लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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राकेश कुमार आर्य

 

हमें बाबा रामदेवजी और आचार्य बालकृष्ण जी जैसी महान विभूतियों का इस बात के लिए ऋणी होना चाहिए कि उन्होंने भारत को विश्वगुरू बनाने की दिशा में ठोस पहल की है और भारतीय धर्म, संस्कृति और चिकित्सा प्रणाली सहित भारत की महान विरासत अर्थात योग की ओर भी संसार का ध्यानाकर्षित करने में महान सफलता प्राप्त की है। ऐसा नहीं है कि स्वामीजी से पूर्व इस दिशा में कोई कार्य नहीं हो रहा था या लोग भारत को ‘भारत’ के रूप में जानते नहीं थे। भारत को लेकर विदेशों के कई विद्वान पूर्व से ही गंभीर रहे हैं और भारत में भी भारत के गौरवपूर्ण अतीत को लेकर पूर्व से प्रयास होते रहे हैं। परंतु स्वामी रामदेव जी महाराज और आचार्य बालकृष्णजी ने इन प्रयासों की धार को और भी अधिक पैना कर दिया है। अब लोग विदेशों में भी भारत की आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्घति के प्रति आकर्षित हो रहे हैं और इस चिकित्सा पद्घति के सुपरिणाम देखकर अपनी एलोपैथिक चिकित्सा प्रणाली को भूल रहे हैं। वास्तव में उनका भारतीयता के प्रति ऐसा आकर्षण वास्तव में हम सबके लिए गर्व और गौरव का विषय है।
अब विश्व के चिकित्सा विज्ञानियों और शोधकर्ताओं का ध्यान इस ओर भी जा रहा है कि भारत की यह चिकित्सा प्रणाली कितनी पुरानी है और यह कैसे अतीत में लोगों का सफलतापूर्वक उपचार करती रही है? इसलिए लोगों ने प्राचीनकाल में आयुर्वेद अथवा प्राकृतिक चिकित्सा पद्घति के माध्यम से स्वयं को कैसे स्वस्थ रखा, इस विषय पर विश्वभर के विद्वानों और वैज्ञानिकों का ध्यान अब पहले की अपेक्षा कहीं अधिक जा रहा है। उसी का परिणाम है कि ऑस्टे्रलिया स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ एडीलेड और ब्रिटेन स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ लीवर पूल के शोधकर्ताओं का निष्कर्ष है कि अब से लगभग 40 हजार वर्ष पूर्व हमारे पूर्वज पीड़ान्तक औषधियों का प्रयोग करते थे। वे उन औषधियों को पेड़ पौधों से बनाते थे। शोधकत्र्ताओं का मानना है कि स्पेन में रहने वाले निएण्डरभल्स के दांतों के अवशेष का निरीक्षण कर यह दावा किया गया है कि वर्तमान समय की एस्प्रिन पैनिसिलिन दवाओं के प्राथमिक स्वरूप को हमारे पूर्वज जानते थे।
वैसे आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के वैज्ञानिकों का इस बात पर आश्चर्यचकित होना कि हमारे पूर्वज अब से हजारों वर्ष पूर्व भी पीड़ान्तक औषधियों की जानकारी रखते थे, वैसा ही है जैसे कि कुछ वैज्ञानिकों को यह जानकर आश्चर्य होता है कि भारत के ऋषि लोग न्यूटन से पूर्व ही गुरूत्वाकर्षण बल को जानते थे, और उन्हें यह भी ज्ञान था कि यह पृथ्वी घूमती है, पर सूर्य नहीं घूमता आदि। पीड़ांतक औषधियों के प्राचीनकाल में प्रयोग और उनके विषय में पूरी जानकारी रखने के विषय पर इस प्रकार के आश्चर्य को व्यक्त करने का कारण ये है कि आज के यूरोप की उन्नति और भौतिक विकास को ही कुछ लोगों ने विश्व का पहला और अंतिम विकास मान लिया है। उन्हें ऐसा लगता है कि यूरोप की आर्थिक उन्नति से पूर्व यह संसार अज्ञानान्धकार में सोया पड़ा था। इन लोगों की इस भ्रांति से यह बात भी