशेषता है.

(१) Lawful, विधिवत,——–(२)Legislation, विधापन,

(३) Legislative,विधायी,——-(४) Legislatable,विधेय

(५) Illegislatable, अविधेय——(६) Lawlessness,विधिहीनता,

(७) Constituition, संविधान,—–(८) Parliament, लोक सभा

(९) Code,संहिता —————-(१०) Law, विधि,

(११) Bill, विधेयक ———–(१२) Lawful, विधिवत,

(१३) Lawless, विधिहीन,——-(१४) Legislative Assembly,विधान सभा

(१५)Act, ——————-(१६) 

इसी प्रकार किसी अन्य विशेष क्षेत्र में भी, ऐसी अर्थ सूचक, और सुसंवादी शब्द रचना, ऐसे ”धातुओं” के आधार पर रची जा सकती है.

नोट कीजिए, कि, अंग्रेज़ी शब्द एक दूसरे से प्रायः स्वतंत्र है. उन के अर्थ आप को डिक्षनरी में देखने पडेंगे हैं. उलटे हिन्दी शब्दावली आप को परस्पर संबद्धित प्रतीत होगी.

यह संस्कृत के शब्द रचना शास्त्र की किमया है. केवल शब्द रचना शास्त्र पर ही कभी विस्तार सहित आलेख डालूंगा. कुछ बिलकुल प्राथमिक जानकारी इस आलेख में उचित अनुक्रम में सम्मिलित की है, देखने-पढने का अनुरोध करता हूँ। 

(तीन) मेडिकल अर्थात चिकित्सा संज्ञाएं

अर्थ सूचक शब्द रचना।

चिकित्सा विषयक शब्द वास्तव में संस्कृत में, अंग्रेज़ी में प्रयुक्त होने वाले शब्दों की अपेक्षा, किसी भी निकषपर कसे जाएं, तो, अत्युत्तम और सरलातिसरल ही है. कुछ मात्रा में ही सरल नहीं बहुत बहुत सरल हैं. कुछ ही उदाहरण देकर स्पष्ट हो जाएगा. ऐसे संक्षिप्त आलेख में क्षमता होते हुए भी अधिक विस्तार करना संभव नहीं.

चिकित्सा की पढाई में सब से कठिन ही नहीं, पर कठिनतम Anatomy के शब्द माने जाते हैं।

आप किसी डॉ. से पूछिए, कि शरीर शास्त्र (Anatomy )एक कठिन(तम) विषय माना जाता है या नहीं? मैं ने छात्रो से पूछकर इसे चुना है. Anatomy के रावण के कपाल पर ही गदा प्रहार कर, सिद्ध कर देंगे तो, अन्य विषयों की शब्दावली सहज स्वीकार होने में कठिनाई नहीं होगी. बस, इसी दृष्टि से मैं ने Anatomy चुना है।

शरीर शास्त्र (Anatomy) उदाहरण:

मुख पेशियों के नाम (अभिनवं शारीरम् से )

(१) भ्रूसंकोचनी या अंग्रेज़ी Corrugator supercilli, क्या सरल है?

पहले Corrugator supercilli को देखिए, मैं एक प्रोफेसर भी, इसका अर्थ भाँप नहीं पाता. आप उस के स्पेलिंग के कूटव्यूह को देखिए, रटना तो पडेगा ही, उसे रटिए, डिक्षनरी में उसका अर्थ देखिए, उसे रटिए, और पाठ्य पुस्तक से व्याख्या रटिए.

पर उसीके लिए प्रयुक्त भ्रूसंकोचनी की व्याख्या, और अर्थ देखते हैं. भ्रू का अर्थ होता हैं भौंह या भौं, और संकोचन का अर्थ है , सिकुडना,अब भौंह सिकुडने में जो पेशियां काम करती है, उन पेशियों को भ्रूसंकोचनी कहा जाता है. बन गया शब्द ”भ्रूसंकोचनी संक्षिप्त और अर्थ सूचक. {इस प्रक्रिया में प्रत्यय का और संधि का उपयोग किया गया मानता हूँ.)

इसी का अंग्रेज़ी प्रति शब्द लीजिए. ”Corrugator supercilli” मेरा अनुमान है, कि यह लातिनी शब्द है, जो अंग्रेज़ी ने उधार लिया है. इस लिए जब तक लातिनी नहीं समझी जाएगी,(जो भाषा हमारी नहीं है ) तब तक उस का शब्दार्थ भारतीय को पता नहीं होगा. वैसे ऐसा शब्दार्थ अंग्रेज़ी भाषी अमरिकन छात्रों को भी पता नहीं है. इंग्लण्ड में भी उनके मेडिकल के छात्र इस विषय को कठिन ही मानते हैं. सुना है, कि उनका लातिनी-युनानी भाषाओं से संबंध तो उतना भी नहीं बचा है, जितनी हमारी भाषाएं संस्कृत से जुडी हुयी है.

तो, (१) स्पेलिंग रटो ही रटो, (२) उस शब्द का अर्थ ढूंढो और रटो (३)और, उसकी व्याख्या रटो; ऐसा तिगुना प्रयास हमें करना पडेगा.

युवा छात्र तो Corrugator supercilli का स्पेलिंग रटते रटते, फिर उसका अर्थ डिक्षनरी में देखते देखते, और अंत में उसकी व्याख्या को कंठस्थ करने में हताश हो सकता है. और फिर उस पेशी का रेखाचित्र भी बनाना पडता है, जो हिन्दी या अंग्रेज़ी दोनों के लिए समान है.

(२) नेत्र निमीलनी: या Orbicularis Oculi

नेत्र का अर्थ है आंखे, और निमीलन का अर्थ बंद करना या होना. तो नेत्र निमीलनी का अर्थ हुआ आंखे बंद करने वाली पेशियां. नेत्र निमीलनी बोलते ही आप उसका हिन्दी स्पेलींग,(वर्तनी) जान गये, उसका अर्थ ही उसकी व्याख्या है, उसे भी जान गए. कितना समय बचा आपका? पर Orbicularis Oculi बोलने पर क्या आप स्पेलिंग शब्द सुनकर बना लेंगे? नहीं. अर्थ जानेंगे? नहीं. और व्याख्या? वह भी नहीं. 

