लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

Posted On by &filed under लेख, साहित्‍य.


हल्दीघाटी

हल्दीघाटी

राकेश कुमार आर्य

 

शक्तिसिंह का शक्ति प्रदर्शन
एक बार की बात है कि राणा उदयसिंह के दरबार में हथियार निर्यातक/निर्माता व्यक्ति अपने हथियारों का प्रदर्शन करने के लिए आया हुआ था, तब वह हथियार निर्यातक व्यक्ति अपनी एक तलवार की तीव्र धार का प्रदर्शन रूई को काट-काटकर के दिखा रहा था। इतने में ही वहां राणा उदयसिंह के एक लडक़े (जो अभी सुकुमार ही था) उदयसिंह ने प्रवेश किया। उसने देखा कि दरबार में एक हथियार निर्यातक व्यक्ति बैठा है जो अपने हथियारों का प्रदर्शन रूई काटकर दिखाते हुए कर रहा है। रूई काटने के उस दृश्य को शक्तिसिंह अच्छा नही मान रहा था। अत: उसने उस हथियार निर्यातक के हाथ से तलवार छीन ली और कहा कि किसी हथियार की तीव्र धार का परीक्षण ऐसे रूई काटकर नही किया जाता। सभी लोग आश्चर्य में पड़ गये। सोचने लगे कि शक्तिसिंह नाम का बच्चा अंतत: कहना क्या चाहता है?

इससे पहले कि शक्तिसिंह के आशय को दरबारी लोग समझ पाते उसने वह तलवार उठाई और एक ही वार में स्वयं अपने एक हाथ की एक उंगली आगे कर उस पर तलवार की धार की तीव्रता का परीक्षण करते हुए ‘कच’ से अपनी अंगुली काट डाली।
राणा उदयसिंह की आज्ञा और शक्तिसिंह
इस दृश्य को देखकर सारा दरबार सन्न रह गया। स्वयं राणा उदयसिंह को भी शक्तिसिंह का यह कृत्य अच्छा नही लगा। वह अपने राज्यसिंहासन से उठा और राजकुमार को पकडक़र अपने सिंहासन के निकट ले आया। उसने क्रोधावेश में निर्णय दिया कि इस दुष्ट दुस्साहसी राजकुमार को शीघ्रातिशीघ्र समाप्त कर दिया जाए, क्योंकि जिसे अपने शरीर से ही प्रेम नही वह किसी अन्य से क्या प्रेम कर सकेगा?

राणा के इस आदेश को सुनकर सारा दरबार और भी आश्चर्यचकित रह गया। आज दरबार में पता नही क्या हो गया था कि एक से बढक़र एक विस्मित और आश्चर्य चकित करने वाली घटनाएं हो रही थीं और कोई चाहकर भी कुछ नही बोल पा रहा था।
राणा उदयसिंह चाहते थे कि उनके आदेश का क्रियान्वयन तुरंत वैसे ही हो जाए, जैसे वह चाहते थे। परंतु कोई भी राजदरबारी ऐसी किसी घटना को क्रियान्वित नही करना चाहता था, जिससे राणा वंश की मर्यादा का हनन होता हो। अब से पूर्व राणा परिवार में ऐसा नही हुआ था कि जब कोई पिता अपने पुत्र के अद्भुत साहस को ही उसका दुस्साहस मानकर उसका वध कराने का ही आदेश पारित कर दे।
राणा की आज्ञा के विरोध में निकला एक विनम्र स्वर
सारा दरबार सन्न था, सारे दरबारी मौन खड़े थे, कोई कुछ नही बोलता था। तभी एक सरदार आगे बढ़ता है, जो स्वयं निस्संतान था। उसने राणा से कहा-‘महाराज, यदि क्षमा कर दें तो एक अनुरोध करना चाहता हूं।’

राणा उदयसिंह ने कहा-‘जी बोलिए।’ तब उस सरदार ने कहा कि-‘महाराज! मुझे कोई संतान नही है यदि आप उचित समझें, तो इस बच्चे को मुझे गोद दे दें। आप अपने लिए इसे मरा हुआ समझ लें।’