जन्मी कि ईश्वर ने जब यह सृष्टि बनायी तो इसमें कोई व्यवस्था नाम की चीज नहीं थी-सब कुछ अस्त-व्यस्त और अव्यवस्थित था। उनका मानना है कि इस अस्त-व्यस्त और अव्यवस्थित सृष्टि व्यवस्था को मनुष्य ने ठीक किया। वास्तव में सारे संसार के व्यवस्थापक और सृष्टि के नियामक की व्यवस्था के प्रति इन वैज्ञानिकों की ऐसी सोच कि सृष्टि के व्यवस्थापक की सृष्टि को व्यवस्था मनुष्य ने प्रदान की-ईश्वर के प्रति मानव का एक प्रकार का उपहास ही है। जिसकी व्यवस्था में कोई दोष नहीं हो सकता, उसे इन लोगों ने दोषपूर्ण मान लिया-यही अविद्या कही जाती है।
बाबा रामदेव जी जैसे लोगों द्वारा भारतीय धर्म और संस्कृति की मचाई गयी धूम के परिणामस्वरूप अब जाकर विश्व की आंखें खुल रही हैं, और उसे धीरे-धीरे पता चल रहा है कि भारत की मान्यताएं ही महान हैं, सत्य हैं और अकाट्य हैं। विश्व ने एलोपैथिक चिकित्सा प्रणाली के माध्यम से अपनी जेब कटवाकर देख लिया और यह समझ लिया कि यह चिकित्सा प्रणाली तो हमें सिवाय मारने के और कुछ कर नहीं रही है और यदि हमने इसका पीछा नहीं छोड़ा तो यह हमारा सर्वनाश कर देगी। यही कारण है कि लोग जीवित और स्वस्थ रहने के लिए अपने सारे जातीय पूर्वाग्रहों और साम्प्रदायिक मान्यताओं को तिलांजलि देकर भारत के आयुर्वेद की शरण में आ रहे हैं।
स्वामी रामदेव जी महाराज और आचार्य बालकृष्ण जी ने विश्व को इस सत्य को समझाने में बड़ी भूमिका का निर्वाह किया है। विश्व ने जैसे ही इस सत्य को समझा है कि आयुर्वेद से ही हम स्वस्थ रह सकते हैं वैसे ही उसकी रूचि भारतीय चिकित्सा प्रणाली में बढ़ी है। उसी का परिणाम है कि उसने भारत की आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रणाली की ओर ध्यान देना आरंभ किया है। ऐसी खोजों से निश्चय ही भारत को विश्वगुरू बनाने और भारत की आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रणाली को विश्व की सार्वभौम चिकित्सा प्रणाली बनाने में हमें सहायता मिलेगी।  साथ ही स्वास्थ्य चिकित्सा के नाम पर अथवा औषधियों के निर्माण के नाम पर जिन निरीह प्राणियों की हत्या की जाती रही है और जिन प्राणियों की हड्डियों आदि से हमारे लिए सौंदर्य प्रसाधन व औषधियां बनती रही हैं, उनके जीवन की रक्षा भी हो सकेगी। क्योंकि सही दिशा में बढ़ता विश्व समुदाय एक दिन निश्चय ही यह भी समझेगा कि स्वास्थ्य का खजाना किसी के प्राणों का हनन करने से नहीं, अपितु किसी के प्राणों की रक्षा करने और प्राकृतिक सौंदर्य को अपने लिए प्रयुक्त करने से ही हो पाना संभव है। आज के संदर्भ में इस सबका यह पावन उद्देश्य होना चाहिए कि हम अपने गौरवपूर्ण अतीत की ऊर्जा को सारे संसार के लिए खुली छोड़ दें और उसके हर स्रोत पर से रहस्य का पर्दा उठा दें। संसार को अपनी ओर आकर्षित होने दें और अपने अतीत की वंदना करने दें।

”गम की अंधेरी रात में दिल को न बेकरार कर।

सुबह जरूर आएगी तू सुबह का इंतजार कर।।”

सुबह की प्यारी-प्यारी अनुभूति हो रही है, हमें इसके लिए अपने महान पूर्वजों का तो ऋणी होना ही चाहिए साथ ही स्वामी रामदेव जी महाराज और आचार्य बालकृष्ण के प्रति भी हार्दिक आभार प्रकट करना चाहिए, जिन्होंने हमें ही नहीं अपितु संसार को भी सुबह का अहसास कराया है।

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