संस्कृत शब्द मुझे आयुर्वेद के ”शरीर-शास्त्र” से मिले. शरीर शास्त्र, एलॉपथी और आयुर्वेद, दोनों में समान है. क्यों कि शरीर ही जब मनुष्य का है, तो शास्त्र में भी कोई अंतर कैसे होगा.

एलॉपथी भी हिन्दी में पढाई जाए तो क्या छात्रों के लिए, सरल नहीं होगी?

क्या देशका लाभ नहीं होगा ?

और Orbicularis Oculi के लिए वही, अनावश्यक परिश्रम करना पडेगा जैसा ”Corrugator supercilli का हुआ था।

(१) ले स्पेलिंग रटो (२) रा डिक्षनरी में अर्थ ढूंढो और रटो,(३) फिर व्याख्या रटो।

आपको प्रामाणिकता (इमानदारी ) से मानना होगा, कि नेत्र निमीलनी दो चार बार के रटने से ही, तुरंत, पल्ले पड सकता है। और मैं तो मेडिकल का जानकार भी नहीं हूँ। न शरीर शास्त्र मैं ने पढा है। 

अब बिना विवेचन दो चार और उदाहरण ही देता हूँ।

नासा संकोचनी: Compressor naris

नासा=नाक को सिकुडने वाली पेशियां।

नासा विस्फारणी: Dilator naris

नाक को विस्फारित करने वाली पेशियां।

नासा सेतु: Dorsum of the nose

नासावनमनी: Dopressor septi

आप बताइए कि भ्रू संकोचनी, नेत्र निमीलनी, नासा संकोचनी, नासा विस्फारणी, नासा सेतु, नासावनमनी इत्यादि से शरीर शास्त्र आप शीघ्रता से पढेंगे? या नहीं?

{संस्कृत शब्द अर्थवाही, बिना स्पेलिंग, व्याख्या को अपने में समाए हुए प्रतीत होते हैं, या नहीं ?, कितना समय बचता?या आप अंग्रेजी में शीघ्रता से पढ पाएंगे, स्पेलिंग याद करते करते बरसों व्यर्थ गवांएंगे?}

(पाँच)

ॐ –संस्कृत छन्द का विशेष गुण:

संस्कृत छन्द का विशेष गुण, उपयोग और लाभ यह भी है, कि सरलता से, व्याख्याएं और सिद्धान्त इत्यादि संस्कृत छंद में रचे जा सकते है।यह गुण छात्र को रटने में सरलता प्रदान करेगा। प्रादेशिक भाषाएं, ऐसी संस्कृत की छन्दोबद्ध व्याख्या का तमिल से लेकर नेपाली तक अपनी अपनी भाषा में अर्थ विस्तार करें। ऐसा अर्थ विस्तार विषय को आकलन करने में सहायक होगा। सभी प्रादेशिक भाषाओं में ऐसे व्याख्याकारी श्लोकों का संग्रह समान ही होगा।

केवल उनके अर्थ अलग अलग भाषाओं में प्रत्येक प्रदेश में सिखाए जाएंगे। इस में भी मैं भारत की एकता को दृढ करने का साधन देखता हूँ। संस्कृत परम्परा को टिकाने का अलग लाभ। जैसे, ”योगः कर्मसु कौशलम्‍” — कर्म को कुशलता से करना कर्म योग है.संक्षेप में कर्म योग की व्याख्या कर देता है। ”योगश्चित्तवृत्ति निरोधः” ध्यान योग चित्त में चलने वाले विचारों का निरोध है.

सोचिए, हमारे पुरखें कितनी दूरदृष्टि वाले होंगे? सारी भगवद गीता ७१५ श्लोकों में दे दी। यह परम्परा टिकाने में बडी सहायता है।पाठ करने में कितनी सरलता है। सारे जीवन का तत्त्व ज्ञान केवल ७१५ श्लोकों में होने से पठन पाठन में सहायक है।और फिर छन्द में है।आज तक भ. गीता के श्लोक मैं ने गुजराती, मराठी, तेलुगु, हिन्दी, अंग्रेज़ी इत्यादि भाषाओं में प्रत्यक्ष देखे हैं। कुछ विषय से भटक गया –पर? ठीक है।

इस पद्धति से एक ओर संस्कृत भाषा से छात्र न्यूनाधिक मात्रा में परिचित भी होंगे, और व्याख्या का श्लोक रटने की सरलता होगी, साथ संस्कृत ज्ञान निधि को अनायास सहज प्रोत्साहन प्राप्त होगा।पंथ एक होगा, लाभ अनेक होंगे। सिद्धान्तों और व्याख्याओं के छंदो-बद्ध श्लोक छोटी छोटी गुटकाओं में समस्त भारत के लिए समान ही छापे जाएं। फिर प्रादेशिक भाषाओं में उसपर भाष्य छापे जा सकते हैं।

संस्कृत के पुरस्कर्ता भी हर्षित होंगे, संस्कृत के पण्डितों का विद्वानों का रक्षण होगा। संस्कृति-परम्परा का पालन पोषण निर्वहन होगा। स्वतंत्र भारत में यह अतीव आवश्यक है। जीवन्त परम्परा टिक जाएगी। पाणिनि कोई आर्थिक लोभ के कारण पैदा नहीं होता.