राणा ने कहा-‘इसमें हमें कोई आपत्ति नही? तब वह सरदार उस बच्चे को अपने साथ ले जाता है और उसका पालन-पोषण करने लगता है। उस को राजकुमार शक्तिसिंह के पालन पोषण में बहुत प्रसन्नता मिल रही थी। तभी कुछ कालोपरांत राणा उदयसिंह की मृत्यु हो गयी तो नये शासक महाराणा प्रताप बने।
महाराणा को हो आया भाई का स्मरण
महाराणा प्रताप जब मेवाड़ के शासक बने तो उन्हें अपने भाई शक्तिसिंह की स्मृतियों ने घेर लिया। इसका एक प्रमुख कारण यह भी था कि महाराणा स्वयं अपने पिता के उत्पीडऩात्मक व्यवहार से त्रस्त रहे थे और उन्हें राजभवन में या दुर्ग में प्रविष्ट होने तक की भी अनुमति नही थी। वह स्वयं दुर्ग से बाहर रहकर अपना जीवन-यापन करते रहे। इसलिए वह ये भलीभांति जानते थे कि उत्पीडऩ क्या होता है? और उसे झेलने वाले की स्थिति क्या होती है? अत: उन्होंने मेवाड़ का राज्यसिंहासन संभालते ही अपने भाई शक्तिसिंह को अपने पास आने का निमंत्रण भेजा। महाराणा के निमंत्रण को पाते ही शक्तिसिंह को भी अपार प्रसन्नता हुई और वह सहर्ष अपने भाई के साथ आकर रहने लगा।

मेवाड़ के मंत्रिमंडल और सरदारों ने महाराणा प्रतापसिंह के इस निर्णय की सराहना की। क्योंकि उन लोगों को ज्ञात था कि जब जगमाल और कई राजपूत लोग अकबर के साथ जा मिले हों, तब शक्तिसिंह की शक्ति का साथ रहना अति आवश्यक ही नही अति उत्तम भी होगा।
हुआ ‘राम-भरत’ का मिलाप
जब दोनों भाई आकर एक साथ मिले तो दोनों को ही असीम प्रसन्नता हुई। अतीत की दुखद स्मृतियां अश्रुधारा के प्रवाह में बह गयीं। सारे दरबारियों को ऐसा लग रहा था कि जैसे लंबे वियोग के पश्चात आज पुन: ‘राम और भरत’ का मिलाप हो रहा हो। अतीत वर्तमान की दहलीज पर खड़ा था, जिसे भविष्य की असीम संभावनाओं की सिंह गर्जना के भय से भाग जाना पड़ा, और दोनों भाई मेवाड़ के भविष्य की योजनाओं का चिंतन करने लगे।

दिन बीतते जा रहे थे। मेवाड़ के शुभचिंतकों को लग रहा था कि अब स्वतंत्रता की स्वर्णिम भार होने ही वाली है। दोनों भाईयों की संयुक्त शक्ति के मिलन को हर व्यक्ति ने मेवाड़ के भविष्य के दृष्टिगत शुभ संकेत माना। दोनों भाईयों की संयुक्त शक्ति को अकबर भी जानता था कि इसका अभिप्राय क्या है? यद्यपि अकबर के दरबार में जगमाल रहने लगा था और अकबर उसे राणा उदयसिंह का वास्तविक उत्तराधिकारी मानने का भ्रम भी पाल चुका था, परंतु इस सबके उपरांत भी अकबर यह भलीभांति जानता था कि राणा प्रतापसिंह और शक्तिसिंह के मिलन से मेवाड़ की शक्ति कितनी बढग़यी है?
….और सपना भंग हो गया
यह एक दुर्भाग्य पूर्ण तथ्य है कि महाराणा प्रताप और शक्तिसिंह का यह मिलन अधिक दिनों तक स्थापित नही रह सका।

