राजनीति का इंजन

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कुछ लोग देश की अर्थव्यवस्था के संचालन में खेती का प्रमुख योगदान मानते हैं, तो कुछ उद्योगों का। कुछ व्यापार को सर्वाधिक महत्व देते हैं, तो कुछ भ्रष्टाचार को; पर शर्मा जी विवाह को भारतीय अर्थव्यवस्था का इंजन मानते हैं। उनका मत है विवाह के बाद बच्चे होते हैं। उनकी पढ़ाई, लिखाई, दवाई और सुख-सुविधाओं… Read more »

घमासान के बाद

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आम आदमी पार्टी (आपा) में पिछले दिनों हुए घमासान से शर्मा जी बहुत दुखी थे। उन्होंने सब नेताओं से कहा कि वे मिलकर काम करें; पर जो मिलकर काम कर ले, वह समाजवादी कैसा ? फिर यहां तो समाजवादी के साथ साम्यवादी, अराजकतावादी और अवसरवादी भी थे। यानि ‘करेला और नीम चढ़ा।’ इसलिए पहले जबरदस्त… Read more »

कविता : अलविदा– विजय कुमार

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 सोचता हूँ जिन लम्हों को ; हमने एक दूसरे के नाम किया है शायद वही जिंदगी थी !   भले ही वो ख्यालों में हो , या फिर अनजान ख्वाबो में .. या यूँ ही कभी बातें करते हुए .. या फिर अपने अपने अक्स को ; एक दूजे में देखते हुए हो ….  … Read more »

कविता : देह – विजय कुमार

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देह के परिभाषा को सोचता हूँ ; मैं झुठला दूं !   देह की एक गंध , मन के ऊपर छायी हुई है !!   मन के ऊपर परत दर परत जमती जा रही है ; देह …. एक देह , फिर एक देह ; और फिर एक और देह !!!   देह की भाषा… Read more »

कविता : मेरा होना और न होना – विजय कुमार

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  मेरा होना और न होना ….       उन्मादित एकांत के विराट क्षण ; जब बिना रुके दस्तक देते है .. आत्मा के निर्मोही द्वार पर … तो भीतर बैठा हुआ वह परमपूज्य परमेश्वर अपने खोलता है नेत्र !!! तब धरा के विषाद और वैराग्य से ही जन्मता है समाधि का पतितपावन सूत्र… Read more »

कविता:जोगन-विजय कुमार

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मैं तो तेरी जोगन रे ; हे घनश्याम मेरे ! तेरे बिन कोई नहीं मेरा रे ; हे श्याम मेरे !! मैं तो तेरी जोगन रे ; हे घनश्याम मेरे !   तेरी बंसुरिया की तान बुलाये मोहे सब द्वारे छोड़कर चाहूं सिर्फ तोहे तू ही तो है सब कुछ रे , हे श्याम मेरे… Read more »

कविता:एक स्त्री जो हूँ-विजय कुमार

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स्त्री – एक अपरिचिता   मैं हर रात ; तुम्हारे कमरे में आने से पहले सिहरती हूँ कि तुम्हारा वही डरावना प्रश्न ; मुझे अपनी सम्पूर्ण दुष्टता से निहारेंगा और पूछेंगा मेरे शरीर से , “ आज नया क्या है ? ”   कई युगों से पुरुष के लिए स्त्री सिर्फ भोग्या ही रही मैं… Read more »

कविता:तुम्हारा आना-विजय कुमार

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कल खलाओं से एक सदा आई कि , तुम आ रही हो… सुबह उस समय , जब जहांवाले , नींद की आगोश में हो; और सिर्फ़ मोहब्बत जाग रही हो.. मुझे बड़ी खुशी हुई … कई सदियाँ बीत चुकी थी ,तुम्हे देखे हुए !!!   मैंने आज सुबह जब घर से बाहर कदम रखा, तो… Read more »

कविता:मृत्यु-विजय कुमार

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ये कैसी अनजानी सी आहट आई है ; मेरे आसपास ….. ये कौन नितांत अजनबी आया है मेरे द्वारे … मुझसे मिलने, मेरे जीवन की , इस सूनी संध्या में ; ये कौन आया है ….   अरे ..तुम हो मित्र ; मैं तो तुम्हे भूल ही गया था, जीवन की आपाधापी में !!!  … Read more »

कविता:तलाश-विजय कुमार

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कुछ तलाशता हुआ मैं कहाँ आ गया हूँ ….. बहुत कुछ पीछे छूट गया है ….. मेरी बस्ती ये तो नहीं थी …..   मट्टी की वो सोंघी महक … कोयल के वो मधुर गीत … वो आम के पेड़ो की ठंडी ठंडी छांव .. वो मदमाती आम के बौरो की खुशबू … वो खेतो… Read more »