कुछ दो सौ वर्षों से उसे ग्रहण लगा है। जीवन्त परम्पराएं कडियां होती है , जो हमें हमारे पूर्वजों से और वंशजो से जोडनी होती है। ”परदादा -हम-और-प्रपौत्र” जुडे तो परम्परा का अर्थ सार्थक होता है।

ॐ –शब्द रचना की झलक

मॉनियर विलियम्स उनके शब्द कोष की प्रस्तावना में कहते हैं, कि संस्कृत के पास १९०० धातु हैं, प्रत्येक धातु पर ५ प्रकार की प्रक्रियाओं से असंख्य शब्द रचे जा सकते हैं।{ वास्तव में, हमारे धातु २०१२ है–लेखक} 

अकेली संस्कृत की अनुपम और गौरवदायी विशेषता है, यह ”शब्द रचना क्षमता”. उसे एक शास्त्र ही मानता हूँ, मैं. ऐसी परिपूर्ण क्षमता बंधु ओं मेरी जानकारी में किसी और भाषा की नहीं है. कोई मुझे दिखा दे, तब मान जाऊंगा.

देशी भाषाओं में, (जैसे हिन्दी, गुजराती, मराठी, बंगला, उडीया, तेलगु, तमिल…इ.) नये नये शब्द, और पारिभाषित शब्द संस्कृत के आधार पर गढे जाते हैं। 

भारत की प्राय: सारी प्रादेशिक भाषाएं संस्कृतजन्य संज्ञाओं का प्रयोग करती हैं। वैज्ञानिक, औद्योगिक, शास्त्रीय इत्यादि क्षेत्रों में पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग सरलता से हो इसलिये और अधिकाधिक शोधकर्ता इस क्षेत्र को जानकर कुछ योगदान देने में समर्थ हो, इसलिये शब्द सिद्धि की प्रक्रिया की विधि इस लेख में संक्षेप में इंगित की जाती है। 

यह लेख उदाहरणसहित उपसर्गोंकाऔर प्रत्ययों के द्वारा मूल धातुओं पर, संस्कार करते हुये किस विधि नये शब्द रचे जाते हैं इस विषय को स्पष्ट करने का प्रयत्न करेगा। 

हिन्दी/ संस्कृत में २२ उपसर्ग हैं। शाला में एक श्लोक सीखा था। 

प्रहार, आहार, संहार, प्रतिहार, विहार वत् 

उपसर्गेण धात्वर्था: बलात् अन्यत्र नीयते।। 

अर्थ: प्रहार, आहार, संहार, प्रतिहार, विहार की भांति उपसर्गो के उपयोग से धातुओं के अर्थ बलपूर्वक अन्यत्र ले जाये जाते हैं। 

उपसर्ग: प्र, परा, अप, सम, अनु, अव. नि: या निऱ्, दु:, या दुर, वि, आ. नि, अधि, अपि, अति, सु, उद. अभि, प्रति, परि और उप- इनके उपयोग से शब्द नीचे की भांति रचे जाते हैं। कुछ उदाहरण: हृ हरति इस धातु से, प्र+हर = प्रहार, सं+हर = संहार, उप+हर = उपहार, वि+हर =विहार, आ+हर = आहार, उद+हर =उद्धार, प्रति+हर =प्रतिहार इत्यादि शब्द सिद्ध होते हैं। 

प्रत्यय: प्रत्ययों का उपयोग, कुछ उदाहरण

(क) योग प्र+योग – प्रयोग, प्रयोग+इक – प्रायोगिक, प्रयोग+शील – प्रयोगशील, प्रयोग+वादी – प्रयोगवादी,

उप+योग – उपयोग+इता – उपयोगिता

उद+योग – उद्योग+इता – औद्योगिकता 

(ख) उसी प्रकार रघु से राघव, पाण्डु – पाण्डव, मनु – मानव, कुरु – कौरव, इसी प्रकार और भी प्रत्यय हमें विदेह – वैदेहि, जनक – जानकी, द्रुपद – द्रौपदी – द्रौपदेय, गंगा – गांगेय, भगीरथ – भागीरथी, इतिहास – ऐतिहासिक, उपनिषद – औपनिषदिक, वेद – वैदिक, शाला – शालेय, 

(ग) संस्कृत के पारिभाषिक शब्द, विशेषण का ही रूप है, इसलिये अर्थ को ध्यान में रखकर रचे जाते हैं। इसलिये शब्दकोष से ही उस अर्थ का शब्द प्राप्त करना पर्याप्त नहीं। हरेक संज्ञा का विशेष अर्थ होने से, परिभाषा को रचने के काम में उन्हीं व्यावसायिकों का योगदान हो, जो एक क्षेत्र के विशेषज्ञ है, साथ में पर्याप्त संस्कृत का भी ज्ञान रखते हैं।

संस्कृत भाषा में २२ उपसर्ग, ८० प्रत्यय और २००० धातु हैं। इनकी ही शब्द रचने की क्षमता २२x८०x२०००=३,५२०,००० – अर्थात ३५ लाख शब्द केवल इसी प्रक्रिया से बनाये जा सकते हैं।

इसके उपरान्त सामासिक शब्द, और सन्धि शब्द को जोडे तो शब्द संख्या अगणित होती है। 

कुछ दो सौ वर्षों से उसे ग्रहण लगा है। जीवन्त परम्पराएं कडियां होती है , जो हमें हमारे पूर्वजों से और वंशजो से जोडनी होती है। परदादा -हम-और प्रपौत्र जुडे तो परम्परा का अर्थ सार्थक होता है।

कवि दुष्यंत कुमार कहते हैं:

मेले में खोए होते, तो, कोई घर पहुंचा देता,

हम तो अपने ही घर में खोए हैं, कैसे, ठौर ठिकाने आएंगे ?