हुआ यूं कि एक बार अहेरिया के उत्सव के समय राजपूत लोग परंपरागत रूप से जंगली सुअरों का शिकार कर अपना भाग्य निर्णय कर रहे थे। इस उत्सव में संपूर्ण मेवाड़ के गणमान्य लोग सामंत-सरदार सम्मिलित थे। यहां तक कि महाराणा प्रताप और शक्तिसिंह भी आ उपस्थित हुए। ये दोनों भाई भी उस जंगली सुअर का शिकार करने की उस प्रतियोगिता में सम्मिलित हो गये।

संयोग की बात रही कि दोनों ने एक साथ ही उस सुअर पर आक्रमण कर दिया और दोनों के भाले (कहीं-कहीं इसे बाण भी बताया गया है) इस सुअर को एक साथ ही जा लगे। जिससे उस सुअर की मृत्यु हो गयी।
हो गया अनिष्ट
शिकार को मृतावस्था में देखकर दोनों भाई अपने संयुक्त शिकार पर एक साथ झपट पड़े। दोनों ही उसे अलग-अलग अपना-अपना शिकार मान रहे थे। इसलिए दोनों ही इस बात के लिए झगडऩे लगे कि शिकार मेरा है। जब दोनों ने ही देखा कि स्थिति विस्फोटक होने लगी है, तो दोनों एक दूसरे के लिए तलवार निकाल बैठे।

सचमुच यह राणा वंश के लिए ही नही भारतवर्ष के लिए भी दुर्भाग्यपूर्ण क्षण थे कि जो महाराणा अभी कल परसों अपने संपूर्ण राज्य को ही मिट्टी का ढेला समझकर उसका त्याग करके वनगमन के लिए तैयार हो गया था, वही आज एक जंगली मृत सुअर की लाश को लेकर अपने अनुज से झपटने लगा।

समय का दुष्चक्र देखिए कि जो महाराणा राज्य के लिए लडऩे झगडऩे को कुल की मर्यादा के प्रतिकूल समझ रहा था-वही अब एक पशु की लाश के लिए कुल की मर्यादा को त्यागकर अनुज से लडऩे पर सन्नद्घ हो गया।

यह दृश्य हर व्यक्ति के लिए अत्यंत पीड़ादायक हो उठा। किसी ने भी इसे अच्छा नही माना। यद्यपि अधिकांश लोग अहेरिया उत्सव में मस्त थे। पर जब इस आकस्मिक और अप्रत्याशित युद्घ की जानकारी अन्य लोगों को होने लगी तो वे उधर को भागने लगे। इस दृश्य को देखकर लोगों के हृदय कांप रहे थे। पर कोई भी युद्घ के बीच-बचाव के लिए आगे नही आना चाहता था।
राज पुरोहित ने दिया आत्म बलिदान
तभी वहां राणा परिवार का राज पुरोहित आ जाता है। वह व्यक्ति अत्यंत राष्ट्रभक्त और अपने राजपरिवार के प्रति अत्यंत निष्ठावान था। उसने जब देखा कि कुछ भी अनर्थ हो सकता है तो उसको लगा कि जैसे संपूर्ण मेवाड़ और मां भारती के सपनों की ‘अर्थी’ निकलने में अब अधिक समय शेष नही रह गया है। यदि मेवाड़ के ये दोनों सपूत परस्पर लड़ मरे या कोई सा एक भी मर गया तो अति विनाश हो जाएगा।

इसलिए वह वृद्घ राजपुरोहित चिल्लाता हुआ आगे बढ़ा। उसके शब्द आकाश की छाती को फाडऩे वाले थे-‘ठहरिये राणा जी! ऐसा मत करिये, अन्यथा अनिष्ट हो जाएगा, तुम्हारे पूर्वजों ने जिस वंश परंपरा का निर्वाह बड़े यत्न से किया है, उसे यूं ही मिट्टी में मत मिलाओ।’

राजकुल पुरोहित के ये शब्द दोनों भाईयों ने बड़ी गंभीरता से सुने। पर उन पर कोई प्रभाव नही हुआ। कुछ क्षण रूकने के पश्चात दोनों भाई पुन: युद्घरत हो गये।