19 Responses to “अंग्रेज़ी से कडी टक्कर:भाग दो”

  1. Mohan Gupta

    बहुत से लोग भारत में यह समझते हैं के भारत से अंग्रेजी का महत्व कभी कम नहीं होगा कोय्नके अंग्रेजी भारत की एक भाषा बन चुकी हैं. बहुत से लोग अंग्रेजी में बोलना अपनि शान और बड़ापन समझते हैं. आजकल रेडियो और दूरदर्शन बा किसी अन्या जगह ऐसी हिंदी नहीं बोली जाती जिसमे अंग्रेजी और उर्दू शादो का मिश्रण ना हो जैसे के हिंदी में उपयुक्त शब्दों का अभाब हो हिंदी चलचित्रों में तो अंग्रेजी शब्दों का मिश्रण तो ५०% से अधिक हैं. श्री मधुसुदन जी ने अपने कई लेखो द्वारा सिद्ध किया हैं के संस्कृत की सहाय ता से हिंदी में असंख्या असीमत सब्दो का निर्माण किया जा सकता हैं.

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    • Bhaskar

      बहुत सही बात है. मुझे ऐसा लग रहा है कि मै हिन्दीमे लिख सकूंगा. यह समझकर बडा आनंद मिल रहा है. इस लिये मै आपका बहुत आभारी हूं.

      आज शाम को मै “support Mr. Modi” कार्यक्रम मे भाग लेने जा रहा हूं. क्षमस्व. शायद मै आपसे सोमवार अथवा मंगल को दूर ध्वनि पर चर्चा विनिमय करनेका प्रयत्न अवश्य करूंगा.

      भास्कर

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  2. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन उवाच

    विचारकों की ओर से, दीर्घ और सोच समझ कर अनेक प्रतिक्रियाएं आयी. किसी भी गंभीर विचार की उपेक्षा नहीं करूंगा. विचार करते समय मैं
    (१)इस विषय में, स्थूल रूप से सोचने का प्रयास करता हूँ. पहले बडा ढाँचा खडा किया जाए.
    (२)प्रादेशिकता से, मातृभाषा से, व्यक्तिगत स्वार्थों से, और राजनीति से भी, ऊपर ऊठकर, केवल राष्ट्रश्रद्धा से प्रेरित होकर ही सोचने का प्रयास करता हूँ।
    (३) और पश्चात सूक्ष्म बिन्दुओं का भी विचार भविष्य में प्रत्येक विषय के निष्णातों द्वारा किया जाए, ऐसा मेरा प्रामाणिक मानना है.
    (४) संस्कृत के शब्दों की प्रचंड शक्ति विश्व के विद्वान मान्ते है, उसकी झलक मात्र मैं दिखाना चाहता था. (५) आगे क्या होगा? इसकी चिन्ता किए बिना हमें तो दर्शाना है, कि कैसे हमारी भाषाएं सक्षम हैं.
    (६) और कैसे वह अंग्रेज़ी से टक्कर लेने में समर्थ है.
    (७) अगले आलेख में मैं कालेज की पढाई के विषय में और पाठ्य पुस्तकों के विषय में सोच रहा हूँ।
    ====> यदि यह प्रमाणित हो जाए, कि “हिन्दी राष्ट्रीय बॅन्क” में आप को ३० से ४० % का ब्याज मिल रहा है, तो क्यों कोई ५-७% ब्याज देनेवाली अंगरेज़ी बॅन्क में खाता खुलवाएगा? <===

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  3. SATYARTHI

    आदरणीय आचर्य प्रवर
    टिपण्णी देने में विलम्ब के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ . आपके तर्क से असहमत होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता.समस्या केवल यह है की देश में मैकाले के मानस पुत्रों का एक छत्र राज्य है जो देश के प्रत्येक क्षेत्र में सत्तासीन है . अभी थोड़े दिन पहले समाचार मिला था की एक अग्रगण्य दलित बुद्धिजीवी ने उत्तर प्रदेश के एक गाँव में अंग्रेजी मैया का मंदिर बनवाया है. उनका विश्वास है की दलितोत्थान का एकमात्र साधन अंगेजी शिक्षा प्राप्त करना है. भारत का शिक्षित वर्ग भी अधिकतर ऐसा ही सोचता है. शुभ समाचार यह है की अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम बनाने के हानिलाभ पर चर्चा होने लगी है
    स्वामीनाथन अंक्लेसरिया ऐयेर के अतिरिक्त इकोनोमिक टाइम्स में भी ‘पोक मी’ श्रंखला में एक स्तम्भ लेखक ने प्रश्न उठाया है की अंग्रेजी को क्यों शिक्षा का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए. संभव है की किसी दिन ऐसा भी चमत्कार हो जाये की इस विषय पर देशव्यापी बहस हो और उसका कुछ सुपरिणाम निकल आये. वैसे आज के वातावरण में जहाँ चहुँ ओर अन्धकार गहराता जा रहा है इस प्रकार की आशा रखना पागलपन ही समझा जाना चाहिए.

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  4. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन उवाच

    शिवेन्द्र जी, एवं विनायक जी, धन्यवाद! आज समझ में आता है, कि भारत को स्वतन्त्रता प्राप्त होने पर देशको सही दिशा इंगित करने वाला नेतृत्व नहीं मिला.
    जो भी नेतृत्व मिला वह कुरसी पर टिकने के लिए देशकी उन्नति की दिशासे ही समझौता करने वाला मिला.
    न उन्हें अपनी परम्पराओं का ज्ञान(?) था, न अभिमान था.
    ऐसे में गांधी हार गए, और मैकाला जीत गया.
    अंग्रेज़ी किसी की व्यक्तिगत उन्नति कर भी ले, पर सारे देशकी उन्नति कर नहीं सकती. क्या कतिपय जनों की उन्नति के लिए सारी रेलगाडी ही कैलाश मानस पर ले जाएं?
    हमारी भाषाएं संस्कृत्जन्य और संस्कृतोद्भव शब्दों से प्रचुर मात्रामें (७०-८०%) गठित हुयी है. इसी बिंदु को उद्घाटित करने का प्रयास है, इन लेखोंका.
    अनुमानत: हम तीन से पांच गुना आगे बढे हुए होते, यदि हमें सही नेतृत्व प्राप्त होता.
    बहुत कुछ कहना है…. फिरसे आप और अन्य प्रबुद्ध पाठकॊं को धन्यवाद. समय मिलते ही अगला आलेख भेजूंगा।