राजपुरोहित ने पुन: अंतिम प्रयास करते हुए दोनों भाईयों से अपील की कि वे युद्घ रोक दें। जब राजपुरोहित ने देखा कि उसकी अपील का कोई प्रभाव दोनों भाईयों पर नही हो रहा है, तो उससे रहा नही गया, और वह उन दोनों भाईयों की तलवारों के मध्य जाकर खड़ा हो गया। कहते हैं कि दोनों भाईयों की तलवारों के संयुक्त वार से वह पुरोहित वहीं पर ढेर हो गया। इस घटना को कहीं यूं भी दिखाया गया है कि कुलपुरोहित ने स्वयं आत्महत्या कर ली।

 

दोनों भाई पीछे हट गये
दोनों भाईयों ने जब देखा कि एक राजपुरोहित की हत्या हो गयी है तो दोनों पीछे हट गये। पर दोनों के माथे अभी भी ठनके थे-भौंहे तनी हुई थीं-सांसें यूं छूट रही थीं कि अभी भी वे एक दूसरे का कुछ भी कर सकती थीं। उनकी तेज श्वांसें चल रही थीं। मानो दो सांड भिड़ रहे हों।

शक्तिसिंह महाराणा की ओर घूरता हुआ वहां से चला गया। राणा ने भी उसे राज्य से निकल जाने की चेतावनी दे डाली। तब शक्तिसिंह सीधा अकबर के दरबार में जा पहुंचा। अकबर के लिए तो यह ‘सोने पे सुहागे’ वाली बात हो गयी थी। उसके लिए ये क्षण सुखानुभूति से भरे हुए थे क्योंकि इससे उसे लगा कि महाराणा प्रताप की शक्ति और भी क्षीण हो गयी है।
पुरोहित था महान देशभक्त
हमारा इतिहास महाराणा वंश के राजपुरोहित के बलिदान को यूं ही उपेक्षित कर छोडक़र चल देता है। जबकि उसका यह बलिदान किसी स्वार्थ के कारण नही दिया गया था। राजपुरोहित को उस समय केवल राष्ट्र की चिंता थी, अपनी हिंदू जाति के पतन की चिंता थी, अपने भारतीय राजवंशों के शिरोमणि राणावंश की चिंता थी, और इन सबसे बढक़र इस बात की चिंता थी कि यदि कुछ अनर्थ हो गया तो उसका लाभ अकबर को मिलेगा जो हमारी स्वतंत्रता का उस समय परम शत्रु था।

ऐसी परिस्थितियों में राजपुरोहित का बलिदान देशभक्ति की भावना से प्रेरित होकर दिया गया था। इस बलिदान को भारत के इतिहास में ऐसा ही सम्मान मिलना भी चाहिए।
क्रोध व्यक्ति का शत्रु है
क्रोध सचमुच व्यक्ति का सबसे बड़ा शत्रु है। इसने कुछ ही क्षणों में ऐसे-ऐसे अपराध लोगों से करा दिये हैं कि उन्हें करने के पश्चात लोगों को, जातियों को व देशों को सदियों तक पश्चाताप करना पड़ा है। महाराणा प्रतापसिंह और शक्तिसिंह ने अपने जीवन काल में अपनी मूर्खता पर प्रायश्चित किया भी। परंतु यह तब किया गया जब बहुत बड़ी क्षति उठा ली गयी थी।