    Reply
  5. शिवेंद्र मोहन सिंह

    मैं करीब एक साल से तमिलनाडु में हूँ, इंग्लिश के सबसे ज्यादा पैरोकार यहीं से हैं और इस राज्य की हालत इस भाषा में इतनी ज्यादा ख़राब है कि पूछिए मत. राजनीतिज्ञों ने यहाँ के लोगों के मन हिंदी के प्रति जहर भर रखा है अन्यथा ऐसा कोई कारण नहीं है कि यहाँ के लोग हिंदी नहीं बोलें, आप विश्वास नहीं करेंगे यदि गणना कि जाए तो हिंदी जानने और बोलने वाले आपको ज्यादा मिलेंगे इंग्लिश के बनिस्बत. इंग्लिश ने पूरे भारत का कबाड़ा किया हुआ है, जिसे काम आता है उसे इंग्लिश नहीं आती और जिसे इंग्लिश आती है उसे काम नहीं आता. ये एक बहुत बड़ी विडम्बना है.

    Reply
    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन उवाच

      शिवेन्द्र जी
      बहुत बहुत धन्यवाद, आप ने तमिलनाडु का जो अनुभव व्यक्त किया, वही बात कुछ छात्र-छात्राएं, जो इस वि. विद्यालय में पढने आए हैं, कहते हैं.
      एक आलेख “तमिल/संस्कृत” में संशोधित हो रहा है. इस बार आलेख में उन छात्र-छात्राओं का भी पर्याप्त योगदान होगा.
      मुझे लगता है, कि —
      (१) देवनागरी लिपि का ही परिचय, जो संस्कृत के साथ जुडा हुआ है, वह सारे भारत में (केवल लिपि) के रूपमें पढाया जाना चाहिए. जिससे परिचित होने पर उच्चारण शुद्धि टिकी रहेगी. रोमन अंग्रेज़ी से शुद्ध उच्चारण बडी आयु होनेपर-बाद में आना कठिन हो जाता है.
      (२) अंग्रेज़ी ही केवल सीखाने पर यहां अमरिकामें भी –भारतीय शिक्षितों(?) की सन्तानें “ढर्म क्सेट्रे कुरू क्सेट्रे समवेटा युयुट्सवा” करती हुयी सुनी है.
      (३) अंग्रेज़ी के ही पुरस्कर्ताओं की संतति, भारत में शायद समाज से भी संस्कार ग्रहण कर ले, पर अमरिका में ऐसी रीति-रुढि हमें (संस्कृति सहित) एक-दो पीढी में खतम कर देगी. विश्वमोहन तिवारी जी ने संस्कृति-भाषा के साथ कैसे जुडी होती है, इसपर बहुत मौलिक लेख प्रवक्ता में ही डाला था.
      आपने टिप्पणी दी, बहुत धन्यवाद.ऐसे ही टिप्पणी देते रहें।

      Reply
    • Bhaskar

      ॐ स्वस्ति ।
      श्री शिवेन्द्र मोहन सिंह जी, प्रणाम.
      आपका सितंबर ६, २०१२ का उत्तर मैने आज पढा, और मुझे १९५६ साल में जब बनरास विश्व विद्यालय में पढता था उस दिन कि एक घटना याद आई.
      मेरा जन्मस्थान कर्नाटक में है. मेरी मातृभाषा मराठी ओर दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभासे विशारद परीक्षामें उत्तीर्ण हुआथा. भाषावार प्रान्त रचना के दुष्परिणाम को अच्छीतरह से जानता था.
      मेरा एक मित्र मद्राससे आयाथा. सुबह्के समय एक दिन ऐसा हुआ. हम दोनो कैन्टीन्से हमारे कमरे पर चल रहे थे. तो हमरा और एक मित्र (अलाहाबाद्से आया था) वह सामने आया, और मजाकमे हमारे मद्रास के मित्र को विनोदी भाषामें कुछ ऐसा बोला, वह बात हमारे मद्रास मित्र को समझ नहीं आई. अब उत्तरी मित्र हस पडा, तो दक्षिणी मित्र समझ लेने के बिना गुस्सेमें आया और तुरन्त अपना पादत्राण निकाला और अन्ग्रेजीमें उसको डांटा. मुझे दोन्हों मित्रोंका वर्तन जरासा अजीब लगा. पश्चात मैने मेरे दक्षिणी मित्रसे पूंछा की ऐसा गुस्सा करने की क्या जरूरी थि, अपनी चप्पल निकालि यह बात ठीक नही लगी. तो उसने मुझे बताया, यह उत्तर हिन्दुस्तान के लोग इत्नी अहंकार्से दक्षिणी लोगोंपर जबर्दस्तीसे हिन्दी भाषा डाल रहे है. Why ca n’t these Balias learn to speak good English, then I will learn Hindi. यह घटना मुझे अभी सताती है. हमारे उस समयके नेता लोग जो थे उन्होने जरासा संयम रख के ओर दूरदृष्टीसे सोचकर राष्ट्रभाष के बारे मे सोचा होता तो आज की भारत कि जो दुर्दशा देखते हैं वो शायद होती नही. लेकिन समय तो चला गया. अब क्या करें?

      हम सब विचारवान लोग और एक बार संस्कृत भाषा प्रचलित करे. यही मेरी आशा और प्रार्थना. जैसे मधुसूदनभाई अपनी ओर से प्रयत्न कर रहें है, वैसे ही हम भी करते चले.

      नमस्कार.

      Reply
      • डॉ. मधुसूदन

        डॉ.मधुसूदन

        डॉ. भास्कर घाटे जी –नमस्कार –कृपया निम्न कडी देखने का अनुरोध करता हूँ।
        टिप्पणियों के लिए धन्यवाद।
        समय समय पर अपना मत और मुक्त टिप्पणियाँ देते रहें।
        http://www.pravakta.com/sanskrit-tamil-3

        Reply
  6. डॉ. मधुसूदन

    dr. madhusudan

    आदरणीय “पंकज व्यास” जी ने विधान ही कर दिया कि, धा धातु नहीं.
    कुछ सन्दर्भ देते तो पता चलता.

    (१) उनसे इस विनम्र लेखक का स्पष्ट कहना है, की धा धातु है, और उभय पदी धातु है, और ३ रे जुहोत्यादि गण की धातु हैं.===> धा-दधाति, (अर्थ है, धारण करना).

    (२) आप पृष्ठ २४१ पर “संस्कृत ज्ञान निधि” —लेखक, डॉ. रामविलास चौधरी, और, डॉ ध्रुव कुमारी चौधरी —की पाठ्य पुस्तक में से सन्दर्भ ढूंढ़ सकते हैं.

    विशेष: आप विद्वान् हैं, तो, आलेख के “मूल (“अंग्रेज़ी से कड़ी टक्कर”)– विषय पर कुछ टिपण्णी करें”– जिस से अन्य पाठकों को भी लाभ हो.

    मेरी, गलती हो भी सकती है.मैं सर्वग्य नहीं हूँ. — पर यहाँ मेरी गलती प्रतीत नहीं होती.

    आप ने कहाँ से, किस आधार पर यह विधान किया? कोई सन्दर्भ देंगे?

    विनय सहित

    Reply
  7. डॉ. मधुसूदन

    dr. madhusudan

    इस आलेख में प्रत्येक बिंदु पर तर्क देने का प्रयास किया गया है.
    आप किसी वस्तु को खरिदने के पहले अपने लाभ का विचार करते हैं.
    और लाभ के सामने क्या व्यय किया जाए, उसका विचार किया जाता है.
    ऐसे तर्क निष्ठित विचार होना चाहिए.

    इस लिए टिप्पणियां स्वीकार करवाने के लिए आपका तर्क भी देते चलें.
    मत नहीं.
    आपका मत दुसरें तभी मानेंगे, जब आप उन्हें तर्क देंगे.
    यह चुनाव नहीं है. राजनीति नहीं है.
    प्रादेशिकता का भी विचार तर्काधारित होना चाहिए.

    भारत का विचार राष्ट्र भाषा के मूल में होना चाहिए.
    अनगिनत लाभ होंगे, जब हमारी अपनी राष्ट्र भाषा होगी.
    जय भाषा भारती.

    Reply
  8. dr dhanakar thakur

    आपका लेखा अछ्छा है
    संस्कृतनिष्ठ हिन्दी या सरलीकृत संस्कृत ही भारत की रास्त्रभाषा हो सकती है पर इसके पहेल रास्त्र क्या ही इसकी अवधारणा लोगोंमे स्पष्ट होनी आवश्यक है जो दोसु वर्षों का नही करीब १००० वर्षों के ग्रहण से ग्रसित है
    टककर केवल अंगरेजी से नहीं एक नयी विघटन की भाषा बना दी गयी उर्दू से भी है

    (१)आलेख गहराई से, लिखा गया है.
    (२)आलेख कुछ विशेषज्ञों के क्षेत्र से संबद्धित भी है.

    (३) निरूपित विषय रा हिन्दी सहित सभी भारतीय भाषाओं के लिए लागू होता है.

    मेडिकल टर्मिनॉलॉजी (शब्दावली )के लिए शब्द निर्माण की क्षमता संस्कृत में है – उर्दू मिलाने के बाद यह क्षमता नष्ट हो जाती है

    ऐसे शब्द समझ में नहीं आते, तो यह हमारी संस्कृत के प्रति उपेक्षा का ही परिणाम है जिसे विद्यालय स्तर तक अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए

    बहुसंख्य भारतीय अंग्रेज़ी भी नहीं जानते, यह सत्य है

    ऐसी संस्कृत जन्य शब्दावली भारत की सभी प्रादेशिक भाषाओं में चलती है, चलनी चाहिए जैसे लैटिन के शब्द सभी एरो भाषाओँ में चलते हैं

    मेडिकल अर्थात चिकित्सा संज्ञाएं-में काफी कम हुआ है आयुर्विज्ञान शब्दावली का प्रकाशन भी १९६० के दशक में सरकारी समिति द्वारा हुआ था पर फिर वह आगे बढ़ाया नहीं गया और जब तक शिक्षा का माध्यम आ उ र्परीक्षा माध्यम भारतीय भाषाएँ नहीं बनेंगी वह प्रयुक्त नही होगी

    (१) भ्रूसंकोचनी या अंग्रेज़ी Corrugator supercilli, के निकट होता हुआ भी सही नहीं है -कार्य जरूर बता रहा है सुपर सिल्ली का अर्थ उसके स्थान से है सिल्लीई के ऊपर

    (२) नेत्र निमीलनी: या Orbicularis ओकुली के मामले में भी ऐसा ही है

    ऐसे विषयों में सम्बंधित विभागों के विद्वान् को बैठाना और निर्णय लेना होगा पर यह संभव है

    एलॉपथी नहीं हम इसे मोदेर्ण मेडिकल साइंस कहते हैं जिसे भी हिन्दी समेत एनी भारतीय भाषाओँ में पढाई जानी चाहिए छात्रों के लिए, सरल होगी और जनता के लए भी चिकित्सा में सहजता आयेगी

    आपने जो एनी शब्द लिखे हिं उसके लए पुरानी शब्दावली में देखने से मालूम होगा की वे अछे हैं या नहीं- समय समय पर उनका संशोधन ,ओपरिवार्धन होना चाहिए
    अभी मैं इस्पात उद्योग के एक रास्ट्रीय सेमिनार में था जो र्ज्भाशा में हुआ और अच्छा भी हुआ
    वैसे ही सभी खेत्रों में करने की आवश्यकता है
    पर इसके लिए सरकार में हमारे आपके जैसे आदमी होने चाहिए