इसके उपरांत भी कुलपुरोहित का बलिदान कम करके नही आंका जा सकता। उसके बलिदान का सबसे उत्तम परिणाम तो यह निकला कि उस समय महाराणा प्रतापसिंह और शक्तिसिंह में से कोई साथी एक दूसरे की हत्या नही कर सका, और दोनों वहां से हटकर अपने-अपने स्थानों की ओर लौट गये।
….और रणभेरी बज गयी
महाराणा प्रताप अपने दृढ़ निश्चय पर अडिग थे कि वह अकबर के दरबार में जाकर शीश नही झुकाएंगे, वह अकबर को अपना शत्रु मानते थे। अकबर ने जब देखा कि महाराणा स्वतंत्रता के गीत गाने की अपनी प्रवृत्ति से बाज आने वाला नही है, तो उसने जून 1776 ई. में मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया। यह युद्घ हल्दीघाटी का युद्घ कहलाता है। इस युद्घ का आंखों देखा वर्णन अलबदायूंनी ने अपनी पुस्तक ‘मुन्तखबत्तारीख’ में किया है। वह लिखता है :-
‘‘जब मानसिंह और आसफ खां गोगून्दा से सात कोस पर दर्रे के पास शाही सेना सहित पहुंचे तो राणा लडऩे को आया। ख्वाजा मुहम्मद रफी बदख्शी, शियाबुद्दीन गुरोह, पायन्दाह कज्जाक अलीमुराद उजबक, और राणा लूणकरण तथा बहुत से शाही सवारों सहित मानसिंह हाथी पर सवार होकर मध्य में रहा और बहुत से प्रसिद्घ जवान पुरूष हरावल के आगे रहे। चुने हुए आदमियों में से 80 से अधिक लड़ाके सैय्यद हाशिम बारहा के साथ इराबल के आगे भेजे गये और सैय्यद अहमद खां बारहा दूसरे सैय्यदों के साथ दक्षिण पाश्र्व में रहा। शेख इब्राहीम चिश्ती के संबंधी अर्थात सीकरी के शेखजादों सहित काजी खां वाम पाश्र्व में रहा और मिहतरखां चंदाबल में। राणा कीका ने दर्रे (हल्दीघाटी) के पीछे से तीन हजार राजपूतों सहित आगे बढक़र अपनी सेना के दो विभाग किये।

एक विभाग ने जिसका सेनापति हकीम सूर अफगान था, पहाड़ों से निकलकर हमारी सेना के हरावल पर आक्रमण कर दिया। भूमि ऊंची नीची रास्ते टेढ़े-मेढ़े और कांटों वाले होने के कारण हमारी हरावल में गड़बड़ी मच गयी, जिससे हमारी (हरावल में) पूर्णत: पराजय हुई। हमारी सेना के राजपूत जिनका मुखिया राजा लूणकरण था, और जिनमें से अधिकतर वाम पाश्र्व में थे, भेड़ों के झुण्ड की तरह भाग निकले और हरावल को चीरते हुए अपनी रक्षा के लिए दक्षिण पाश्र्व की ओर दौड़े। इस समय मैंने आसफ खां से पूछा कि ऐसी अवस्था में हम अपने और शत्रु के राजपूतों की पहचान कैसे कर सकें? उसने उत्तर दिया कि तुम तो तीर चलाये जाओ, वाहे जिस पक्ष के आदमी मारे जावें, इस्लाम को तो उससे लाभ ही होगा। इसलिए हम तीर चलाते रहे और भीड़ ऐसी थी कि हमारा एक भी वार खाली नही गया, और काफिरों को मारने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ। इस लड़ाई में बारहा के सैय्यदों तथा कुछ जवान वीरों ने रूस्तम की सी वीरता का प्रदर्शन किया। दोनों पक्षों के मरे हुए वीरों से रणखेत छा गया।’’
युद्घ क्षेत्र में महाराणा का ‘रामप्रसाद’ हाथी
अलबदायूंनी के उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट है कि युद्घ क्षेत्र में हिंदू (राजपूत) चाहे मुस्लिम पक्ष का ही था उसे भी मारना मुस्लिमों के लिए उचित था। क्योंकि इससे इस्लाम की सेवा करने का अवसर मुस्लिमों को मिल रहा था। युद्घ की विभीषिका भी देखने योग्य थी। कोई सा भी पक्ष पीछे हटना नही चाहता था। राणा की मुट्ठी भर सेना अपने अदम्य साहस और शौर्य का परिचय दे रही थी। मुस्लिमों की सेना के उसने दांत खट्टे कर दिये थे। अबुल फजल ने अकबरनामा में लिखा है :-‘‘दोनों पक्षों के वीरों ने लड़ाई में जान सस्ती और इज्जत महंगी कर दी। जैसे पुरूष वीरता से लड़े वैसे ही हाथी भी लड़े। महाराणा की ओर के शत्रुओं की पंक्ति को तोडऩे वाले लुणा हाथी के सामने जमाल खां फौजदार गजमुक्त हाथी को ले आया। शाही हाथी घायल होकर भाग ही रहा था कि शत्रु के हाथी का महावत गोली लगने से मर गया, जिससे वह लौट गया। फिर राणा का प्रताप नामक एक संबंधी मुख्य हाथी ‘रामप्रसाद’ को ले आया, जिसने कई आदमियों को पछाड़ डाला। हारती दशा में कमाल खां गजराज हाथी को लाकर लड़ाई में सम्मिलित हुआ। पंचू ‘रामप्रसाद’ का सामना करने के लिए रणमदार हाथी को लाया जिसने अच्छा काम दिया। उस हाथी के पांव भी उखडऩे ही वाले थे इतने में ‘रामप्रसाद’ हाथी का महावत तीर से मारा गया। तब वह हाथी पकड़ा गया, जिसकी बहादुरी की बातें शाही दरबार में अक्सर हुआ करती थीं।’
युद्घ हो उठा था रोमांचकारी
अबुलफजल के इस कथन से स्पष्ट है कि महाराणा प्रतापसिंह और उनकी सेना संख्या में कम होने के उपरांत भी कितनी वीरता से लड़ रही थी। आज उन्हें अपनी मातृभूमि के ऋण से उऋण होने का अच्छा अवसर मिला था। शत्रु को देश की सीमाओं से बाहर निकालकर हिंदू वीरता का कीर्तिमान स्थापित करना उनकी एक-एक सांस का उद्देश्य बन गया था। यह नही देखा जा रहा था कि हम संख्या में कितने हैं, अपितु हमारा एक सैनिक कितने मुगल सैनिकों को समाप्त कर सकता है-देखा यह जा रहा था। युद्घ प्राणपण से किया गया। पूरी योजना बनाकर किया गया। राजपूतों के शौर्य ने मुगलों को हिलाकर रख दिया। अकबरनामा का लेखक अबुल फजल स्वयं लिखता है :-‘‘सरसरी तौर से देखने वालों की दृष्टि में तो महाराणा प्रताप की जीत नजर आती थी इतने में ही एकाएक शाही फौज की जीत होने लगी। जिसका कारण यह हुआ कि सेना में यह अफवाह फैल गयी कि बादशाह (अकबर) स्वयं (युद्घक्षेत्र में) आ पहुंचा है। इससे बादशाही सेना में जान आ गयी और शत्रु सेना की, जो जीत पर जीत प्राप्त कर रही थी हिम्मत टूट गयी।’’