    ॐ –संस्कृत छन्द का विशेष गुण:
    ऐसी संस्कृत की छन्दोबद्ध व्याख्या का तमिल से लेकर नेपाली तक अपनी अपनी भाषा में अर्थ विस्तार करें। ऐसा अर्थ विस्तार विषय को आकलन करने में सहायक होगा। सभी प्रादेशिक भाषाओं में ऐसे व्याख्याकारी श्लोकों का संग्रह समान ही होगा।- से सहमत हूँ.
    भगवद गीता ७१५ श्लोकों में- मैंने ७०० सूनी है ? कौन से १५ अधिक हैं? दक्षिण भारत में १३वे अध्याय में एक श्लोक पंडित मधुसुदन सरस्वती का जोड़ा हुआ पहला चलता है चूँकि १२वेन से उसकी संगती नहीं है
    (मेरी एक मैथिली गीता मैह्तिलिई में अनुवाद है जिसका प्रक्क्वाथान परम पूज्य पुरी के शंकराचार्य ने लिखा है)

    सरलीकृत संस्कृत ही स्वतंत्र भारत में चल सकती है ( दो वचन, तीन काल, सामान शब्दरूप आ उर धातुरूप वाली, अंकों में २ या अधिक के लिए बहुवचन, जटिल संधि नहीं वल्कि विच्छेदित
    अभ्युत्थानं धर्मस्य वाली अभ्युत्थानंधर्मस्य नहीं जिसको लोग अधर्मस्य भी समझ सकते हैं )

    यह अतीव आवश्यक है।

    कुछ एक हज़ार दो सौ वर्षों से उसे ग्रहण लगा है।
    ॐ –शब्द रचना की झलक
    संस्कृत की अनुपम और गौरवदायी विशेषता है, यह ”शब्द रचना क्षमता”.
    देशी भाषाओं में, (जैसे हिन्दी, गुजराती, मराठी, बंगला, उडीया, तेलगु, तमिल…इ.) नये नये शब्द, और पारिभाषित शब्द संस्कृत के आधार पर गढे जाते हैं और चलेंगे उनमे खासकर तकनीकी शब्द ।
    आपने सही लिखा हिया संस्कृत भाषा में २२ उपसर्ग, ८० प्रत्यय और २००० धातु हैं। इनकी ही शब्द रचने की क्षमता २२x८०x२०००=३,५२०,००० – अर्थात ३५ लाख शब्द केवल इसी प्रक्रिया से बनाये जा सकते हैं।
    इसके उपरान्त सामासिक शब्द, और सन्धि शब्द को जोडे तो शब्द संख्या अगणित होती है पर समस और संधि से जटिलता बढ़ती है – हमें सारा सुबोध संस्कृत चाहिए । एनी युगों में भी यह हुआ है
    अब संस्कृत के १० लाकर नहीं लिखे जाते – वेदों की लेट लकार की बात आब लेट (पुरानी या स्वर्गीय ) हो गयी है – संस्कृत को सरल करें यह युग की मांग है

    Reply
    • डॉ. मधुसूदन

      dr. madhusudan

      सम्माननीय डॉ. ठाकुर –ह्रदय तल से धन्यवाद.
      उद्देश्य कुछ सामूहिक विचार चिंतन मंथन इत्यादि प्रारंभ हो, यही है.
      आप के सभी बिंदु स्वीकार्य हैं.
      संस्कृत बहुल हिंदी –और संस्कृत निष्ठ हिंदी भी मेरी दृष्टी में विशेष अंतर नहीं रखती.
      मुझे लगता है, की आचार्य रघुवीर जी ने, मेडिकल व्याख्याएं जो दी है, वे आपकी व्याख्याओं से मिलती जुलती है.
      प्रवास पर होने से अभी मैं उन्हें देख कर सुनिश्चित नहीं कर सकता.
      आपकी टिपण्णी दिशा दर्शक है.—-बहुत बहुत धन्यवाद.
      ऐसी ही टिपण्णी का अनुरोध है\

      Reply
  9. Rekha Singh

    संस्कृत भाषा के जानकारों को ही पता है इस देव वाणी की विशेषता क्या है | जिन लोगो को अंग्रेजी का भूत चढ़ा हो भला वो लोग सही कैसे सोच सकते है | भूत तो अन्धकार का धोत्तक है |हां यदि अंग्रजी का ज्ञान संस्कृत तथा अपनी और भारतीय भाषाओ के साथ हो तो सनातन संस्कृति से समस्त विश्व का कल्याण हो सकता है |आज सनातन संस्कृति से प्रेरित मानवता शाकाहार ,योग ,आयुर्वेद ,ध्यान से अपने जीवन को धन्य कर रही है |लोग संस्कृत सीख रहे है ताकि ज्ञान के उस खजाने को प्राप्त क़र सके |मेरा व्यक्तिगत विचार एवं अनुभव है खाली अंग्रजी पढे लोग आर्थिक रूप से से तो समृद्ध हो सकते है परन्तु मानसिक रूप से असंवेदनशील ,अज्ञान ,घमंडी और मूर्ख होते है |संस्कृत भाषा का उद्गम और उद्भव अंग्रजी भाषा से अलग संस्कृत भाषा हमे जिन विचारों एवं भावों से ओतप्रोत करती वह अंग्रजी मे कहा |संस्कृत बेजोड़ | संस्कृत भाषा का कोइ सानी नहीं |

    Reply
    • डॉ. मधुसूदन

      dr. madhusudan

      बहन रेखा जी,
      सही कहा आपने.
      आपके नहीं, पर कुछ और प्रश्न फोन पर आये हैं, उन का उत्तर भी मैं, इसी में लिख देता हूँ.

      प्र. शासकों से क्या चाहते हो?

      उ. समस्त भारत को उठाने, और आगे बढाने का उद्देश्श्य होना चाहिए हमारी शासकीय सोच का, और हमारी शिक्षा का.
      प्र.लोगों को अंग्रेजी चाहिए, इसमें क्या गलत है? नेताओं से क्या अपेक्षा थी आपकी?

      उ.बौने नेतृत्व से हमारी अपरिमित हानि ही हुयी है, यह देशका दुर्भाग्य ही मानता हूँ. विश्व मोहन जी सही कहते हैं, आज अंग्रेजी का विरोध बहुत बहुत कठिन है, पर असम्भव नहीं.
      उधारी के धन से कोई यदि समृद्ध हो सकता, तो उधार अंग्रेजी से भी देश समृद्ध हो जाता. जो आज तक हुआ नहीं है. समृद्धि मेरी आपकी अंग्रेज़ी पढों की ही पर्याप्त नहीं,

      ऑस्ट्रेलियन विद्वान् को पूछा गया, की, अफ्रिका क्यों पिछड़ा है?,
      उत्तर: क्यों की वहां भी अंग्रेजी में शासन न्याय ….इत्यादि चल रहा है.

      मेरा प्रश्न है, क्या भारत में कोई बुद्धिमान ही नहीं? जो इसपर अपनी भाषा, प्रदेश, अपनी उन्नति, राजनीति, तुष्टिकरण, वोट बैंक, इत्यादि से ऊपर उठकर सोचे, शिक्षा को सही दिशा दे?

      कुछ लोग अंग्रेज़ी, रुसी, लातिनी, यूनानी, फारसी, अरबी, जापानी, चीनी, हिब्रू, …….इत्यादि पढ़ने वाले होने ही चाहिए. और वे समस्त विश्व की अच्छी पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद करें, जो हमारे शिष्ट समाज को प्राप्त हो.
      हम तो “||आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः||” का मन्त्र देने वाले हैं. हम क्या कम्बल ओढ़कर सो जाकर, विश्व से आने वाले शुद्ध विचारों को रोकेंगे? कभी नहीं!

      आज, समृद्धि कुछ विशिष्ट वर्ग तक ही सिमित है. और यह वर्ग अपने संकुचित विचारों के कारण, अपनी वयक्तिक समृद्धि से अलिप्त होकर चिंतन करने में असमर्थ है. एक दशक के पहले मैं भी ऐसी सोच से पीड़ित था–आज नहीं हूँ.

      इस से भयजनक परिस्थिति निर्माण हो चुकी है. भ्रष्टाचार भी इसी विघटन कारी अवस्था की देन है.
      जब तक सामान्य नागरिक अफसरों(जो उनके नौकर है) को नौकर की भाँती कड़े प्रश्न पूछ नहीं सकेगा, तब तक भ्रष्टाचार कम नहीं होगा.
      जैसे सारी मछलियाँ पानी के बाहर निकल कर स्पष्ट अवलोकन नहीं कर पाती, उद्यान की शुद्ध पवन का आनंद नहीं ले पाती, बस उसी अवस्था में साधारण भारतीय और वाचक वर्ग भी हो सकता है.
      चिंतन के लिए आप को परिस्थिति से ऊपर उठकर निर्लिप्त होना पड़ता है, ध्यान ऐसे ही किया जाता है. ऐसी स्थिति में, एक अँधेरी अमावस्या की रात में जैसे कुछ क्षण तक चमकती बिजली में आपको समस्त परिसर के स्पष्ट दर्शन होते हैं, बस सभी सच्चाइयां सूरज की भाँती दिखाई देती हैं.
      कृपया अगले लेख की प्रतीक्षा करें.
      ||जय भाषा भारती||

      Reply
  10. डॉ. मधुसूदन

    dr. madhusudan

    हो सकता है, की कहीं, यह आलेख साधारण पाठक के लिए कठिन तो नहीं?
    प्रश्न भी हो तो —बताइये. बंधुओं देशका भला जिससे हो, वही मैं भी चाहता हूँ.
    मौन ना रहिए.
    प्रवास पर हूँ. उत्तर देने में विलम्ब हो सकता है.
    ||जय भाषा भारती||

    Reply
  11. Vishwa Mohan Tiwari

    डा. मधुसूदन जी बधाई तथा साधुवाद के पार् हैं।

    पहला तो यही कि अंग्रेज़ी भाषा से टक्कर लेना आज ४७ के पूर्व अंग्रेज़ों से टक्कर लेने से कहीं अधिक कठिन है, क्योंकि आज तो भारतवासी ही गुलामी की भाषा अंग्रेज़ी‌चाहता है।

    दूसरा, हिदी की शक्ति से आज का पढ़ा लिखा भारतीय भी न केवल अपरिचित है, वरन् अपने अज्ञान को हिन्दी की दुर्बलता समझता है। मधुसूदन जी ने इस भ्रान्ति का ऐसा निराकरन किया है कि संदेह बच ही‌नहीं सकता।

    तीसरा, उऩ्होंने यह भी समझा दिया है कि यह भाषा हमें अपने पूर्वजॊं से, परम्परा से अपनी संस्कृति से जोडती है

    मेरा अनुरोध है कि डा मधुसूदन अपनी पुस्तक शीघ्र ही‌लिखें

    Reply
    • डॉ. मधुसूदन

      dr. madhusudan

      आ. विश्वमोहन जी —
      पुस्तक लिखने का विचार तो सही है, लगता है, आज कल अंतर्जाल पर ही सुधि पाठक काफी समय देते हैं, पुस्तक से और अधिक क्या हो सकता है?
      फिर भी सोचता अवश्य हूँ.
      और भी बिंदु मुझे प्रस्तुत करने हैं, प्रवक्ता पर.
      मेरी दृढातिदृढ़ मान्यता बन रही है, कि बिना अपनी भाषा सर्वांगी उन्नति नहीं होगी.
      अंग्रेजी से, भारत का सामान्य नागरिक कभी भी उन्नति नहीं कर पाएगा.
      आप के विचार पर और भी सोचूंगा अवश्य –कोई अंतिम बात नहीं अभी.
      फिर भी वैसी पुस्तक कठिन नहीं प्रतीत होती–
      सादर मधूसूदन

      Reply

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