हल्दीघाटी का सच अबुल फजल से उत्तम और कौन बता सकता है,जो स्पष्ट कहता है कि महाराणा प्रताप की सेना युद्घ में जीत पर जीत प्राप्त कर रही थी। कर्नल टाड लिखता है-‘‘अपने राजपूतों और भीलों के साथ मारकाट करता हुआ प्रताप आगे बढऩे लगा। लेकिन मुगलों की विशाल सेना को पीछे हटाना और आगे बढऩा अत्यंत कठिन हो रहा था। बाणों की वर्षा समाप्त हो चुकी थी और दोनों ओर के सैनिक एक दूसरे के समीप पहुंचकर तलवारों और भालों की भयानक मार कर रहे थे। हल्दीघाटी के पहाड़ी मैदान में मारकाट करते हुए सैनिक कट-कट कर पृथ्वी पर गिर रहे थे। मुगलों का बढ़ता हुआ जोर देखकर प्रतापसिंह अपने घोड़े पर प्रचण्ड गति के साथ शत्रु सेना के भीतर पहुंच गया और वह मानसिंह को खोजने लगा।’’

कितना रोमांचकारी चित्रण है हल्दीघाटी के युद्घ का? इसके साथ ही यह भी विचारणीय है कि हमारे जिन योद्घाओं ने इस युद्घ में भाग लिया था उनकी वीरता और शौर्य को शत्रुपक्ष ने स्वीकार किया है। जिसे हमें भी यथावत स्वीकार करना चाहिए।
क्रमश:

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *